राजनीति
अपने गिरेबान में झाँककर देखें इमरान खान, क्या है पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति

आशुचित्र- भारत को अल्पसंख्यकों से व्यवहार का पाठ पढ़ाने वाले इमरान खान को अपने देश की परिस्थितियों से सरोकार रखने की आवश्यकता है।

जहाँ एक तरफ 25 दिसंबर को भारत में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में सुशासन दिवस मनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर उसी दिन पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्नाह का जन्मदिन मानाया जाता है।

इस अवसर पर अपने क़ैद-ए-आज़म (अर्थ- महान नेता) को याद करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक ट्वीट में लिखा कि जिन्नाह का सपना एक लोकतांत्रिक पाकिस्तान का था जहाँ अल्पसंख्यकों को भी समान अधिकार मिलें। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि जिन्नाह का शुरुआती राजनीतिक जीवन हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत के रूप में गुज़रा था।

इसके अगले ही ट्वीट में उन्होंने भारत-पाकिस्तान के विभाजन का कारण हिंदू बहुसंख्यकों द्वारा मुस्लिम अल्पसंख्यकों से असमान व्यवहार बताकर भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर प्रश्न खड़ा किया।

पहले बात करें मोहम्मद अली जिन्नाह की तो यह कहना गलत नहीं होगा कि वे एक अवसरवादी नेता थे। इंगलैंड से पढ़कर लौटे जिन्नाह का आंग्लीकरण हो चुका था। उनका रहन-सहन एक मुस्लिम से अधिक अंग्रेज़ों से मेल खाता था। जब उन्हें लगा कि धर्मनिरपेक्षवाद (सेक्युलरिज़्म) से खुद को स्थापित किया जा सकता है तब वे हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करने लगे और 1940 के दशक में उन्होंने हवा के बदलते रुख के अनुसार खुद को एक मुस्लिम नेता के रूप में स्थापित कर लिया। सत्याग्रह आंदोलन को राजनीतिक अराजकता मानने वाले नेता अगर भारत में अल्पसंख्यकों को समान स्थिति में नहीं पाते हैं तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हाँ, यह सत्य है कि जिन्नाह ने पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र की तरह स्थापित नहीं किया था लेकिन जिस राष्ट्र का निर्माण सामुदायिक आधार पर हुआ हो, वहाँ धर्मनिरपेक्षवाद की बात करना ढोंग के अलावा और कुछ नहीं है।

नरेंद्र मोदी सरकार को अल्पसंख्यकों से व्यवहार सिखाने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को 1948 की याद दिलाते हैं जब कराची में रहने वाले 1300 यहूदियों को पाकिस्तान से खदेड़ दिया गया था। 1956 में पाकिस्तान को एक इस्लामिक गणतंत्र घोषित किया गया था और 1967 से 2014 तक ईश-निंदा कानून के तहत 1,300 लोगों को सज़ा दी जा चुकी थी।

पाकिस्तान के अखबार द डॉन  ने 2017 में ज़मीनी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें सिंध प्रांत के थारपारकर और उमेरकोट जिलों में हिंदुओं के बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन की बात कही गई है। इस क्षेत्र में विशेषकर युवतियों व नाबालिग लड़कियों का लव जिहाद के माध्यम से धर्म-परिवर्तन करवाया जा रहा है। और वहीं दूसरी ओर यदि कोई हिंदू युवक मुस्लिम युवती से विवाह करना चाहता है तो उसे इस्लाम अपनाना होता है। पाकिस्तान हिंदू परिषद के संरक्षक डॉ रमेश ने बताया कि ऐसा एक भी मामला सामने नहीं आया जहाँ स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन किया गया हो। धर्म-परिवर्तन करवाने वाले मौलवी याकूब ने बताया कि पिछले 15 साल में उन्होंने 9000 लोगों को इस्लाम क़ुबूल करवाया है। इसके अलावा उन्होंने आर्थिक कारणों से धर्म-परिवर्तन करने की बात कही क्योंकि मुस्लिम कल्याण संघ द्वारा परिवर्तित लोगों को पक्का घर बनाने के लिए ईंटें, घी, सिलाई मशीन, आटा आदि चीज़ें दी जाती हैं।

पेशावर के सिखों का कहना है कि 2014 से प्रमुख सिख चेहरों को जान-बूझकर निशाना बनाया जा रहा है। यहाँ तक कि पिछले वर्ष हुई जनगणना में भी सिखों को शामिल नहीं किया गया था जिससे उनकी जनसंख्या के ठोस डाटा उपलब्ध नहीं हैं लेकिन समाज सेवक रादेश सिंह ने बताया कि अब पेशावर में मात्र 8,000 सिख ही बचे हैं।

चलिए मान लेते हैं कि ये सब पुरानी बाते हैं और इमरान खान कुछ नया करना चाह रहे हैं। तो देखते हैं कि उनके पद संभालने के बाद अल्पसंख्यकों के साथ पाकिस्तान में कैसा व्यवहार किया गया। यू-टर्न को कुशल राजनीति का हिस्सा मानने वाले इमरान खान ने आर्थिक तंगी झेल रहे देश को बचाने के लिए भी यू-टर्न का सहारा लिया है। 2009 में दो मज़दूरों से क्रिश्चियन के घर का पानी न पीने की लड़ाई पर 2010 में एक क्रिश्चियन महिला एशिया बीबी पर ईश-निंदा का मामला दर्ज किया गया था और उन्हें मृत्युदंड की सज़ा भी नवंबर 2010 में सुना दी गई थी। पैगंबर मोहम्मद की बुराई करने के आरोप में आठ साल तक कानूनी कार्यवाही झेलने वाली बीबी को पोप के हस्तक्षेप पर रिहाई मिली। रिहाई के बाद पाकिस्तान की इस्लामिक पार्टियों ने तीन दिन तक प्रदर्शन भी किया था लेकिन सौदे के अनुसार पाकिस्तान सरकार उनकी सज़ा के लिए फिर से सिफारिश नहीं कर सकती थी इसलिए इमरान खान को चुप बैठना पड़ा।

हाल ही में मनाए गए क्रिसमस के त्यौहार पर इमरान खान ने केवल ईसाई धर्म को मानने वाले नागरिकों को ही इसकी शुभकामनाएँ दी जो यह साफ दर्शाता है कि वे धर्मनिरपेक्ष तो नहीं हैं। करतारपुर साहिब गलियारे के उद्घाटन के दौरान भी इमरान खान को सिखों के तीर्थ स्थल का महत्त्व समझाने के लिए उसकी तुलना मदीना से करनी पड़ी जो उनके देश में अल्पसंख्यकों के प्रति लोगों की उदासीनता दर्शाता है।

भारत में आकर ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाले ट्विटर के सीईओ को भी पाकिस्तानी ईश-निंदा कानून आवश्यक लगता है और इसलिए दिसंबर के दूसरे सप्ताह में ट्विटर ने कनाडा के स्तंभकार एंथोनी फरे, सऊदी-कैनेडियन कार्यकर्ता इंसाफ़ हैदर तथा इमाम मोहम्मद ताहिदी को नोटिस भेजा था। इमरान खान की सरकार खुद को ईश-निंदा कानून का पालन करने के लिए इतना प्रतिबद्ध मानती है कि जो पाकिस्तान के नागरिक नहीं हैं, उन्हें भी नोटिस भेजा गया था।

दूसरों को सद्-व्यवहार का पाठ पढ़ाने वाले इमरान खान को अगर भारत के अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंतनीय लगती है तो या तो वे अपने देश की परिस्थितियों को नहीं जानते या “चोरी और सीनाज़ोरी” की कहावत को साकार करने के लिए आतुर हैं।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।