राजनीति
बाढ़ का कहरः क्या गाडगिल आयोग के सुझावों को नजर अंदाज कर केरल ने गलती की?

प्रसंग
  • माधव गाडगिल, जिन्होंने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की अध्यक्षता की थी, ने केरल में हाल ही में आई बाढ़ और भूस्खलन के लिए गैर-जिम्मेदार पर्यावरण नीति की आलोचना की थी

केरल में 325 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवा दी है, इसके साथ गुरुवार (16 अगस्त) को एक ही दिन में 106 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। लगभग 2.5 लाख लोगों को स्थानांतरित कर दिया गया है और इन्हें करीब 2,100 राहत शिविरों का सहारा दिया गया है। कम से कम 20,000 घर आंशिक रूप से या पूरी तरह से प्रभावित हुए हैं और 10,000 कि.मी. से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त हो गई हैं। यह एक प्राकृतिक आपदा है या एक क्रम, जिसे लगभग एक शताब्दी से केरल ने नहीं देखा है। अभी तक 8,000 करोड़ रुपये से अधिक के शुरुआती नुकसान का अनुमान है, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि यह 10,000 करोड़ रुपये भी हो सकता है।

बाढ़ प्रभावित इलाकों का मुआयना करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोच्चि से हवाई दौरा किया और प्रधानमंत्री राहत कोष से अनुग्रह राशि के भुगतान की घोषणा की, हालांकि अब बारिश की तीव्रता में कमी आई है। विशेषज्ञ और अधिकारी रिकॉर्ड देखने में लगे हैं कि केरल में पिछली बार 1924 में किस प्रकार की क्षति हुई थी। सोशल मीडिया में से कुछ ने 1924 की बाढ़ के बारे में कहानियों का स्मरण करना शुरू कर दिया है जो उन्हें उनके दादा-दादी ने सुनाईं थीं।

उस समय, केरल में 3,368 मिमी बारिश हुई थी और मुल्लापेरियार बाँध का पानी छोड़े जाने के बाद पेरियार नदी में बाढ़ आ गई थी। तब करिंथिरी मलाई नामक एक पहाड़ी का अस्तित्व खत्म हो गया था, जबकि 1,000 से अधिक लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी।

इस बार, भारत के मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार केरल में पिछले लंबे समय के 1606.7 मिमी औसत के मुकाबले 2091.1 मिमी बारिश हुई है। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं बताता।

8 अगस्त के आस-पास बारिश की तीव्रता में तेजी आई और मलप्पुरम जिले के निलांबर जैसे क्षेत्रों में एक ही दिन (9 अगस्त) में 350 मिलीलीटर बारिश हुई। 12-13 अगस्त के दौरान मुन्नार में 160 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश हुई। इडुक्की, जहां स्थिति बेहद खराब है, में 10 अगस्त को लगभग 100 मिमी बारिश हुई। तमिलनाडु के किनारे पलक्कड़ जिले के ओट्टापलम में 14 अगस्त को 130 मिमी से ज्यादा बारिश हुई और कोट्टायम से 85 कि.मी. दूर पीरमेड में 16 अगस्त को 225 मिमी बारिश हुई।

एक बड़े क्षेत्र में मूसलधार बारिश से केरल के 14 जिलों में से कम से कम 10 जिलों में बाढ़ आ गई है। 16 अगस्त तक केरल में छोटे और बड़े 80 बाँध खोल दिए गए थे जिसमें इडुक्की बाँध पिछले हफ्ते 26 सालों में पहली बार खोला गया। कर्नाटक के कोडागु जिले में भारी बारिश के पानी के बाँधों द्वारा छोड़े गए पानी से मिलने के कारण कावेरी नदी में बाढ़ आ गई है और तमिलनाडु में ईरोड, सेलम और करूर जैसे जिले खतरे मे आ रहे हैं।

रिकॉर्ड्स दर्शा सकते हैं कि केरल में लंबी अवधि के औसत की तुलना में केवल 30 प्रतिशत अतिरिक्त बारिश हुई है, लेकिन एक करीबी जाँच से पता चलता है कि इडुक्की में 70 फीसदी अतिरिक्त मूसलाधार बारिश हुई है जबकि पलक्कड़ में सामान्य वर्षा की तुलना में 57 फीसदी अधिक बारिश हुई है। विडंबना यह है कि त्रिसूर, जहां 2 फीसदी तक कम बारिश हुई है, भी बाढ़ के खतरे का सामना कर रहा है।

दक्षिण-पश्चिम मॉनसून, जो 1 जून को उठा था, को जाने में करीब पांच हफ्ते और लग सकते हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि केरल में और ज्यादा बारिश होने की संभावना है। जैसा भी हो पर केरल को ऐसे अभूतपूर्व संकट का सामना क्यों करना पड़ रहा है, एक ऐसा संकट जो राष्ट्रीय आपदा कहे जाने की मांग कर रहा है? तथ्य यह है कि बाढ़ से अधिक प्रभाव भूस्खलन ने डाला है जिसकी वजह से यह कहर टूटा और जान-माल की हानि के नुकसान का कारण बना।

केरल का तट कटान के लिए खतरनाक है। इसे रोकने के लिए लोग लंबे समय तक वहां पत्थरों का पटाव करते रहे हैं। इन पत्थरों को पहाड़ी इलाकों से खोद कर लाया जाता है। अतः पहाड़ी इलाके अब खनन की वजह से कमजोर हो गए हैं। यह उत्खनन बड़े उपकरणों और विस्फोटों से किया गया है। हालांकि कथित रूप से उत्खनन कानूनी रूप से किया जा रहा है, लेकिन कुछ खनिक कानूनी खामियों का फायदा उठा रहे हैं। 2011 में एक रिपोर्ट में कहा गया था कि चल रही 18,000 खानों में से केवल 8,000 खानों के पास ही लाइसेंस हैं। 2015 में केरल अप्रधान खनिज रियायत नियमों में एक संशोधन किया गया था जिसमें एक ग्राम अधिकारी के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया था कि खनन के लिए जमीन प्रमाणित करते समय यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि वह जमीन किसी अन्य उद्देश्य के लिए ना सौंपी गयी हो। लेकिन हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ और विशेष रूप से इडुक्की जैसी जगहों पर हालात खराब रहे हैं।

हालांकि, यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। माधव गाडगिल, जिन्होंने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की अध्यक्षता की थी, के अनुसार दूसरा कारण यह है कि वर्तमान में आई हुई बाढ़ से केरल में उत्पन्न होने वाली समस्या मानव निर्मित है। गाडगिल ने पश्चिमी घाटों में 140,000 किलोमीटर में तीन जोनों का निर्माण करने का सुझाव दिया था, जैसा कि पर्यावरण संरक्षण के अनुसार यह जरूरत थी। उन्होंने 17 अगस्त को मीडिया को बताया कि ज्यादातर प्रभावित क्षेत्रों को उनके नेतृत्व में पैनल द्वारा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील माना गया था। यह बताते हुए कि पैनल ने अपनी 2011 की रिपोर्ट में खनन और उत्खनन और गैर-वन प्रयोजनों के लिए जमीन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी, उन्होंने कहा कि उन्होंने ऊंची इमारतों के निर्माण के खिलाफ भी सिफारिश की थी – जिनमें से सभी चीजों को नजरअंदाज कर दिया गया है।

बल्कि, केरल सरकार ने रिपोर्ट को खारिज कर दिया था क्योंकि मुख्य रूप से ईसाई संगठनों की ओर से दबाव बनाया जा रहा था और सिफारिशों से प्रभावित होने वाले अधिकांश किसान ईसाई थे जो वायनाड जैसे ऊंचे इलाके से थे। गाडगिल पैनल की एक भी सिफारिश लागू नहीं की गई थी।

मीडिया के साथ बातचीत में गाडगिल ने केरल में हालिया बाढ़ और भूस्खलन के लिए गैर जिम्मेदार पर्यावरणीय नीति की आलोचना की।

इन कारकों के अलावा, भूकंप संभावित क्षेत्रों में बहु मंजिला इमारतों की बढ़ती संख्या, जलाशयों के पास वन्य भूमि का अवैध अधिग्रहण और नदियों तथा समुद्रों के नजदीक क्षेत्रों में इमारतों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं।

जबकि सेना और पैरा-मिलिट्री फोर्स के साथ केंद्र और राज्य स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन केरल को और राहत की आवश्यकता है।

भविष्य में ऐसी चीजों को दोहराने से बचने के लिए अब एक तीन-स्तरीय रणनीति का सुझाव दिया जा रहा है। पहला, इस घटना के कारणों का अध्ययन करें और अंतिम समय तक प्रतीक्षा करने के बजाए पानी को समय पर छोड़ना तय करें। दूसरा, सरकारों को पर्यावरण कानूनों को लागू करने में लचीलापन नहीं दिखाना चाहिए। तीसरा, गाडगिल पैनल की सिफारिशों को स्वीकार किया जाना चाहिए, और इसके द्वारा सुझाए गए विभिन्न उपायों को लागू किया जाना चाहिए।

एम.आर. सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वह @mrsubramani पर ट्वीट करते हैं।