राजनीति
नितिन गडकरी द्वारा विजय माल्या के पलायन का बचाव असमर्थनीय है

आशुचित्र- मोदी सरकार से अपनी भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए गडकरी ने माल्या का पक्ष लेकर गलत मसला उठा लिया है।

संभवत: नितिन गडकरी एनडीए सरकार के सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले मंत्री है। कुछ समय से खुद को वो सरकार से भिन्न राह पर चलने वाला दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं। हो सकता है कि उन्हें आशंका हो कि अगले आम चुनावों में भाजपा का बहुमत में आना मुश्किल है तथा उस समय मोदी के बिना भाजपा गठबंधन वाली सरकार बनाना एक नया विकल्प हो सकता है।

यहाँ उनके कहे कुछ कथनों पर प्रकाश डालते हैं जिनमें कुछ उचित दिखाई पड़ते हैं तथा कुछ नहीं।

कुछ महीनों पूर्व जब बैंकिंग क्षेत्र में अनर्जक परिसंपत्तियों (एनपीए) के कारण दिक्कतें आ रही थीं तब उन्होंने दावा किया था कि बैंकों के 3 लाख करोड़ रुपए इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में फँसने से उन्होंने बचाए थे।

यह दावा गलत नहीं है क्योंकि गडकरी ने सड़क निर्माण परियोजनाओं के वित्तीय ढाँचे को बदलकर उन्हों व्यवहार्य बनाया है। ऋण की दिक्कतों को बदतर होने से बचाने के लिए उन्हें निश्चित रूप से श्रेय मिलना चाहिए।

अक्टूबर माह में एक मराठी चैनल को दिए साक्षात्कार में गडकरी के कथनों ने मोदी सरकार को शर्मिंदा भी किया था। उन्होंने कहा था कि 2014 लोकसभा चुनावों के पूर्व भाजपा को बड़े वादे करने के लिए कहा गया था क्योंकि पार्टी को सत्ता में आने का विश्वास नहीं था। उन्होंने कहा, “हमें निश्चित रूप से पता था कि हम सत्ता में नहीं आ सकते हैं, इस हेतु हमें बड़े वादे करने की सलाह दी गई थी। यदि हम सत्ता में नहीं आते तो उसके ज़िम्मेदार हम नहीं होते। अब चूँकि हम सत्ता में हैं तो लोग हमें हमारे वादे याद दिलाते हैं। हालाँकि इन दिनों हम बस हँसकर आगे बढ़ रहे हैं।”

शायद गडकरी ने यह मज़ाक के तौर पर कहा लेकिन राहुल गाँधी ने इसे गंभीरता से लेते हुए उनके कथन का वीडियो साझा किया था।

गडकरी के दावे पर भी प्रश्नचिन्ह है कि 2014 में भाजपा के सत्ता में आने की बात पर आश्वस्त नहीं थे। लेकिन अगर थोड़ी भी आशंका होती तो वो इस बात पर होनी चाहिए थी कि चुनावों के बाद भाजपा गठबंधन की सरकार चलाएगी या फिर वो अकेले ही पूर्ण बहुमत हासिल करने में सक्षम होगी (जहाँ उसके किए गए वादे उतनी महत्ता नहीं रखते)। अत: यदि इस कथन का उद्देश्य मोदी-शाह की जोड़ी पर विश्वसनीयता को धूमिल करना तथा समय पड़ने पर अपनी उपयोगिता दर्शाना नहीं था, तो यह कथन अनुचित था।

13 दिसंबर को गडकरी ने विजय माल्या को लेकर मोदी सरकार से पूर्णतया अलग बात कह दी। बता दें कि विजय माल्या बैंकों पर 9000 करोड़ का क़र्ज़ बकाया है। द इकोनॉमिक टाइम्स  के अनुसार गडकरी ने कहा, “माल्या ने ब्याज़ तथा बकाया 40 सालों तक निरंतर जमा किया है। उसके बाद वे विमानन क्षेत्र में आए तथा वहाँ उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा। क्या यह उन्हें चोर बनाता है? यह सही है कि व्यक्ति 50 सालों तक क़र्ज़ भरता रहे और एक बार चुकाने में असमर्थ हो तो क्या वो धोखेबाज़ हो गया? यह मानसिकता ठीक नहीं है।”

यह तो तय है कि एक बार दोषी की संज्ञा मिलने के लिए एक बार का दोष ही काफ़ी है। चोर की संज्ञा एक बार में ही मिल जाती है भले ही उसके पहले 10 बार आपने चोरी नहीं की हो। अधिक से अधिक आप केवल उदारता की विनती कर सकते हैं।

गडकरी के कथन के विरुद्ध दूसरा तर्क यह दिया जा सकता है कि यदि माल्या असफ़ल व्यवसायी थे तो कथित तौर पर 300 बैग लेकर चुपके से देश छोड़कर क्यों भागे? यदि व्यवसाय की असफलता के अलावा और कोई कारण न हो तो कौनसा व्यवसायी असफल होने पर देश छोड़कर भाग जाता है? और ऐसा भी नहीं था कि बैंकों ने चाहकर माल्या के उद्यम किंगफिशर एयरलाइन्स को चलाए रखने के लिए पैसा देना चाहा था, उन पर ऐसा करने के लिए दबाव डाला गया था। इस कारण यह बात माल्या के विरुद्ध हो जाती है, जबकि माल्या कहते हैं कि उन्हें जबरदस्ती उदाहरण बनाया जा रहा है।

एक कार्यक्रम के दौरान माल्या ने कहा था कि वे सब सामान्य करना चाहते हैं किंतु सरकार उन्हें ऐसा नहीं करने दे रही है तथा बलि का बकरा बनाए रखना चाहती है। किंतु उनका यह कथन फिर से तर्कसंगत नहीं रहता क्योंकि यदि वे सब कुछ सामान्य करना चाहते थे तो अपने ऋण के हालात बिगड़ने के बाद 5 सालों तक भी कर सकते थे। उल्लेखनीय है कि उनके ऋण की हालत 2011 से बिगड़ना आरंभ हो गई थी तथा 2016 में वे देश छोड़कर चले गए।

लेकिन देश छोड़ने के कुछ माह पूर्व उन्होंने गोआ में एक भव्य जन्मदिन पार्टी रखी थी। कोई भी व्यक्ति इतना बड़ा क़र्ज़ होने के बाद भी, ऐसा नहीं कर सकता। भारतीय स्टेट बैंक द्वारा माल्या को जानबूझकर दोषी करार दिए जाने के बाद ही इस दावत का आयोजन हुआ था। इस पर उस समय के भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर, रघुराम राजन ने एक टीवी साक्षात्कार के दौरान कहा था, “यदि आप इतना क़र्ज़ बकाया होने के बाद भी अपने जन्मदिन  को इतनी भव्यता से मना रहे हैं तो इससे यह प्रतीत होता है कि आपको कोई परवाह नहीं है। और यह एक गलत संदेश देता है। यदि आप वाकई मुश्किल में हैं, तो आप अपने व्यय को कम करने का प्रयास करते।”

अभी भी, यदि माल्या केवल व्यवसाय की असफलता के दोषी होते तो भारत में प्रत्यर्पण के लिए अवरोध करने का प्रयास नहीं करते। यदि वे खुद से यहाँ आते तो आवश्यक पूछताछ के बाद कुछ ही दिनों में उन्हें ज़मानत भी मिल जाती।

दरअसल, माल्या का पक्ष लेकर गडकरी खुद के लिए गलत कर रहे हैं। उन्होंने मोदी सरकार से अपनी भिन्नता दर्शाने के लिए गलत मसला उठा लिया है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।