राजनीति
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव को कैसे प्रभावित करेंगे एस सी-एस टी वोट?

आशुचित्र- तीन उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों की संख्या उनके मत को महत्तवपूर्ण बनाती है।

छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनावों का पहला चरण 12 नवंबर को संपन्न हुआ और आज दूसरा और आखिरी चरण आज (20 नवंबर) को चल रहा है। इसी के साथ मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रत्याशियों के नामों की भी घोषणा कर दी गई है।

भारतीय राजनीति में हमेशा जाति की अहम भूमिका रही है। जहाँ एक तरफ सारी पार्टियाँ कोशिश कर रही हैं कि हर सीट पर एक उत्तम जाति संधि बनाई जाए, वहीं अनुसूचित जातियाँ और अनुसूचित जनजातियाँ (एस सी-एस टी), जिनका इन तीन राज्यों में अधिक प्रतिनिधित्व है, तय करेंगी कि सत्ता किसके पास जाएगी।

मुख्य तथ्य और आँकड़े

  • मध्य प्रदेश में 31 प्रतिशत, राजस्थान में 37 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 44 प्रतिशत एस सी-एस टी जनसंख्या है।
  • म प्र के 51 जिलों में से 19 में जनजातीय बहुलता है।
  • म प्र में 82, राजस्थान में 58 और छत्तीसगढ़ में 39 सीटें एस सी-एस टी समुदाय के लिए आरक्षित हैं।
  • वर्तमान में म प्र में भाजपा 35 में से 28 अनुसूचित जातियों और 47 में से 31 अनुसूचित जनजातियों की आरक्षित सीटों पर है।
  • छत्तीसगढ़ के 27 जिलों में से 5 जनजातीय बहुसंख्या वाले हैं।
  • वर्तमान में छत्तीसगढ़ में भाजपा 10 में से 9 अनुसूचित जातियों की आरक्षित सीट पर है।
  • जबकि अनुसूचित जनजातियों की सीट में कांग्रेस 29 में से 18 पर है जबकि भाजपा मात्र 11 पर।
  • राजस्थान में वर्तमान में भाजपा के पास 33 अनुसूचित जाति की सीटों में से 31 है और अनुसूचित जनजातियों की 25 सीटों में से 18।
  • म प्र की 137 विधान सभी सीटों पर एस सी-एस टी जनसंख्या 20 प्रतिशत से ज़्यादा है। इसी प्रकार के आँकड़े छत्तीसगढ़ में 47 और राजस्थान में 90 सीटों पर हैं।

इन आँकड़ों से साफ होता है कि इन तीन राज्यों की राजनीति में एस सी-एस टी समुदाय का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

मध्य प्रदेश

म प्र के पाँच जिलों- झबुआ, बरवानी, डिंडोरी, मंडला और धार में अनुसूचित जनजातियों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक है जबकि शहडोल और उमरिया में 40 प्रतिशत से ज़्यादा है। एस टी की आरक्षित सीटों की आधी सीटें इन जिलों में ही है। उज्जैन और सीहोर में अनुसूचित जातियों की संख्या 30 प्रतिशत से अधिक है। इन अनुसूचित जातियों में चमार और बलाही उप-जातियों की जनसंख्या 50 प्रतिशत है। भील और गोंड अनुसूचित जनजाति जनसंख्या का तीन-चौथाई भाग हैं। 2013 में 36 प्रतिशत एस सी मतदाताओं ने भाजपा का समर्थन किया, 33 प्रतिशत ने कांग्रेस का और 22 प्रतिशत ने बसपा का। वहीं 47 प्रतिशत एस टी मतदाताओं ने भाजपा और 43 प्रतिशत ने कांग्रेस का समर्थन किया था। एस सी सीटों पर बसपा की अच्छी पकड़ है, 2013 में यह तीन सीटों पर जीती थी। 8 सीटों पर बसपा का वोट शेयर जीत के अंतर से अधिक था।

राज्य में चुनाव से पहले भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस मायावती के साथ संधि करने का प्रयास कर रही थी। बसपा को एस सी मतादाताओं से अच्छा समर्थन मिलता है, विशेषकर कि जाटवों से जो एस सी जनसंख्या का 47 प्रतिशत हैं। मायावती स्वयं इसी उप-जाति की हैं। इससे कांग्रेस को एस सी आरक्षित सीटों में फायदा मिल सकता था। लेकिन वार्ता किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँची और इसकी भरपाई कांग्रेस को चुनाव में करनी पड़ सकती है।

जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) मध्य प्रदेश में जनजातीयों के अधिकारों के लिए कुछ समय से लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने इसके अध्यक्ष डॉ हीरालाल अलावा को मानावर सीट से टिकट दिया है। इससे एस टी सीटों पर पार्टी को लाभ मिल सकता है। लेकिन जयस के अन्य सदस्यों में इस बात को लेकर असंतोष है जो कांग्रेस और अलावा के लिए पेंचीदा सिद्ध हो सकता है।

राजस्थान

राजस्थान में 33 विधान सभा सीटें एस सी समुदाय के लिए तय हैं। 2013 में भाजपा इनमें से 31 सीटों पर जीती थी। अनुसूचित जनजातियों की बहुसंख्या वाले जिले हैं- डुंगरपुर, उदयपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ जहाँ उनकी जनसंख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। गंगानगर, हनुमानगढ़ और करौली में 25 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जातियों की संख्या है। 2013 में राजस्थान से बसपा किसी भी आरक्षित सीट पर नहीं जीती थी। लेकिन दो सीटों पर इसका वोट शेयर जीत के अंतर से अधिक है।

नेशनल पीपल्स पार्टी के राज्य अध्यक्ष और विधायक किरोड़ी लाल मीणा जिन्होंने बारतीय जनता पार्टी छोड़ दी थी, अब वापस आ गए हैं। उनकी वापसी से भाजपा राज्य के 7 प्रतिशत मीणा मतों पर आस लगाए बैठी है।

एस सी-एस टी सीटों में भी पूरे राज्य जैसा चलन रहा है। 2003 और 2013 में भाजपा अधिकांश सीटों पर विजयी हुई। 2008 में ज़्यादातर सीटों पर कांग्रेस का कब्ज़ा हुआ था। अब यह देखना है कि यही चलन बरकरार रहता है या नहीं।

छत्तीसगढ़

पाँच जिलों- बस्तर, दंतेवाड़ा, जशपुर, कांकेर और सुरगुज में 50 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जनजातियों की संख्या है जिन्हें मिलाकर राज्य की 29 आरक्षित सीटें बनती हैं। एस सी की 10 आरक्षित सीटें हैं। 2013 में बसपा एस सी सीटों में से एक भी नहीं जीत पाई थी। 4 सीटों पर बसपा का वोट शेयर जीत के अंतर से अधिक था।

छत्तीसगढ़ नक्सलवाद और हिंसात्मक गतिविधियों का गढ़ रहा है। दशकों से राज्य सरकार माओवादी संगठनों से संघर्ष कर रही है जिसमें दोनों ही पक्षों की ओर से हथियारबद्ध गतिविधियाँ हुई हैं। दक्षिण छत्तीसगढ़ पर नक्सलियों की अच्छी पकड़ है जहाँ बस्तर, दंतेवाड़ा और कांकेर जैसे जनजातीय बहुल जिले हैं और इनमें 13 सीटें हैं। राज्य औसत से मतदाताओं की भागीदारी इस क्षेत्र में कम ही रही है और राज्य औसत सेअधिक यहाँ नोटा भी डाला गया।

छत्तीसगढ़ में हमेशा दो राष्ट्रीय पार्टियों में सीधा मुकाबला होता है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के आने से चीज़ें पेंचीदा हो गई हैं क्योंकि यहाँ हपले ही भाजपा और कांग्रेस के बीच मतों का अंतर 2013 में एक प्रतिशत से कम था। अजीत जोगी जो पहले कांग्रेस में थे, अब उन्होंने बसपा के साथ संधि कर ली है जिसका राज्य के कुछ भागों में प्रभाव है। जोगी जनजातीयों व सतनामी समुदाय में लोकप्रिय हैं लेकिन उनकी कमज़ोरी यह है कि ज़्यादातर लोग अभी भी उन्हें कांग्रेस का सदस्य मानते हैं क्ययोंकि उनकी पार्टी अभी भी ग्रामीण इलाकों तक यह बात नहीं पहुँचा पाई है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि एस सी-एस टी समुदाय किसे पसंद करते हैं, उसका प्रभाव मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों पर देखा जा सकता है।

कुमारी खुशबू को भी श्रेय।  

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार इनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।