भारती / राजनीति
विचारधारा को चुनावी राजनीति में केंद्र बिंदु न बनाना भाजपा के लिए हानिकर होगा

इन दिनों मुकुल रॉय के कारण बंगाल की राजनीति पुनः चर्चा के केंद्र में है। रॉय का आना निश्चय ही संयोग नहीं था और ना वापस लौट जाना ही। मुकुल आए तो कई ‘कुल’ (परिवार) उनके साथ आए और लौट गए तो ‘कुल’ (मिलाकर) कई साथ ले भी गए।

यह पहली बार नहीं कि भाजपा ने विचारधारा से बाहर समझौता किया है। लोकतंत्र की एक विडंबना यह भी है कि देशहित-लोकहितोन्मुखी विचारधारा से राजनीति आरंभ करने वाले दल को अपना अस्तित्व बनाए रखने हेतु कभी-कभार चुनावी राजनीतिक समीकरणों का उपयोग करना (सहारा लेना) पड़ता है।

अस्तु, स्वतंत्रता-पूर्व से ही सामाजिक एवं राजनीतिक उथल-पुथल की दृष्टि से बंगाल चर्चा का विषय रहा है। बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए ही ‘जन संघ’ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी राजनीति में सक्रिय हुए थे।

स्मरणीय है कि राष्ट्रवाद पर ‘कांग्रेस के विकृत विचार’ और ‘अधिनायकवादी शासन’ के कारण अनेकानेक सक्रिय नेताओं ने कांग्रेस को त्यागकर नई राजनीतिक धाराएँ बनाने का महत्कार्य किया। मुखर्जी ने भी कांग्रेस का त्याग करके ही लोकहित-राष्ट्रहित के लिए जन संघ की स्थापना की थी।

उल्लेखनीय है, वे स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री थे। कांग्रेस से अलग होने के पीछे मुखर्जी की ‘विचारधारात्मक’ दृष्टि एवं दृढ़ता थी, जिसकी परिणति ‘जन संघ’ की स्थापना में हुई। स्मरणीय है कि मुखर्जी ‘भारत विभाजन’ के पक्ष में नहीं थे।

विभाजन के पश्चात् 1950 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में हिंदुओं पर हुए अत्याचार और हत्याओं के विरुद्ध मुखर्जी द्वारा निवेदन करने के बाद भी नेहरू ने कोई विशेष कार्रवाई नहीं की। इसके विपरीत नेहरू-लियाकत समझौता हुआ।

मुखर्जी यह जान चुके थे कि धर्मनिरपेक्षता, आधुनिकता और समाजवाद के नाम पर नेहरू का रवैया पाकिस्तान परस्त है। वास्तव में ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार से यह कहा जा सकता है कि नेहरू की धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक एवं समाजवादी राजनीति का निहितार्थ था– मुस्लिम तुष्टीकरण।

बंगाल में उन दिनों (इन दिनों!) मुस्लिम तुष्टीकरण चरम पर था (है!)। कांग्रेस से निकलकर बनी तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में इसने सातवाँ आसमान छू लिया है। मुखर्जी की विचारधारा का मुख्य बिंदु था– ‘अखंड भारत’।

ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है कि वे मुस्लिम समुदाय के विरोधी कदापि नहीं थे। मूलतः मुस्लिम लीग द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले ‘सांप्रदायिक विद्वेष’ से उनका वैचारिक विरोध था। भारत विभाजन के बाद कश्मीर मुद्दे पर भी उनका दृढ़ मत था कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

उन्होंने ही नारा दिया था– ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे’। मोदी शासित भाजपा ने अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाकर मुखर्जी का स्वप्न पूर्ण किया। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी। यह लोकहित-देशहित में विचारधारात्मक राजनीति की जीत थी।

मुखर्जी गोलवलकर (गुरुजी) के सामाजिक-सांस्कृतिक-सांगठनिक और विचारधारात्मक पक्ष के मुरीद थे, तो गोलवलकर मुखर्जी की राष्ट्र-निष्ठा और ‘अखंड भारत’ के स्वप्न एवं प्रण के मुरीद थे। इस प्रकार ‘अखंड भारत’ की विचारधारा का संधान करने वाले दो सुचिंतित समभाव वाले व्यक्तित्वों की आपसी सुझ-बूझ का ही परिणाम था कि दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और पेप्सू (पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ, जिसका 1956 में पंजाब में विलय हुआ) में भारतीय जन संघ की इकाइयाँ गठित हुईं।

21 अक्टूबर 1951 को संस्थापक अध्यक्ष डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जन संघ का अखिल भारतीय पार्टी के रूप में उद्घाटन किया। यह विचारधारा के प्रति दृढ़ निष्ठा एवं लोकहित-देशहित में सकारात्मक दूरदर्शिता के कारण ही संभव हो पाया था। कांग्रेस की केंद्रीय कार्यकारिणी से त्याग-पत्र देने के बाद भारतीय जन संघ की स्थापना कांग्रेस के विकल्प की खोज का ही परिणाम था। जन संघ से लेकर वर्तमान स्वरूप तक भाजपा की यात्रा सहज नहीं थी।

भारतीय जन संघ (वर्तमान भाजपा) की प्रतिबद्धता भारत की गौरवमयी संस्कृति और मर्यादा के आलोक में राष्ट्रवाद पर कांग्रेस के विकृत विचार, अधिनायकवाद, मायामय समाजवाद, अल्पसंख्यक (मुस्लिम) तुष्टीकरण के बरक्स आधुनिक, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक मूल्यों से युक्त राष्ट्र के पुनर्निर्माण के प्रति रही है।

विचारधारा के आधार पर भारतीय जन संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि को गोलवलकर के दि आर्गनाइज़र में 25 जून 1956 को प्रकाशित लेख ‘हाउ जन संघ वॉज़ फाउंडेड’ से समझा जा सकता है–

“जब एक बातचीत में सहमति हुई तो मैंने अपने निष्ठावान एवं परखे हुए सहयोगियों को चुना, जो निस्वार्थ और दृढ़-इच्छाशक्ति वाले थे और एक नई पार्टी का बोझ उठाने की क्षमता रखते थे। इस तरह डॉ मुखर्जी भारतीय जन संघ की स्थापना के अपने आदर्श को साकार कर सके।”

दलहित-राष्ट्रहित में संघ-भाजपा की यह वास्तविक चिंतन-धारा थी (है?)। जब-जब भाजपा विचारधारा से बाहर लोगों का साथ-सहयोग लेती है, ऐसा प्रतीत होता है गोया इस चिंतन-धारा को चुनावी राजनीतिक खेल में सफलता हेतु इधर ताक़ पर रख दिया गया है।

विचारधारा की बात आती है, तो बहुतांश विचारक (विशेषकर वामपंथी और कांग्रेस परस्त) भाजपा को ‘दक्षिणपंथी’ पार्टी कहते हैं। परंतु दीनदयाल उपाध्याय ने जन संघ की विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहा था–

“यह (जन संघ) उन रीति-रिवाज़ों और परंपराओं से चिपके रहना नहीं चाहता, जो निरर्थक या रुग्ण हो चुके हैं। इस दृष्टि से इसे रामराज्य परिषद से भिन्न माना जाना चाहिए। हम अपने समाज को सुधारने की आवश्यकता का अनुभव करते हैं, ताकि वह आधुनिक समय की चुनौतियों का सामना कर सके।

परंतु आधुनिक बनने का प्रयास करते समय हमें सावधान रहना है, ताकि आधुनिकता के वेश में पश्चिमीकरण प्रवेश न कर जाए। यहीं जन संघ कांग्रेस, पीएसपी, सीपीआई और स्वतंत्र पार्टी जैसी अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों से भिन्न है, जो विभिन्न रूपों में और भिन्न-भिन्न हदों तक पश्चिम के राजनीतिक और आर्थिक विकास को भारतीय परिदृश्य में प्रक्षेपित करना चाहते हैं।

अतः हम ‘दक्षिण’ और ‘वाम’ अथवा ‘समाजवाद’ और ‘पूँजीवाद’ की सभी अवधारणाओं को अस्वीकार करते हैं। हमारे जैसे विस्तृत एवं समृद्ध विरासत वाले देश के जीवन को विदेश से आयातित सुनिश्चित साँचों में नहीं ढाला जा सकता।” (जन संघ, सेमिनार, नई दिल्ली, जनवरी 1962, पृ 20)

अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 1972 में भागलपुर में आयोजित एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इस भ्रामक संकल्पना (दक्षिणपंथ) का निषेध करते हुए सटीक कहा था कि “हम न तो बाएँ जा रहे हैं और न दाएँ जा रहे हैं; हम सीधे जा रहे हैं और राष्ट्र को उचित विकल्प देने की अपनी नियति को पूरा करने के लिए आगे ही बढ़ते जाएँगे।” (द मदरलैंड, नई दिल्ली, 8 मई 1972)

उन्होंने यह भी कहा था कि “जन संघ वह पार्टी है, जो आगे बढ़ने की अपनी कोशिश में पीछे देखने में विश्वास करती है।” (द हिंदू, मद्रास, 9 अगस्त 1972) लालकृष्ण आडवाणी ने इसी धारा को स्पष्ट करते हुए 1975 में एक साक्षात्कार में कहा था–

“जन संघ किसी भी आर्थिक वाद के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है और ‘दक्षिण’ तथा ‘वाम’ जैसे शब्द भारतीय संदर्भ में बिल्कुल ही प्रासंगिक नहीं हैं। पश्चिम की लोकतांत्रिक राजनीति में ‘वामपंथ’ का अर्थ मोटे तौर पर हो गया है– राज्य द्वारा नियंत्रण की ओर झुकाव।

जिस दूसरी महत्वपूर्ण कसौटी पर पश्चिम में वाम-दक्षिण का भेद आधारित है, वह है समानता के प्रति रुख, परिवर्तन के प्रति रुख। पहली कसौटी के आधार पर जन संघ को दक्षिणपंथी पार्टी कहा जा सकता है। लेकिन दूसरी कसौटी पर जन संघ को वामपंथी पार्टी कहा जा सकता है। सच्चाई यह है कि यह न तो वामपंथी है और न दक्षिणपंथी। यह भविष्योन्मुखी पार्टी है।”

न वाम, न दक्षिण अपितु बौद्धिक-दार्शनिक दृष्टि से “जन संघ दयानंद और तिलक की सुधारवादी परंपरा का अनुकरण करता है– सिर्फ सामाजिक क्षेत्र में नहीं, बल्कि आर्थिक मुद्दों तक भी उसका विस्तार करने का प्रयास करता है।

भारतीय संस्कृति और मर्यादा भारतीय जन संघ का आधार हैं। भारतीय संस्कृति का अर्थ सिर्फ वे तत्व नहीं हैं, जो किसी विशेष जन की सांस्कृतिक विशेषताओं का निर्धारण करते हैं, बल्कि एक विश्व दर्शन भी है। यही दर्शन न केवल विभाजित विश्व को एक कर सकता है, बल्कि उसे शांति प्रदान कर सकता है।

सह-अस्तित्व और विश्व ऐक्य के आदर्श तब तक सिर्फ रणनीतिक नारे रहेंगे, जब तक वे इस जीवंत दर्शन से अनुप्राणित नहीं होते। हमारा मिशन यही है। भारतीय संस्कृति जड़ नहीं, गतिशील है। हम पाते हैं कि समाज में दो तरह की प्रवृत्तियाँ कार्यशील हैं।

एक प्रवृत्ति प्राचीन को स्वीकार करती है, जिसका निहितार्थ यह है कि मौजूदा स्थिति मानों किसी धर्म विधान से जुड़ी हुई है, जिसके बारे में प्रश्न नहीं किया जा सकता और जिसे कभी बदला नहीं जा सकता। दूसरी प्रवृत्ति जो कुछ भी पुराना है, उसकी भत्सर्ना करती है और दिशा तथा रूपाकार की परवाह किए बगैर परिवर्तन के लिए व्याकुल है।

जन संघ इन दोनों प्रवृत्तियों के विरुद्ध है। अतीत हमारे लिए प्रेरणा की वस्तु है। लेकिन हमें भविष्योन्मुख होना है। जन संघ को हमारी जनता के पुनर्जागरण का सक्षम औजार बनना है। हमें एक आंदोलन का नेतृत्व करना है, न कि सिर्फ एक पार्टी बनानी है।

यह कोई नया आंदोलन नहीं है। पिछली शताब्दी के दौरान स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, डॉ हेडगेवार, मदनमोहन मालवीय और महात्मा गांधी इस क्षेत्र में अग्रणी रहे हैं।” (दीनदयाल उपाध्याय, दि ऑर्गनाइज़र, नई दिल्ली, दीपावली अंक, 1964, पृ 11)

उपरोक्त बौद्धिक-दार्शनिक पृष्ठभूमि के आलोक में तत्कालीन जन संघ अर्थात् वर्तमान भाजपा की सांगठनिकता एवं विचारधारा का परिचय मिल जाता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा की धारा में जन संघ अर्थात् भाजपा (संघ सहित) ‘कृणवन्तो विश्वमार्यम्’ का ही निर्वाह कर रही है– अर्थात् संसार के सारे मनुष्यों को श्रेष्ठ गुण-​कर्म-स्वभाव वाले बनाने का उपक्रम।

निश्चय ही वह दक्षिण-वाम (लेफ्ट-राइट) की पक्षधर नहीं है और रामो-वामो-कामो के विपरीत कैडर-आधारित पार्टी है। यद्यपि चुनावी राजनीति को दृष्टिगत रखते हुए भाजपा ने विशेषकर पूर्व, पूर्वोत्तर एवं घाटी में विचारधारा से बाहर के नेताओं को पार्टी में सम्मिलित किया अथवा अन्य दलों के साथ गठबंधन किया तथापि ध्यातव्य है कि लोकतंत्र में संख्या ही निर्णायक होती है।

परंतु भाजपा को अपनी जड़ों (विचारधारा और कैडर) को अधिक मज़बूत बनाने की आवश्यकता है। पूर्व और पूर्वोत्तर में कार्यकर्ताओं को अधिक मज़बूत बनाने की आवश्यकता है। इधर, घाटी में बहुत हद तक वैचारिक जागरण दृष्टिगोचर हो रहा है।

उत्तर प्रदेश चुनाव में (पिछले और हालिया) भाजपा ने जातिवादी राजनीति को पस्त-ध्वस्त कर ही दिया है। अब पूर्व में विचारधारा का विकास करने की नितांत आवश्यकता है। कथित भद्र लोगों की अभद्रता को शनैः-शनैः ही सही वास्तविक भद्रता (श्रेष्ठ गुण-​कर्म-स्वभाव) का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है।

मुकुल रॉय जैसे भ्रष्ट एवं अवसरवादियों के जनाधार को देखकर विचारधारा के साथ समझौता करना भविष्य के लिए हानिकर हो सकता है। गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी के उपरोक्त कथनों को गीता के संदेश की भाँति स्मरण रखकर ही पार्टी अपने वास्तविक उद्देश्य की प्राप्ति कर सकती है।

मुकुल रॉय का तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में सम्मिलित होना और अब फिर घर-वापसी कर जाना तथा जितिन प्रसाद का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होना दल-बदल की ‘अवसरवादी राजनीति’ के जीवंत उदाहरण हैं।

विचारधारा से बाहर और भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं के समावेशन से विचारधारा की राजनीति दलदल में फँस सकती है। कहना न होगा कि रॉय का भाजपा में जुड़ना और चुनावोपरांत दल बदलना सोची-समझी कूटनीतिक चाल थी।

कल्पनीय है कि यूथ कांग्रेस से राजनीति में प्रवेश करने वाले रॉय ने 1998 में ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की और न केवल 2011 में वामपंथियों के विरुद्ध टीमसी को आश्चर्यजनक जीत दिलाई, अपितु अगले कार्यकाल में भी टीमसी को सत्ता में बरकरार रखने की कार्यनीति बनाई थी।

कहा जाता है कि उन दिनों, यदि बनर्जी पार्टी का भावनात्मक स्रोत और निर्विवाद नेत्री थीं, तो रॉय की कैडरों पर गहरी पकड़ थी और वे ही उन्हें नियंत्रित भी करते थे। 2015 में नारदा-शारदा घोटालों में उनका नाम आने के बाद ममता ने उनसे किनारा किया ताकि बंगाल की राजनीति में इसका गहरा प्रभाव ना पड़े।

मामले की गंभीरता देखते हुए रॉय बड़ी चतुराई से नवंबर 2017 में भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा को पश्चिम बंगाल में पैर जमाने के लिए यह सुनहरा अवसर प्रतीत हुआ और वह ममता-रॉय द्वारा फेंके जाल में बुरी तरह फँसी।

मुकुल रॉय के आने से अनेक टीएमसी कार्यकर्ता भी भाजपा में शामिल हुए और इस तरह पश्चिम बंगाल में भाजपा ‘तृणमूल कांग्रेस भाग-2’ बनी, जिसकी भाजपा समर्थक एवं कार्यकर्ताओं द्वारा घोर आलोचना हुई।

अब रॉय की टीएमसी में ‘घर वापसी’ के बाद भाजपा को आकलन और आत्म मंथन करने की आवश्यकता है कि भारतीय जन संघ बनाते समय किस प्रकार निष्ठावान और परखे हुए कार्यकर्ताओं को चुना गया था। इन दिनों भाजपा यूँ ही किसी भी ‘ऐरे-गैरे नत्थू खैरे’, भ्रष्ट और विचारधारा के धुर विरोधियों को पार्टी में शामिल कर अपनी विचारधारात्मक छवि को धूमिल ही नहीं कर रही है, अपितु भविष्य में विचारधारा के लिए खतरे आमंत्रित कर रही है।

कांग्रेस के किसी नेता ने चुनावों के दौरान कहा था कि ‘यह पार्टियों की नहीं, विचारों की लड़ाई है।’ भाजपा की विचारधारा से विपरीत कांग्रेस की नींव परिवारवाद, अधिनायकवाद, भ्रष्टाचार, देश हितैषी विचारधारा विरोध पर टिकी हुई है।

वर्तमान में एकमात्र भाजपा ही देशहित-लोकहितैषी राष्ट्रीय पार्टी है। कांग्रेस को राष्ट्रीय कहना अनुचित ही होगा, क्योंकि वह कुछ राज्यों में ही सिमट चुकी है और वहाँ भी अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की बैसाखियों के सहारे लंगड़ा रही है।

भाजपा को अपनी विचारधारा में मंझे-परखे हुए अपने कार्यकर्ता और कैडरों का सम्मान करना चाहिए। उनकी निष्ठा एवं योग्यता का समुचित उपयोग करना चाहिए। स्मरणीय है, राष्ट्रवाद पर विकृत विचार, अधिनायकवाद, मायामय समाजवाद, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के कारण ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का दौर आरंभ हुआ था।

अपनी विचारधारा को ताक पर रखकर विचारधारा से बाहरवालों को समाविष्ट करते हुए भाजपा को निश्चय ही मंथन करना चाहिए कि कहीं ‘गैर-भाजपावाद’ का दौर ना आरंभ हो जाए! कहते हैं, अपनी नाँव बनाने में अपने सुपरिचित सहयोगियों को ही साथ रखना उचित होता है।

विरोधियों को निर्माण-कार्य में सम्मिलित करने से नाँव के दुर्बल पक्ष और गुप्त-मार्ग का भी पता चल जाता है। अनुमान करें, वह कितना हानिकर होगा? कहते हैं, छत्रपति शिवाजी महाराज दुर्गों की रक्षा का दायित्व अपने जाने-परखे मावलों को ही देते थे ताकि उनकी अभेद्यता सुनिश्चित रहे।

भाजपा ने अत्यंत कम समय में रॉय को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक बना दिया और ना जाने कितने ही निष्ठावान कार्यकर्ता एवं कैडरों को दुखी किया है। हिंदी के रीतिकालीन कवि गिरधर कविराय ने “घर-आँगन आवै अनगैरी। हित की कहै बनाय जानिए पूरो बैरी।।” के माध्यम से नीतिपरक संदेश दिया था।

वर्तमान समय में भाजपा को पूरी चिंतनशीलता के साथ इस सीख का अंगीकार करना चाहिए। सही मायने में भाजपा को कृष्ण की तरह युद्ध में साथ-साथ ना लड़ने वाले परंतु जीत सुनिश्चित करने वाले तथा कर्ण की तरह आपके गलत होने के बावजूद साथ रहने वाले और मरते दम तक साथ न छोड़ने-लड़ने वाले मित्रों की आवश्यकता है।

गिरधर कविराय की ये पंक्तियाँ भी प्रसंगोचित हैं– “बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय। काम बिगारै आपनो, जग में होत हंसाय॥” भाजपा के लिए यह आत्म मंथन का समय है। ‘अब पछताए क्या होत जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत’ वाली स्थिति से बचने का यही मार्ग है।

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।