राजनीति
गिल्गित-बल्तिस्तान: भारत द्वारा भुलाया गया क्षेत्र

शनिवार (10 नवंबर) को बंगलुरु में आलोक बंसल द्वारा लिखित पुस्तक ‘गिल्गित-बल्तिस्तान एंड इट्स सागा ऑफ अनेंडिंग ह्यूमन राइट्स वायलेशन’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम का आयोजन थिंकर्स फोरम द्वारा किया गया था जिसमें प्रोफेसर डी. सुबा चंद्रन भी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। आलोक बंसल ने कुछ वर्षों तक भारतीय नौसेना को अपनी सेवाएँ दीं, वर्तमान में वे सुरक्षा विश्लेषक व इंडिया फाउंडेशन के निदेशक हैं। सुबा चंद्रन नेशनल इंस्टीट्युट ऑफ़ एडवान्स्ड स्टडीज़ में संघर्ष व सुरक्षा विद्यालय के अधिष्ठाता हैं। इस कार्यक्रम में इन दोनों वक्ताओं के व्याख्यान व श्रोताओं के प्रश्नों के माध्यम से बहुत कुछ जानने-सुनने को मिला। इस लेख के माध्यम से समझते हैं।

पुस्तक का कवर

सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण प्रश्न, गिल्गित-बल्तिस्तान है क्या? यह भूखंड भारत का अंश है या पाकिस्तान का? संवैधानिक तौर पर यह भारत का भाग है लेकिन अधिकांश भारतीय जानते नहीं हैं कि भारत के नक्शे के शीर्ष में जो भाग है जिसे हम भारत माता का मुकुट मानते हैं, वही है गिल्गित-बल्तिस्तान। और दुख की बात है कि भारत माता को सुशोभित करने के लिए यह मुकुट अब भारत के प्रशासन के अधीन नहीं है।

इसे पाकिस्तान की रणनीति कहें या भारत की अनदेखी कि जब भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की चर्चा होती है, तब केवल पाकिस्तान के शब्दों में आज़ाद जम्मू-कश्मीर व जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के शब्दों में मीरपुर-मुज़फ्फराबाद क्षेत्र पर ही ध्यान दिया जाता है, और इस बात पर हमारा ध्यान जाता ही नहीं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में गिल्गित-बल्तिस्तान नामक भी एक क्षेत्र है।

कश्मीर का मानचित्र

पुस्तक की शुरुआत में इस क्षेत्र के विषय में सारी जानकारी दी गई है- जनसंख्या-संबंधी, यहाँ के लोगों की जातीयता, धर्म, आदि। बौद्ध काल, मुग़ल काल और सिखों के समय से अंग्रेज़ों के समय तक यहाँ के इतिहास का विवरण है। यह बात गौर करने योग्य है कि इस क्षेत्र की ऐसी स्थिति के पीछे अंग्रेज़ों का हाथ भी है। रूस से प्रभावित रणनीति द्वारा अंग्रेज़ मेजर ब्राउन ने गिल्गित-बल्तिस्तान को नवंबर 1947 में भारत का हिस्सा नहीं बनने दिया था।

इसके बाद यह क्षेत्र 90 के दशक तक पाकिस्तान के उपनिवेश के रूप में रहा जहाँ इसकी स्वायत्त सरकार नहीं थी। 1984 में काराकोरम राजमार्ग बनने से यह क्षेत्र पाकिस्तान के अन्य क्षेत्रों से जुड़ा व यहाँ के नौजवान पाकिस्तान में शिक्षा ग्रहण करने जाने लगे। 1994 में इस क्षेत्र को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुए। इसके बाद इस क्षेत्र में राजनीति भी सक्रिय हुई और उन्होंने पाकिस्तान सर्वोच्च न्यायालय में समान अधिकारों की माँग की। न्यायालय की सहमति के बावजूद यहाँ के लोगों को अधिकार नहीं मिला। 2009 के ऑर्डर के बाद इसे प्रांत के आंशिक अधिकार प्राप्त हुए। 2018 में फिर एक ऑर्डर जारी किया गया जिसके अनुसार गिल्गित-बल्तिस्तान विधान सभा अब गिल्गित-बल्तिस्तान सभा के नाम से जानी जाएगी, इसके साथ ही पाकिस्तान के संविधान की अनुसूची 4 के सभी अधिकार भी इसे मिले। अब यह सभा खनिज, पनबिजली व पर्यटन संबंधी कानून भी पारित कर सकेगी।

2018 का यह ऑर्डर महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसकी भाषा के माध्यम से पाकिस्तान इस क्षेत्र पर एकछत्र अधिकार व्यक्त कर रहा है लेकिन साथ ही इसके नागरिकों को पूर्ण अधिकार भी नहीं दे रहा। वहीं इस क्षेत्र के लोग जो दशक भर पहले तक भारत की ओर आस लगाए बैठे थे, आज पाकिस्तान में पाँचवें प्रांत के रूप में सम्मिलित होना चाह रहे हैं। भारत की अनदेखी ने लोगों के मन में भी बेरुखी पैदा कर दी है। पाकिस्तान यहाँ भी अपनी चालाकी दिखा रहा है और गिल्गित-बल्तिस्तान को खुद में सम्मिलित नहीं कर रहा क्योंकि ऐसा करने से संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे पर इसकी पकड़ ढीली पड़ जाएगी।

इसलिए इस पुस्तक का नाम एकदम सटीक बैठता है ‘…सागा ऑफ़ अनेंडिंग ह्यूमन राइट्स वायलेशन’। आज़ादी से अब तक इस क्षेत्र के लोग नागरिक अधिकारों तो क्या मानव अधिकारों से भी वंचित रहे हैं। इनकी हालत उन सीमावर्ती गाँवों की तरह हो गई है जिन्हें कोई राज्य अपना हिस्सा नहीं मानता। भारत इस क्षेत्र को संवैधानिक दर्जा तो देता है लेकिन पाकिस्तान से इसका अधिकार छीनकर यहाँ के लोगों के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा, वहीं पाकिस्तान है जो इसपर हक़ जमाए बैठा है लेकिन यहाँ के लोगों के लिए उसने भी कुछ नहीं किया।

काराकोरम राजमार्ग

पाकिस्तान गिल्गित-बल्तिस्तान को इसलिए भी नहीं छोड़ना चाहता क्योंकि यही एकमात्र रास्ता है जो पाक-चीन के आर्थिक गलियारे का साधन है। दूसरा यह कि पानी के संसाधन इस क्षेत्र से होकर गुज़रते हैं, अगर पाकिस्तान इन्हें खो देगा तो उसके लिए जल संकट भी उत्पन्न हो सकता है। भारत से गिल्गित-बल्तिस्तान को पूर्णतः छीनने के लिए हाल ही में पाकिस्तान ने एक नए कथात्मक (नेरैटिव) का प्रचार शुरू किया है जिसके अनुसार ऐतिहासिक रूप से गिल्गित-बल्तिस्तान पाकिस्तान का अंग है। इस कथात्मक का खंडन करने का प्रयास इस पुस्तक द्वारा किया गया है जहाँ यह बताया गया है कि मौर्य साम्राज्य, कुषाण साम्राज्य व मुग़ल साम्राज्य में गिल्गित-बल्तिस्तान भारत का ही अंग था। यह क्षेत्र महाराजा रणजीत सिंह और महाराजा गुलाब सिंह के अधीन भी था। गिल्गित सिटी के बाहरी क्षेत्र में मौर्य काल के समय बनी बुद्ध प्रतिमा इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि गिल्गित-बल्तिस्तान हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है।

हमें इस क्षेत्र पर इसलिए ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह भारत का संवैधानिक क्षेत्र है लेकिन राजनीतिक रूप से परितक्त होने के कारण यह पाकिस्तान से जुड़ता जा रहा है। इस क्षेत्र पर अधिक अध्ययन नहीं हुआ है जो कि होना चाहिए। यह एक मात्र क्षेत्र है जहाँ शिया समुदाय बहुसंख्यक हैं। इस क्षेत्र पर अधिकार करके हम पाकिस्तान पर वर्चस्व स्थापित कर सकते हैं क्योंकि जल संसाधनों के साथ-साथ पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारा भी हमारे अधीन आ जाएगा। यह क्षेत्र सांप्रदायिक हिंसा से भी जूझता रहा है। इस क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित करके हम यहाँ समान कानून लागू करके यहाँ के लोगों के जीवन को बेहतर बना सकेंगे।

गिल्गित-बल्तिस्तान का प्राकृतिक सौंदर्य

आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह भारत के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। ऑस्ट्रेलिया खनिज कॉर्पोरेशन ने बताया कि यहाँ सोना बहुतायत में उपलब्ध है। कुछ ऐतिहासिक किस्सों से भी यहाँ सोने की उपलब्धि का संकेत मिलता है। इस क्षेत्र में पनबिजली भी उत्पन्न की जा सकती है। अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण यह पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बन सकता है।

अब समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। इस क्षेत्र को लद्दाख व कार्गिल से बस सेवाओं द्वारा जोड़ा जाना चाहिए। यह क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से कार्गिल, लेह और लद्दाख से जुड़ा हुआ है जिसका हमें फायदा उठाना चाहिए। गिल्गित-बल्तिस्तान के लोग अब फारसी लिपि छोड़कर तिब्बती लिपि अपना रहे हैं क्योंकि यह उनकी भाषा के अधिक अनुकूल है। कार्गिल उत्सव मनाकर हमें इन क्षेत्रों को भारत से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। इस विषय पर और अध्ययन होना चाहिए जिससे बेहतर समाधान निकल सकें। हमें वहाँ चुनाव आयोजित करने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन यह सभी प्रयास तब ही किए जा सकते हैं जब दिल्ली से आदेश आए। इस क्षेत्र में विकास और यहाँ के नागरिकों के अधिकार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता देखने की आशा में…