राजनीति
इतिहास करुणानिधि के लिए निर्दयी होगा जब उनकी तुलना एमजीआर के साथ की जाएगी

प्रसंग
  • इतिहास निश्चित रूप से करुणानिधि के लिए निर्दयी होगा जब उनकी तुलना एमजीआर के साथ की जाएगी, खासकर जब चुनावी भाग्य की बात होगी।

जब भी तमिलनाडु की राजनीति के इतिहास की समीक्षा, पुनर्लेखन या चर्चा होती है, तब द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) के प्रमुख एम. करुणानिधि और अखिल भारतीय अन्ना द्रमुक के संस्थापक एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) का चेहरा सामने आएगा। विशेष रूप से उनके जीवन की घटनाओं के कुछ कड़वे सच सामने आएंगे।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि द्रविड़ आंदोलन को करुणानिधि के तीखे संवादों और एमजीआर के अभिनय से लाभ मिला। ऐसा नहीं है कि द्रविड़ आंदोलन के तीसरे स्तम्भ सी.एन. अन्नादुराई कहीं से भी कम प्रतिभाशाली थे लेकिन दुर्भाग्यवश वह यह देखने के लिए पर्याप्त समय तक जीवित नहीं रहे कि कैसे यह आंदोलन किसी भी राष्ट्रीय दल को तमिलनाडु की सत्ता में काबिज होने का रत्ती भर भी मौका न देते हुए फला-फूला।

इससे लोग करुणानिधि और एमजीआर एवं उनके प्रशासनों की तुलना आसानी से कर सकते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है कि करुणानिधि के अंतर्गत तमिलनाडु के शहरी इलाकों ने एक बेहतर प्रशासन देखा था। झुग्गी बस्तियों में विकास उनके प्रशासन की पहली प्राथमिकता थी। दूसरी तरफ एमजीआर ने ग्रामीण तमिलनाडु पर अधिक ध्यान दिया था क्योंकि वह आंतरिक क्षेत्रों से, विशेष रूप से महिलाओं से अपनी शक्ति जुटाते थे।

इतिहास निश्चित रूप से करुणानिधि के लिए निर्दयी होगा जब उनकी तुलना एमजीआर के साथ की जाएगी, खासकर जब चुनावी भाग्य की बात होगी। तमिलनाडु में 1980 के लोकसभा चुनावों को छोड़कर, जब एआईएडीएमके ने 39 सीटों में से सिर्फ दो सीटों पर ही जीत हासिल की थी, करुणानिधि ने कभी भी एमजीआर के खिलाफ सफलता का स्वाद नहीं चखा। लेकिन इस परिणाम को शायद इंदिरा गांधी के पक्ष में तमिलनाडु के वोट के रूप में समझा जाना चाहिए, चूंकि इससे पहले जनता पार्टी 1977 में अपनी विजय के बाद सत्ता में रहने के लिए एकजुट नहीं रह सकी थी।

द्रविड़ इतिहास पर एक नजर एमजीआर को प्राथमिक बल के रूप में इंगित करती है, जिस बल ने 1969 में अन्नादुराई की मृत्यु के बाद करुणानिधि को मुख्यमंत्री बनाया। एमजीआर ने करुणानिधि को समर्थन देने फैसला किया यह सुनिश्चित करने के लिए कि करुणानिधि ही मुख्यमंत्री बनें न कि वी.आर. नेदुंचेझियान, जिनके सत्ता संभालने और मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद थी। इतिहासकारों का कहना है कि लेकिन बाद के वर्षों में एक सन्निकट एमजीआर शो का फैसला हो चुका था जो 1971 तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में द्रमुक के व्यय विवरण की मांग के लिए एमजीआर के निष्कासन के बाद स्वाभाविक रूप से अन्ना द्रमुक के गठन का कारण बना।

एक नवजात पार्टी के रूप में अन्ना द्रमुक ने जो अपना पहला चुनाव जीता वह था 1973 में डिंडीगुल लोकसभा के लिए एक उपचुनाव। करुणानिधि इस जीत को एमजीआर की सनक बताते हुए खारिज कर रहे थे। 1977 में यह करुणानिधि और द्रमुक के लिए बदतर हो गया। एमजीआर अन्ना द्रमुक, द्रमुक और कॉंग्रेस के बीच एक त्रिकोणीय चुनाव में अपनी पार्टी की विजय के साथ सत्ता में काबिज हो गए। एआईएडीएमके और इसके गठबंधन सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी और फॉरवर्ड ब्लॉक को 33.5 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिला।

चूंकि एमजीआर ने जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया था, इसलिए करुणानिधि ने भी 1980 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए मौके का फायदा उठाया। इसने कॉंग्रेस-द्रमुक गठबंधन को तमिलनाडु के चुनावों में जीत दिलाने में मदद की। चूंकि इन्दिरा गांधी ने उनके खिलाफ गठबंधन खड़ा करने के लिए एमजीआर को कभी भी माफ नहीं किया था इसलिए उन्होंने कुछ अन्य राज्य सरकारों के साथ तुरंत उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया। यह बर्खास्तगी एमजीआर को एक और अधिक मजबूत मतदाता समर्थन के साथ वापस लेकर आई। यह शायद तमिलनाडु में पहला चुनाव था जिसने दिखाया था कि एक मजबूत गठबंधन क्या कर सकता है।

हालांकि अन्ना द्रमुक को लगभग 39 प्रतिशत ही वोट प्राप्त हुए थे लेकिन दोनों कम्यूनिस्ट पार्टियों, फॉरवर्ड ब्लॉक और कुछ छोटी पार्टियों के साथ इसके गठबंधन ने जीत सुनिश्चित करने वाले 48.9 प्रतिशत वोट हासिल किए। द्रमुक गठबंधन को 44.4 प्रतिशत वोट मिले लेकिन इसका स्वयं का वोट शेयर 1977 से कुछ तीन अंक नीचे गिरकर 22.1 प्रतिशत पर आ गया। कॉंग्रेस ने तब 20 प्रतिशत वोट प्राप्त किए थे।

1984 के चुनावों में, तमिलनाडु के मतदाता द्रमुक के खिलाफ और भी कठोर थे। लेकिन इस बार कॉंग्रेस ने पाला बदल लिया था और यह अन्ना द्रमुक से जा मिली थी और इस प्रकार यह गठबंधन को स्पष्ट लाभ था। अंत में इस गठबंधन को लगभग 54 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए, जबकि द्रमुक को अपने प्रदर्शन में सुधार देखने के बावजूद अपने गठबंधन के लिए 37 प्रतिशत और स्वयं के लिए 29 प्रतिशत वोटों से संतुष्ट होना पड़ा। लेकिन 1984 का चुनाव अन्ना द्रमुक की दूसरी सर्वश्रेष्ठ जीत ही नहीं था बल्कि यह एक ऐसा यादगार चुनाव था जो एमजीआर ने अमेरिका के ब्रुकलिन अस्पताल में अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे जीता था।

इस चुनाव की दो अन्य विशेषताएं थीं। पहली, संभवतः, मेरे व्यक्तिगत विचार में, इस चुनाव ने तमिलनाडु में फोटो-शॉपिंग की पैदाइश को देखा था। द्रमुक की आधिकारिक पत्रिका मुरासोली ने ब्रुकलिन अस्पताल की एमजीआर की तस्वीरें छापीं और मतदाताओं को बताया कि अभिनेता से नेता बने एमजीआर सक्रिय राजनीति में दोबारा वापसी नहीं कर पाएंगे। दूसरी, द्रविड़ आंदोलन के दिग्गज करुणानिधि द्वारा मतदाताओं से बार-बार कहना कि जब तक एमजीआर अस्पताल से वापस नहीं आ जाते तब वे जनादेश उन्हें दें। उन्होंने अपील की, “मैं इसे उन्हें वापस सौंप दूँगा।” लेकिन तमिलनाडु के लोगों के लिए उनका एक और बयान था: “क्या यह पर्याप्त नहीं है कि आपने मुझे इतने लंबे समय तक दंडित किया है!”। लेकिन तमिलनाडु में मतदाता टस से मस नहीं हुए।

1987 में एमजीआर की मृत्यु हो गयी और राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में करुणानिधि की वापसी की संभावनाओं को नया जन्म मिला।

इस दरम्यान द्रमुक और अन्ना द्रमुक को आपस में विलय कराने के प्रयास किए गए थे। इस प्रयास के प्रस्तावक थे उड़ीसा के बीजू पटनायक। द्रविड़ कड़गम के महासचिव के. वीरमनी ने 2009 में एक समारोह में इसका खुलासा किया। वीरमनी के मुताबिक, एमजीआर ने स्वर्गीय पटनायक से करुणानिधि से विलय की संभावनाओं का पता लगाने के लिए कहा था। विलय की शर्तें यह थीं कि द्रमुक संयुक्त पार्टी होगी, ध्वज पर अन्नादुराई की तस्वीर रहेगी और जहां एक तरफ एमजीआर मुख्यमंत्री होंगे वहीं दूसरी तरफ करुणानिधि पार्टी के नेता होंगे।

एमजीआर और करुणानिधि चेपॉक में सरकारी गेस्टहाउस में मिले और एक साथ आने का फैसला किया। एमजीआर ने करुणानिधि को बताया कि वह अपनी पार्टी के कार्यकारी परिषद को बुलाएंगे और विलय पर एक प्रस्ताव पारित करेंगे। लेकिन चीजें उस बिन्दु से आगे नहीं बढ़ीं और विलय कभी भी नहीं हो पाया। एमजीआर और करुणानिधि की बैठक में मौजूद पनरुति एस. रामचंद्रन के अनुसार करुणानिधि और वी.आर. नेदुंचेझियान ने एमजीआर के साथ विलय न करने का फैसला किया। रामचंद्रन ने स्वराज्य को बताया कि करुणानिधि और वी.आर. नेदुंचेझियान ने एमजीआर को इंगित किया था कि द्रमुक द्वारा अन्ना द्रमुक के कार्यकर्ताओं के साथ बुरा बर्ताव किया जाएगा और उन्हें कष्ट उठाना पड़ेगा। उन्होंने अभिनेता से नेता बने एमजीआर को आश्वस्त कर लिया कि जमीनी स्तर पर द्रमुक और अन्ना द्रमुक दोनों के कार्यकर्ता विवेकहीन हैं और विलय से अन्ना द्रमुक को कार्यकर्ताओं की हानि उठानी पड़ेगी। जब एमजीआर प्रशंसक संघ के प्रमुख मुसीरी पुथन की द्रमुक कार्यकर्ताओं द्वारा पिटाई की खबर आई तो वह आश्वस्त थे कि विलय उनके फॉलोअर्स और कैडर के लिए अच्छा नहीं होगा।

रामचंद्रन कहते हैं कि करुणानिधि से निपटने में एमजीआर हमेशा ही “आत्मविश्वासी” रहे थे। न ही उत्साहित हुए न ही हताश हुए। वह शांतचित्त स्वभाव के थे जिसने उन्हें सही निर्णय लेने में मदद की, चाहे यह करुणानिधि के पक्ष में रहा हो या विरोध में।

उदाहरण के लिए, 1979 में जब इन्दिरा गांधी ने तमिलनाडु का दौरा किया, तो द्रमुक कार्यकर्ताओं के एक हिंसक समूह ने उन पर हमला किया। तब उस समय कॉंग्रेस कार्यकर्ता रहे पी. नेदुमारन, जो अब तमिल ईलम के समर्थक हैं, ने तकिये को ढाल बना कर उन्हें बचाया। जब इन्दिरा इसी यात्रा के एक हिस्से के रूप में चेन्नई आयीं तो एमजीआर ऐसी किसी भी घटना को बर्दाश्त नहीं करते। इसलिए, कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए करुणानिधि और कुछ महत्वपूर्ण द्रमुक नेताओं को गिरफ्तार करने में उन्होंने संकोच नहीं किया।

करुणानिधि ने एमजीआर के खिलाफ कुछ एक बार भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। लेकिन विशेष रूप से ग्रामीण मतदाता इन आरोपों पर विश्वास नहीं कर सके। एक अनुभवी द्रविड़ियन के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कहती थीं, “भले ही वह भ्रष्टाचार में लिप्त हों, लेकिन यह हमारे लिए है”। लेकिन दूसरा तथ्य यह भी था कि एमजीआर का करिश्मा तब तक फीका नहीं पड़ा जब तक कि उनकी मृत्यु नहीं हो गयी, जबकि करुणानिधि पर बनाई गई एक नकारात्मक छवि लंबे समय तक जनता की यादों में बनी रही।

एमजीआर के साथ काम करने वाले लोगों सहित, अलग-अलग समय में विभिन्न लोगों के पास एमजीआर-करुणानिधि के सम्बन्धों पर बात करने के लिए बहुत सारी बाते हैं। अधिकांश समय उनके संबंध सौहार्दपूर्ण थे और कुछ यह भी कहते हैं कि तमिलनाडु में स्वस्थ राजनीति सुनिश्चित करने के लिए उनके बीच काफी बातचीत होती थी।

लेकिन फिर, जब चुनावी रणनीति की बात आती थी तो इसमें कोई संदेह नहीं कि एमजीआर करुणानिधि से हमेशा एक कदम आगे थे। और इसमें, इतिहास हमेशा इस बड़े द्रमुक नेता के लिए निर्दयी रहेगा।

एम.आर. सुब्रमनी स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वह @mrsubramani पर ट्वीट करते हैं।