राजनीति
पुलवामा पर बंगाल की नई पीढ़ी का आक्रोश बदलती राजनीतिक संस्कृति का परिचायक

आशुचित्र-

  • पुलवामा हमले के बाद पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व राष्ट्रवादी आक्रोश और उत्कट देशप्रेम देखा गया जो पिछले कई वर्षों से अगोचर था।
  • इस अभूतपूर्व राष्ट्रवाद और देशप्रेम से बंगाल की राजनीति और राजनीतिक संस्कृति में हो रहा परिवर्तन झलकता है।

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के काफिले पर हमले ने बंगाल समेत राष्ट्र व्यापी भर्त्सना देखी। लेकिन बंगाल में और भी कुछ हुआ, कुछ ऐसा जो पिथले सात दशकों में नहीं हुआ। पुलवामा हमले के बाद पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व राष्ट्रवादी आक्रोश और उत्कट देशप्रेम देखा गया जो पिछले कई वर्षों से अगोचर था।

शहरों, नगरों और गाँवो में पुरुषों और महिलाओं को गर्व से तिरंगा फहराते हुए और “भारत माता की जय”, “वंदे मातरम” और “जय हिंद” जैसे उद्घोषों के साथ सड़कों पर मार्च करते हुए देखा गया। उनका जोश अचूक और संक्रामक था। “पाकिस्तान मुर्दाबाद” और “भारत ज़िंदाबाद” के नारे भी लगाए गए। ये जुलूस, कैंडल लाइट मार्च और सीआरपीएफ के बलिदानी जवानों को श्रद्धांजलि ने स्वतः ही गति पकड़ ली और पूरे राज्य को इसमें ओतप्रोत कर दिया।

इस अभूतपूर्व राष्ट्रवाद और देशप्रेम से बंगाल की राजनीति और राजनीतिक संस्कृति में हो रहा परिवर्तन झलकता है। 89 वर्षीय प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी गिरजा देवी जो उत्तरी कोलकाता के बोबाज़ार में रहती हैं, ने बताया कि स्वाधीनता के बाद से बंगाल में ऐसा देशप्रेमी और राष्ट्रवादी जोश नहीं देखा गया था। “बंगाल ने असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया था और सभी कट्टर राष्ट्रवादी थे। लेकिन बंगाल में राजनीतिक संस्कृति बदली, विशेषकर 1960 के बाद से और यह राष्ट्रवादी जोश दशकों बाद देखने को मिला।”, उन्होंने कहा।

सिर्फ राष्ट्रवादी नारेबाज़ी और ध्वजारोहण ने ही राजनीतिक पंडितों का ध्यान आकृष्ट नहीं किया। इसके साथ सीआरपीएफ पर हमले का समर्थन करने वालों की भी कड़ी आलोचना हुई जो सेना के कथित अत्याचार को इसका दोषी ठहरा रहे थे। वामपंथी छात्रों, अध्यापकों व व्यावसायिकों द्वारा पाकिस्तान की दोषमुक्ति व सेना के अत्याचारों का हवाला देकर अप्रत्यक्ष रूप से इस अपराध को सही ठहराने के संबंध में सोशल मीडिया पर किए गए पोस्टों की भी भरसक निंदा हुई।

इस प्रकार के पोस्ट को शेयर किया गया और अल्प समय मेंये वाइरल हो गए। युवक-युवतियाँ इन पोस्ट को करने वालों के विरोध में सड़कों पर उतर आए और उनसे माफी भी मंगवाई। इन लोगों की बेइज़्ज़ती के वीडियो भी वाइरल हुए जिससे और लोग माफी मांगने को तैयार हो गए। कुछ ने मर्यादा की सीमा को लांघकर उन लोगों के साथ हाथापाई भी की जिन्होंने पाकिस्तान समर्थक या आतंक समर्थक पोस्ट किए थे। लेकिन बंगाल के लोकव्यवहार में परिवर्तन अचूक था। भारत-विरोधी और पाकिस्तान समर्थक पोस्ट या फिर कश्मीरियों की दुर्दशा का हवाला देकर आतंक को सही ठहराने वाले पोस्ट करने वालों के नियोक्ता से संपर्क कर उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए कहा गया।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बंगाल अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि ये दर्शाता है कि अब युवा राज्य के राजनीतिक कथात्मक (नैरेटिव) में राष्ट्र विरोधी तत्वों को स्वीकार नहीं करेंगे। “बहुत लंबे समय से वामपंथी व छद्म-धर्मनिरपेक्षवादियों (स्युडो-सेक्युलर) ने बंगाल की राजनीतिक व बौद्धिक चर्चा पर शासन किया। और यह चर्चा अधिकांश रूप से भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रही। देशप्रेम को तुच्छ समझा जाता था व राष्ट्रवादी जोश को भद्दा और आक्रामक कहा जाता था। इस कथात्मक के अनुसार कश्मीर और कश्मीरी मुस्लिमों के मामले में भारतीय राज्य ही दोषी था। और इसलिए कश्मीर में आतंकवाद तर्कसंगत था।”, उन्होंने कहा।

“बंगाली कम्युनिस्ट, छद्म-धर्मनिरपेक्षवादी व छद्म-उदारवादी राजनेताओं व बुद्धिजीवियों ने हमेशा यह तर्क दिया कि पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को आतंकी हमले का दोषी नहीं कहा जाना चाहिए और इस बात में आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है कि पाकिस्तानियों से संबंध बनाए रखा जाए, भले ही वे भारत और भारतीयों पर कितने बी हमले करते रहें। भाग्यवश, अब यह बदल गया है और सामाजिक-राजनीतिक रूप से जागरूक नई पीढ़ी अब इस स्व-पराजय और अदेशभक्तिपूर्ण कथात्मक में विश्वास नहीं रखती। इससे भी अधिक यह कि वे इस कथात्मक को चुनौती दे रहे हैं और परिवर्तन की ओर बल दे रहे हैं।”, घोष ने कहा।

“पहले (कम से कम पिछले 50 सालों में), बंगाल में किसी प्रकार के राष्ट्रवाद को व्यग्र दृष्टि से देखा जाता था। “पूर्ण रूप से भारत-विरोधी न दिखने के लिए वामपंथी और तथाकथित उदारवादी सूक्ष्म तरीके से भारत और सुरक्षा बलों का अपमान करते थे और पाकिस्तान द्वारा, कश्मीरी आतंकवादियों द्वारा या माओवादियों द्वारा किए गए हमले को सही ठहराते थे। यह तब हुआ जब बंगाल में बुद्धिजीवी वर्ग में वामपंथियों और छद्म-धर्मनिरपेक्षतावादियों का प्रभुत्व था।”, भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा ने कहा।

अचानक से उभरे इस राष्ट्रावादी जोश और देशभक्ति ने बंगाल के पुराने बुद्धिजीवियों, कम्युनिस्टों और यहाँ तक कि तृणमूल कांग्रेस को भी अचंभित कर दिया है और उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा। बंगाली समाचार-पत्रों ने भी इस ट्रेंड पर टिप्पणी की है और यहाँ तक कि इन देशप्रेमियों की पहचान पर आश्चर्य भी व्यक्त किया है। “बंगाल की सड़कों पर ‘भारत माता की जय’ चिल्लाते हुए और तिरंगा फहराते हुए ये लोग कौन हैं?”, एक बंगाली दैनिक आनंदबाज़ार पत्रिका  की हेडलाइन में लिखा था। कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों ने राष्ट्रवाद के इस प्रदर्शन की निंदा भी की।

कलकत्ता विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले अमलेंदु भट्टाचार्य ने कहा कि यह परिवर्तन अपरिहार्य है। “पहले की तरहबंगाल के युवा किसी कक्ष में कैद नहीं हैं। जादवपुर और प्रेसिडेन्सी विश्वविद्यालय जो वामपंथ की ओर झुके हुए हैं, उनके अलावा पूरे बंगाल में वही लहर है जो पूरे देश में है। आज देश की युवा पीढ़ी अत्यधिक देशप्रेमी और राषट्रवादी है और इस ट्रेंड ने बंगाल पर भी अपना प्रभाव छोड़ा है।”, भट्टाचार्य ने कहा। इसके अलावा सोशल मीडिया का भी योगदान है जो विचारों को प्रभावित करती है और कथात्मक गढ़ने में सहायक है, उन्होंने जोड़ा।

रित्विक आचार्य एक बड़ी टेक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं व जादवपुर विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। सोशल मीडिया पर राष्ट्र-विरोधियों को सूचीबद्ध कर, वे बंगाली देशभक्तों की एक अनौपचारिक सेना का सहयोग करते हैं। कोलकाता के न्यू टाउन-राजरहाट में काम कर रहे आचार्य कहते हैं कि वे सोशल मीडिया पर राष्ट्र-विरोधी भाव और सामग्री को ढूंढते हैं। “इसके बाद, मैं अपने समूह के साथ इनकी पहचान साझा करता हूँ और वे इसे और प्रसारित करते हैं। इन लोगों को ऑनलाइन शर्मसार किया जाता है। इसका मूल उद्देश्य उनके विस्तार को और राष्ट्र-विरोधी भाव को फैलने से रोकना है।”, आचार्य ने कहा। “मैं जादवपुर विश्वविद्यालय से स्नातक हूँ जो वामपंथियों का गढ़ है। मुझे पूर्ण ज्ञान है कि वामपंथी कैसे राष्ट्र-विरोधी भावनाओं को फैलाते हैं और पूर्वोत्तर के विद्रोहियों, माओवादियों और कश्मीरी आतंकवादियों जैसे भारत-विरोधी तत्वों के लिए रक्षा कवच का निर्माण करते हैं। इसलिए उन्हें इस गंदे खेल में हराने के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ।”, उन्हेंने कहा।

बंगाल का यह ताज़ा ट्रेंड राज्य में भाजपा की स्वीकार्यता की ओर संकेत देता है। पार्परिक रूप से चले आ रहे वामपंथी संभाषण के स्थान पर एक नए संभाषण की स्थापना संघ परिवार की सफलता है। वामपंथियों और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चिंता का एक कारण यह भी है। लेकिन भले ही वामपंथी और अन्य इस नई राष्ट्रवादी भावना पर कितने भी चिंतित हों, यह ट्रेंड स्थाई है। और साथ ही स्वागत योग्य भी।