राजनीति
भगवा आतंक के कथानक को 26/11 हमलों से जोड़ने के षड्यंत्र का खुलासा पुस्तकों में

“यदि कोई अनहोनी एक बार घटे तो वह दुर्घटना है, दूसरी बार संयोग परंतु तीसरी बार निश्चित रूप से शत्रुगत कार्यवाही है”- सिनेमा के जानेमाने पात्र जेम्स बॉन्ड का यह प्रसिद्ध संवाद पत्रकारिता की भाषा में तीन बिंदु सिद्धांत के रूप में पढ़ाया जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि तीन बिंदु एक क्रम में आ जाएँ तो वह एक सीधी रेखा है। अर्थात विषय पर अगर- मगर छोड़ एक निश्चित राय बनाई जा सकती है।

आज 26/11 हमले को घटे 12 वर्ष बीत चुके हैं और इस त्रासदी के पाकिस्तानी प्रायोजन पर ही नहीं बल्कि भारतीय सीमाओं के भीतर बुने गए षड्यंत्र पर भी काफी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। जहाँ पाकिस्तान के लिए यह हमला लगातार जारी गज़वे का हिस्सा था, वहीं देश के भीतर बैठे हिंदू विरोधियों के लिए “भगवा आतंक” कथानक को मजबूत करने का एक और अवसर। यह जानने के लिये बॉन्ड होना ज़रूरी नहीं कि 26/11 त्रासदी और इससे पहले की तमाम घटनाएँ एक निश्चित योजना का हिस्सा थीं।

हमले की तफ्तीश का नेतृत्व करने वाले भूतपूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया की पुस्तक “लेट मी से इट नाउ” में हुए सनसनीखेज खुलासे के बाद “भगवा आतंक” गढ़ने की साज़िश महज अनुमान न होकर एक सीधी, स्पष्ट और गहरी लकीर बनकर उभरी थी। राकेश मारिया ने अपनी पुस्तक में खुलासा किया था कि यदि सब कुछ आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की योजना अनुसार चलता तो मुंबई हमले में पकड़े गए अजमल कसाब को समीर चौधरी बनकर मरना था।

इस आशय से तैयार की गई आईडी पर उसका नाम समीर दिनेश चौधरी, उसका हैदराबाद स्थित कॉलेज का विद्यार्थी होना और बेंगलुरु का आवासीय पता दर्ज था। मारिया ने लिखा है के यदि उस दिन कसाब घटनास्थल पर ही मारा जाता तो हमें हाथ पर कलावा बंधी हुई एक लाश मिलती। अति उत्साही पत्रकारों की टोलियाँ इन हैदराबाद, बेंगलुरु पतों पर समीर चौधरी को ढूंढ रही होतीं और “भगवा आतंक” खबरों की सुर्खियों में होता।

मुंबई पुलिस के तेज तर्रार अफसर राकेश मारिया ने लगातार कई दिनों तक कसाब से स्वयं पूछताछ की थी। मारिया ने यह भी बताया है कि लश्कर व दाऊद इब्राहिम कसाब की पाकिस्तानी नागरिकता की पुष्टि हो जाए इससे पहले ही जेल में उसे मारने की फिराक में थे। एक अन्य चौंकाने वाले खुलासे में मारिया लिखते हैं कि मीडिया को कसाब की छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर ली गई बहु प्रकाशित तस्वीर मुंबई पुलिस ने नहीं बल्कि दिल्ली स्थित जाँच एजेंसियों ने मुहैया कराई थी। तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम, जिनके मंत्रालय के अंतर्गत ये एजेंसियाँ आती थीं, “भगवा आतंक” गढ़ने के मुख्य प्रणेता माने जाते हैं।

राकेश मारिया पहले व्यक्ति नहीं है जिन्होंने इस षड्यंत्र पर प्रकाश डाला है। इससे पहले भूतपूर्व गृह सचिव आरके सिंह भी यूपीए सरकार पर भगवा आतंक को साजिशन गढ़ने के आरोप लगाते रहे हैं। सिंह, सुशील कुमार शिंदे के मंत्री काल में गृह सचिव थे। गृहमंत्री शिंदे द्वारा “भगवा आतंक” का प्रयोग करने पर उनकी जमकर आलोचना हुई थी और उन्हें इसके लिए माफी भी मांगनी पड़ी थी। परंतु “भगवा आतंक” शब्दावली का प्रयोग सबसे पहली बार सन 2010 में चिदंबरम ने गृह मंत्री रहते हुए किया था। हालाँकि कांग्रेस ने इस शब्द उपयोग से औपचारिक रूप से किनारा कर लिया था।

चिदंबरम के इस कार्यकाल में मालेगाँव, मक्का मस्जिद और समझौता ब्लास्ट की जांच में बड़ा बदलाव आया। तब तक लश्कर से संबद्ध शब्बीर को मालेगांव धमाकों का मुख्य आरोपी माना जा रहा था। शब्बीर के गैराॅज से आरडीएक्स भी बरामद हुआ था। मक्का मस्जिद ब्लास्ट में  शरीफुद्दीन और मोहम्मद बिलाल का नाम सामने आया था। इसी तरह समझौता ब्लास्ट के मास्टरमाइंड के रूप में लश्कर एवं अलकायदा से जुडे़ आरिफ कस्मानी की पुष्टि भारत सहित सार्क एवं अमेरिकी एजेंसियों ने भी की थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आज भी समझौता ब्लास्ट केस में कस्मानि को ही दोषी मानती है।

परंतु चिदंबरम के कार्यकाल में इन तीनों घटनाओं की जाँच की दिशा पूरी तरह बदल गई। जांच के दायरे में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और स्वामी असीमानंद को घसीटा गया। बाद में अलग-अलग अदालतों ने तीनों ही को साक्ष्यों के अभाव में बरी किया। मालेगांव धमाके की जांच कर रही मुंबई एटीएस के इंस्पेक्टर महबूब अब्दुल करीम मुजावर ने भी एक बड़ा खुलासा कर बताया था कि जांच की दिशा बदलने और कर्नल पुरोहित को फंसाने के लिए स्वयं एटीएस टीम ने उनके पास आरडीएक्स रखा था।

“भगवा आतंक” गढ़ने की साजिश का विस्तारपूर्वक वर्णन गृह मंत्रालय के सेवानिवृत्त अधिकारी आरवीएस मणि ने किया है। सन् 2006 से 2010 के बीच गृह मंत्रालय में अवर सचिव रहे मणि इस कालखंड की प्रमुख घटनाओं में सक्रिय पात्र रहे हैं। अपनी पुस्तक “द मिथ ऑफ हिंदू टेरर” में मणि लिखते हैं कि इस्लामी संगठनों द्वारा हो रहे लगातार आतंकी हमलों से जनता में भारी रोष था। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर हुए हमले के बाद इस्लामी आतंक के खिलाफ यह रोष और तीखा हो गया था। यहीं से सत्ता में बैठे कुछ महत्वपूर्ण लोगों द्वारा एक विरोधी कथानक बनाने का प्रयास शुरू हुआ।

मणि को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देकर इशरत जहान मामले में शपथ-पत्र बदलवाने का भरसक प्रयास किया गया। इस शपथ-पत्र में इशरत की जमात- उ-दवा की पूर्व में उल्लेखित सदस्यता का ब्यौरा हटवाया जाना था। मणि पर आईबी के उच्चाधिकारी राजेंद्र कुमार को फंसाने के लिए भी दबाव बनाया जा रहा था। याद रहे कि राजेंद्र कुमार के इनपुट पर ही इशरत और उसके साथियों को गुजरात पुलिस ने वारदात से पहले घेरा था।

दो पाकिस्तानी आतंकियों के साथ पकड़ी गई इशरत, जिसको जमात-उद-दवा ने स्वयं अपना कैडर माना, उसको पाक साफ बताने के लिए यूपीए सरकार इस हद तक चली गई थी कि उसने तत्कालीन आईबी प्रमुख आसिफ इब्राहिम पर राजेंद्र कुमार को सीबीआई के हवाले करने के लिए भरपूर दबाव बनाया था। यह अलग बात है कि इब्राहिम सरकार के दबाव में नहीं आए।

मुंबई आतंकी हमले के संबंध में मणि ने बहुत सारे रहस्योद्घाटन किए हैं। मणि बताते हैं कि हमले से सप्ताह भर पूर्व मुंबई तट से परे, अरब महासागर में एक संदेहजनक नौका को तलाशी के लिए भारतीय नौसेना ने घेर लिया था परंतु दिल्ली से आदेश के बाद नौसैनिकों को तलाशी से रोक लिया गया।

उन्होंने पुस्तक में आगे लिखा है कि ऐन हमले वाले दिन भारतीय गृह मंत्रालय के सभी शीर्ष अधिकारी पाकिस्तान में सालाना द्विपक्षीय बैठक के लिए गए हुए थे। वार्ता को एक और दिन बढ़ाया गया और हमले वाले दिन पूरा भारतीय दल पीर पंजाल पहाड़ियों में स्थित मरी में ले जाया गया जहां सूचना के पर्याप्त साधन भी नहीं थे। हमले के वक्त, शीर्ष अधिकारियों की गैरमौजूदगी में मणि गृह मंत्रालय में कमान संभाल रहे थे। उनके अनुसार सुरक्षाबलों की पहली टुकड़ी भेजने में गृहमंत्री शिवराज पाटिल से त्वरित आदेश न आने के कारण विलंब हुआ।

मणि के अनुसार हमले से पहले ही अजीज़ बर्नी की किताब “26/11 आरएसएस की एक साजिश” पर लेखन कार्य शुरू हो गया था। इस किताब को एआर अंतुले और दिग्विजय सिंह ने प्रचारित किया। कोई क्षेत्राधिकार ना होने के बावजूद विभिन्न आतंकी घटनाओं की जांच में हो रही प्रगति में दिग्विजय सिंह की असामान्य रुचि को भी मणि ने अपनी पुस्तक में दर्ज किया है।

गृहमंत्री चिदंबरम को दी जा रही ऐसी ही एक ब्रीफिंग में दिग्विजय सिंह और एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की उपस्थिति का भी मणि ने उल्लेख किया है। गौरतलब है कि मुंबई हमले में  करकरे की मृत्यु पीठ में गोली लगने से हुई थी और उनके शव का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया था। हमले के बाद पाकिस्तान को भेजे गए डोसियर में आखिरी समय में बदलाव कर ऐसी स्पष्ट खामियाँ छोड़ी गईं जिससे कि डोसियर की विश्वसनीयता खत्म हो जाए।

यह पूरा प्रकरण बहुत सारे गंभीर सवाल छोड़कर जाता है। आतंकवाद को धर्म से न जोड़ने की हिमायती कांग्रेस यकायक आतंक को हिंदुओं से जोड़ने में क्यों जुट गई थी? “भगवा आतंक” शब्दावली के पुरजोर विरोध, जिसमें पार्टी के कुछ बड़े नेता भी शामिल थे, के बावजूद उसके मंत्री बार-बार इस शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे थे? क्या राहुल गांधी का अमेरिकी राजनायिक को दिया बयान जिसमें उन्होंने हिंदू आतंकवाद को इस्लामी आतंकवाद से बड़ा खतरा बताया पार्टी द्वारा तय कर दी गई दिशा का प्रेषण था? क्या “भगवा आतंक” गढ़ने की साजिश का ज्ञान ही हेमंत करकरे की मौत का कारण बना?

स्थानीय मदद मिलने की कसाब की स्वीकारोक्ति के बावजूद गृहमंत्री चिदंबरम हमले में स्थानीय मदद वाले पहलू को क्यों नकारते रहे? कुछ ही दिन पहले मुंबई तट से परे नौका देखे जाने और स्पष्ट इंटेलिजेंस इनपुट के बावजूद महाराष्ट्र गृह मंत्रालय की शीर्ष अधिकारी हमले के समय ताज होटल में क्या कर रही थीं? सबसे महत्वपूर्ण सवाल है  कि “भगवा आतंक” महज देशी राजनीतिक खुराफात की उपज थी या फिर सीमा पार जन्मे दुष्प्रचार को भारतीय किरदार हवा दे रहे थे?

राजनीतिक षड्यंत्र रचने के आरोप कांग्रेस पर सदा से लगते आए हैं। सैंट किट्स से रफाल तक इन कुचेष्टाओं की एक लंबी सूची है। परंतु “भगवा आतंक” गढ़ने का प्रयास एक बेहद खतरनाक मानसिकता का द्योतक है। इसका सरोकार किसी व्यक्ति या दल से न होकर देश की सुरक्षा और छवि से जुड़ा हुआ है।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस षड्यंत्र की पुष्टि सरकार में रहे अनेकों छोटे-बडे़ अधिकारियों ने स्वयं की है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैरोल्ड विल्सन के शासनकाल के बारे में माना जाता है कि 10, डाउनिंग स्ट्रीट की रसोई का मैन्यू भी केजीबी तैयार करती थी। क्या यूपीए शासन भारत का समकक्ष विषम काल था? आज 26/11 हमले में मारे गए व्यक्तियों को श्रद्धांजली देने के साथ देश अमर हुतात्मा तुकाराम ओंबले का भी ऋणी है जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर अजमल कसाब को पकड़ा। उन्होंने न सिर्फ बहुत से लोगों की जान बचाई परंतु एक गहरी साजिश को फलित होने से भी बचा लिया।