राजनीति
माओवादियों के खिलाफ़ अंतिम युद्ध में बस्तर की तैयारी: ज़मीनी रिपोर्ट
Naxal Parade

24 अप्रैल को अपने नवीनतम कुकृत्य में माओवादी आतंकवादियों ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के सुकमा ज़िले में 25 सी.आर.पी.एफ़. जवानों की नृशंसतापूर्ण हत्या कर दी। पर यह बर्बर कार्यवाही एक पूरी तरह से असफल क्रांति, जिसे उन आदिवासियों का भी न के बराबर समर्थन मिल रहा है जिन्हें कथित रूप से आज़ाद किया जाना था के आखि़री दिनों का संकेत भी हो सकती है । हाँ, युद्ध ज़रूर चल रहा है, लेकिन राज्य ये युद्ध जीतने की कगार पर है।

बस्तर के विस्तृत भ्रमण के दौरान इस संवाददाता ने लोगों के मूड में एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा है। मुझे वहाँ देखने को मिलीं-उम्मीदें, महत्वाकांक्षा, और विकास जो कि इन सिरफिरे माओवादियों की जड़ों पर प्रहार कर रहा है।

जिस ज़मीन पर बहुत सा ख़ून बहाया गया अब वो ज़मीन कई सपनों को पोषित कर रही है: किसान अपनी जैविक फ़सलों को सुदूर शहरों में बेचना चाहते हैं, माओवादी आतंकियों के हाथों अनाथ हुए बच्चे डाॅक्टर और फ़ैशन डिज़ायनर बनना चाहते हैं। लाल झंडे के तले ख़ून के प्यासे इन आतंकियों के हाथों विधवा हुई महिलायें अपना व्यापार के साथ-साथ और भी बहुत कुछ करना चाहती हैं।

सुकमा के दोर्णापाल क्षेत्र में गश्त लगतो सीआरपीएफ़ के जवान जहाँ सोमवार 24 अप्रेल की दोपहर मुठभेड़ हुई थी

सुकमा के दोर्णापाल क्षेत्र में गश्त लगतो सीआरपीएफ़ के जवान जहाँ सोमवार 24 अप्रेल की दोपहर मुठभेड़ हुई थी

 

सुकमा के दोर्णापाल क्षेत्र में गश्त लगतो सीआरपीएफ़ के जवान जहाँ सोमवार 24 अप्रेल की दोपहर मुठभेड़ हुई थी

सुकमा के दोर्णापाल क्षेत्र में गश्त लगतो सीआरपीएफ़ के जवान जहाँ सोमवार 24 अप्रेल की दोपहर मुठभेड़ हुई थी

बस्तर में एक ख़ामोश क्रांति हो रही है, पर वैसी नहीं जैसी कि माओवादी आतंकियों ने सपना देखा था। सड़कों और पुलों का निर्माण बेहद तेज़ी से किया जा रहा है जबकि छत्तीसगढ़ की पहाड़ियांे की ढलान पर अत्याधुनिक सुविधायुक्त अस्पताल और सरकारी स्कूल भी बन रहे हैं। माओवादियों की विनाशकारी छाया से उभर रहे लगभग सभी आदिवासियों ने अपने बाक़ी देशवासियों की तरह एक सामान्य जीवन की कामना शुरू कर दी है। माओवादियों के खिलाफ़ जंग में बुलेट्स का साथ विकास से दिया जा रहा है। राज्य निर्णायक रूप से जंग जीतने की स्थिति में है।

राज्य सरकार का अनुमान है कि दो साल के वक्त में बस्तर माओवादियों से मुक्त हो जायेगा।

कनेक्टिविटी ही कुंजी है

2003 से छत्तीसगढ़ से राज्य पर शासन कर रहे, मुख्यमंत्री रमन सिंह ने स्वराज को बतया कि पिछले कुछ सालों में फ़ोकस ज़मीनी कनेक्टिविटी पर रहा है। ”एक बार सुदूर गाँवों को सभी मौसमों में चलती रहने वाली सड़कों से जोड़ दिया जाता है और उस गाँव तक विकास होने लगता है तो उस क्षेत्र से माओवाद की मज़बूत पकड़ कमज़ोर पड़ने लगती है। सड़कें बनने का सबसे बड़ा फ़ायदा ये होता है कि गाँव वालों की सुरक्षा में आसानी होती है क्योंकि सुरक्षा बलों के लिये गाँवों तक पहुँचना आसान हो जाता है। इसीलिए हमारा मुख्य ध्यान तेज़ी से पुलांे और सड़कों के निर्माण पर है।“ वह विस्तार से बताते हैं। पूरे बस्तर में मानव और मशीनें दोनांे बड़ी तेज़ी से छोटे-बड़े पुल और सड़कें बनाने के लिए बहुत तेज़ी से काम कर रहे हैं। यह सच है कि कई जगहों पर ये निर्माण कार्य लगातार सुरक्षा बलों और अद्र्ध सुरक्षा बलों के सुरक्षा घेरे के बीच हो रहा है, लेकिन ठेकेदारों और कर्मचारियों के बीच अब सुरक्षा का माहौल बना है। ”पहले कोई भी ठेकेदार यहाँ पुल और सड़क के कामों के लिए निविदायें ही नहीं भरते थे। बार-बार टेण्डर निकालने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आती थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों में स्थिति में बहुत बदलाव आये हैं।“ आई.ए.एस. अधिकारी संतोष मिश्रा ने बताया, जोकि मुख्यमंत्री के मुख्य सहायक हैं।

पहले की ही तरह अब भी ठेकेदारों को माओवादियों की ओर से गम्भीर चेतावनी दी जाती है। ”सड़कों का मतलब है, सुरक्षा बलों के लिए सुदूर गाँवों तक पहुँचने मे बहुत आसानी होगी, यही गाँव माओवादियों की मज़बूत पकड़ में हैं। माओवादी सड़क निर्माण के उपकरण जलाते थे, कर्मचारियों को भगा देते थे, ठेकेदारों सु जुर्माना वसूलते थे और कइयों का तो अपहरण तक कर लिया। चार साल पहले तक तो हममें से कोई भी किसी ठेकेे के लिए बोली लगाने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था। बस्तर के डिवीज़नल हेडक्वार्टर, जगदालपुर के बाहर से काम करने वाले ठेकेदार, शांति कुमार शुक्ला ने बताया।

इंजेराम-भेज्जी की सड़क पर होता निर्माण कार्य। इस निर्माणाधीन सड़क की गश्त करते समय माओवादियों के हमले में 25 सीआरपीएफ़ जवान शहीद हुये थे।

इंजेराम-भेज्जी की सड़क पर होता निर्माण कार्य। इस निर्माणाधीन सड़क की गश्त करते समय माओवादियों के हमले में 25 सीआरपीएफ़ जवान शहीद हुये थे।

सरकार के निर्माण कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने और सुरक्षा बलों के माओवादियों को पीछे धकेलना शुरू करने के बाद बदलाव आने शुरू हो गये। ”हालात भी बदले हैं और डर और कुछ बुरा होने की आशंका अब कम हो गयी है, शांति कुमार शुक्ला ने बताया। उन्होंने बस्तर ज़िले के माओवादियों का अड्डा माने जाने वाले लोहंदीगुड़ा ब्लाॅक, में एक पुलिस स्टेशन बनाने के लिए निविदा भरी। ”लोहंदीगुड़ा बहुत ही दूर के क्षेत्र में है, माओवादियों की कार्यवाही के डर से, मैंने स्वास्थ्य केंद्र का बोर्ड लगाकर, पुलिस स्टेशन का निर्माण करवाया, लेकिन आज लोहंदीगुड़ा माओवादियों से पूरी तरह आज़ाद है,“ शुक्ला ने बताया।

बढ़ते हुए विश्वास का पता इस बात से चलता है कि कुछ दूसरे प्रदेशों के ठेकेदार भी यहाँ पर काम के लिए आने लगे हैं। उन्हीं मंे से एक हैं, सुब्रतो मण्डल जो कि सुदूर स्थित पलासी, पश्चिम बंगाल (प्लासी के युद्ध के लिए मशहूर) से हैं। मण्डल एक सब-काॅन्ट्रैक्टर हैं, जोकि मंगाचल नदी पर बनने वाले बहुत महत्त्वपूर्ण पुल बनाने के काम से जुड़े हुए हैं, जो नैशनल हाइवे 63 से जगदल पुर से बीजापुर को जोड़ता है, जोकि बस्तर ज़िले का नामित मुख्यालय है। सुब्रतो के भाई शुभंकर बताते हैं, ”हमारे पास 63 मज़दूर हैं, और उन्हें माओवादियों से कोई ख़तरा नहीं है।वे सभी एक सी आर पी एफ शिविर के पास रहते हैं।”

भैरमगढ़ से बीजापुर जाने वाली 42 किलोमीटर की रोड माओवादियों के पसंदीदा शिकार क्षेत्र से होकर जाती थी। रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सीमा सड़क संगठन इस रोड को दोबारा से बनाने मंे जुटा था, इसे लगभग दस वर्ष पहले माओवादियों ने कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त कर दिया था। लेकिन आतंकवादियों की लगातार धमकियों और 13 आई ई डी (इम्प्रोवाइज़्ड एक्पलोसिव डिवाइस) के विस्फोटों ने दो बार बीआरओ को परियोजना छोड़ने पर मजबूर किया। इसके बार, बड़ी संख्या में अद्र्धसैनिक बलों को तैनात किया गया और इस सड़क पर सुरक्षा बलों के सात शिविर लगाये गये, जिससे ठेकेदारों के बीच विश्वास पैदा हुआ। हैदराबाद स्थित एक फ़र्म ने इस सड़क को दोबारा तैयार करने के लिए काॅन्ट्रैक्ट किया और काम पूरे ज़ोरों से चल रहा है।

चार साल पहले, एन.एच. 63 पर जगदालपुर से बीजापुर तक ही ड्राइव करने में 6 घंटे लगते थे, और रास्ता जोखि़मों से भरा था।”हम गोधूलि के बाद इस सड़क पर कभी यात्रा नहीं करते थे। माओवादियों ने इस सड़क की मरम्मत के काम को कई बार बाधित किया, इसके लिए वो यहाँ आई ई डी लगा देते थे। कई लोगों को जानें गँवानी पड़ीं। लेकिन अब यह सड़क पूरी तरह सुरक्षित है,“ बीजापुर के कलेक्टर अय्याज तम्बोली ने बताया। सड़कों पर पोस्टर्स फेंककर माओवादी अपनी उपस्थिति महसूस कराने का प्रयास करते रहते हैं। लेकिन बस इतना ही, इससे ज़्यादा कुछ नहीं, तम्बोली ने आगे बताया।

माओवादियों की धमकियाँ और हिंसा न तो राज्य सरकार को सेलफ़ोन टाॅवर की स्थापना करने से रोक पायी है (भले ही ये टाॅवर्स अद्र्धसैनिक बलों के शिविरों और पुलिस स्टेशनों के अंदर ही लगे हैं।) और न ही विद्यालयों के पुनर्निर्माण और माओवादी गढ़ों में भीतर उतरने से। सुकमा ज़िले मंे माओवादी क्षेत्र में भीतरी इलाक़े भेज्जी तक की सड़क का ही मामला लें, ये वही सड़क है जहाँ 11 मार्च को हुए हमले में सड़क निर्माण कर्मियों की हिफ़ाज़त के लिए गश्त पर निकले 12 सीआरपीएफ जवानों को अपनी जान गँवानी पड़ी। हमले के तुरंत बाद, काम पूरी गति से शुरू हो गया, और ये सड़क जल्दी ही तैयार हो जायेगी। सुकमा के ज़िलाधिकारी नीरज कुमार बनसोड ने स्वराज को बताया।

माओवादी हिंसा से सबसे बुरी तरह प्रभावित ज़िले के रूप में जाने जाने वाले बीजापुर के प्रशासनिक अधिकारी, तम्बोली का कहना है कि नई और पुनः बनाई जा रही सड़कों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र पुलिस और अर्धसैनिक बलों के शिविरों का लगाया जाने से बहुत बड़ा बदलाव आया है। बीजापुर में छह सीआरपीएफ बटालियन और 3000 सशस्त्र राज्य पुलिसकर्मी तैनात हैं, यहाँ आम नागरिकों और सुरक्षाबलों का अनुपात 1:25 का है। वो कहते हैं, ”पूरे ज़िले को नक्सलों से मुक्त करने के लिए मुझे 200 करोड़ रुपये और 2 बटालियन सैनिक चाहिए।”

आधुनिक शिक्षा सुविधायें

उन इलाक़ों में जहाँ अभी कुछ समय पहले तक माओवादी तानाशाही अपने चरम पर थी, वहाँ तक पहुँचने वाली सड़कें और पुल बनाने के साथ-साथ, छत्तीसगढ़ सरकार अत्याधुनिक शिक्षा प्रणाली से लैस, ऐसे विद्यालयों की स्थापना भी पूरे ज़ोर-शोर से कर रही है जो किसी भी प्रकार से भारत के महानगरों के किसी भी निजी विद्यालय से किसी तरह कम नहीं होंगे। ऐसा ही एक विद्यालय है, बीजापुर के भैरमगढ़ में बना, एकलव्य विद्यालय। 25 एकड़ में बना ये को-एजूकेशनल स्कूल, एक बड़ी दोमंज़िला इमारत में स्थित है, कक्षा-6 से 10 तक के बीच यहाँ 233 बच्चे हैं और ये सभी बच्चे आदिवासी हैं। ”इस विद्यालय की अवधारणा नवोदय विद्यालय पर आधारित है। हम प्रतिवर्ष 60 विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं, और हमारे यहाँ कम्प्यूटर और विज्ञान प्रयोगशालाओं और पुस्तकालय के साथ-साथ समस्त आधुनिक सुविधायें हैं।“ स्कूल के इंचार्ज बी.आर. पाल ने बताया। नये स्कूल की इमारत और चार छात्रावासों को बनाने में कुल 14 करोड़ रुपये का ख़र्च आया।

छत्तीसढ़ शिक्षा के क्षेत्र में कई अन्य राज्यों से इसलिए अलग है क्योंकि यहाँ के सभी सरकारी स्कूल आवासीय सुविधा भी देते हैं। ”एक बड़ी संख्या मंे आदिवासी बच्चे इन आवासीय स्कूलों में रहते हैं और समग्र शिक्षा प्राप्त करते हैं। पहले के समय में बाँस से बने हुए स्कूल अब कंक्रीट की इमारतो मंे चल रहे हैं।“ संतोष मिश्रा ने बताया। बीजापुर ज़िले के 56,000 से भी अधिक स्कूल जाने वाले बच्चों में से 29,000 बच्चे हास्टल में रहते हैं। दाँतेवाड़ा में स्कूल जाने वाले 43,000 बच्चों मंे से 20,000 हाॅस्टल में रहते हैं, जबकि सुकमा में 45,000 स्कूली बच्चों में से 20,000 से भी ज़्यादा बच्चे हॉस्टल में रहते हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल सामान्य बच्चों की शिक्षा-दीक्षा ही छत्तीसगढ़ सरकार की योजनाओं का मुख्य विषय है। विशेष बच्चों के लिए भी बस्त में कई सारी सुविधायें दी गई हैं। सक्षम अवासी विद्यालय, विशेष बच्चों के लिए दाँतेवाड़ा में बना एक ऐसा ही विद्यालय है, एक ऐसे शहर में जो कि नक्सलवादियों के गढ़ के रूप में मशहूर था। जहाँ कई सीआरपीएफ और पुलिस के जवानों ने अपना जीवन गँवाया। लगभग 210 लड़के और लड़कियाँ- जो सुनने, बोलने या अन्य शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं- इस स्कूल में रहते हैं। ”हमारे यहाँ , खेल, कम्प्यूटर और संगीत कक्षाओं के साथ-साथ स्पीच थेरेपी और आॅडियोमेट्री सुविधायें भी मौजूद हैं। बच्चे बाहर जाकर नियमित स्कूलों में भी पढ़ते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि वो ‘सामान्य’ बच्चों की तरह सीखें। उनकी पढ़ाई में मदद करने के लिए स्कूल के पहले या बाद में हम उन्हें विशेष कक्षायें भी देते हैं।“ सक्षम के प्रधानाचार्य दुर्गा साहू ने बताया।

सक्षम आवासी विद्यालय, दाँतेवाड़ा में दिव्यांग बच्चियाँ

सक्षम आवासी विद्यालय, दाँतेवाड़ा में दिव्यांग बच्चियाँ

 

सक्षम आवासी विद्यालय, दाँतेवाड़ा विशेष श्रवण क्षमता वाले बच्चे

सक्षम आवासी विद्यालय, दाँतेवाड़ा विशेष श्रवण क्षमता वाले बच्चे

दाँतेवाड़ा के गीदाम ब्लॉक में स्थित आस्था विद्या मंदिर में 918 से अधिक बच्चों की ख़ुशनुमा हँसी गूँजती है, जो स्कूल के हाॅस्टल में रहते हुए पढ़ रहे हैं, खेल रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा चलाया जाने वाला ये सीबीएसई बोर्ड स्कूल इस मायने में विशेष है कि ये उन बच्चों के लिए चलाया जा रहा है, जिन्हें माओवादियों ने अनाथ कर दिया या जो बच्चे ऐसे सुदूर क्षेत्रों से हैं, जहाँ के स्कूलों की इमारतों को इन आतंकवादियों ने नष्ट कर दिया है। ज़्यादातर बच्चों की कहानियाँ दिल दहला देने वाली हैं, लेकिन यहाँ के शिक्षक, विशिष्ट थेरेपिस्ट और यहाँ का आधुनिक वातावरण, जिसमें इन बच्चों का विकास हो रहा है, उससे इन्हें अपने गहरे दिमाग़ी आघात से उबरने में मदद मिलेगी।

आस्था विद्या मंदिर के प्रमुख संतोष प्रधान कहते हैं, ”स्कूल कैम्पस पूरी तरह से वाई-फ़ाई इनेबल्ड (सक्षम) है। 4 जी कनेक्टिविटी के साथ बच्चों के लिए स्मार्ट क्लासेज़ में पढ़ना और सीखना मज़ेदार अनुभव है। हमारे यहाँ कम्प्यूटर और विज्ञान की प्रयोगशालायें हैं, 10,000 से भी अधिक पुस्तकों वाला पुस्तकालय है, खेल सुविधायें, संगीत की कक्षायें और वह सब कुछ भारत के अच्छे से अच्छे निजी स्कूल ही दे सकते हैं।“ दाँतेवाड़ा में पूरी तरह से आवासीय कौशल विकास विद्यालय के अकाउंट्स, कम्प्यूटर ऐप्लिकेशंस, कारपेन्ट्री, प्लम्बिंग, मैसनरी, ड्राइविंग और फ़ैशन डिज़ायनिंग के सर्टिफ़िकेट कोर्सेज़ में 210 विद्यार्थी हैं, इनमें से ज़्यादातर ज़िले के दूरस्थ गाँवों के अदिवासी हैं। कृतेश हीरवानी, इस विद्यालय के प्रधानाचार्य, कहते हैं कि प्रदेश के अंदर और बाहर से आने वाली कम्पनियाँ भी यहाँ के विद्यार्थियों को अपने यहाँ काम के लिए भर्ती करती हैं।

आस्था विद्या मंदिर, दाँतेवाड़ा में कम्प्यूटर प्रयोगशाला में बच्चे

आस्था विद्या मंदिर, दाँतेवाड़ा में कम्प्यूटर प्रयोगशाला में बच्चे

 

आस्था विद्या मंदिर, दाँतेवाड़ा में कम्प्यूटर प्रयोगशाला में बच्चे

आस्था विद्या मंदिर, दाँतेवाड़ा में कम्प्यूटर प्रयोगशाला में बच्चे

सुकमा में ज्ञानोदय में स्कूली शिक्षा पूरी न कर पाने वालों की ज़रूरतों को बड़े प्रभावी ढंग से ध्यान दिया जा रहा है। ”यहाँ 6 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए पूरी तरह से आवासीय सुविधा दी जाती है, जो या तो कभी स्कूल नहीं गये या फिर जो अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी नहीं कर पाये। हम उन्हें 6 महीने की कोचिंग देते हैं और फिर उनका दाख़िला नियमित स्कूलों में करवा दिया जाता है, जैसे कि यहाँ के डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल में। इन स्कूलों में शिक्षा शुल्क सरकार द्वारा दिया जाता है और इन बच्चों को हमारे यहाँ के हाॅस्टल्स में ही रखा जाता है।“ नोडल आॅफ़िसर आशीष राम ने हमें बताया। सभी बच्चे- पिछले बैच में 227 बच्चों ने दाख़िला लिया- आदिवासी हैं।

अच्छे विद्यार्थियों के लिए सरकार विशेष सुविधायें देती है। सुकमा में स्टेम (साइंस, टेक्नॉलजी, इंजीनिअरिंग, मैथमेटिक्स) स्कूल में विभिन्न ज़िलों से चुने गये 60 ऐसे विद्यार्थियों को, जिन्होंने कक्षा आठ पास की है, उन्हें नवीं और दसवीं कक्षाओं के लिए विशेष कोचिंग दी जाती है। आवासीय सुविधा में पिछले वर्ष 18 विद्यार्थियांे को दाखि़ला दिया गया था, इस वर्ष ये संख्या बढ़ाने के बारे में सोचा जा रहा है। दसवीं पास करने के बाद ये विद्यार्थी, आरोहण, में चले जाते हैं, ये भी एक आवासीय सुविधा वाला विद्यालय है, जहाँ अगले दो वर्षों में, कक्षा 11 और 12 के तेज़ विद्यार्थियों को मेडिकल और एंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इस समय आरोहण में 200 विद्यार्थी हैं और पिछले वर्ष एक बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने प्रवेश परीक्षाएँ पास भी की थीं।

लाइव्लिहुड कॉलेज, दाँतेवाड़ा

लाइव्लिहुड कॉलेज, दाँतेवाड़ा

और फिर दाँतेवाड़ा के शोपीस, एजूकेशन सिटी में, 100 एकड़ क्षेत्र में 120 करोड़ रुपये की लागत से बनाई गई है। यहाँ की सुविधाओं में, सक्षम, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए एक आवासीय स्कूल, माओवादी हिंसा से प्रभावित बच्चों के लिए एक विद्यालय, एक पाॅलिटेक्निक़ कॉलेज, एक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान और एक कन्या शिक्षा परिसर ;मेधावी छात्राओं के लिए एक विशेष आवासीय विद्यालयद्धए एक मॉडल स्कूल ;नवोदय विद्यालय की तर्ज परद्धए कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय; ग़रीब परिवार की लड़कियों के लिएद्धए क्रीड़ा परिसर ;विशेष खेल कोचिंग स्कूलद्धए और अन्य सुविधायें जैसे आॅडिटोरिया, स्विमिंग पूल, इनडोर और आउटडोर स्टेयिम जैसी अन्य सुविधायें 4,500 से अधिक छात्र, इनमें से लगभग सभी आदिवासी, इन संस्थानों मंे रहते हैं और अध्ययन करते हैं।

सपनों का पोषण

भैरमगढ़ के एकलव्य विद्यालय में, कक्षा सात के छात्र राम प्रकाश सोरी का कहना है कि वह कम्पयूटर ऐप्लिकेशन सीखकर गाँव के विद्यालय में शिक्षक बनना चाहते हैं। बीजापुर के उसुर प्रशासनिक खण्ड, में पुन्नुर गाँव के सोरी का कहना है कि अगर एकलव्य विद्यालय नहीं होता तो उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती।

सुनील माण्डवी (12) और उनके भाई पिण्टू (10) गीदाम के आस्था विद्या मंदिर में कक्षा-4 में पढ़ते हैं। उनके पिता सुंदरम को, जो कि दाँतेवाड़ा में उनके मूल गाँव गुफ़ा में एक स्कूल में चपरासी थे, माओवादियों ने पुलिस मुख़बिर होने के शक में 2014 में गोली मार दी थी। उनकी माता की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी, वो दोनों पिता की मृत्यु के बाद इस विद्यालय में आये। बेहतरीन कबड्डी खिलाड़ी सुनील का कहना है, ‘‘मैं ख़ूब मेहनत से पढ़ाई करके अपने देश की सेवा और अगर मौक़ा मिला तो माओवादियों का सफ़ाया करने के लिए सेना में भर्ती होना चाहता हूँ।’’ उनके छोटे भाई पिंटू को गणित पसंद है, और वह एक एंजिनियर बनना चाहते हैं। लक्ष्मी कटलम, 11, आस्था विद्या मंदिर में कक्षा-5 में पढ़ती हैं। 2012 में माओवादियों ने उनके पिता चन्ना की हत्या कर दी थी, एक साल बाद उनकी माँ के साथ भी यही हुआ। वह कहती है, ‘‘मैं डाॅक्टर बनना चाहती हूँ और ग़रीबों का इलाज करना चाहती हूँ।’’

लक्ष्मी कटलम, के माता पिता की माओवादियों ने हत्या कर दी थी, वह आस्था विद्या मंदिर में पढ़ती हैं, और डॉक्टर बनना चाहती हैं

लक्ष्मी कटलम, के माता पिता की माओवादियों ने हत्या कर दी थी, वह आस्था विद्या मंदिर में पढ़ती हैं, और डॉक्टर बनना चाहती हैं

18 वर्षीया, सुनीता कर्णम, दाँतेवाड़ा के कौशल विकास कॉलेज में फ़ैशन डिज़ायनिंग का कोर्स कर रही हंै। वह बताती हैं, ‘‘मैंने कुछ साल पहले टी.वी. पर एक फ़ैशन शो देखा था, और तब से फ़ैशन डिज़ाइनर बनना मेरा सपना रहा है, अब मैं अपना सपना सच कर सकती हूँ, मैं आदिवासी प्रकृति और जीवनशैली का प्रदर्शन करने वाले कपड़े महिलाओं और पुरुषों के लिए डिज़ाइन करना चाहती हूँ।’’

सुकमा के ज्ञानोंदय में राहुल पोडियामी, 6 वर्षीय, का कोंटा ब्लाॅक के तेमेलवाड़ा गाँव स्थित स्कूल जब माओवादियों ने जला दिया था तो उनकी शिक्षा की सारी आशायें समाप्त हो गयी थीं। अब वह पढ़कर पुलिस अफ़सर बनना चाहते हैं ताकि माओवादियों से लड़ सकें और यही कहानी कोंटा ब्लाॅक के मेरवाड़ी गाँव के 7 वर्षीय, सरियाम विकी की भी है,  जिनके पिता बुच्चा सरिआम को माओवादियों ने इस साल पहले मार दिया था। वह भी सेना में भर्ती होना चाहते हैं। 8 वर्षीय रमेश सोरी का एक साल पहले दिल टूट गया था जब पिछले साल पेनटेपार गाँव में माओवादियों ने सभी घरों के साथ-साथ उनके स्कूल को भी जला दिया था। उन्होंने बताया, ‘‘उन्होंने पूरे गाँव पर पुलिस से मिले होने का आरोप लगाया था, मैं पढ़कर आई.पी.एस. अफसर चाहता हूँ, और बदला लेना चाहता हूँ।’’

बाँये से दाँये: सारियाम विकी, राहुल पोदियामी और रमेश सोरी, ज्ञानोदय विद्यालय, सुकमा

बाँये से दाँये: सारियाम विकी, राहुल पोदियामी और रमेश सोरी, ज्ञानोदय विद्यालय, सुकमा

 

ज्ञानोदय विद्यालय, सुकमा के आँगन का दृश्य

ज्ञानोदय विद्यालय, सुकमा के आँगन का दृश्य

राज्य के प्रयासों का अनुपूरक

राज्य के अलावा भी माओवादियों के गढ़ माने जाने वाले आदिवासी क्षेत्रों में कुछ अन्य संगठन भी समग्र शिक्षा प्रदान करने का प्रयास कर रहे हैं। जैसे: एकल फ़ाउंडेशन के अंतर्गत बस्तर के 810 गाँवों में एक शिक्षक वाले अनौपचारिक एकल विद्यालय चलाये जा रहे हैं। वे बच्चों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में शिक्षित करते हैं। समाज, समुदाय, भारत की विरासत और संस्कृति, धर्म और जैविक खेती सहित अच्छी कृषि पद्धतियाँ आदि बहुत कुछ बच्चे नियमित स्कूल घंटों के बाद भी सीखते हैं। ‘‘हम बुज़ुर्गों और महिलाओं का सम्मान करने, योग और प्राणायाम,व सामान्य ज्ञान तथा 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को रामायण और महाभारत की कहानियाँ बताते हैं, स्वामी विवेकानंद हमारी प्रेरणा हैं,’’ छत्तीसगढ़ में एकल गतिविधियों के प्रभारी महासचिव, संजीव रँगता ने बताया।

जगदालपुर को भैरमगढ़ से जोड़ने वाले एन.एच. 30 पर स्थित बाहेगाँव से क़रीब 5 किलोमीटर, दूर चरभटा गाँव के एकल विद्यालय में झाने भोइयर बच्चों के तीन समूहों को पढ़ाते हैं। ‘‘बच्चे नियमित स्कूलों में जाते हैं, फिर शाम पाँच से आठ बजे तक, एकल विद्यालय में आते हैं। मैं स्वास्थ्य, स्वच्छ भोजन और हमारे अनुष्ठानों और रीति रिवाजों के बारे में सप्ताह में एक बार महिलाओं को भी सिखाता हूँ।’’ चरभटा के सरपंच पंचम भोईर कहते हैं, एकल विद्यालय ने अपनी स्थापना के पाँच वर्षों में युवाओं में एक उल्लेखनीय बदलाव किया है। वे कहते हैं, ‘‘एकल विद्यालय में जाने के बाद हमारे बच्चे अधिक जानकार, अनुशासित व आज्ञाकारी और स्मार्ट हो गये हैं।’’

बस्तेर में आरएसएस द्वारा संचालित 250 से अधिक सरस्वती शिशु मंदिर भी हैं। ‘‘हम वनवासी कल्याण आश्रम भी चलाते हैं और माओवादियों की विनाशकारी पकड़ से आदिवासियों को छुड़ाने के बहुत से काम कर रहे हैं। हमें भी बहुत नुक़सान हुआ है, पिछले पाँच वर्षों में हमारे 25 कार्यकर्ता माओवादियों ने मार दिये और हमें 10 सरस्वती शिशु मंदिरों को बंद करना पड़ा है। हम अब उन स्कूलों से संस्कार केंद्र चलाते हैं,’’ बस्तर के आरएसएस प्रभारी हेमंत शुक्ला ने बताया। रामकृष्ण मिशन और कुछ अन्य संगठन भी दूरस्थ क्षेत्रों में आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल चला रहे हैं।

चिकित्सा और अन्य सुविधायें 

बस्तर का हद दर्जे तक ख़ूबसूरत इलाक़ा सिर्फ़ चिकनी सड़कों और उम्दा आवासीय विद्यालयों से ही घिरा हुआ नहीं है। अत्याधुनिक अस्पताल और कई अन्य स्वास्थ्य सुविधायें की मदद से सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा लगभग सभी लोगों को उनके दरवाज़े पर ही प्राप्त हो रही हैं। उदाहरण के लिए, बैरमगढ़ में एक तीस बेड वाला अस्पताल है, दो पाँच-पाँच बिस्तरों वाले छोटे अस्पताल हैं, तो वहीं एक दर्जन क्लीनिक हैं, जहाँ उपचार और दवाएँ निःशुल्क दिये जाते हैं।

बैरमगढ़ में हाल तक माओवादियों का गढ़ माने जाने वाले, मातावाड़ा में बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ.शिवेंद्र ठाकुर हैं। ‘‘हमारे यहाँ दस बेड हैं और रोज़ यहाँ कम से कम 50 मरीज़ तो आते ही हैं,’’ उन्हांेने बताया। स्वास्थ्य केंद्र किसी महानगर में बने आधुनिक क्लीनिक जैसा ही दिखता है और इसमें एक वातानुकूलित आॅपरेशन थियेटर भी है, जबकि देश के अधिकांश राज्यों में इस तरह की सुविधाओं की आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

मातावाड़ा से कुछ किलोमीटर की दूरी पर झाँगला गाँव स्थित है। गाँव नज़र जिस चीज़ पर टिकती है, वो है गाँव में बना जाँगला आदर्श आँगनबाड़ी केंद्र। गहरी रँगों में रँगी हुई इमारत और सामने बच्चों के खेलने के लिए बना पार्क इसे एक ख़ुशनुमा जगह बना देते हैं। थोड़ी ही दूरी पर जँगला पंचायत भवन है जहाँ 3-जी कनेक्टिविटी के साथ और भी कई सारी सुविधायें हैं- लोक शिक्षा केंद्र √;वयस्क साक्षरता केंद्रद्ध, एसबीआई और पीडीएस की आउटलेट और एक ई-कैफ़े जहाँ से ग्रामीण फ़सल लोन, घर के लिए आर्थिक मदद और अन्य सरकारी लाभों प्राप्त करने के लिए ई-फाॅम्र्स भर सकते हैं साथ ही मनरेगा का भुगतान और सरकारी योजनाओं का स्तर जान सकते हंै। ‘‘इस केंद्र ने जाँगला के 360 परिवारों के सदस्यों को सशक्त किया है। पिछले एक साल में बहुत से बड़े बदलाव आये हैं, जिनके परिणामस्वरूप माओवादियों के प्रभाव में कमी आई है। अब लोगों को माओवादियों के खि़लाफ़ हिम्मत पैदा हुई है और उनको अपनी गतिविधियाँ रोकने को भी कहा गया है,’’ जाँगला पंचायत के सचिव कोमल निषाद ने बताया।

बीजापुर में ज़िला मुख्यालय में 150 बेड वाला अस्पताल बीजापुर के लिए गर्व की बात है। यहाँ इस्तेमाल होने वाले उपकरण किसी भी लिहाज़ से राष्ट्रीय राजधानी के निजी अस्पताओं में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों से कम नहीं है। ‘‘हमारे पास माॅड्यूलर आॅपरेशन थियेटर है, जहाँ आर्थोपीडिक और जनरल सर्जरी के साथ-साथ लेप्रोस्कोपिक सर्जरी भी की जाती है। हमारे यहाँ 21 डाॅक्टर हैं, जिनमें 11 पोस्टग्रेजुएट, 30 पैरामीडिक्स और 46 नर्सें शामिल हैं, और आई.सी.यू और आॅपरेशन थियेटर में 5 करोड़ रुपये की क़ीमत के उपकरण हैं,’’ ज़िले के सिविल सर्जन टी.आर. कँवर ने बताया।

अन्य राज्यों के चिकित्सक भी बस्तर में इन अस्पतालों की बेहतरीन व्यवस्था और बढ़िया तनख़्वाह में यहाँ काम करने के लिए झुण्ड के झुण्ड पहुँच रहे हैं ;मानक सरकारी वेतन को माइनिंग कम्पनियों के अनिवार्य योगदान से बने ज़िला खनिज कोष से अनुपूरित किया जाता हैद्ध। कुशाल सकूर, जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपना एम.बी.बी.एस. किया है, ज़िला अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं, उनका कहना है कि उन्होंने सुविधाओं के कारण यहाँ काम करने का विकल्प चुना है। ‘‘मैंने एक बार इस अस्पताल का दौरा किया और यहाँ काम करने का फ़ैसला किया है। मुझे भारत में कहीं भी ऐसी सुविधायें नहीं मिल सकती थीं,’’ उनका कहना है। बस्तर के अन्य ज़िलों में भी इसी तरह राज्य के अत्याधुनिक अस्पतालों की स्थापना की जा रही है।

संयोग से, छत्तीसगढ़ अपने नागरिकों को निःशुल्क स्वास्थ्य कार्ड मुहैया कराता है, जिसके ज़रिये एक व्यक्ति प्रतिवर्ष 50,000 रुपये तक का निःशुल्क इलाज करा सकता है। कुछ और स्वास्थ्य योजनायें कई सारी चिकित्सा सुविधाओं में सहायता प्रदान करती हैं, जिनमें सर्जरी, दवायें, अस्पताल में भर्ती आई सी यू और आई टी यू सुविधाएँ शामिल हैं।

बीजापुर ज़िले के कलेक्टर तम्बोली का कहना है कि उनके ज़िले में आक्रामक तरीक़े से हुए विकास के शानदार परिणाम सामने आने लगे हैं। ‘‘सलवा जुडूम के बाद, लोग गाँवों, ख़ासकर सुदूर क्षेत्र के गाँवों से चले गये थे, और यह क्षेत्र माओवादियों से भर गये थे। माओवादियों ने उन गाँवों में सभी बुनियादी ढाँचों को नष्ट कर दिया। सड़कों और विकास के साथ, हम धीरे-धीरे इन सभी गाँवों फिर से जोड़ रहे हैं। ज़िले में हमारे पास 1,150 आँगनबाड़ी केंद्र और 911 सरकारी विद्यालय हैं। ज़िले के 600 गाँवों में से आधे गाँवों में विद्युतीकरण हो चुका है, 27 नये गाँवों में पिछले महीने ही विद्युतीकरण किया गया,’’ उन्होंने बताया।

दाँतेवाड़ा ज़िले के कलेक्टर सौरभ कुमार ने ग्रामीणों के बीच व्यावहारिक बदलाव की बात की। वह पूर्व में माओवादियों का गढ़ रहे सुदूर क्षेत्र के गाँव बाड़ेगड्रा का उदाहरण देते हैं। ज़िला प्रशासन ने नवीनतम कृषि ज्ञान को ग्रामीणों तक पहुँचाया और धीरे-धीरे ग्रामीणों को जैविक खेती के लिए तैयार किया। ‘‘बाड़ेगड्रा में लगभग 160 किसान जैविक खेती करते हैं, और उन्हें उनकी उपज के अब काफ़ी अच्छे दाम मिल रहे हैं। गाँववाले, जो कुछ वर्ष पहले तक हमारे प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते थे, अब काफ़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत करते हैं और वो अब माओवादियों के प्रति सहानुभूति भी नहीं रखते हैं,’’ उन्होंने बताया।

आज दाँतेवाड़ा में 25,000 से अधिक किसान जैविक खेती करते हैं। ‘‘जैविक खेती कृषि करने से पहले की अपेक्षा अब मुझे अपनी सब्ज़ियों के अब दोगुने दाम मिलते है, चावल की उपज भी पहले के 36 क्विंटल बढ़कर 56 क्विंटल प्रति हेक्टेअर हो गई है,’’ गीदम ब्लाॅक के करली गाँव के रतीराम यादव ने बताया। ‘‘भूमगड़ी नाम से एक किसानों की सोसायटी की स्थापना भी की गई है, जिसमें 4,000 किसान शेअरहोल्डर हैं। इसके 12 गोदाम और एक पूर्णकालिक सीईओ है। उनकी जैविक खेती की उपज को आदिम ब्रांड के तहत चेन्नई, हैदराबाद, बंेग्लोर और चंडीगढ़ के निजी रीटेल चेन्स के साथ-साथ इस्काॅन द्वारा भी बेचा जा रहा है। बहुत जल्द, दाँतेवाड़ा से जैविक चावल और दालें, दिल्ली और मुम्बई हवाई अड्डों पर आउटलेट्स के माध्यम से बेची जायेंगी,’’ कुमार कहते हैं।

गीदाम के करली गाँव में में अपने जैविक खेत में रति राम यादव

गीदाम के करली गाँव में में अपने जैविक खेत में रति राम यादव

वह अपने ज़िले के पूर्व में स्थित कटेकलियान ब्लाॅक में पारसीली गाँव का उदाहरण देते हैं। यद्यपि इस क्षेत्र में कुछ समय पूर्व माओवादियों का बहुत गहरा प्रभाव था, अब ग्रामीण सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं की माँग कर रहे हैं, वे एक स्कूल चाहते हैं और बुनियादी ढाँचे को किसी भी क्षति के विरुद्ध उन्होंने चेतावनी दे दी है। ‘‘दो वर्षों में माओवादियों के साथ जुड़ने का किसी भी ग्रामीण को कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ नहीं होगा। अगर वो बंदूकें छोड़ देते हैं, तो आदिवासियों को कोई नुक़सान नहीं होगा, बल्कि फ़ायदा ही फ़ायदा होगा। माओवादियों के खि़लाफ़ युद्ध में विकास की ही जीत होगी। माओवादियों के खि़लाफ़ ये जीत बहुत आसान होगी,’’ उन्होंने बहुत आत्मविश्वास से कहा, साथ ही ये भी बताया कि यहाँ तक कि दूरस्थ गाँवों में भी लोग अब विकास चाहते हैं।

सुकमा ज़िले के कलेक्टर बनसोड भी कुछ ऐसी ही बात करते हैं, उन्होंने कहा, माओवादियों ने सड़कों, स्कूलों और क्लीनिकों को नष्ट कर दिया, बाज़ार बंद कर दिया और आदिवासियों को अपने गाँवों से बाहर निकलने से मना कर दिया। ‘‘उनकी मज़बूत पकड़ बड़े ही प्रभावी ढंग से तोड़ दी गयी है। हम गहरे अंदरूनी हिस्सों में सड़कों का निर्माण कर रहे हंै। बाज़ार, स्कलों और क्लीनिकों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। भेज्जी और जगरमुंडा के मुख्य आदिवासी बाज़ार पुनः खोले गये हैं और माओवादियों द्वारा उड़ाये जा चुके 120 में से ज़्यादातर स्कूलों की इमारतों का पुनर्निर्माण किया जा चुका है और उनमें कक्षायें भी आरम्भ हो चुकी हैं।’’

बनसोड का मानना है कि कुछ ही वर्षों में सुकमा जैविक खेती का केंद्र भी बन जायेगा। उन्होंने कहा, ‘‘हम तेज़ गति से अस्पतालों और स्कूलों का निर्माण कर रहे हैं, आदिवासियों को आजीविका के अवसर प्रदान करते हैं, दूर-दराज़ गाँवों को बिजली और पेयजल प्रदान करते हैं और इन सभी से आदिवासियों में माओवादियों का विरोध करने के लिए आत्मविश्वास पैदा हुआ है।’’ वह तो अद्वितीय प्राकृतिक सुंदरता, अनगिनत अंजान झरनों और अन्य दर्शनीय स्थलों से भरे सुकमा को तीन वर्षों में एक पर्यटन स्थल में बदलने की भी बात करते हैं!

निर्माणाधीन दोर्णपाल सड़क

निर्माणाधीन दोर्णपाल सड़क

 

दोर्णपाल, सुकमा से ओडियामा, ओडिशा तक बना नया पुल, माओवादी इस पुल का विरोध कर रहे थे। दोर्णपाल से ओडिशा तक के सफ़र में अब सिर्फ़ 12 घंटे लगेंगे।

दोर्णपाल, सुकमा से ओडियामा, ओडिशा तक बना नया पुल, माओवादी इस पुल का विरोध कर रहे थे। दोर्णपाल से ओडिशा तक के सफ़र में अब सिर्फ़ 12 घंटे लगेंगे।

सबरी नदी के ऊपर बना 550 मीटर लम्बा दोर्णापाल-ओडियामा पुल, बंसोद की इस बात का समर्थन करता है कि माओवादियों का प्रभाव घटा है। सुकमा को मलकानगिरि से जोड़ने वाले इस पुल का निर्माण रोकने का माओवादियों द्वारा हर सम्भव प्रयास किया गया। लेकिन सुकमा के लोग इस नये मौक़े से बहुत उत्साहित हैं, जहाँ उन्हें अपनी फ़सलों के उत्पादन को ओडिशा ले जाने का मौक़ा मिलेगा, जिससे उन्हें अच्छी क़ीमत मिलने के आसार हैं।

ई-कनेक्टिविटी

भौतिक कनेक्टिविटी और बुनियादी ढाँचे के साथ-साथ मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए ई कनेक्टिविटी भी एक ध्यान देने योग्य क्षेत्र है। पिछले वर्ष अगस्त में लाॅन्च होने वाले उनके पसंदीदा बस्तर नेट प्राॅजेक्ट में बस्तर क्षेत्र में 40,000 वर्ग किमी में इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 832 किलोमीटर लम्बा आॅप्टिकल फ़ाइबर नेटवर्क लगाया गया था। सिंह ने स्वराज को बताया, ‘‘बस्तर का यह डिजिटल राजमार्ग, बस्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए है, ज्ञान आधारित समाज का प्रवेश करायेगी, नये-नये आर्थिक अवसर बढ़ेंगे और सरकारी सेवाओं में भी पारदर्शिता और उत्तरदायिता में वृद्धि होगी।’’

बीजापुर से 40 किलोमीटर दूर कभी पूरी तरह से माओवादियों का गढ़ रहे पालघर गाँव का दौरा करने पर पता चलता है कि इस तरह की कनेक्टिविटी लोगों के जीवन में किस तरह से लाभ पहुँचा सकती है। पालघर 3 जी कनेक्टिविटी से गौरवान्वित है और यहाँ एक लाइन से 16 ऐसी दुकानंे हैं, जहाँ डिजिटल पेमंट सामान्य सी बात है। भुगतान ईज़ीटैप मशीन ;शहरों में इस्तेमाल होने वाली पीओएस मशीन जैसीद्ध के माध्यम से किये जाते हैं, जिसके लैंडलाइन कनेक्शन की भी ज़रूरत नहीं होती है। पेटीएम के माध्यम से भी चीज़ें ख़रीदी जाती हैं।

यहाँ 20 एमबीपीएस की स्पीड वाला एक वाई-फ़ाई ज़ोन है, एक सार्वजनिक सर्विस सेंटर है, जहाँ कम्प्यूटर हैं जिनसे ग्रामीण सरकारी लाभ के लिए फ़ाॅर्म भर सकते हैं, मनरेगा के लिए पेमंट प्राप्त कर सकते हैं, आधार से जुड़े अपने ख़ातों में पेंशन प्राप्त कर सकते हैं, और फ़सलों के लिए कृषि वैज्ञानिकों से सुझाव प्राप्त कर सकते हैं, पूरे ज़िले में ऐसे 27 केंद्र हैं।

पलनर में पेटीएम से भुगतान करता एक ग्रामीण

पलनर में पेटीएम से भुगतान करता एक ग्रामीण

पलनार में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, जहाँ एक ‘‘स्वास्थ्य एटीएम’’ रखा गया है। इस एटीएम के माध्यम से, ग्रामीण सामान्य जाँच के साथ-साथ, श्वास, दिल और फेफड़ों की जाँचें करवा सकते हैं। यहाँ एक टेक्नीशन ये जाँचें करता है और मुम्बई में चिकित्सकों के पैनल द्वारा इन नतीजों को आॅनलाइन देखकर दवाइयों की सलाह दी जाता है। यह सुविधायें एक निजी संस्था द्वारा दी जा रही हैं, जो बस्तर में ऐसे और एटीएम स्थापित करने की योजना बना रही है।

माओवादियों के खिलाफ़ क्रोध

माओवादी अपने आपको जिन आदिवासी हितों के लिए समर्पित होने का झूठा दावा करते हैं, उन्हीं आदिवासियों के बीच माओवादियों के खि़लाफ़ एक स्पष्ट क्रोध है। बीजापुर क़स्बे के मध्य में स्थित, विडम्बनापूर्ण नाम वाले शांतिनगर में जहाँ माओवादियों के उपद्रव और क्रूरता से पीड़ित सैकड़ों पीड़ितों ने शरण ले रखी है। पचपन वर्षीय एमला सुकलू, उनमें से एक हैं, ‘‘2004 और फिर 2006 में, माओवादियों ने गंगालुर ;उनके मूलगाँवद्ध पर हम लोगों पर पुलिस मुख़बिर होने का झूठा इल्ज़ाम लगाकर माओवादियों ने हमला किया। पहली बार उन्होंने बेटों को बुरी तरह पीटा और दूसरी बार उन्होंने मेरे 25-साल के बेटे और उसकी पत्नी को जान से मार दिया। उन्होंने हमारे घर लूट लिये और सारा क़ीमती सामान और मवेशियों को उठा ले गये। मैं बच गया और तब से यहीं रह रहा हूँ। मेरे पास कुछ खेती लायक़ ज़मीन है, लेकिन अब वो परती पड़ी है। मैं सरकारी अनुदान पर जीवित हूँ। माओवादी राक्षस हंै, और हम जैसे ग़रीब आदिवासियों का फ़ायदा उठाते हैं।’’

मंगू हेमला अपने परिवार के साथ शांतिनगर में

मंगू हेमला अपने परिवार के साथ शांतिनगर में

 

माओवादियों द्वारा अनाथ किये गये बच्चे, ये बच्चे अब बीजापुर के आवासीय स्कूल में रहते हैं

माओवादियों द्वारा अनाथ किये गये बच्चे, ये बच्चे अब बीजापुर के आवासीय स्कूल में रहते हैं

मंगू हेमला (60) भी गंगालुर के रहने वाले हैं, उन्हें भी 2006 में ऐसा ही भयानक अनुभव हुआ जिससे वो अभी तक भी उबर नहीं पाये हैं। ‘‘माओवादी अक्टूबर, 2006 में हमारे गाँव आये थे और कुछ परिवारों के पुरुष सदस्यों को इकठ्ठा किया, मुझे और मेरे बड़े बेटे को भी बुलाया, हमें खड़ा कर दिया। और फिर गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। मेरे पैर में गोली लगी, मैं गिर पड़ा, मेरा बेटा मेरे ऊपर गिरा। वो जंगली गिरे हुए लोगों पर भी गोलियाँ चलाते रहे, मेरे बेटे को बहुत सी गोलियाँ लगीं, ये मुझे भी महसूस हुआ। वह मर चुका था। मैं केवल मौत का बहाना करके बच सका। इनमें से हरेक माओवादी को बुरी-बुरी से बुरी मौत मारा जाना चाहिए,’’ ग़ुस्से से भरे हुए मंगू ने बताया।

पंड्रू कुंजम, 45 वर्षीय, मूलतः मेटापाल गाँव के रहने वाले हैं, उन पर सलवा जुडूम का आरोप लगाकर उन्हें 2008 में बुरी तरह मारा गया। वो दस महीने तक अस्पताल में रहे और अभी भी लँगड़ाकर चलते हैं। ‘‘मुझे माओवादियों से निपटने के लिए एक बंदूक की ज़रूरत है, उन्हें बहुत ही क्रूरता से मारा जाना चाहिए,’’ वह कहते हैं।

शांतिनगर माओवादियों के ख़िलाफ़ ग़ुस्से से जल रहा है। ‘‘माओवादी क्रूर और ख़ून के प्यासे हैं, और इस ख़तरे को जड़ से उखाड़ने का एक ही तरीक़ा है, उनका सामना उन्हीं तरीक़ों से किया जाय, जिन्हें वो इस्तेमाल करते हैं,’’ माओवादी हमले में बाल-बाल बचे, 35 वर्षीय एमला बुध ने बताया।

28 साल के सावन दुर्गाम ने अपने मूल गाँव, पुस्नार में, 2006 से तीन वर्षों में अपने पिता दुर्गाम लंझा और उनके दो भाइयों की बेरहम हत्या देखी है। ‘‘माओवादियों ने उन्हें पुलिस मुख़बिर होने के झूठे इल्ज़ाम में मार डाला, मुझे पता था कि अगली बारी मेरी होगी, इसलिए मैं 2009 में शांतिनगर भाग आया। अब मैं पुलिस में अपनी नौकरी का इंतज़ार कर रहा हूँ और जैसे ही वह मुझे मिलेगी मैं जाकर माओवादियों को मारूँगा,’’ वो बताते हैं।

यहाँ तक कि माओवादी की गोलियों से अपने माता-पिता को खो चुके बच्चे भी बहुत ग़ुस्से में हैं। गणेश कुमार वासन, बीजापुर के आवापल्ली में, जनपद मिडिल स्कूल में कक्षा सातवीं के छात्र हैं, उन्होंने भी अपने माँ-बाप को माओवादियों की गोलियों से खोया था, वह बताते हैं, ‘‘मुझे कभी भी खेलों का शौक़ नहीं था, लेकिन अब मैं सभी खेल खेलता हूँ ताकि अपने आपको शारीरिक रूप से मज़बूत कर सकूँ, ताकि अपने माता-पिता की हत्या का बदला लेने के लिए पुलिस में भर्ती हो सकूँ।’’ अब उनका एकमात्र परिवार उनकी बड़ी बहन, रीना 27 हैं, जिनके साथ वो रहते हैं।

माओवादी हिंसा के शिकार बच्चे बीजापुर के शांतिनगर में

माओवादी हिंसा के शिकार बच्चे बीजापुर के शांतिनगर में

 

गणेश कुमार वासन अपनी बड़ी बहन रीना के साथ

गणेश कुमार वासन अपनी बड़ी बहन रीना के साथ

माओवादियों के हाथों अपने माता-पिता को गँवा चुके एमला सुकलू के पोते अजय (11) और अभय (6) बालक आश्रम, बीजापुर में पढ़ते हैं, वो दोनों अपने माता-पिता के हत्यारों से लड़ने के लिए सेना में भर्ती होना चाहते हैं। अजय भारतीय वायु सेना में भरती हो, फाइटर पायलट बनना चाहते हैं, ताकि वो अपने माता-पिता के हत्यारे ‘‘माओवादियों पर बमबारी’’ कर सकें। बीजापुर गल्र्स स्कूल में ग्यारहवीं की छात्रा, 18 साल की सुनीता हेम्ब्राम, आई.पी.एस. अफ़सर बनकर माओवादियों से लड़ना चाहती हैं, उन्होंने कहा, ‘‘मैं अक्सर अपने माता-पिता ;संकी, 2004 में माओवादियों द्वारा हत्या की गई, मसाराम हेम्ब्राम, 2005 में माओवादियों ने हत्या कर दी थीद्ध को सपने में देखती हूँ। उनकी आत्मा को तब तक शांति नहीं मिल सकती जब तक कि उनके हत्यारों को उसी तरह बेरहमी से नहीं मार दिया जाता जैसे कि उनकी ;मेरे माता-पिताद्ध हत्या की गई थी।’’

युद्ध में जीत

बस्तर के कार्यवाहक आई.जी.पी. और बस्तर क्षेत्र (जिसमें सात ज़िले कांकेर, कोंडगाँव, बीजापुर, नारायणपुर, बस्तर, सुकमा और दाँतेवाड़ा शामिल हैं।) की सुरक्षा की ज़िम्मेवारी सम्हाल रहे, सुंदरराज पी भी विकास को ही युद्ध में जीत का मंत्र मानते हैं। विकास के साथ-साथ, सुरक्षा के भी कई मापदंड भी इस्तेमाल किये जा रहे हैं। सी.आर.पी.एफ़. की बस्तरिया बटालियन बनना इस युद्ध में एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसला होगा।

”माओवादी कमज़ोर हो रहे हैं। उनकी संख्या बहुत तेज़ी से घट रही है। उनके बहुत से लोकल आॅर्गनायजे़शन स्कवाड का विलय हो चुका है,“ सुंदरराज ने कहा। आदिवासियों को भी अब माओवादियों से किसी प्रकार की कोई सहानुभूति नहीं रही है। सड़कों के निर्माण और अन्य आधारभूत सुविधाओं के बढ़ने से प्रशासन और सुरक्षाबलों का जंगलों के भीतर पहुँचना जैसे-जैसे आसान हो रहा है, अपने प्रभुत्व वाले इलाक़ों में भी माओवादियों का प्रभाव भी बुरी तरह घट रहा है।“

लेकिन माओवादी युद्ध में वापसी के लिए पूरी कोशिश करेंगे 24 अप्रेल को सी.आर.पी.एफ़. पर हुआ हमला इस बात को ही साबित करता है। माओवादियों से होने वाला अंतिम युद्ध बेहद ख़ूनख़राबे से भरा होगा इसमें वरिष्ठ पुलिस  अधिकारियों को क़तई कोई शक नहीं है। जैसा कि के.विजय कुमार, वामपंथी चरमपंथ पर गृह मंत्रालय के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार के. विजय कुमार ने बताया कि उनके मज़बूत प्रभाव वाले क्षेत्रों को सड़कों द्वारा जोड़े जाने से माओवादी बुरी तरह घबराये हुए हैं। ”सड़कों के बनने से विकास को भी गति मिलती है।स्कूल और चिकित्सा सुविधायें बढ़ती हैं। राशन की दुकानें तो खुलती हैं, साथ ही गाँववालों को बाहर की बाज़ारों तक पहुँचने में आसानी होती है।इससे माओवादी प्रचार-प्रसार को गहरी चोट पहुँचती है।चूँकि सी.आर.पी.एफ. की सड़क निर्माण को सुरक्षा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है, यही कारण है कि माओवादी उनपर बड़ी मात्रा में हमले करते हैं। 24 अप्रेल के हमले से पता चलता है कि माओवादी बुरी तरह से घबराये हुए हैं, और यही वजह है कि वो सुरक्षाबलों पर इस तरह के अंधाधुंध हमलों को आखिरी दाँव की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। कुमार ने हमलों के बाद ये बताया।

इस बीच काउंटर टेररिज़्म एंड जंगल वारफेयर कॉलेज, कांकेर,  और काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल, वैरनगेट में प्रशिक्षण द्वारा सुरक्षा बलों की युद्ध क्षमता को बढ़ाने के प्रयास भी जारी हैं, आई.जी.पी. का हमें बताते हैं। बस्तर में आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए राज्य पुलिस के 26,000 हथियारबंद जवानों के साथ-साथ सी.आर.पी.एफ., आई.टी.बी.पी. और बी.एस.एफ़. और एस.एस.बी. की 44 बटालियनें तैनात हैं।