राजनीति
ग्राउंड रिपोर्ट: जातिगत अत्याचार नहीं बल्कि साथी दलितों द्वारा अपमान के कारण 50 परिवार अपनाना चाहते हैं इस्लाम
जातिगत अत्याचार नहीं बल्कि साथी दलितों द्वारा अपमान

प्रसंग
  • अधिकांश मीडिया उच्च जाति द्वारा शोषण की कहानी फ़ैलाने में जुटा है जो कि सच नहीं है।
  • सच्चाई यह है कि इस लड़ाई में दलित अपने ही लोगों का सामना कर रहे हैं।

मंदिर में मूर्ति की स्थापना से इनकार के बाद उत्तर प्रदेश में दलित परिवारों ने धर्म परिवर्तन की दी धमकी’

यह हेडलाइन, या ऐसी ही हेडलाइंस, हाल ही में कई समाचार प्रकाशनों द्वारा प्रस्तुत की गई थीं। यह नई दिल्ली से लगभग 100 किमी दूर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इंचोली तहसील का एक मामला था।

जैसा कि सोशल मीडिया पर तत्काल प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि अधिकांश पाठकों ने जो निष्कर्ष निकाला वह यह था कि: ‘उच्च जाति’ समूहों ने, विशेष रूप से ब्राह्मणों ने, जाति उत्पीड़न जारी रखते हुए ‘निचले जाति’ समूहों को एक पूजा स्थल, जिसे सभी हिन्दुओं के लिए एक समान माना जाता है, पर उनके अधिकारों का प्रयोग करने से रोका। यह कि जाति के आधार पर भेदभाव को गैरकानूनी बनाने के छः दशक बाद भी उच्च जातियां बिना किसी दंड के ऐसा कर रही हैं और निचली जातियों के पास दमनकारी समाज को छोड़ने और एक जाति-रहित धर्म अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ रहीं। यही ना?

जी नहीं।

गाँव का एक दौरा और दोनों पक्षों तथा गाँव वालों के साथ बातचीत से जो तस्वीर सामने आई वह इन हेडलाइनों से बहुत अलग है।

यह पता चला है कि उत्पीड़नकर्ता, वह समूह जिसने कथित तौर पर मूर्ति स्थापना से रोका था, भी एक दलित समूह है। दरअसल, विवाद में लिप्त दोनों ही पक्ष जाटव समुदाय से हैं। यह विवाद एक भूभाग को लेकर हुआ है न कि पूजा के अधिकार को लेकर। यह इस तथ्य से साफ है कि ब्राह्मणों समेत कई पुजारियों ने मूर्ति स्थापना के लिए अपने परिसर की पेशकश की है। इस्लाम में शामिल हो जाने की धमकी परिवार के स्वयं के शब्द हैं, जिसका मकसद है दूसरे पक्ष को एक “सबक” सिखाना।

ग्राउंड रिपोर्ट

यह 54 वर्षीय राजकुमार थे, जो अपनी पसंद के मंदिर में माँ काली की मूर्ति की स्थापना न होने की स्थिति में इस्लाम में शामिल होने के 50 परिवारों के इरादे की घोषणा करने के लिए समाचार चैनलों पर दिखाई दिए थे।

जब मैं मसूरी गाँव में कुंकुरा रोड पर उनके मकान में प्रवेश करती हूँ, तब उनकी माँ बेदो देवी समेत कई महिलाएं मुझे एक छोटे से कमरे में ले जाती हैं, जिसमें गेहूं का एक ढेर लगा हुआ है। वे गेहूं के ढेर में हाथ डालती हैं और माँ काली की एक फीट लम्बी मूर्ति बाहर निकालती हैं।

जातिगत अत्याचार नहीं बल्कि साथी दलितों द्वारा अपमान

माँ काली की मूर्ति के साथ बेदो देवी (दाहिने)

बेदो देवी फफक कर रो पड़ती हैं। वह माँ काली की मूर्ति को पहले की तरह ढेर में लिटा देती हैं और सिसकियाँ भरते हुए कहती हैं, “यह नवरात्र का तीसरा दिन है (शुक्रवार को) और हमारी देवी यहाँ अनाज में दबी हुई हैं। उनको उनकी जगह नहीं दी गयी है और यह एक अपमान का विषय है। हमारे अलावा इस पाप का भागीदार और कौन है?”

इसके बाद राजकुमार मुझे दूसरे कमरे की तरफ ले जाते हैं ताकि हम विस्तार से बात कर सकें, लेकिन इससे पहले वह दीवार पर फ्रेम करके लगाई गयी तस्वीरों की तरफ इशारा करते हैं। नरेंद्र मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीरें हिन्दू देवी-देवताओं के साथ लगी हुई हैं। राजकुमार कहते हैं, “मैं मोदी का एक बड़ा समर्थक हूँ। मैंने पूरी जिंदगी भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) का समर्थन किया है।” वह आगे स्पष्टीकरण देते हैं कि क्यों यह जानकारी इस विवाद के लिए प्रासंगिक है: “कृपया यह मत सोचिये कि हमें हिन्दू होने पर गर्व नहीं है लेकिन प्रशासन की उदासीनता के कारण हम इस्लाम में धर्म परिवर्तन पर विचार करने एक लिए मजबूर हुए हैं।

वह कहानी का अपना पक्ष बताते हैं: उनके घर से लगभग 200 मीटर दूर एक शिव मंदिर है जहाँ उनका परिवार नियमित रूप से पूजा करता है। कुछ सप्ताह पहले, उन्होंने नवरात्र के पहले दिन पर मंदिर में काली माँ की मूर्ति स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की थी। मंदिर में पहले से ही शिव जी और हनुमान जी की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर के प्रबंधकों ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया था। यहाँ तक कि उनमें से एक शिवचरण मूर्ति, जिसकी कीमत 11000 रुपए है, को खरीदने के लिए हस्तिनापुर उनके साथ भी गए थे। राजकुमार ने मूर्ति के लिए मोहल्ले वासियों से चंदा इकठ्ठा किया था यह उन निवासियों की सामूहिक इच्छा थी कि मूर्ति को विधिवत रीति-रिवाजों के साथ स्थापित किया जाए। इसके लिए सीमेंट और ईंटें खरीदकर इस स्थान पर रखी गयी थीं।

जातिगत अत्याचार नहीं बल्कि साथी दलितों द्वारा अपमान

राजकुमार (बाएं) अपनी माँ बेदो देवी के साथ

अभी तक तो सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन बुधवार को, जब वह उस स्थल पर पहुंचे तब उन्होंने पाया कि मंदिर के आस-पास के परिवारों ने ईंटों को सड़क पर फेंक दिया था और सीमेंट बिखरा दिया था। राजकुमार को बताया गया कि मूर्ति की स्थपाना नहीं हो सकती क्योंकि यह मंदिर में समुदाय की जगह ले लेगी जो कि हवन, भंडारा और शादियों जैसी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल की जाती है।

व्याकुल राजकुमार वापस लौटे और अपर जिला मजिस्ट्रेट से उनके हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए उन्हें एक लिखित शिकायत सौंपी और इस धमकी का भी जिक्र किया कि यदि उनकी मूर्ति की स्थापना नहीं होती है तो मोहल्ले के कई सारे परिवार इस्लाम में धर्म परिवर्तित हो जायेंगे। मीडिया से राजकुमार ने कहा, “हम हिन्दू हैं और यदि हम एक मंदिर में एक देवी की मूर्ति स्थापित नहीं कर सकते हैं तो हम कहाँ जाएँ? इससे बेहतर है धर्मपरिवर्तन।”

जातिगत अत्याचार नहीं बल्कि साथी दलितों द्वारा अपमान

राजकुमार का शिकायत पत्र जिसमें उन्होंने धर्मपरिवर्तन की धमकी दी थी।

यह कथन पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि परिवार को हिन्दुओं के रूप में उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया गया था।

विरोधी समूह ने राजकुमार को शिव मंदिर से 50 मीटर से भी कम दूरी पर एक अन्य स्थल की पेशकश की थी। हालाँकि यह राजकुमार के परिवार को मंजूर नहीं था। बेदो देवी कहती हैं, “यह स्थल जंगल की तरफ है। मतलब ही नहीं बनता कि मैं अपनी माँ को एक जंगल में रखूँ। इसके अलावा काली अकेले नहीं रह सकती। हमें वहां शिव भी चाहिए।”

एक अन्य शिव मंदिर के एक ब्राह्मण पुजारी मुकेश गिरी ने भी अपने परिसर की पेशकश की थी। लेकिन राजकुमार के परिवार द्वारा इस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया गया। बेदो देवी कहती हैं, “उस मंदिर में पहले से ही काली की एक मूर्ति है। क्या शिव दो देवियों के साथ रह सकते हैं?”

राजकुमार का कहना है कि ग्रामीण अन्य विकल्प सुझा रहे हैं लेकिन यह उनके लिए उचित नहीं है। “हमारा सवाल है कि जब वे शुरुआत में हमारे प्रस्ताव पर सहमत थे तो अब क्यों पलट गए? मैं देवी को कभी भी इस जगह पर नहीं लाता।”

पुजारी मुकेश गिरी (बाएं) जिन्होंने अपने प्रबंधन वाले मंदिर में मूर्ति स्थापना की पेशकश की थी।

राजकुमार के अनुसार, वे लोग इस लिए पलट गए क्योंकि राजकुमार का पक्ष भाजपा का समर्थन करता है जबकि दूसरा पक्ष बहुजन समाज पार्टी का समर्थक है।

मैं दूसरे पक्ष, जहाँ राजकुमार द्वारा शिकायत में आरोपियों के रूप शिवचरण समेत 10 लोगों के नाम दिए गए थे, की तरफ जाती हूं। कौतूहल यह है कि उन नामित लोगों में कोई भी उपलब्ध नहीं है या बात करने को तैयार नहीं है। लेकिन कई अन्य निवासी अपने पक्ष की कहानी बताने के लिए मेरे चारों ओर इकठ्ठा होते हैं। वे कहते हैं कि दोनों मोहल्लों के परिवार एक-दूसरे से सम्बंधित हैं और एक ही समुदाय से आते हैं। वे भाजपा-बसपा पर अनाप-शनाप बातें करते हैं।

अमित, जो कि एक मजदूर हैं, कहते हैं कि “राजकुमार के पास सरकारी नौकरी है। उस मोहल्ले में हर कोई दौलतमंद है। वे किसी भी जगह अपनी बेटियों की शादी कर सकते हैं। दूसरी तरफ हमारा मोहल्ला गरीब है। हमारे पास जो कुछ भी है यह मंदिर ही है। वे हमारी जगह क्यों बर्बाद करना चाहते हैं?”

शिव मंदिर

एक छात्र मोंटी कहते हैं, “यह एक मंदिर ही नहीं बल्कि एक धर्मशाला भी है। इस परिसर का इस्तेमाल कांवड़ियों की आरामगाह के रूप में भी होता है। आज राजकुमार, कल उस मोहल्ले से कोई और अपनी मूर्ति की स्थापना करने के लिए आ जायेगा। हम अपना एकमात्र सामुदायिक स्थल खो देंगे।”

निवासियों का कहना है कि राजकुमार का परिवार जिस स्थान को जंगल कह रहा है उस स्थान को प्रभावी प्रयासों के माध्यम से एक सुन्दर और चार दीवारी वाले स्थान में बदला जा सकता है, लेकिन “कुछ लोग अपने घमंड से परे कुछ नहीं सोच पाते”।

वे कहते हैं कि यहाँ कोई विवाद नहीं है बल्कि वर्चस्व की लड़ाई के साथ एक छोटी सी जगह के लिए एक छोटी सी लड़ाई है। यह पूछे जाने पर कि पहले राजकुमार का प्रस्ताव क्यों स्वीकार किया गया था, अमित कहते हैं, “मुझे नहीं पता इसके लिए हाँ किसने की। जैसा कि आप देख सकते हैं कि अधिकांश लोग इसके खिलाफ हैं।”

पूजा स्थल के लिए प्रस्तावित वैकल्पिक जगह, जो जंगल की तरफ है

उनके सम्बन्धियों के मुस्लिम बनने की धमकी के बारे में पूछने पर निवासी कहते हैं कि हमें इससे फर्क नहीं पड़ता। धीरज कहते हैं, “वे जो करना चाहते हैं करने दीजिये। एक समाधान के रूप में कभी भी हमने ऐसा सुझाव नहीं दिया है।” एक अन्य निवासी कहते हैं कि “आज कल धर्मपरिवर्तन एक फैशन बन गया है।”

भगवा कपड़े पहने हुए पुजारी मुकेश गिरी सबको शांत करते हैं और समझाते हैं, “मंदिर बहुत हैं, पूजा करने वाला कोई नहीं।”

भीड़ तितर-बितर हो जाती है।

क्या इस संकट का कोई समाधान है?

निवासियों का कहना है कि इंचोली थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) बुधवार से हर दोपहर दौरा कर रहे हैं ताकि दोनों पक्ष बात करें और एक समाधान पर पहुँच सकें।

जमीन पर और दीवारों पर चढ़े हजारों गाँव वालों के बीच प्रेमचंद शर्मा दो सिपाहियों के साथ एक कुर्सी पर बैठते हैं और चर्चा शुरू करते हैं। वह राजकुमार से धैर्य रखने के लिए कहते हैं। राजकुमार उत्तर देते हैं कि जैसे-जैसे नवरात्र के दिन गुजरते जा रहे हैं वैसे-वैसे उनका धैर्य जवाब दे रहा है। शर्मा तीखे स्वर में पूछते हैं, “तो फिर मुझे प्रशासन द्वारा लिखित अनुमति दिखाइए और मैं सुनिश्चित करूँगा कि मूर्ति की स्थापना हो। क्या आपने अभी तक अनुमति के लिए आवेदन किया है?” राजकुमार कहते हैं कि मैं इस सब में नहीं पड़ना चाहता।

चाय और बिस्कुट बांटे जाते हैं और शर्मा धैर्य पर चर्चा जारी रखते हैं। वह चर्चा के लिए 10 आरोपियों को बुलाने का कोई स्पष्ट प्रयास नहीं करते हैं। वह राजकुमार को बताते हैं कि उन्हें ये नाटकीय धमकियां नहीं देनी चाहिए जिनसे मीडिया को मौका मिलता है। इसके बाद वह जाने के लिए उठ खड़े होते हैं। यह बैठक आधे घंटे से अधिक समय तक चलती है।

शर्मा मुझसे कहते हैं, “तो आप दिल्ली से हैं? ठीक है, वह (राजकुमार) जो कहता है वैसा कुछ नहीं कर रहा है। हम कोशिश कर रहे हैं कि दोनों पक्ष बात करें और एक समाधान पर पहुंचे। यह कोई मुद्दा नहीं है।”

एसएचओ प्रेमचंद शर्मा (बाएं), बैठक में ग्रामीण (दाएं)

पुलिस चली जाती है, दोनों समूह आपस में वाद-विवाद करते हैं। राजकुमार का परिवार भी चला जाता है।

राजकुमार मुझे बताते हैं, “मैं गंभीर हूँ। यदि मेरी देवी का इस तरह अपमान होगा तो मैं नवरात्र के अंतिम दिन एक मौलवी को बुलाऊंगा। मेरे पास पहले ही कई मौलवियों से फोन आ रहे हैं। देखिये, मेरा फोन चेक कीजिये।”

बेदो देवी सहमति में सिर हिलाती हैं। “मैं देवी को दान में दे दूंगी, इस मकान को बेच दूँगी और दूसरे गाँव में चली जाउंगी।”

राजकुमार के एक रिश्तेदार, जिनका नाम भी राजकुमार ही है, कहते हैं, “मुसलमान आपस में चाहे जितना लड़ें लेकिन मस्जिद में वे सब एक हैं। मैं पिछले 18 सालों से अब तक मुसलमानों के साथ काम करता रहा हूँ।” वह कहते हैं, “यहाँ हमारी कोई सुनवाई नहीं है।”

कोई सुखद समाधान न निकल पाने के कारण मामला अब कानून के हाथो में है। राजकुमार ने दस्तावेज प्राप्त किए हैं जो दिखाते हैं कि शिव सेवा समिति, जो मंदिर का प्रबंधन करने का दावा करती है, वह एक पंजीकृत संगठन है लेकिन मंदिर की भूमि पर कोई दावा नहीं कर सकती है क्योंकि यह सरकार से जुड़ी हुई है। राजकुमार के ही मोहल्ले से राजेश कुमार अपनी जेब से एक डायरी निकालते हैं जिसमें इन सभी वर्षों में शिव मंदिर को दिए गए चंदे का रिकॉर्ड है। वह कहते हैं, “देखिये, अधिकाँश चंदा इसी मोहल्ले के सदस्यों द्वारा दिया जाता है।”

लेकिन यह काफी स्पष्ट है कि कानून इस विवाद को हल नहीं करेगा। नौ दिनों के नवरात्रों में तो किसी भी तरह से नहीं। राजकुमार कहते हैं कि अनुमति हेतु आवेदन के लिए अब काफी देर हो चुकी है और ऐसा करने की अब उनकी इच्छा भी नहीं है। वह कहते हैं, “मैं नहीं चाहता कि देवी को इस सब से गुजरना पड़े।”

राजकुमार के छोटे भाई एक कार्यकर्ता से कहते हैं कि “वह एक कट्टर हिन्दू हैं”। हालाँकि, उनकी आस्था लागातार कमजोर पड़ने के कारण सम्भावना है कि परिवार अपनी धमकी पर काम करेगा। उनके अपने शब्दों में, “इस गाँव में अब और रहना उनके लिए अत्यधिक शर्मिंदगी का कारण बनता जा रहा है।”

अपने स्वयं के समुदाय के भीतर शमिंदगी से बचने के लिए धर्मान्तरण और प्रशासन को हरकत में लाने के लिए धर्मान्तरण की धमकियाँ देश के इस हिस्से में कोई नयी बात नहीं हैं।

पास के ही बागपत जिले में 20 सदस्यों के एक मुस्लिम परिवार ने हिन्दू धर्म में ‘घर वापसी’ (उनके पूर्वजों के धर्म, हिन्दू धर्म में धर्मान्तरण) करने की धमकी दी थी। कारण था कि वे अपने बच्चे की हत्या, जो कि कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा की गयी थी, के मामले में “पुलिस को हरकत में लाना चाहते थे”। वे अपनी धमकी को अमल में लाये, हिन्दू धर्म अपनाया और दूसरे गाँव में चले गए। दोबारा बागपत में, एक मुस्लिम व्यक्ति ने एक हिन्दू बनने की धमकी दी। कारण था उसके द्वारा कांवड़ यात्रा करने के कारण उसे मुस्लिम साथियों द्वारा नमाज़ अता करने से रोका जाना और उन मुस्लिम साथियों को दण्डित न किया जाना। इस मामले ने अगस्त में मीडिया का अच्छा-खासा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था लेकिन उसके बाद कोई जानकारी नहीं है कि उसने अपनी धमकी पर काम किया या नहीं।

इंचोली का यह नवीनतम मामला भी कुछ ऐसा ही पैटर्न दिखाता है। हालाँकि यह रिपोर्टिंग मीडिया की एक सहज प्रवृत्ति का एक और उदाहरण है जिसमें मीडिया किसी कहानी में दलितों के शामिल होते ही उन कहानियों को जातिगत उत्पीड़न से जोड़ देता है जबकि यथार्थतः ऐसा बिल्कुल नहीं होता है।

स्वाती गोयल शर्मा स्वराज्य में एक वरिष्ठ संपादक हैं। वह @swati_gs पर ट्वीट करती हैं।