राजनीति
राजस्थान मतदान के बाद परिणाम प्रभावित करने वाले डाटा बिंदू

कल (7 दिसम्बर) राजस्थान में तेलंगाना के साथ मतदान है। आइए चुनावी घमासान को समझने के लिए एक नज़र डालते हैं कुछ बिंदुओं पर।

सीटें
राजस्थान विधानसभा के चुनावों में हमेशा से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच खींचतान होती रही है।1993 से प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में जनता ने हमेशा सत्तारूढ़ दल को सत्ता से अलग किया है। 2013 में 163 सीटों के साथ भाजपा ने अपना सर्वश्रेष्ठ रेकॉर्ड दर्ज किया था। जबकि 1998 में पार्टी ने अपना सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए केवल 38 सीटें हासिल की थी। वैसे ही कांग्रेस पार्टी ने 1998 में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हुए 158 सीटें हासिल की और 2013 में 21 सीटें प्राप्त की।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा)अभी तक एक सफल तृतीय पक्ष के रूप में लोगों के सामने खड़ी नहीं हो पाई है। अन्य पार्टियों और निर्दलीय प्रत्याशियों का राजनीतिक प्रभाव प्रदेश में घट रहा है।

वोट शेयर
अन्य क्षेत्रीय पार्टियों और निर्दलीय प्रत्याशियों के वोट शेयर गिरने के कारण बसपा, भाजपा और कांग्रेस के वोट शेयर बढ़ें हैं। दोनों पार्टियों के वोट शेयर घटते-बढ़ते रहे हैं- भाजपा का वोट शेयर बढ़ा है जब कांग्रेस सत्ता में थी और ऐसा ही कांग्रेस के साथ हुआ जब भाजपा सत्ता में थी।बसपा का वोट शेयर 4 से 7 प्रति शत के बीच रहा है।

जातिगत समीकरण
भारतीय राजनीति में जाति बहुधा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।अक्सर अपनी जाति के प्रत्याशी से लोगों का एक भावनात्मक जुड़ाव रहता है, जो कि मतदान में असर डालता है।अनुसूचित जाति और जनजाति को मिलाकर 31 प्रति शत, सवर्ण 19 प्रति शत, जाट 12 प्रति शत, अन्य पिछड़ा वर्ग के 18 प्रति शत लोग हैं। प्रदेश में अल्पसंख्यकों की संख्या का कोई ख़ास असर नहीं है।

जातिगत मतदान
राजस्थान में सवर्ण और पिछड़ा वर्ग के लोग भाजपा के पारम्परिक मतदाता रहे हैं।अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों के मतदान में बदलाव होता रहा है।अनुसूचित जातियों के लोगों में बसपा के लिए कुछ समर्थन भी है। मुस्लिम समुदाय के लोगों में कांग्रेस ने हमेशा से बढ़त बनाई रखी है। जाट समुदाय जो कि कांग्रेस का पारंपरिक मतदाता माना जाता था, कुछ वर्षों से भाजपा की ओर रुख करता हुआ दिखाई दे रहा है।

आरक्षित सीटें
राजस्थान में कुल 58 आरक्षित सीटें हैं- अनुसूचित जनजाति (25) और अनुसूचित जाति (33)। दोनों पार्टियों के हिस्से में आरक्षित सीटों की संख्या चुनाव के नतीजों के साथ बदलती रही है। बसपा ने 1993 से लेकर 2013 तक मात्र एक आरक्षित सीट जीती है। जैसे सत्तारूढ़ दल हर चुनाव के बाद बदला है उसी तरह इन सीटोंने हर बार अपना मन बदला है।

मतसंख्या अंतर
मतसंख्या अंतर चुनाव की कठिनता को दर्शाता है। 230 में से 9 सीटों पर बहुत ही करीबी मुकाबला देखने को मिलता है। इन सभी कठिन सीटों में से भाजपा ने आधे से ज्यादा सीटें जीती है।148 सीटों पर प्रत्याशी 10 हजार से ज्यादा मतों से जीते हैं, जिससे हमें 2013 के चुनावों में एकतरफ़ा नतीजे देखने को मिलते हैं। भाजपा का औसत अंतर (22,394) कुल औसत अंतर (14,151) से अधिक था।

क्षेत्र
सेंटर फॉरस्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी के अनुसार चुनावी विश्लेषण के लिए राजस्थान को 6 क्षेत्रों में बांटा गया है- उत्तर, पश्चिम, मध्य,मत्स्य, दक्षिण और हाड़ौती। 200 सीटों में से पश्चिम क्षेत्र के पास सबसे ज्यादा सीटें हैं और हाड़ौती के बाद सबसे कम सीटें हैं।

कुल मतदान संख्या
कुल मतदान संख्या चुनाव के परिणाम निर्धारित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण मापदंड है। 2013 में उत्तर, दक्षिण और हाड़ौती क्षेत्र में प्रदेश के कुल औसत मतदान से अधिक मतदान हुआ है। और पिछले चुनाव में भाजपा ने हाड़ौती और दक्षिण क्षेत्र में विरोधी दल का सफाया किया था।

क्षेत्रीय वोट शेयर
कांग्रेस की तुलना में भाजपा ने 2013 के चुनावों में अधिक वोट शेयर दर्ज किया था। यदि कांग्रेस और बसपा दोनों मिलकर चुनाव लड़ते तो केवल मत्स्य क्षेत्र में भाजपा से आगे हो पाते। (-0.80 प्रति शत)
2008 में अधिकतर क्षेत्रों में कांग्रेस ने भाजपा से अधिक वोट शेयर प्राप्त किया। भाजपा की पकड़ पश्चिम और मत्स्य क्षेत्र में काफ़ी अच्छी रही है क्योंकि इन क्षेत्रों में पार्टी ने अपने हार के समय में भी अच्छा प्रदर्शन किया था। पश्चिम क्षेत्र में भाजपा ने कांग्रेस काफ़ी अच्छी टक्कर दी है।

उपरोक्त में से कोई नहीं (NOTA)
NOTAविकल्प ने भी चुनाव परिणाम में अहम भूमिका अदा की है। दक्षिण क्षेत्र में अधिकतम NOTA संख्या दर्ज की गई वहीं उत्तर क्षेत्र में सबसे कम NOTA संख्या देखी गई।

शहरी-ग्रामीण मतदान वरीयता
2008 और 2013 दोनों चुनावों में भाजपा शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस से आगे रही है। 2008 में कांग्रेस ग्रामीण सीटों पर भाजपा से आगे थी लेकिन 2013 में ग्रामीण सीटों पर भाजपा आगे थी। राजस्थान में 25 सीटें शहरी और 175 सीटें शहरी हैं।

मोदी फैक्टर
राजस्थान में मोदी फैक्टर बहुत ही मजबूत है। जहाँ भारत में 27 प्रति शत लोगों ने 2014 में नरेंद्र मोदी का समर्थन किया था, राजस्थान में 42 प्रति शत लोगों ने नरेंद्र मोदी का समर्थन किया था।

पोल ऑफ़ पोल्स
पोल्स ऑफ़ पोल्स के अनुसार कांग्रेस को 122 सीटें का और भाजपा को 68 सीटें मिलने का अनुमान है।

2018 में मुख्य मुद्दे
इंडिया टुडे-पीएसईसर्वे के अनुसार, स्वच्छता, कृषि, बेरोज़गारी,पेयजल, महंगाई और सड़क व्यवस्था राजस्थान में मुख्य मुद्दे रहें हैं।

क्षेत्रों का विवरण
राजस्थान में 33 जिलें और 6 क्षेत्र हैं, जिनका विवरण नीचे दिया है-

20 प्रतिशत से अधिक एस. सी. और एस. टी. जनसंख्या
20 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति और जनजाति जनसंख्या वाली सीटें चुनावी लहर के साथ रहती हैं।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार इनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।