राजनीति
हिंदी सोशल मीडिया का चुनावों पर प्रभाव व इसका विस्तार

आशुचित्र- 2014 का चुनाव भले ही सोशल मीडिया का रहा हो परंतु 2019 का चुनाव ‘हिंदी’ सोशल मीडिया का होगा।

2014 में नरेंद्र मोदी की जीत पर कई विश्लेषक लेख छपे जिनमें से कई ने उनकी जीत का श्रेय सटीक सोशल मीडिया प्रभाव को दिया। माना गया कि सोशल मीडिया प्रचार ने मुख्य रूप से पहली बार मतदान देने वाले युवाओं को प्रभावित किया। भारतीय इंटरनेट एवं मोबाइल संघ (आईएएमएआई) की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि सोशल मीडिया ने 24 राज्यों के 3 से 4 प्रतिशत मतों को प्रभावित किया।

फाइनेन्शियल टाइम्स और सीएनएन तो मोदी के सोशल मीडिया प्रचार से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने लेख का शीर्षक क्रमशः  नरेंद्र मोदी टू बी इंडियाज़ फर्स्ट सोशल मीडिया प्राइम मिनिस्टर  और इंडियाज़ फर्स्ट सोशल मीडिया इलेक्शन  रखा।

2014 से अब तक कई चीज़ें बदली हैं। 4जी (विशेषकर जियो) के आने से डाटा उपभोग की मात्रा बढ़ी है, साथ ही डाटा की सस्ती उपलब्धता से अब इंटरनेट ग्रामीण क्षेत्रों में भी जगह बना चुका है। जहाँ 2014 में प्रति स्मार्टफ़ोन 0.26 जीबी डाटा की खपत होती थी, वहीं 2017 में यह आँकड़ा 4 जीबी तक पहुँच गया। साथ ही यह भी अंदाज़ा लगाया गया है कि 2014 की तुलना में 2019 के चुनावों में 10 गुना अधिक डाटा की खपत होगी।

नवीनतम डाटा के अनुसार 52.83 करोड़ भारतीय हिंदी को अपनी मातृभाषा के रूप में मानते हैं और इनमें से 2016 में 25.4 करोड़ लोग इंटरनेट पर हिंदी के प्रयोग को प्राथमिकता देते थे। केपीएमजी इंटरनेशनल द्वारा अप्रैल 2017 में जारी रिपोर्ट से अनुमान लगाया जाए तो वर्तमान में लगभग 28 करोड़ लोग चैट ऐप पर, 36 करोड़ लोग डिजिटल मनोरंजन पर और 26 करोड़ लोग सोशल मीडिया पर भारतीय भाषा के प्रयोग को प्राथमिकता देते हैं।

बढ़ती डाटा की खपत का सीधा संबंध वीडियो से है। कई रिपोर्टों में बताया गया कि 65 से 75 प्रतिशत तक डाटा खपत ऑनलाइन वीडियो में होती है और सोशल मीडिया पर भी 90 प्रतिशत डाटा वीडियो के लिए उपभोग किया जाता है। यह सत्य है कि अधिकांश वीडियो संगीत व मनोरंजन के देखे जाते हैं लेकिन इसके बाद तीसरा स्थान समाचार एवं राजनीति संबंधित वीडियो का है जिसका सब्सक्राइबर बेस 12 करोड़ है।

ऐसे में हमने यूट्यूब पर चैनलों को टटोला और पाया कि शीर्ष हिंदी न्यूज़ चैनल आज तक, इंडिया टीवी, एनडीटीवी इंडिया और ज़ी न्यूज़ के क्रमशः 1.6 करोड़, 1.1 करोड़, 70 लाख व 20 लाख सब्सक्राइबर हैं, वहीं शीर्ष अंग्रेज़ी चैनल सीएनएन, एनडीटीवी 24X7, इंडिया टुडे और टाइम्स नाउ के क्रमशः 63 लाख, 39 लाख, 16 लाख और 10 लाख सब्साक्राइबर हैं। यानी शीर्ष अंग्रेज़ी चैनल हिंदी के शीर्ष तीसरे चैनल से भी नीचे है और शीर्ष हिंदी चैनल से इसमें 1 करोड़ सब्सक्राइबर का अंतर है।

सिर्फ इतना ही नहीं किसी एक ही मुद्दे पर बने एक ही प्रकार के वीडियो को हिंदी में अंग्रेज़ी की तुलना में कम से कम दोगुने व्यूज़ मिले थे, चाहे वह बालाकोट हवाई हमले के संबंध में हो या राफेल की कैग रिपोर्ट के संबंध में। लेकिन एक ही मुद्दे पर कई अलग-अलग वीडियो डाले जाते हैं और कुल व्यूज़ की बजाय एक वीडियो से तुलना करना भ्रामक हो सकता है इसलिए हमने एक ही चैनल द्वारा एक ही मुद्दे पर डाले गए अंग्रेज़ी और हिंदी वीडियो में तुलना की। 2019 बजट के हिंदी विश्लेषण को 4.5 लाख व्यूज़ मिले थे और अंग्रेज़ी वीडियो को 45 हज़ार। 10 गुना का आँकड़ा अधिक आश्चर्यजनक सिद्ध हुआ।

यह तो सिर्फ समाचार की बात हुई जिससे मात्र सूचना मिलती है लेकिन आजकल लोग हर राजनीतिक मुद्दे पर अपना मत भी रखते हैं जिसके लिए कई वैचारिक चैनल भी यूट्यूब पर अस्तित्व में हैं। यदि आप इन्हें खोजेंगे तो आपको इनमें से अधिकांश की भाषा हिंदी ही मिलेगी। राजनीतिक दलों के भी अपने यूट्यूब चैनल हैं, जहाँ भाजपा के 11 लाख सब्सक्राइबर हैं, वहीं कांग्रेस के 4 लाख। चुनावी मौसम में इन चैनलों पर प्रतिदिन 5-6 वीडियो डाले जा रहे हैं जिनमें से भाजपा के अधिकांश वीडियो हिंदी भाषा में ही हैं, वहीं कांग्रेस के कुछ वीडियो अंग्रेज़ी में भी हैं।

वीडियो जगत से बाहर निकलकर उन मंचों पर आते हैं जहाँ ये वीडियो साझा और प्रसारित किए जाते हैं। 2014 के चुनावों में भले ही फ़ेसबुक और ट्विटर प्रमुख सोशल मीडिया मंच रहे हों लेकिन अब दृश्य बदल चुका है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 2014 से 2018 के बीच वॉट्सैप पर न्यूज़ साझा करने का चलन तीन गुना बढ़ा है। वहीं फ़ेसबुक पर यह संख्या घटी है। भारत में 2017 में 14 प्रतिशत लोग वॉट्सैप का उपयोग करते थे, वहीं 2018 में यह संख्या बढ़कर 24 प्रतिशत हो गई। वॉट्सैप की नीति के अनुसार यह नहीं पता लगाया जा सकता है कि किस प्रकार की सामग्री इसपर साझा हो रही है लेकिन आप सभी वॉट्सैप के सक्रिय उपभोक्ता होंगे, इसका अनुमान लगाने का कार्य आप पर छोड़ा जा रहा है।

ट्विटर पर हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता पर यूएस में एक अध्ययन किया गया था और इसका सूचक यह है कि राजनेताओं के सर्वाधिक रिट्वीट किए गए 15 ट्वीटों में से 11 हिंदी में होते हैं। 2016 के बाद देखा गया कि पार्टियों द्वारा हिंदी में किए गए ट्वीट बेहतर प्रदर्शन करते हैं। चौकीदार अभियान के संदर्भ में जितने भी ट्वीट हुए उनमें अंग्रेज़ी की तुलना में हिंदी ट्वीट 25 प्रतिशत अधिक थे। कई रिपोर्टों में यह पाया गया कि राष्ट्रव्यापी मुद्दों को हिंदी में अधिक पढ़ा व लिखा जाता है। जटिल नीतिगत निर्णयों पर चर्चा भले ही अंग्रेज़ी में होती है परंतु उनके प्रभावों का आँकलन हिंदी में ही किया जाता है।

राजनीतिक पार्टियों के ट्विटर हैंडल की बात करें तो भले ही भाजपा के कांग्रेस से दोगुने फॉलोअर हैं लेकिन दोनों के ट्वीटों पर प्रतिक्रिया में अधिक अंतर नहीं देखा जा सकता। साथ ही जहाँ भाजपा के हिंदी ट्वीटों की संख्या अंग्रेज़ी ट्वीटों से 4 गुना अधिक है, वहीं कांग्रेस को दोनों भाषाओं का बराबर प्रयोग करते देखा जा सकता है। हिंदी भाषी क्षेत्रों की पार्टियों की बात करें तो देखा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी (सपा) लगभग अपना हर ट्वीट हिंदी में ही करती है और ऐसा ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ भी देखा गया है।

फ़ेसबुक से जहाँ समसामायिक गतिविधियों के प्रति जागरूक लोग ट्विटर और मनोरंजन में अधिक रुचि रखने वाले लोग इंस्टाग्राम की ओर रुख कर रहे हैं, वहीं यहाँ राजनीतिक पेजों पर ट्विटर की तुलना में कम फॉलोअर होने पर भी अधिक प्रतिक्रियाएँ होना आश्चर्यजनक था। यहाँ भी हिंदी का प्रयोग ट्विटर के परदचिह्नों पर ही हो रहा है। इंस्टाग्राम पर सामान्य पोस्टों के अलावा राजनीतिक मीम प्रचलित नज़र आए जिसमें अंग्रेज़ी की तुलना में हिंदी मीम दोगुने हैं। कांग्रेस अंग्रेज़ी-हिंदी को यहाँ भी बराबर रख रही है लेकिन भाजपा यहाँ भी हिंदी को प्राथमिकता दे रही है। कांग्रेस से चार गुना फॉलोअर होने वाले भाजपा के हैंडल के पोस्ट पर लगभग दोगुनी प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं।

राजनीति में हिंदी का प्रयोग हमेशा से ही प्रचलित रहा है क्योंकि जिह्वा पर चढ़ने वाले जुमले मातृभाषा में ही हो सकते हैं लेकिन पहले की तुलना में जो बढ़त देखी गई है, वह यह है कि अब देवनागरी लिपि में ही अधिकांश हिंदी का प्रयोग हो रहा है जो हिंदी के इस प्रभाव को मुखर कर रहा है। 2014 का चुनाव भले ही सोशल मीडिया का रहा हो परंतु 2019 का चुनाव ‘हिंदी’ सोशल मीडिया का होगा।