राजनीति
स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस का उद्भव

आशुचित्र- कांग्रेस ने अपने मूलभूत रूप में राष्ट्र सेवा की, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किंतु इतिहास का तटस्थ अध्ययन इतिहास की त्रुटियों से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।

इतिहास एक दु:स्वप्न है जिससे मैं जागने का प्रयास कर रहा हूँ।जेम्स जॉयस अपनी रचना युलिसेस में लिखते हैं। ऐसा भान होता है कि भारत भी एक देश नहीं एक व्यक्ति है जो एक दुःस्वप्न से जागने का प्रयास कर रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस की भूमिका इतिहास का चकित करने वाला प्रसंग है। बड़ा विचित्र सा लगता है जब कांग्रेस समूचे स्वतंत्रता आंदोलन को निगल जाने का प्रयास करती है। अधिकांश स्कूली पुस्तकें कांग्रेस का इतिहास स्थापना से प्रारंभ करके सीधा गांधी जी के राजनैतिक अवतरण पर ले जाती हैं। इस बीच में लालबालपाल कहीं उड़ती चर्चा में दिखाई देते, और नेताजी सुभाष, पटेल और डॉ राजेंद्र प्रसाद ऐसे चरित्र अभिनेताओं की भूमिका में दिखते हैं जिनका अस्तित्व नेहरू के नायकत्व की स्थापना के लिए हो। हाशिये पर धकेले गए नेताओं ने सदा कांग्रेस को एक राष्ट्रीय नुमाइन्दा रखने का प्रण बनाए रखा, इसमें दो राय नहीं है। किंतु यह कांग्रेस से अधिक यह उन नेताओं की वैचारिक परिपक्वता का परिचायक है जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को टूटने और बँटने देना नहीं चाहते थे। जिस बिस्मिल और अशफ़ाक़ के विरुद्ध सरकारी वकील कांग्रेसी नेता जगतनारायण मुल्ला रहे, वह भी अंतिम संदेश देते हैं कि हम आपस में बँटने के स्थान पर कांग्रेस को प्रतिनिधि मान के ब्रिटिश सरकार से स्वतंत्रता के विषय में प्रश्न उठाएँ। इस प्रश्न का उत्तर तब की कांग्रेस के मूल चरित्र में हैं। इसी लिए हमें यह जानना अति आवश्यक है कि जिस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बात स्वतंत्रता आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में होती है, वह कांग्रेस आज के वर्तमान बहुरूप से कितनी भिन्न है।   

इस परी-कथा को जन मानस में बैठाने के लिए कांग्रेस को स्थापना समय से एक राजनैतिक दल दिखाना आवश्यक था जो ए, ई, आई, ओ इत्यादि वर्णमालाओं से होता हुआ प्रथम परिवार की निजी संपत्ति के रूप में स्वीकार्य हो। इसके लिए यह भी आवश्यक था कि जब तक अफ्रीका से लौटे गांधी कांग्रेस को राजनैतिक मशीन न बना दें, तब तक का इतिहास ढाँप कर रखा जाए।  

आज धर्मनिरपेक्षता की विचित्र परिभाषाओं में धर्म राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में अछूत शब्द हो गया है किंतु भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की और आगे कांग्रेस की नींव धर्म की धरती पर ही पड़ी थी। कांग्रेस के आकर लेने से पूर्व ब्रह्मो समाज के श्री केशब चंद्र सेन इतिहास और सनातनी विचार के आधार पर एक राष्ट्रीय विचार की भूमि तैयार कर चुके थे। सर हेनरी कॉटन के अनुसार 8 जनवरी 1884 को उनकी मृत्यु के पश्चात संपूर्ण भारत एक रूप से शोकाकुल दिखा। उनके विचारों को राजनारायण बोस ने एक हिंदू विकल्प प्रदान किया जब श्री बोस के विचारों से प्रभावित हो कर श्री नबागोपाल मित्र ने हिंदू मेला का प्रारंभ किया।

बंगाल में ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की 1851 में स्थापना डॉ राजेन्द्रलाल मित्र और श्री रामगोपाल घोष के नेतृत्व में हुई। 1879 में महारानी स्वर्णमयी के समर्थन से श्री लाल मोहन घोष लंदन में ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीय मूल निवासियों के स्वर के रूप में पहली बार शासन से संवाद के लिए भेजे गए। यह भारतीय उपनिवेश के लिए एक राष्ट्रीय स्वर का प्रथम अवसर था। महाराष्ट्र में बॉम्बे एसोसिएशन की स्थापना हुई जहाँ से आगे दादाभाई नैरोजी निकले। पूना में पूना सार्वजनिक सभा और मद्रास में द हिंदू की स्थापना हुई। बंगाल में ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के स्थान पर “द इंडियन एसोसिएशन” की स्थापना श्री सुरेंद्र नाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस के नेतृत्व में 1876 में हुआ।

1877 में लॉर्ड लिट्टन ने मल्लिका विक्टोरिआ को क़ैसर-ऐ-हिंदू की उपाधि दी, दिल्ली दरबार का आयोजन करके भारत को पूर्णतया अंग्रेज़ी सरकार का उपनिवेश घोषित किया और आर्म्स एक्ट लाकर भारतीय नागरिकों के अस्त्र रखने का अधिकार समाप्त कर दिया। यह समय सूखे और दुर्भिक्ष का था। आर्थिक विपन्नता ऐसी थी कि प्रति व्यक्ति आय 1932 में वही थी जो कभी अकबर के काल 1601 में थी। तीन शताब्दियों तक भारतीय अर्थ-व्यवस्था मृतप्रायः थी। इन तीन शताब्दियों में से एक ब्रिटिश राज की थी। इसी अवधि में ब्रिटिश प्रति व्यक्ति जीडीपी चार गुना बढ़ी थी (अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, मोरलैंड एंड चटर्जी, पार्टीशन, बार्नी वाइट-स्पूनर से साभार)।

एक मुकदमे में हिंदू व्यक्ति को ब्रिटिश जज द्वारा हिंदू देवता को प्रस्तुत करने के आदेश की निंदा करने पर श्री सत्येंद्र बनर्जी को अदालत की अवमानना में दो महीने की जेल हुई। इसका सार्वजनिक विरोध हुआ और इंडियन एसोसिएशन की बीडोन स्क्वायर पर 18 मई 1883 को सभा हुई जो उस समय तक की सबसे बड़ी सभा थी।

इस आंदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के बाद 28, 29, 30 दिसंबर 1883 को पहले इंडियन नेशनल एसोसिएशन अधिवेशन का प्रस्ताव रखा गया। 1883 में कलकत्ता में राजनैतिक अधिवेशन मे पश्चिम और दक्षिण से प्रतिनिधियों ने भाग लिया। दूसरा अधिवेशन 1885 में कलकत्ता में हुआ जिसमे 30 राजनैतिक दलों ने भाग लिया। इतिहासकार आर सी मजूमदार के अनुसार कांग्रेस की परिकल्पना थियोसोफिकल सोसाइटी में नहीं बल्कि इंडियन नेशनल एसोसिएशन के राष्ट्रीय अधिवेशन में हुई थी। 1881 में मद्रास महाजन सभा की स्थापना हुई और 31 जनवरी 1885 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी असोसिएशन की।

एक राष्ट्रव्यापी समन्वय की आवश्यकता महसूस की जाने लगी और अंततः एलान ओक्टावियन ह्यूम ने मार्च 1885 में अधिवेशन का प्रस्ताव किया। श्री डब्लू सी बनर्जी के 1898 में लिखे लेख के अनुसार 1884 में कांग्रेस की स्थापना के पीछे विचार इसे सामाजिक सेवा मंच के रूप में बनाना था, जहाँ राजनैतिक संगठन सामाजिक सरोकार की वार्ता वर्ष में एक बार कर सकें। इस कार्यक्रम का आयोजन लॉर्ड दफ्फेरिन के अप्रत्यक्ष निर्देश पर हुआ। मार्च 1885 में पूना में हुई सभा में प्रथम कांग्रेस अधिवेशन के लिए 25 दिसंबर 1885 का दिन तय हुआ, भारतीय राष्ट्रीय संघ के नाम से। हैजे की महामारी के कारण प्रथम अधिवेशन पूना से बॉम्बे किया गया। कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन बॉम्बे में गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में 28 दिसंबर 1885 को हुआ। यहाँ अगली कांग्रेस का समय और स्थान 28 दिसंबर 1886 कलकत्ता के लिए तय किया गया।

कांग्रेस का प्रारंभिक प्रारूप राज के समर्थक का ही रहा था। ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थन का भाव स्थापित करने के लिए ही संभव है, आरंभ में सुरेंद्र नाथ बनर्जी, जो नेशनल एसोसिएशन से जुड़े थे, कांग्रेस से बाहर रखे गए, और डब्लू सी बनर्जी जो इंडियन एसोसिएशन से बाहर रहे, कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। कांग्रेस का राजनैतिक प्रारब्थ 1886 में श्री सुरेंद्र नाथ बनर्जी के कांग्रेस से जुड़ने के बाद ही निर्धारित हुआ जब वह एक राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़ी। पहले अधिवेशन में 72 सदस्यों ने भाग लिया और कलकत्ता में हुए दुसरे अधिवेशन में लगभग 450 सदस्यों ने।

क्योंकि कांग्रेस अधिवेशनों का दल था, रिसेप्शन समिति के अध्यक्षों का ख़ासा प्रभाव था। कांग्रेस नरमदलियों का संगठन हो गया और उग्र राष्ट्रवादी निरंतरता से कांग्रेस से जाते रहे। लाला लाजपत राय चौरी चौरा के बाद गांधी से विवादों के कारण कांग्रेस छोड़ गए। 1920 में गांधी के कांग्रेस पर बढ़ते नियंत्रण को देखते हुए बिपिन चंद्र पाल भी कांग्रेस छोड़ गए।

कांग्रेस जो वास्तविकता में अनेक राजनैतिक दलों का मंच था, उसे राजनैतिक दल के रूप में सार्वजनिक पटल पर स्थापित करना संभवत: इसलिए आवश्यक बन गया ताकि एक परिवार की राष्ट्रीय ज़मींदारी की निरंतरता स्थापित की जा सके। इसका पर्याय वर्त्तमान में हम देखें तो यह ऐसा है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल या ऐसा कोई सम्मलेन यह स्थापित करने लगे कि उसके आयोजन में भाग लेने वाले सभी लेखक एवं प्रकाशक उस मंच के सदस्य या कर्मचारी हों।

कांग्रेस ने अपने मूलभूत रूप में राष्ट्र सेवा की, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किंतु इतिहास का तटस्थ अध्ययन इतिहास की त्रुटियों से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है। हमें उन राष्ट्रनायकों को भी जानना आवश्यक है जो वर्तमान राजनैतिक नैरेटिव में न सध पाने के कारण कहीं अतीत में छूट गए हैं।

साकेत सूर्येश स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे  @saket71 द्वारा ट्वीट करते हैं।