राजनीति
जब रोहिंग्या भारत के शरणार्थी हैं ही नहीं तो देश क्यों उठाए उनके जीवन-यापन का बोझ

आशुचित्र-

  • रोहिंग्याओं की परिस्थिति के प्रति कोई कितनी भी सहानुभूति दिखाए लेकिन यह बात साफ है कि वे अपनी जान बचाने के लिए बांग्लादेश भागे थे इसलिए वे शरणार्थी उसी देश के लिए हुए।
  • भारत में वे मात्र अवैध प्रवासी हैं और उनसे उसी प्रकार का व्यवहार होना चाहिए।

अनवर हुसैन मात्र तीन वर्ष का था जब 2005 में परिस्थितियों ने उसे म्यानमार के रखाइन से जीर्ण नावों में भागना पड़ा। उनके पक्ष में बस यही एक बात थी कि उन्हें ज़्यादा लंबा सफर तय नहीं करना पड़ा। वे पड़ोसी देश बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार शहर के बंदरगाह पर पहुँचे। अपने पूर्वजों की मेहनत से बने आलीशान घरों को छोड़कर उनका भाग्य उन्हें ऐसी जगह ले आया जहाँ उन्हें कूड़े के बीच रहना पड़ा।

परिवार सात वर्षों तक कॉक्स बाज़ार में रहा जहाँ अब भी नौ लाख रोहिंग्या रह रहे हैं जो खदेड़े जाने के बाद वहाँ आकर रुके थे।

हुसैन और उसके छः भाई-बहनों को स्कूल में दाखिलल किया गया था। वे साथ-साथ कुछ और काम करके अपने माँ-बाप का सहयोग भी करते थे जो मज़दूरी करके अपना पेट-पाल रहे थे। 2012 में जब हुसैन ने कक्षा 3 उत्तीर्ण कर ली खी, तब परिवार ने भारत आने का निर्णय लिया। “मेरे सबसे बड़े भाई ने बांग्लादेश में एक रोहिंग्या लड़की से शादी की थी। उस समय उसका परिवार भारत आने की सोच रहा था क्योंकि उन्हें एक रास्ता पता चला था। मेरा भाई अपना पत्नी के साथ भारत चला गया।”, हुसैन ने बताया।

“मेरा भाई फ़ोन पर बताता था कि भारत में जीवन काफी बेहतर है। उसने हमें वहाँ बुलाया। उसने कहा कि अगर हम बांग्लादेश में रहेंगे तो वह हमारे लिए कुछ नहीं कर पाएगा और अगर हमें हमारे बेहतर भविष्य के लिए भारत आ जाना चाहिए।”

परिवार ने हुसैन के बड़े भाई अली जोहर को चीज़ें सुनिश्चित करने के लिए भारत भेजा। एक हफ्ते में जोहर ने सब सही होने की पुष्टि की।

2012 के अंत तक पूरा परिवार भारत आ गया। उनको बस इतना करना था कि परिवार के हर सदस्य के लिए पाँच-छः हज़ार रुपए एक ‘ज़िम्मेदार’ यानि दलाल को देनी थी जो उन्हें बांग्लादेश से बंगाल लाया और हरियाणा के मेवात में उन्हें बसा दिया। डेढ़ साल बाद उसका परिवार उसके बड़े भाई के पास नई दिल्ली के निकट शहीन बाग़ क्षेत्र में बस गया। आज, हुसैन और उसके तीन अन्य भाई-बहन दिल्ली युनिवर्सिटी और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे विश्वविद्यालयों में दाखिल हैं।

हुसैन की कहानी में जो क्षति और संघर्ष है, उसमें ताकत है कि वह खोखले दिलों में हमदर्रदी जगा सके। लेकिन हमें पीछे मुड़कर एक प्रश्न पूठना होगा- क्या हुसैन भारत का शरणार्थी है?

शरणार्थियों हेतु संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (यू.एन.एच.सी.आर.) अपनी वेबसाइट पर लिखता है, ‘शराणार्थी’ वे हैं जो किसी “विवाद या अत्याचार” से भागकर आए हैं और उन्हें उन परिस्थितियों में वापस नहीं भेजना चाहिए जहाँ उनके “प्राण और स्वतंत्रता खतरे में हो”। निस्संदेह वह बांग्लादेश में एक शरणार्थी की तरह आया। लेकिन भारत में हर व्यावहारिक और न्यायिक प्रयोजन के लिए वह एक अवैध शरणार्थी है जो अन्य लाखों की तरह बांग्लादेश की सीमा से ग़ैर-क़ानूनी तरीके से घुस कर आया है।

यह बात स्पष्ट है कि हुसैन का परिवार भारत में विवाद या अत्याचार से बचने के लिए बाग कर नहीं आया था, परंतु बेहतर आर्थिक अवसरों और बेहतर जीवन की खोज में आया था, अन्य शब्दों में कहा जाए तो “एक बेहतर भविष्य के लिए”। हालाँकि इससे उसे और उसके परिवार को शरणार्थियों हेतु संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त का शरणार्थी कार्ड मिलने में कोई व्यवधान नहीं हुआ।

हुसैन एकमात्र मामला नहीं है। वास्तव में हमारी पूछताछ से कि रोहिंग्या बांग्लादेश से बेहतर भारत को क्यों मानते हैं, यह पता लगा कि यह अपवाद नहीं बल्कि एक आम आचरण है। पिछले कुछ हफ्तों में हमने नई दिल्ली और हरियाणा के पास बसे रोहिंग्याओं से बात करके पाया कि भारत कि विशालता और यहाँ उपलब्ध अवसरों के कारण वे यहाँ आए, साथ ही भारत के समाज और लोगों की उदारता ने उन्हें प्रोत्साहित किया।

“भारत जैसी जगह हमें कहाँ मिलेगी?”, 19 वर्षीय मोहम्मद कबीर कहता है जो एक वर्ष से अधिक बांग्लादेश में रहा था। उसका परिवार भारत आया क्योंकि, “यहाँ काम-धंधा अच्छा है।” वह एक दशक से अपनी माँ और सात भाई-बहनों के साथ भारत में रह रहा है। कबीर कहता है कि वह यहाँ आसानी से घूम-फिर सकता है और इस लंबे समय में किसी ने उससे यू.एन.एच.सी.आर. कार्ड एक बार भी नहीं माँगा।

“मैं आठ-नौ वर्ष का था जब मेरे परिवार ने रखाइन छोड़ा। हमारी समुदायों पर होने वाले अत्याचारों से हम तंब आ चुके थे। बौद्ध रात को हमारे घर में घुस जाते थे, हमारे वृक्षों से फल और हमारे पशुओं को ले जाते थे। वे हमें मारते थे। एक दिन हम अपना सबकुछ छोड़कर रात भर की यात्रा कर बांग्लादेश आ गए। हमें यह छिप-छिपकर करना पड़ा क्योंकि जो कोई भी रखाइन से भागने की कोशिश करता है, पुलिस उसे मारती है। नाव में बैठने से पहले हमें बहुत दूर तक पैदल चलना पड़ा।”, कबीर ने बताया।

“बांग्लादेश में जीवन आसन नहीं था। न ही वहाँ रोजगार के ज़्यादा अवसर थे, न ही हम ज़्यादा पढ़े-लिखे थे। मेरा भाई बकरियों को चराकर महीने के पाँच-छः हज़ार रुपए कमाता था पर यह काफी नहीं था। फिर मुझे भारत आने का विचार आया। एक दिन हमने कॉक्स बाज़ार से सीमा तक के लिए एक बस पकड़ी और फिर हम मालदा (पश्चि बंगाल) के रास्ते से चुपके से भारत आ गए। वहाँ से हमने जम्मू के लिए ट्रेन पकड़ी।”, उसने जोड़ा।

कबीर कहता है कि उसके परिवार के यहाँ आने से पहले उसके रिश्तेदार और उसके जान-पहचान वाले भारत में कई सालों से रह रहे थे। उन्होंने ही परिवार को जम्मू आने की सलाह दी थी। पश्चिम बंगाल के दलालों ने सारी व्यवस्था की थी।

जम्मू में कबीर हिंदी सीख गया और कार मेकैनिक की तरह काम करने लगा। 2012 में शरणार्थी कार्ड की माँग के लिए संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय के सामने प्रदर्शन में शामिल होने के लिए वह दिल्ली आया।

“हमें हमारे कार्ड मिल गए और फिर हम कभी जम्मू वापस नहीं गए।”, उसने कहा।

उसी शिविर में रहने वाले 26 वर्षीय मोहम्मद सादिक़ का भारत आने का कारण था कि बचपन में उसने सुना था कि “भारत एक अच्छा देश है” और वहाँ “किसी के साथ गलत नहीं होता”। अपने परिवार में आठ बच्चों में सबसे बड़े सादिक़ ने बताया कि 2012 में बौद्ध लोगों की हिंसा के कारण वह रखाइन छोड़कर आया। क्योंकि उसने भारत आने के लिए पहले ही मिर्णय कर लिया था, वह केवल दो-तीन दिन ही बांग्लादेश में रहा। “हजारों रोहिंग्या भाग रहे थे। हम उस स्थान पर जाते हैं जो हमें लगता है कि हमारे लिए अच्छा होगा। मैंने भारत को चुना।”, उसने कहा।

उसका पड़ोसी हब्शा बताता है कि भारत उसकी पहली पसंद नहीं था। उसे सउदी अरबिया जाना था। “जब हम बांग्लादेश आए, मेरे पिता सउदी के लिए निकले। पर वे वहाँ घुस नहीं पाए। हम वापस म्यानमार नहीं जा सकते थे क्योंकि वे हमें आने नहीं देते। फिर हमने भारत आने का निर्णय किया क्योंकि हमारे रिश्तेदार यहाँ रहते थे।”, उसने कहा।

नई दिल्ली से 70 किलोमीटर दूर, हरियाणा के नूह जिले में कई कहानियाँ हैं। चंदनी और नांगली के शिविरों में जिनसे स्वराज्य की बात हुई उनमें से अधिकांश लोग 2012 में रखाइन छोड़कर भारत आए, जब सुरक्षा बलों ने रोहिंगाओं के विरुद्ध सैन्य अभियान छेड़ दिया था।

22 वर्षीय मोहम्मद जिसका निवेदन था कि उसका पूरा नाम सार्वजनिक न किया जाए ने बताया कि जुम्मे की नमाज़ पढ़ने जाने वाले मुसलमानों पर हमले के पबाद उसके परिवार ने म्यानमार छोड़ दिया। “मेरे पिता ने कहा कि अपनी जान बचाने के लिए हम सभी को भागना होगा।”, उसने कहा। परिवार बांग्लादेश भाग गया और दो-तीन दिन बाद वहाँ भारतीय सीमा के लिए एक बस पकड़ ली, जहाँ सुरक्षा बलों ने उन्हें रोका।

“हमने सैनिकों को अपनी त्रासदी के विषय में बताया कि कैसे हमारे देश में हम पर अत्याचार हो रहा था। कई घंटों के रोने के बाद एक दयालु अफसर ने हमें जाने दिया। सीमा से हम सीधे जम्मू आ गए। कुछ दिनों बाद परिवार दिल्ली आया और अंततः नूह में बस गया।”

लेकिन वे बांग्लादेश में क्यों नहीं रहे? एक इस्लामिक देश होने के नाते उनपर वहाँ कोई अत्याचार नहीं होता। मोहम्मद ने कहा कि एक सुरक्षा अधिकारी ने भी उनसे यही प्रश्न किया था। “मैंने उन्हें बताया कि वह एक छोटा देश है और जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। हमें वहाँ ज़्यादा काम नहीं मिलता। न ही हम वहाँ इतना स्वतंत्र महसूस करते।”, उसने कहा।

मोहम्मद ने कहा कि उसे काम पर जाना है इसलिए वह आज्ञा चाहता है। बाँस की झोपड़ियाँ बनाने में माहिर, उसे इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक त्रिदिवसीय प्रदर्शनी के लिए एक दूरसंचार कंपनी के लिए अस्थायी बाँस की दुकान बनाने का ठेका मिला है। हालाँकि उसके पास कोई वैध दस्तावेज़ नहीं है, अपना शरणार्थी कार्ड दिखाकर उसे काम मिल गया। “मुझे कुल 35,000 रुपए मिल रहे हैं और कच्चे माल और बाकी संसाधनों के पैसे काटकर कुल 25,000 रुपए की कमाई होगी।”, मोहम्मद ने बताया।

हालाँकि मोहम्मद एक खुशमिज़ाज और अच्छा इंसान लगता है, हमें पूछना चाहिए भारतीय कंपनियों से कि वे अवैध रोहिंग्या शरणार्थियों से कि वे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के इतना निकट उन्हें कैसे काम करने दे सकती हैं जबकि खुफिया एजेंसियों ने सुरक्षा चेतावनी दी है। इस प्रकार का रवैया चिंता का विषय है।

मोहम्मद की तरह मोहम्मदुल्लाह जो चंदनी शिविर में एक दुकान चलाता है ने बताया कि शुरू में उसे संघर्ष करना पड़ पर अब वह अच्छे से कमा रहा है। पिछले दो साल में उसने बांग्लादेश में अपने माता-पिता को करीबन डेढ़ लाख रुपए भेजे हैं। दिलचस्प बात है कि उसे भारत आने के कुछ दिनों में ही अपना शरणार्थी कार्ड मिल गया था पर उसके माता-पिता को साढ़े पाँच सालों तक रहने के बाद भी नहीं मिला। “बांग्लादेश में हफ्ते में दो दिन का काम मिलना भी मुश्किल है। यहाँ मैं रोज़ कमा सकता हूँ।”, उसने कहा।

चंदनी के दूसरे शिविर में रहने वाले हारून राशिद 2008 में भारत आया था। जब वह बांग्लादेश में था तो उसने सुना था कि भारत में एक दिन के काम से अगले 10 दिनों के भाजन का इंतज़ाम किया जा सकता है। बांग्लादेश में स्थिति खराब थी, उसने कहा। “वहाँ कोई कानून व्यवस्था नहीं है। शाम को घर लौटते वक्त चोर आपकी पूरे दिन की कमाई लूट सकते हैं। यह भारत में नहीं होता। ऊपर से यहाँ आय भी बेहतर है।”, उसने कहा। “सीमा के दोनों तरफ लोग हैं जो परिवहन देखते हैं।”, उसने सीमा पार लोगों की आवा-जाही का तरीका बताया।

28 वर्षाय मोहम्मद असलम के पूरे परिवार में 80 से ज़्यादा लेग हैं। वो और उसके 31 परिवार वाले 2012 में अपनी 26 एकड़ की संपत्ति छोड़कर रखाइन छोड़कर भाग आए। बाकि परिवार वाले कुछ महीनों बाद बांग्लेश आ गए और अभी भी बांग्लादेश में रह रहे हैं। “हम बांग्लादेश में केवल नौ दिन के लिए थे, कुटुपलंग शरणार्थी शिविर में। यह बहुत पुराना है। जो नए शिविर बने हैं, वह स्लम हैं।”

असलम के अनुसार उसका परिवार ज़्यादा समय तक उस शिविर में नहीं रह सकता था क्योंकि वहाँ केवल पंजीकृत शरणार्थी रह सकते थे। “उन्होंने हमें शरणार्थी कार्ड नहीं दिया। इसलिए हमें छोड़ना पड़ा। हमने भारत के बारे में सुना था कि यह बहुत बड़ा देश है और यहाँ बहुत मुस्लिम रहते हैं। हम यहाँ अच्छे से कमा सकते हैं और अपने परिवारों का भरन-पोषण कर सकते हैं।”

असलम को दिल्ली में अपना शरणार्थी कार्ड पाने में बिल्कुल समय नहीं लगा। “ज़ाफराबाद के हमारे मुफ्ती ने कहा कि यह बेहतर होगा कि हम दिल्ली छोड़कर मेवात चले जाएँ क्योंकि वह मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। हम तबसे यही रह रहे हैं। यहाँ के स्थानीय लेग बहुत अच्छे हैं। वे हमें परेशान नहीं करते।”

हालाँकि रोहिंग्या शिविर में रहते हुए हमें हमारा भविष्य अस्थिर लगता है। “हम अभी तक शांतिपूर्वक रह रहे हैं।”, मोहम्मद ने कहा। इस महीने के शुरू में पुलिस द्वारा हमारी राष्ट्रीयता के लिए फॉर्म भरवाए गए थे। यह फॉर्म म्यानमार दूतावास द्वारा भेजा गा था और भारतीय गृह मंत्रालय द्वारा बँटवाया गया था। यह फॉर्म ज़िम्मेदार के पास हैं और अभी तक उन्होंने किसी को नहीं बाँटा है। रोहिंग्याओं ने यह फ़ॉर्म भरने से मना कर दिया है क्योंकि उन्हों डर है कि इससे उन्हें म्यानमार वापस भेज दिया जाएगा।

उनकी व्याकुलता इसलिए है क्योंकि फॉर्म में उनका नाम लिखने के साथ यह घोषणा करनी है कि ‘मैं म्यानमार का बंगाली हूँ।’

रोहिंग्या संकट के मूल में उनकी उत्पत्ति और जातीयता को संबंध में हाद-विवाद है। राहिंग्या दावा करते हैं कि वे म्यानमार के एराकन क्षेत्र के मूल निवासी हैं इसलिए वे अराकनी मुस्लिम हैं। दूसरी तरफ म्यानमार सरकार, अंग्रेज़ों के दस्तावेज के अनुसार उन्हें बंगाली मुस्लिम मानती है जो चिट्टागोंग (बांग्लादेश) से आए हैं इसलिए वे मूल निवासी नहीं हैं। 1970 और 80 के दशक में स्थिति बिगड़ने लगी जब म्यानमार सरकार ने औपचारिक तौर पर उनकी राष्ट्रीयता छीन ली। तबसे ही वे रखाइन से भागते आ रहे हैं।

विडंबना है कि भारत विभाजन के समय, बर्मा की स्वतंत्रता के पहले रोहिंग्या मुस्लिम नेताओं ने मुहम्मद अली जिन्नाह से अनुरोध किया था कि वे अराकन क्षेत्र को पूर्वी पाकिस्तान में सम्मिलित कर लें क्योंकि वहाँ मुस्लिम लोग बहुतायत में थे। अब वे बांग्लादेश में रहना तक नहीं जानते और खुद के बंगाली मुस्लिम कहे जाने का विरोध करते हैं।

भारत में रोहिंग्या बौद्धों और रखाइन सेना के अत्याचार की दुखभरी कहानी सुनाते हैं। हत्या, बलात्कार, राजनीतिक दमन और दुर्व्यवहार। फॉर्म भरने से इंकार करते हुए उन्होंने कहा कि इससे बेहतर भारत सरकार उन्हें “मार दे, वम से उड़ा दे या ज़हर दे दे।”

“जब तक म्यान्मार हमें नागरिक नहीं मानता और हमें बंगाली मुस्लिम कहना बंद नहीं करता, तब तक हम यह फॉर्म नहीं भरेंगे।”, मोहम्मद सादिक़ ने स्वराज्य को सभी रोहिंग्याओं का मत रखते हुए कहा। कुछ माँग करते हैं कि म्यान्मार सरकार उन्हें बौद्धों के बराबर अकार दे, उनकी संपत्ति वापस करे, उनसे चुराई हुई चीज़ें वापस करे और उनके जीवन की सुरक्षा निश्चित करे। “तभी हम वापस जाने के विषय में सोचेंगे। अगर हम अभी वापस जाएँगे, तो मारे जाएँगे।”, वे कहते हैं।

लेकिन कोई कितना भी इनकी परिस्थिति के प्रति सहानुभूति व्यक्त करे, भरातीय राज्य भावनाओं में बहकर और कानून का बलिदान देकर उन्हें यहाँ नहीं रख सकता। इन लेखाओं के आधार पर यह कहा जाता है कि वे अपनी जान बचाने के लिए भागकर बांग्लादेश गए थे। भारत में वे केवल अवैध प्रवासी हैं।

वकील जे. साई दीपक जो सर्वोच्च न्यायालय में इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और रोहिंग्याओं को वापस भेजने के पक्षमें हैं ने कहा कि रोहिंग्याओं को कम-से-कम बांग्लादेश तो वापस भेजना ही चाहिए।

दीपक कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के अवापसी नियम के अनुसार वे लोगों को वहाँ वापस नहीं भेज सकते जहाँ उन्हें जान का खतरा होगा लेकिन यह भारत में रोहिंग्याओं पर लागू नहीं होता क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन पर भारत ने हस्ताक्षर नहीं किए थे। वे कहते हैं कि अगर यह लागू भी होता तो भी रोहिंग्या बांग्लादेश भेजे जाने चाहिए क्योंकि वे सब बांग्लादेश से भारत आए थे और बांग्लादेश में उनकी जान को कोई खतरा नहीं था।

जब दीपक से पूछा गया कि यू.एन.एच.सी.आर. कार्ड धारकों को शरणार्थी कहा ज सकता है या महीं, उन्होंने कहा, “कोई खुद को शरणार्थी नहीं कह सकता जब तक वह उस देश के कानून के हिसाब से शरणार्थी न हो। तथाकथित संविधान के पुजारी इस मौलिक वास्तविकता का सामन  नहीं करना चाहते।”

“जो रोहिंग्यओं को वापस भेजने का विरोध करते हैं, वे कहते हैं कि उनमें से कोई आतंकवादी नहीं है, वे चाहते हैं कि हम उन्हें शरणार्थी का दर्जा दें, जो वो नहीं हैं।”, वे जोड़ते हैं।

रोहिंग्या जो खुद के भारत आने का कारण बेहतर अवसर बताते हैं, उनके लिए दीपक कहते हैं कि रोहिंग्या मात्र अवैध प्रवासी हैं जो बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों के आने की निरंतरता बनाए हुए हैं। वे देश के संवेदनशील हिस्सों में जनसंख्या संबंधी परिवर्तन करने में सक्षम हैं और संबे समय में भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बनेंगे।

जनसंख्या संबंधी परिवर्तन का डर पहले जम्मू में उठा। स्वराज्य से वार्ता में कई रोहिंग्याओं ने बताया कि उन्हें जम्मू जाने को कहा गया। जम्मू-कश्मीर पुलिस की इंटेलीजेंस विंग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बंगाल में उपद्रव होते रहते हैं जिनके कारण वे जम्मी जाते हैं और वहाँ सुरक्षित भी महसूस करते हैं क्योंकि यह एक मुस्लिम बहुल राज्य उनका स्वाभाविक घर है।

इसी प्रकार मेवात में भी कई रोहिंग्याओं ने रिकॉर्ड पर यह मान कि वे मेवात इसलिए आए क्येंकि यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। मोहम्मद कहते हैं कि जब दिल्ली के स्थानीय लोग उनके वहाँ बसने का विरोध करने लगे, तब ज़ाफराबाद के एक मौलाना ने उन्हें कहा, “मेवात जाओ, वह मुस्लिमों के लिए अच्छा है, खासकर कि तुम लोगों के लिए।”