राजनीति
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सीटों का बँटवारा शिवसेना के लिए क्या उजागर करता है

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। 288 सीटों पर होने वाले चुनाव में गठबंधन के रूप में भाजपा और शिवसेना मैदान में हैं। दोनों दलों के बीच सीट बँटवारे का गणित लगभग तय हो गया है, इसकी औपचारिक घोषणा दोनों दल साथ मिलकर जल्द ही कर सकते हैं। 288 सीटों में से भाजपा 144 सीट पर जबकि शिवसेना 126 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

शिवसेना के इतिहास में यह पहली बार है कि वह महाराष्ट्र की राजनीति में छोटे भाई की भूमिका में है। दोनों दलों के शुरुआती गठबंधन से ही शिवसेना हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रही है, लेकिन इस बदलते स्वरूप ने शिवसेना की राजनीति आस्तित्व पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

गठबंधन के बारे में कहा जा रहा है कि भाजपा अपने पास मुख्यमंत्री का पद रखेगी, जबकि शिवसेना को उपमुख्यमंत्री का पद दिया जाएगा। कभी महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी धाक के लिए प्रसिद्ध शिवसेना इस स्थिति में कैसे पहुँची? आखिर शिवसेना की कौन सी गलती आज उसके भविष्य के लिए खतरा बन गई है?

इसके लिए हमें शिवसेना के अतीत में जाना होगा। 2012 में शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे के निधन के बाद से ही शिवसेना का पतन शुरू होने लगा था। ठाकरे अपने जीवनकाल में ही अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को पार्टी की कमान सौंपकर निश्चित हो गए थे, लेकिन उद्धव को जनता के बीच बाल ठाकरे जैसी स्वीकार्यता नहीं मिली।

रही सही कसर बाल ठाकरे के राजनीतिक रुख ने पूरी कर दी, जिसमें उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का विरोध किया था। बाल ठाकरे ने एनडीए की ओर से सुषमा स्वराज के नाम को आगे बढ़ाया था, लेकिन उनके आकस्मिक निधन ने उनके इस राजनीतिक रुख का उल्टा परिणाम दिया।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद मोदी-शाह की जोड़ी ने पार्टी और सरकार पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। उसी साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शिवसेना को आधी-आधी सीटें पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया, लेकिन शिवसेना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। नतीजा शिवसेना के विपरीत गया और भाजपा ने सरकार बना ली।

चूँकी भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत नहीं थी इसलिए पार्टी ने शिवसेना को किसी भी तरह अपने साथ मिलाकर पाँच साल तक सरकार चलाई, लेकिन अब भाजपा शिवसेना के प्रभाव को कम करती नज़र आ रही है।

भाजपा ने इन पाँच सालों में शिवसेना की बुनियाद पर ही चोट कर दी। एक युवा नेता देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाकर महाराष्ट्र में शिवसेना की युवा हिंदुत्व वाली राजनीतिक ज़मीन को ही छीन लिया।

शिवसेना जानती है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने उसकी राजनीतिक ज़मीन को कुंद कर दिया है और गठबंधन में अगर नहीं रहे तो पार्टी में बड़ी टूट हो सकती है, इसलिए शिवसेना अब छोटे भाई की भूमिका में रहकर ही अपनी राजनीतिक ज़मीन बचाने में लगी है।

शिवसेना के नकारात्मक रवैये ने भी उसपर काफी असर डाला है। सरकार में रहते हुए सरकार की आलोचना ने पार्टी की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। महाराष्ट्र में पार्टी के जनाधार और जनता के बीच यह बात गई कि शिवसेना विपक्ष की राजनीति के लिए ही बनी है। भाजपा ने इसका बखूबी फायदा उठाया।

पहले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने शिवसेना को कम सीट देकर और अब विधानसभा में छोटे भाई की भूमिका में रखकर पार्टी के पुराने इतिहास और वर्चस्व पर गहरा चोट किया है।

इस बार कयास लगाया जा रहा है कि ठाकरे परिवार भी चुनावी मैदान में उतरेंगे। संभावना है कि आदित्य ठाकरे को चुनावी मैदान में उतारा जाएगा। शिवसेना को लगता है कि ठाकरे परिवार को चुनाव लड़ने से पार्टी के अंदर नई उर्जा का संचार होगा।

शिवसेना को लगता है कि ठाकरे परिवार के राजनीति परिधि में रहने से पार्टी में टूट-फूट की संभावनाओं से बचा जा सकता है और पार्टी पर आए इस संकट से भी उबरा जा सकता है।