राजनीति
हाथरस घटना के लिए आंदोलन का उद्देश्य न्याय या योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाना?
अनिल सिंह - 12th October 2020

बलात्‍कार जैसी घटनाएँ किसी भी सभ्‍य समाज में स्‍वीकार्य नहीं हैं। ऐसे मामलों में आरोपियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। पीड़िता को न्‍याय मिले यह सरकार और जाँच एजेंसियों का दायित्‍व है। बलात्‍कार जैसे जघन्‍य मामलों में जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, लेकिन क्‍या हाथरस और बलरामपुर में हुई घटनाओं के संदर्भ में यह बात कही जा सकती है?

कुछ दिनों के भीतर उत्तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, बिहार में बलात्‍कार की कई दुर्भाग्‍यपूर्ण घटनाएँ दर्ज की गईं। उप्र में हाथरस और बलरामपुर के अलावा बुलंदशहर एवं आज़मगढ़ में बलात्‍कार की घटनाएँ हुईं, लेकिन उबाल केवल हाथरस की घटना को लेकर ही क्यों हुआ? बलरामपुर, आज़मगढ़ और बुलंदशहर की घटनाएँ विपक्षी दलों और जातीय हिमायती संगठनों को उद्वेलित क्यों नहीं कर पाईं?

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की आत्‍मा को बलरामपुर में दलित युवती के साथ हुई बलात्‍कार एवं हत्‍या की नृशंस घटना भी झकझोर नहीं पाई? हाथरस की युवती के लिए न्‍याय मांगने वाली भीम आर्मी को भी बलरामपुर की दलित युवती के लिये न्‍याय मांगने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई? दलित चेतना के नाम पर आंदोलन चलाने वालों को हाथरस के अलावा अन्‍य दलित युवतियों के साथ हुए अत्‍याचार पर आवाज़ उठाने की आवश्यकता समझ नहीं आई? मीडिया को भी बलरामपुर, आज़मगढ़ की बजाय हाथरस में ही टीआरपी नज़र आई!

दरअसल, यह किसी पीड़िता या उसके परिवार को न्‍याय दिलाने का अभियान नहीं था बल्कि उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को घेरने एवं उनकी छवि खराब करने का सुनहरा मौका था, जिसे बड़ी तैयारी के साथ विपक्ष ने लपक लिया, जबकि यह घटना पहले ही दिन से संदिग्‍ध थी। ऐसा लड़की और उसके परिजनों के कई बार बयान बदलने से प्रतीत भी हुआ।

प्रश्न यह भी है कि कई राज्‍यों में इस तरह की दुर्भाग्‍यपूर्ण घटनाओं के बीच उत्तर प्रदेश के हाथरस को ही क्‍यों चुना गया? उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में इससे ज्‍यादा वीभत्‍स घटना का संज्ञान क्‍यों नहीं लिया गया? क्‍यों तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टी के नेता हाथरस में न्‍याय मांगने पहुँच गए, जबकि उत्तर प्रदेश में उनका कोई जनाधार नहीं है। न्‍याय ही उद्देश्‍य था तो तृणमूल कांग्रेस के एजेंडे से बलरामपुर, आज़मगढ़, बुलंदशहर क्‍यों बाहर रह गया?

क्‍यों लेफ्ट विचारधारा से जुड़े लोगों के सोशल मीडिया वॉल पर अचानक युवती के जीभ काटे जाने, गर्दन एवं रीढ़ की हड्डी तोड़े जाने की अफवाह बेतहाशा तैरने लगी? क्‍यों केवल हाथरस मामले में ही दलित चेतना जगाकर न्‍याय की माँग की जाने लगी और बलरामपुर की दलित युवती को न्‍याय मिले इसकी चिंता हाशिये पर रह गई?

ज़ाहिर है, हाथरस की पीड़िता दलित थी और आरोपी क्षत्रिय समाज से थे, जबकि बलरामपुर समेत अन्‍य ज्‍यादातर घटनाओं के आरोपी अल्‍पसंख्‍यक थे। हाथरस मामला विपक्षी दल और वामपंथ के एजेंडे के अनुकूल था। इसके कारण योगी आदित्‍यनाथ को निशाने पर लेने की साज़िशें शुरू हुईं, जिनका सबूत भी जाँच एजेंसियों को मिलना शुरू हो गया है। दंगे करवाकर योगी सरकार को बदनाम करने की योजना का भी खुलासा हुआ है। दंगों से उप्र को अस्थिर करके जातीय संघर्ष की आग में झोंकने का भी प्रयास था ताकि हिंदुओं में आपसी फूट पड़े।

शुरुआती जाँच में यह भी सामने आ रहा है कि इस अभियान में राजनीतिक दलों के साथ जातीयता के नाम पर संगठन चलाने वालों के अलावा संदिग्‍ध गतिविधियों में लिप्‍त पीएफआई की भी महत्त्‍वपूर्ण भूमिका है। पीएफआई को इस्‍लामिक देशों से भी फंडिंग मिलने के साक्ष्य मिले हैं। सीएए आंदोलन के दौरान भी पीएफआई की नकारात्‍मक भूमिका सामने आई थी।

पीएफआई का नेटवर्क कितना मज़बूत है, इसका एक छोटा-सा उदाहरण है कि देवरिया जैसे सीमावर्ती जिले में अल्‍पसंख्‍यक बाहुल्‍य बस्तियों से मार्च निकालकर 800 किलोमीटर दूर मौजूद हाथरस की बेटी के लिये न्‍याय की मांगा जा रहा है। लेकिन मात्र 200 किमी दूर स्थित बलरामपुर और उतनी ही दूरी पर मौजूद आज़मगढ़ की बेटी के लिये न्‍याय की एक आवाज़ तक नहीं उठी। इन दलित बेटियों की चिंता किसी भी राजनीतिक दल या दलित अस्मिता के नाम पर चलने वाले जातीय संगठन ने नहीं की।

हाथरस के बहाने योगी पर यह हमला अचानक नहीं हुआ है! इसके पीछे लंबी तैयारियाँ हैं। इसमें कुछ अपने भी शामिल हैं और पराये भी। सत्ता संभालने के बाद योगी आदित्‍यनाथ ने प्रदेश में भ्रष्‍टाचारियों, उपद्रवियों और अपराधियों पर जिस तरीके से नकेल कसी है, उसने अब तक सत्ता को अपने हिसाब से चलाने वाले वर्ग को हतप्रभ किया है।

क्‍या योगी आदित्‍यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने से पहले यह सोचा जा सकता था कि उपद्रवियों और बलात्‍कारियों की तस्‍वीर चौक चौराहों पर टांगी जाएगी? उनसे तोड़फोड़ और सार्वजनिक चीजों को क्षतिग्रस्‍त करने की वसूली की जाएगी, पर ऐसा हुआ! ऐसा दूसरे राज्‍यों और देशों में भी हो रहा है। उत्तर प्रदेश की तर्ज पर कर्नाटक एवं स्‍वीडन ने भी उपद्रवी ताकतों से वसूली की प्रक्रिया आरंभ की।

क्‍या योगी के सत्तासीन होने से पहले कभी इसकी कल्‍पना की जा सकती थी कि राजनीतिक दलों के सरपरस्‍ती में पलने वाले संगठित अपराधियों के आर्थिक साम्राज्‍य को ध्‍वस्‍त कर दिया जाएगा? उनके अवैध कब्‍जों और कमाई से बनी इमारतों को नेस्‍तनाबूद कर दिया जाएगा? उनके भय के इतिहास को जमींदोज कर दिया जाएगा? ऐसा हो रहा है, और इसके लिए कोई नया कानून नहीं बनाया गया बल्कि योगी आदित्‍यनाथ ने मौजूद कानूनों को लागू कराने की मजबूत इच्‍छाशक्ति दिखाई है।

संगठित अपराध को हाशिये पर धकेलकर योगी आदित्‍यनाथ ने उप्र में निवेश का माहौल बनाया है। इसका परिणाम है कि उत्तर प्रदेश में 2 लाख करोड़ से ज्‍यादा का निवेश आया है। उप्र में बहुप्रतिक्षित फिल्‍म सिटी स्‍थापित करने की घोषणा करके उन्‍होंने प्रदेश ही नहीं समूचे हिंदी बेल्‍ट के कलाकरों तथा तकनीशियनों को खुश होने का मौका दिया है।

हिंदूवादी चेहरे और विकासपरक राजनीति के साथ अपराधियों-भ्रष्‍टाचारियों पर नकेल कसने की इच्‍छाशक्ति ने योगी को जो लोकप्रियता दी है, उससे बाहर के साथ संगठन के भीतर के विरोधी भी परेशान हैं। इस परेशानी से निजात पाने का आसान रास्‍ता हाथरस में नज़र आया। विरोधी योगी आदित्‍यनाथ को अब तक बेईमानी या भ्रष्‍टाचार जैसे मुद्दों पर नहीं घेर पाए हैं, लिहाजा गाहे बगाहे जातिवादी आरोप लगाकर घेरने की असफल कोशिश की जाती है। योगी को कभी ब्राह्मण-विरोधी, कभी दलित-विरोधी तो कभी पिछड़ा-विरोधी बताकर उनपर निशाना साधा जाता है।

एक दौर में यह ताकतें जिस तरीके से गुजरात के मुख्‍यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को अपने निशाने पर रखती थीं, अब उसी तरीके से योगी आदित्‍यनाथ पर हमले किए जा रहे हैं। पीएफआई जैसे संदिग्‍ध इस्‍लामिक संगठन, जिन्‍हें भाजपा, मोदी और योगी कभी रास नहीं आए, कुछ विपक्षी दल एवं जातीय संगठनों की सहायता से हिंदू जातियों को आपस में लड़ाकर कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं।

मोदी के नेतृत्‍व में जिस तरीके से अगड़ा, पिछड़ा एवं दलित हिंदू एकजुट हुआ है, उसने तमाम सियासी दलों के अल्‍पसंख्‍यक तुष्टिकरण की राजनीति को हाशिये पर डाल दिया है। हिंदुओं की एकजुटता ने कई राजनीतिक दलों के समीकरण धराशायी कर दिए हैं। नरेंद्र मोदी के इसी अभियान को योगी आदित्‍यनाथ मजबूती से आगे बढ़ा रहे हैं।

जब तक हिंदू एकजुट रहेंगे, तब तक भाजपा मजबूत रहेगी। हिंदुओं की इसी मजबूती को तोड़ने की साज़िश हाथरस में रची गई। स्‍वच्‍छ छवि, ईमानदार कार्यशैली, मजबूत इच्‍छाशक्ति, लीक से हटकर चलने का साहस दिखाने वाले योगी आदित्‍यनाथ पर आने वाले दिनों में हमले अभी और तेज़ होंगे। अभी कई और हाथरस गढ़े जाएँगे और कई बलरामपुर नज़रअंदाज़ किए जाएँगे!