राजनीति
नेहरू से है संबंधित अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का इतिहास

आशुचित्र- अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के संदर्भ में अतीत के सत्य को न जानना नेहरू और डॉ मुख़र्जी दोनों के साथ अन्याय है।

कई बार आभास होता है कि भविष्य के प्रश्नों का उत्तर अतीत के पास है। दुर्भाग्य यह है कि अतीत अक्सर सामान्य दृष्टि से छुपा कर रखा है। इसका कारण वैचारिक कपट ही है। राजनीति ने भारतीय बौद्धिक समाज को ऐसा प्रभावित किया कि पसंद के महानायकों की किंवदंतियाँ बनाई गई और राजनैतिक विरोधियों की बौद्धिक प्रखरता को ऐसी कालिमा में ढाँप कर रखा गया कि उनके विचारों की एक कमज़ोर-सी किरण भी बाहर कर उन्हें तय राष्ट्रीय नायकों के समकक्ष खड़ा कर दे। वर्तमान में चुनावों के परिपेक्ष्य में अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य पर बड़ी चर्चा हुई। एक भूमिका गढ़ी गई जिसमे वामपंथी स्वतंत्रता के सेनानी स्थापित किये गए और दक्षिणपंथियों को कट्टरता का मुखौटा पहनाया गया।  

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की ज़मींदारी के लाभार्थियों की संख्या ऐसी महान है कि प्रपोत्र के राजनैतिक अभियान में अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के पुरोधा नेहरू को ही घोषित कर दिया गया है, ताकि उसका लाभ कांग्रेस को पहुँच सके। ऐसे असत्य और घाल-मेल के वातावरण में आवश्यक है कि हम इस बहस की पृष्ठभूमि और सन्दर्भ समझें , उस सत्य को जाने जिसके पास हमें वो जाने नहीं देना चाहते हैं जो अभिव्यक्ति की छद्म चिंता तो करते हैं, और दूसरी और एक युवा लड़की को एक मीम बनाने पर जेल भेजने में नहीं हिचकते। 

संविधान समिति में गोविंद वल्लभ पंत जी ने 24 जनवरी 1947 को एक अलग इप-समिति बनाने का निर्णय लिया जो मूलभूत अधिकारों पर कार्य करे। संविधान समिति में 2 दिसंबर 1948 को अभिव्यक्ति के मूलभूत अधिकार पर चर्चा हुई। सरदार भूपिंदर सिंह मान ने चर्चा का आरंभ किया और लोकमान्य तिलक के संदर्भ में 124- द्वारा राष्ट्रद्रोह की धारा अंग्रेज़ों द्वारा लाये जाने के विषय पर बात की। इसी कमिटी की सलाह पर श्री बी एन राउ ने मूलभूत अधिकारों का प्रारंभिक स्वरूप बनाया। इस में सरदार पटेल के सुझाव परराष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्थाकी सीमाएँ डाली गईं।

किंतु समय के साथ नेहरू को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के मूलभूत अधिकार के अंतर्निहित संवैधानिक मानदंड पर्याप्त नहीं लगे और संविधान का प्रथम संशोधन अधिक प्रतिबंध लाने के लिए प्रस्तावित किया गया। यह एक विडंबना और विरोधाभास ही रहा कि वामपंथी इतिहासकारों ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में नारे तो बहुत लगाए, परंतु प्रथम संशोधन पर हुई चर्चा को हाशिये पर डाल दिया क्योंकि उनके नायक वैचारिक विभाजन के विपरीत खंड में दिखते हैं। यह विडंबना ही है कि जहाँ अमेरिका का प्रथम संवैधानिक संशोधन वैचारिक आज़ादी के पक्ष में हुआ, भारत के संविधान का पहला संशोधन स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया।

भारतीय संविधान के प्रभाव में आने के 15 महीने के पश्चात ही नेहरू जी 10 मई 1951 को संविधान में पहला संशोधन ले आए। इसके लाए जाने के कारणों पर मतभेद हैं। एक विचार है कि उस समय निकले कई प्रकाशनों जैसे रोमेश थापर के क्रॉस रोड से नेहरू की नाराज़गी थी और उन्होंने इनपर सेंसर करने का प्रयास किया जिसे सर्वोच्च न्यायलय ने संविधान के मूलभूत अधिकारों का हनन मानकर खारिज़ किया।

दूसरा विचार नेहरूलियाकत समझौते पर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध को इस संशोधन का कारण बताता है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अन्य कई नेता विभाजन को अस्थायी व्यवस्था मानते थे और अखंड भारत के समर्थक थे। नेहरूलियाक़त पैक्ट इस विभाजन को स्थायी बनाता था। नेहरू इस विरोध से चिंतित थे क्योंकि उनका मानना था कि भारत में ऐसा विचार पाकिस्तान से विरोध पैदा कर सकता है। 

एक अन्य मत के अनुसार जातिगत आरक्षण के विरोध में मद्रास उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में राज्य बनाम चंपकम दोरईराजन मुकदमे में सरकार की हार के कारण यह संशोधन विधेयक लाया गया। इस महिला ने जातिगत आरक्षण को संविधान में समानता के मूलभूत अधिकार का विरोधी माना था। कारण सम्मिलित रहे होंगे परंतु संसद में इस बिल के पक्ष और विपक्ष में जो बहस हुई उसमें कांग्रेस के अग्रणी नेता नेहरू और कालांतर में जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी की बहस दोनों की बौद्धिक स्थिति का प्रतिबिंब है। यह कांग्रेस तथा भाजपा के उस इतिहास की और इंगित करता है जिसे हम सब काफ़ी हद तक भुला चुके हैं।

आज कई प्रबुद्ध लोग बहुमत की सरकार पर भी मत प्रतिशत का प्रश्न उठाकर उसे निर्णयों से रोकते हैं। प्रथम संशोधन में भी यह पहला विरोध था कि नेहरू सरकार का बहुमत बारीक़ था। नेहरू ने इसे सिरे से नकारते हुए कहा कि जैसे उन्हें संविधान बनाने का अधिकार था, वैसे ही उन्हें उसमें संशोधन का भी अधिकार है।

नेहरू मीडिया के संबंध में कहते हैं, “मुझे बहुत खेद है कि दिन प्रतिदिन कुछ अख़बार अश्लीलता और असत्य प्रकाशित करते हैं जिससे मुझे तो फ़र्क़ नहीं पड़ता परंतु युवा प्रभावित होते हैं। यह एक राजनैतिक नहीं वरन एक नैतिक समस्या है।” …दूसरी समस्या विदेशी शक्तियों की निंदा की है जिसके कारण भारत के विदेश संबंध प्रभावित हो सकते हैं। इस पर प्रतिबंध होना चाहिए। आगे नेहरू कहते हैं कियह आवश्यक था कि हमारा एक लिखित संविधान हो। यह अब हमारे पास है और एक बढ़िया संविधान है। परंतु जैसे जैसे हम आगे बढ़ते हैं कठिनाइयाँ प्रकट होती हैं। समझदार लोगों की तरह हमें अब उन्हें देखना है और संविधान में परिवर्तन करने हैं।

डॉ मुखर्जी ने नेहरू के इस प्रस्ताव को सामान्य बताने पर आपत्ति की और कहा कि इसके दूरगामी प्रभाव को ध्यान रखते हुए इसे जनता में ले जाना चाहिए और सर्वसम्मति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने अमेरिका के प्रथम संशोधन का उदाहरण देकर कहा कि अन्य देशों में जब ऐसा संशोधन लाया गया, नागरिक अधिकारों में वृद्धि के लिए लाया गया, कि अधिकारों की कतरब्योंत के लिए।

उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री (नेहरू) स्वयं अपने हृदय में जानते है कि मूलभूत अधिकारों में यह परिवर्तन संविधान की जड़ों पर हमला है।... क्या उन्हें लगता है कि भारत की जनता अराजक है और उस पर स्वातंत्र्य के संचालन के लिए विश्वास नहीं किया जा सकता है? …जहाँ तक प्रेस पर नैतिक नियंत्रण का प्रश्न है, बिना संशोधन के भी संविधान में पर्याप्त प्रावधान हैं इसके लिए। विदेशी सत्ता की आलोचना के संदर्भ में मैंने कई राष्ट्रों के संविधान का अध्ययन किया किंतु विदेशी सत्ता की आलोचना पर प्रतिबंध कहीं नहीं देखा। संभव है डॉ अंबेडकर इस बारे में मदद कर सकें। मेरा मानना है कि विभाजन एक भूल थी जिसका सुधार एक एक दिन होना ही है। यह मेरा विचार है तो ऐसा कहने का मेरा अधिकार क्यों नहीं है? नेहरू जी का अधिकार है कि वे देशवासियों को मेरी बात सुनने से मना करें। क्यों नेहरू जी मेरे विभाजन विरोधी विचारों से इतने चिंतित हैं। यह हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के ही हित में होगा। मैं समझता हूँ कि एक दिन दोनों देशों के लोग इस भूल को समझकर इसके सुधार का प्रयास करेंगे।”

नेहरू के कथन कि अभी न्यायपालिका परिपक्व नहीं है पर डॉ मुख़र्जी कहते हैं कि इसका यह अर्थ कतई यह नहीं होना चाहिए की संसद सब अधिकार अपने अधिकार में ले ले।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एकाकी युद्ध नेहरू की विजय और संविधान के पहले संशोधन के साथ हुआ। कांग्रेस के संख्या बाहुल्य पर डॉ मुख़र्जी अंत में यही कहकर रह गए, “इस संसद में आपके 240 समर्थक हैं किंतु भारत की करोड़ों जनता मूलभूत अधिकारों के इस हनन का समर्थन नहीं करेगी।” जिसके उत्तर में नेहरू का कहना था, “आपका आशय निंदनीय है।” डॉ मुखर्जी का प्रत्युत्तर था, “आपकी असहिष्णुता निंदनीय है।

यह इतिहास के नेहरूकरण का ही उदहारण है कि आज प्रथम संशोधन का विरोध करने वाली श्यामाप्रसाद जी की सोच को असहिष्णु कहा जाता है और कांग्रेस जनता की संक्षिप्त स्मृति का लाभ लेकर स्वयं को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का रक्षक बताती है। वाम और दक्षिणपंथी सोच के बीच यह अंतर शोर से सत्य को डूबने की साजिश बताती है। क्या यह सिर्फ संयोग है कि इंदिरा आपातकाल लाईं, राजीव गांधी पोस्टल बिल लाए (जो पास नहीं हुआ) जिसमें सरकार को व्यक्तिगत पत्रों को सेंसर करने का अधिकार था, और सोनिया गांधी इंटरनेट पर नज़र रखने के लिए 66  लाईं। सत्ता से बाहर होकर बड़े-बड़े शासक जनवादी हो जाते हैं किंतु इस संदर्भ में अतीत के सत्य को जानना नेहरू और डॉ मुख़र्जी दोनों के साथ अन्याय है।

साकेत सूर्येश स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे  @saket71 द्वारा ट्वीट करते हैं।