राजनीति
यदि सर्वोच्च न्यायालय वाकई में मध्यस्थता चाहता है तो वामपंथ को इससे बाहर रखे

आशुचित्र-

  • अगर सर्वोच्च न्यायालय वाकई में एक मध्यस्थ हल चाहता है तो इसे राजमोहन गांधी जैसे उचित बुद्धिजीवियों की ओर रुख करना चाहिए, न कि अपूर्वानंद जैसे दुष्ट।
  • अगर मध्यस्थता प्रक्रिया में कोई भी वामपंथी बुद्धिजीवी होगा तो यह विचार पनपने से पहले ही मृत है।

यह रोचक है लेकिन आश्चर्यजनक नहीं कि अयोध्या मामले की सुनवाई कर रही पाँच जजों की पीठ पुनः मध्यस्थता को विवाद सुलझाने के लिए एक तार्किक साधन मान रही है। एक मध्यस्थ या मध्यस्थता पैनल की नियुक्ति की घोषणा संभवतः 6 मार्च को की जाएगी।

मध्यस्थता का विचार उतनी ही पुराना है जितना कि ये विवाद। भारत के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर ने 2017 में यह सुझाव दिया था, यहाँ तक कि वे खुद भी इसकी मध्यस्थता करने के लिए तैयार थे। 1991 में स्वर्गीय प्रधानमंत्री चंद्र शेखर ने भी मध्यस्थता का प्रयास किया था लेकिन वामपंथी इतिहासकार बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी के लिए बिना किसी साक्ष्य के ही विजयी हो गए। जब 2010 में इलाहाबाद बेंच ने निर्णय सुनाया तब वामपंथी इतिहासकारों ने गलत साक्ष्य प्रस्तुत कर निर्णय को बदलने का प्रयास किया। (वामपंथी नमकहरामियों को जानने के लिए यह और यह पढ़ें)

हाल ही में सुनवाई से पूर्व श्री श्री रविशंकर ने मध्यस्थता का प्रयास किया था और एक मुस्लिम पार्टी, शिया समूह को अपनी योजना में सम्मिलित कर लिया था।

इस माह की शुरुआत में महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी ने एक साधारण समझौते का प्रस्ताव रखा। इंडियन एक्सप्रेस  में लिखते हुए उन्होंने यह कहा, “समझौते की खुली रग को पहचानना मुश्किल नहीं है। पहला यह कि हिंदू पक्ष मानता है कि मस्जिद को गिराना गलत था। दूसरा, भारतीय राज्य संरचना को गिरने से रोक पाने में असमर्थता को अपनी असफलता स्वीकार करता है। तीसरा, मुस्लिम पक्ष राम मंदिर देखने की हिंदू समुदाय की अभिलाषा को समझता है क्योंकि हिंदू समुदाय का मानना है कि जहाँ बाबरी मस्जिद थी, वहीं पहले एक मंदिर हुआ करता था। चौथा, स्थल से निकट ही मस्जिद बनाने के लिए भूमि हिंदू समुदाय और भारतीय राज्य उपलब्ध कराएगा। अगर आवश्यकता हुई तो ये चार कदम साथ-साथ हो सकते हैं। इस स्वप्न जैसे दृश्य में गलती स्वीकार करने से न्याय और समाधान का द्वार खुलता है।”

राजमोहन गांधी एक बिंदु पर थोड़ा भ्रामक हैंउनका सुझाव है कि बाबरी मस्जिद के स्थल के नीचे एक मंदिर का अस्तित्व केवल एक हिंदू विश्वास था जबकि पुरातात्विक साक्ष्य ने स्पष्ट रूप से इसे तथ्य के रूप में स्थापित किया है। और अगर हम इसे स्वीकार करते हैं तो एक और स्वीकृति की आवश्यकता है कि मुसलमानों को यह स्वीकार करना चाहिए कि अतीत में मुस्लिम शासकों द्वारा उनके मूर्तिभंजन के प्रति उत्साह के कारण कई मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था।

यहाँ तक ​​कि अगर इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि बाबरी के निर्माण के लिए एक मंदिर को वास्तव में ध्वस्त कर दिया गया था तो कम से कम यह स्वीकार कर सकते हैं कि हिंदुओं द्वारा पवित्र माने जाने वाले स्थान पर कथित रूप से बर्बाद मंदिर पर मस्जिद का निर्माण एक गलती थी।

इसलिए राम जन्मभूमिबाबरी मुद्दे के सभी पहलुओं पर सही सुलह और समझ होनी चाहिए। लेकिन हम क्षमा और भूलकर आगे बढ़ने की सामान्य भावना से इसे जाने दे सकते हैं अगर राजमोहन गांधी को सुझावों को वास्तव में सभी दल स्वीकार करते हैं।

लेकिन वामपंथी और फर्जी धर्मनिरपेक्षता ढोंग करने वाले इसे आसानी से जाने नहीं देंगे। उन्होंने वास्तव में कभी भी सत्य को बढ़ावा देने और इस सरल कारण के लिए सामंजस्य स्थापित करने में विश्वास नहीं किया क्योंकि यदि हिंदू और मुसलमान एक हो सकते हैं तो उनकी धर्मनिरपेक्षता की कोई आवश्यकता नहीं होगी जो अनिवार्य रूप से हिंदुओं के खिलाफ हैं। भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर वैश्विक सेमिनारों के लिए कोई निमंत्रण नहीं होगा, गुजरात में 2002 के दंगों पर अमेरिकी कांग्रेस को सबूत देने के लिए कोई पांच सितारा निमंत्रण नहीं होगा, आदि।

आश्चर्य की बात नहीं है कि राजमोहन गांधी के बयान पर बमुश्किल एक सप्ताह बाद, दिल्ली विश्वविद्यालय के एक हिंदी प्राध्यापक अपूर्वानंद ने प्रस्ताव पर विचार किया और प्रस्ताव कोएक सड़ा हुआ समझौताकहा। अपूर्वानंद एक हिंदू फोबिक बुद्धिजीवी हैं और उनकी विकिपीडिया प्रोफ़ाइल में उन्हें एक “धर्मनिरपेक्षऔरअल्पसंख्यक अधिकारों का अथक चैंपियनकहा गया है “वे हिंदी प्रमुख क्षेत्रों में संघ परिवार के सबसे मुखर आलोचकों में से एक हैं।”

यह मानते हुए कि यह व्यक्ति खुद का वर्णन कैसे करेगा यह स्पष्ट करता है कि वह मानवाधिकारों का बचाव करने के लिए आगे नहीं आया है बल्किअल्पसंख्यक अधिकारोंके लिए आगे आया है। भारत में अल्पसंख्यकों की संख्या 20 करोड़ है और दुनिया में कहीं भी इस तरह की संख्या अल्पसंख्यक कहलाने के योग्य नहीं होगी।

अगर सर्वोच्च न्यायालय वाकई में एक मध्यस्थ हल चाहता है तो इसे राजमोहन गांधी जैसे उचित बुद्धिजीवियों की ओर रुख करना चाहिए, न कि अपूर्वानंद जैसे दुष्ट। अगर मध्यस्थता प्रक्रिया में कोई भी वामपंथी बुद्धिजीवी होगा तो यह विचार पनपने से पहले ही मृत है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।