राजनीति
#MeToo को इसकी खुद की खातिर अराजकता का प्रतीक नहीं बनने दिया जा सकता
MeToo

प्रसंग
  • हर समझदार इंसान, महिला या पुरूष, को ‘#MeToo’ का समर्थन करना चाहिए। उसी तरह, भारत औद्योगिक रूप से अविकसित छोटे से देश की तरह काम नहीं करता, न यह कर सकता है और न इसको करना चाहिए।

हाल ही में, अगर एक ऐसा इंसान जिसने दुनिया भर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ट ट्रम्प से ज्यादा सुर्खियाँ बटोरी हैं तो वह ब्रेट कावानॉ हैं, जिनको डॉ. क्रिस्टीन ब्लैसी फोर्ड द्वारा लगाए गए यौन दुर्व्यवहार के आरोपों के मद्देनज़र अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन द्वारा आखिरकार सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। जबकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कावानॉ की नियुक्ति को ट्रम्प विरोधियों के तिरस्कार का सामना करना पड़ा, वहीं एक प्रगतिशील महिला के रूप में मैं कट्टर नारीवादी के प्रति थोड़ा सम्मान और सहानुभूति रखती हूँ। फोर्ड के लिए खड़ी कितनी महिलाओं या पोर्न स्टार स्टॉर्मी डेनियल्स की जय-जयकार करने वाली कितनी महिलाओं में साहस, दृढ विश्वास या संवेदनशीलता है कि वे भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की असहाय पीड़िताओं जैसे मोनिका लेविंस्की या पौला जोन्स, कैथलीन विले, जुआनिटा ब्रोड्रिक के पक्ष में कभी भी आवाज उठा सकें।

वह बिल क्लिंटन थे और शायद उनका लगातार आँख मटक्का करना कोई मुद्दा ही नहीं है। असल मुद्दा तो उनकी शक्तिशाली पत्नी हिलेरी क्लिंटन, जो राष्ट्रपति पद का चुनाव हार चुकी हैं, की उदासीन चुप्पी है। यह बात साफ है कि हिलेरी क्लिंटन कथित शारीरिक शोषण में निजी तौर पर कैसे शामिल रही हैं और अपने ऐयाश पति की पिटाई की है, जो दरअसल हिलेरी और उनके जैसे अन्य बहुत से मामलों को कमजोर करता है।

कानूनी अलगाव ही एक बुरे वैवाहिक संबंध से छुटकारा पाने का आसान रास्ता है। लेकिन जब आप क्लिंटन होती हैं, जो एक साधन-संपन्न वकील, एक राजनयिक, एक राजनेता और एक धनी, दुनिया भर का चक्कर लगाने वाली एक मजबूत महिला और हर अंतराष्ट्रीय मंच से महिला सशक्तिकरण को समर्थन देने वाली महिला है, तब एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ खड़े न होना जो उसका पति था और आगे भी बना रहा तथा अमेरिका का पूर्व राष्ट्रपति भी था, तब इसमें पाखण्ड की बू आती है।

अपने पास में ही देखा जाए तो, भारत में ‘#MeToo’ आंदोलन को शुरू करने वाली नायिकाएं पाँच मुस्लिम महिलाएं – शायरा बानो, गुलशन परवीन, आफरीन रहमान, इशरत जहाँ और आतिया साबरी थीं, जिन्होंने तलाक-ए-बिद्दत और तीन तलाक, जिससे वे पीड़ित थीं, के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। उनके पतियों द्वारा घरेलू हिंसा से लेकर कई जबरन गर्भपातों, दहेज़ की कठोर मांगों तक हर प्रकार से सताए जाने के बावजूद इन महिलाओं के साहस को कुछ भी कमजोर न कर सका और अंततः उन्होंने एक क्रूर और प्रतिगामी प्रथा के खिलाफ लड़ाई जीत ली। मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक पर ऐतिहासिक अध्यादेश लाने के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की हवा निकल गयी और उन्होंने एक बार भी इन महिलाओं की सराहना नहीं की। खैर, इस मामले में ओवैसी की चुप्पी उनके पाखंड को व्यक्त करती है।

‘#MeToo’ केवल यौन उत्पीड़न, हमला, अनुचित स्पर्श, भद्दे इशारे करने, यौन तंज, अश्लील वाक्य बोलने या बलात्कार करने के बारे में ही नहीं है। यह “नो” कहने के किसी व्यक्ति के स्पष्ट अधिकार के बारे में भी है और किसी को किसी भी व्यक्ति की मूल मानव गरिमा पर अतिक्रमण करने की इजाजत नहीं देता है। बॉलीवुड के बेरोजगार बैठे छोटे सितारों को यह महसूस करना चाहिए कि ‘#MeToo’ अभियान समाज में किसी भी महिला के साथ हो रहे प्रतिकूल व्यवहार या गतिविधि को उजागार करने का एक गंभीर प्रयास है। उन्हें अपने गंभीरता हीन प्रयासों के साथ इस सार्थक अभियान को लूटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

भारत में तेजी से प्रचलित ‘#MeToo’ अभियान में यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारतीय मीडिया के वर्गों ने बोलने की आज़ादी की आड़ में इस पूरे अभियान को आधी सच्चाई वाला, वास्तविक तथ्यों से दूर और झूठ के साथ राजनीतिक रंग देना पसंद किया है। किसी भी तरह का यौन समझौता करने के लिए मजबूर किया जाना सबके सामने आना चाहिए और यह बात कोई मायने नहीं रखती कि यह दस, बीस, तीस या चालीस सालों के बाद सामने आता है। किसी को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि एक महिला को अपने उत्पीड़नकर्ता का नाम लेने और उसे शर्मिंदा करने में बहुत ज्यादा साहस की जरूरत होती है। टेलीविजन स्टूडियो को स्वघोषित अदालतों में तब्दील किया जा रहा है और ऐसे टीवी एंकर जिनके खुद के गिरेबान गंदे हैं, उनके द्वारा इस असाधारण अभियान को ओछा अभियान बनाया जा रहा, जहाँ कुछ महिलाओं, जो न्याय का नाम लेकर अपने पूर्व-पुरुष मालिकों और सहयोगियों के साथ पुरानी पेशेवर और व्यक्तिगत दुश्मनी अदा करने की कोशिश कर रही हैं, द्वारा दृश्यरतिक आनंद उत्पन्न किया जा रहा है।

एम. जे. अकबर – जो एक कुशल पत्रकार, लेखक, पूर्व कांग्रेस नेता और वर्तमान सरकार में अब एक मंत्री हैं –  पूर्व महिला सहयोगियों द्वारा लगाए गए बहुत सारे आरोपों के साथ स्वयं को असहज पाते हैं। अकबर के पीछे पूरी मीडिया हाथ धोकर पड़ी है। यकीनन उन्हें अदालत में कोशिश करने दी जाए और मामले के अनुसार निर्दोष या दोषी करार दिया जाए। यहां प्रासंगिक सवाल यह है कि क्या अकबर को अपनी स्थिति को स्पष्ट करने का अधिकार नहीं है? निश्चित रूप से उनके पास अधिकार है।

अकबर के भाग्य का फैसला किसे करना है? क्या यह मीडिया को करना है, जिसने ग्यारह वर्षों में कभी भी सुकन्या सिंह और उनके पिता बलराम सिंह के कथित रूप से गायब होने पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर सवाल उठाने का साहस नहीं किया है?

वास्तव में, राजनेताओं और उन लोगों के लिए जो सरकार में हैं, उनके लिए पाखंड करने का स्तर अधिक ऊंचा है। मैं व्यक्तिगत रूप से मानती हूं कि नैतिक पतन एक सम्पूर्ण “ना” है खासकर सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों के लिए। समान रूप से, देश का कानून सर्वोच्च है और एम. जे. अकबर की पहुंच उतनी ही है जितनी कि किसी और की। जिन लोगों ने अकबर का “नाम लिया” है उन्हें न्यायिक फैसला सुनाए जाने तक कानूनी समाधान की तलाश करनी चाहिए और इसका निर्णय कौन करेगा कि क्या पीड़िताओं ने अकबर से डरकर चुप्पी साधी थी या उनका ऐसा करना उनके भविष्य के करियर के लिए सुविधाजनक और आर्थिक रूप से फायदेमंद था?

अकबर के खिलाफ आरोपों का फैसला कौन करेगा? ममता बनर्जी, जिन्होंने यौन पीड़िता सुज़ेट जॉर्डन को झूठा कहते हुए उसे शर्मिंदा किया था? या समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ऐसा करेंगे, जिन्होंने बलात्कार के आरोपी गायत्री प्रजापति की सुरक्षा की थी? एम. जे. अकबर से इस्तीफे की मांग करने वाली सीपीआई (एम) की वृंदा करात होती कौन हैं? क्या वृंदा करात ने कभी जेएनयू के लफंगे छात्र और वामपंथी कन्हैया कुमार की निंदा की है, जिसने कथित रूप से एक युवा महिला कमलेश नरवाना के सामने अपना गुप्तांग प्रदर्शित किया था, लेकिन इसके बावजूद भी उसे सभी वामपंथी उदारवादी धर्मनिरपेक्ष लोगों द्वारा “अगली बड़ी राजनीतिक वस्तु” के रूप में सम्मानित किया गया था? क्या सीताराम येचुरी ने केरल के विधायक पी.सी. जॉर्ज के खिलाफ कभी आवाज उठाने की रत्ती भर भी कोशिश की है, जार्ज, जिन्होंने कहा था कि यदि नन ने बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ 13वीं बार बलात्कार होने के बाद शिकायत की है तो क्या यह नहीं हो सकता है कि उसने 12 बार इन मौकों का आनंद उठाया हो?

नरेंद्र मोदी सरकार हमेशा महिलाओं को सशक्त बनाने के मामले में बात करती रही है और कभी भी राजनीतिक प्रतिक्रिया के अनपेक्ष सच्चाई तक पहुंचने में पीछे नहीं हटी है। चाहे पूर्व मंत्री निहाल चंद का मामला हो या कुलदीप सेंगर का हाल का ही मामला हो, अखंडता पर कोई समझौता नहीं किया गया है। मैं फिर से कहना चाहूंगी कि 2014 से भाजपा के साथ रही एक कार्यकर्ता के रूप में मैंने कभी भी अपने लिंग या अन्य कारणों के चलते शोषण महसूस नहीं किया है। चाहे जो भी हो, मुझे उस पार्टी की सदस्या होने पर गर्व है जो न सिर्फ 11 करोड़ सदस्यों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन है बल्कि यह एक सराहनीय, कार्य-उन्मुख और एक ऐसा संगठन भी है जहाँ मुझे एक महिला होते हुए न तो असुविधा महसूस हुई और न ही मुझे कोई अतिरिक्त लाभ मिला, और हूबहू इसे ऐसा ही होना चाहिए।

प्रत्येक समझदार व्यक्ति को, चाहे वह महिला हो या पुरुष, ‘#MeToo’ का समर्थन करना चाहिए। भारत एक अविकसित देश नहीं है। न्याय प्रदान करने के लिए न्यायिक तंत्र है और महज आरोपों का मतलब कुछ भी नहीं है। जैसा कि वे कहते हैं, “परोपकार घर से शुरू होता है।” इसलिए भारतीय मीडिया को स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ प्रदर्शित करने की कोशिश करनी बंद कर देनी चाहिए। मीडिया को राजनेताओं से जवाबदेही की मांग करने दें लेकिन इसे अपना दामन भी साफ करने के लिए कहें। इसे जिम्मेदार होने की जरूरत है क्योंकि #TimesUp.

संजू वर्मा एक अर्थशास्त्री और मुंबई से भाजपा की प्रमुख प्रवक्ता हैं।