राजनीति
वे पाँच संदेश जो 2019 का लोकसभा चुनाव हमें देता है

आशुचित्र-

  • नरेंद्र मोदी को सिर्फ भारत को चलाने का जनादेश नहीं मिला है अपितु यह एक ऐतिहासिक जनादेश है जो पूर्ण रूप से उनकी योग्यता पर मिली है।
  • ये हैं पाँच संदेश जो यह चुनाव हमें देता है।

46- यह मत प्रतिशत है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) को मिला है 2019 लोकसभा चुनावों में। 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपाः ने 2014 में 31 प्रतिशत मत जीते थे और इसके सहयोगियों ने 8 प्रतिशत, तब कहा गया था कि उन्हें मत प्रतिशत में बहुमत नहीं मिला है। भले ही यह तथ्य है कि 1984 से किसी पार्टी को 40 प्रतिशत से अधिक मत नहीं मिला है।

लगता है प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपने विरोधियों की इस शिकायत का समाधान किया है। 46 प्रतिशत एक ऐतिहासिक अंक है और इसकी महत्त तब और बढ़ जाती है जब यह पुनर्निर्वाचन के लिए हो। इस आँकड़े को केवल 1957 में नेहरू और 1984 में राजीव गांधी ही पार कर पाए हैं।

नेहरू ने कांग्रेस को 47.8 प्रतिशत से जीत दिलाई थी लेकिन तब में और अब में अंतर है- 1957 में कोई मज़बूत विपक्ष नहीं था। मोदी ने सबसे भ्रष्ट और उनके विरुद्ध नफरत फैलाने वाले विपक्षी अभियान का सामना किया। राजीव की जीत इंदिरा गांधी की हत्या के बात हुई थी जिसमें से अधिकांश मत सहानुभूति के नाम पर मिले थे।

स्वतंत्र भारत के विभिन्न चुनावों के मत प्रतिशत को देखें-

भारत में किसी भी पार्टी को 50 प्रतिशत मत नहीं मिले हैं। मोदी और शाह लगभग यहाँ तक पहुँचे हैं। अब किसी को इसकी शिकायत नहीं करनी चाहिए। एनडीए को विभिन्न राज्यों में ये मत प्रतिशत मिले हैं।

नरेंद्र मोदी को सिर्फ भारत को चलाने का जनादेश नहीं मिला है अपितु यह एक ऐतिहासिक जनादेश है जो पूर्ण रूप से उनकी योग्यता पर मिली है। 2019 में नरेंद्र मोदी भारत के सबसे बड़े राजनेता की तरह उभरे हैं। इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के ज़माने में सत्ता के पक्ष में इतना बड़ा मत दुर्लभ है। चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि ईवीएम के बाद से 90 प्रतिशत बाहर ऐसा हुआ है कि सत्ता पक्ष को बाहर का रास्ता देखना पड़ा। इतने अंतर से जीतना 2019 के जनादेश को विशेष बनाता है।

2019 के चुनावों से मुख्य संदेश

यह चुनाव हमें पाँच प्रमुख संदेश देता है।

पहला, यह संभव है कि विकास की बात करके चुनाव जीता जाए। हालाँकि चुनाव अभियान में मिले-जुले संदेश दिए गए लेकिन मोदी की हर रैली में गरीब समर्थक विकास की बात की गई। मीडिया ने भले ही इस बात को उतने उत्साह से कवर नहीं किया होगा जितना कि बालाकोट, राष्ट्रवाद और मोदी के मंदिर दर्शनों को किया।

हर चुनावी विश्लेषण में लभार्थी एक बहुत महत्त्वपूर्ण शब्द होता है और मोदी के जीवन-गुणवत्ता वर्धन योजनाएँ अपने कार्य में सफल रही हैं। मोदी के कुछ आलोचक पाँच वर्षों तक कहते रहे कि विकास बकवास था। आज उन्हें इस विकास गाथा का पुनर्वलोकन करना चाहिए।

दूसरा, एक आम भारतीय मतदाता भारत से प्यार करता है। सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रगति, विदेश नीति, सैन्य बल और आतंकवाद का सफाया, देश की ऐसी उपलब्धियाँ हैं जिन्होंने जनता को आकर्षित किया। सरकार ने इस बात का श्रेय लिया और इसमें कुछ गलत नहीं है। जब राकेश शर्मा ने ‘सारे जहां से से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा कहा था’ तब दूसरी ओर उपस्थित इंदिरा गांधी को भी उतना ही श्रेय मिला था। जब पोखरन-2 हुआ था तो श्रेय डॉ एपीजे अब्दुल कलाम और अटल बिहारी वाजपेयी को मिला था।

एक विपक्ष  जो कथित तौर पर भारत विरोधी तत्वों के साथ धरना पर बैठी और बालाकोट हमलों पर प्रश्न उठाया, वह उन राज्यों में स्थान नहीं बना सकती थी जहाँ प्रायः हुतात्माओं के शव आते रहे हैं। न ही भारतीय जनमानस में उन तथाकथित बुद्धिजीवियों को सम्मान की दृष्टि से देखता है जो कहते हैं कि पत्थरबाज़ों और आतंकवादियों के मानवाधिकार सेना से अधिक हैं। बहुत कम राजनीतिक टिप्पणीकार मानेंगे कि भारतीयों के लिए देशप्रेम सर्वोपरि नहीं है।

तीसरा, भारत में पहली बार चुनावों ने जातिवाद में कमी देखी गई। उत्तर प्रदेश में एक संगठित महागठबंधन ने भाजपा का समाना किया लेकिन परिणामों में दिखता है कि भाजपा सक्षम है। भाजपा ने राज्य में 62 सीटें जीती हैं जो कि 2014 के चुनावों से मात्र नौ सीटें कम है। इससे भी विशेष यह हुआ कि भाजपा को तगड़ा मत प्रतिशत मिला और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में भ यह कुछ सीटें जीतने में सक्षम हुई।

महाराष्ट्र में जहाँ मराठाओं की जनसंख्या 30 प्रतिशत और हरियाणा जहाँ जाटों की संख्या 30 प्रतिशत है- वे भाजपा-विरोधी माने जाते हैं लेकिन इन राज्यों में भाजपा ने 50 मत प्रतिशत पार कर लिया- कुछ ऐसा जो आज तक कोई राजनेता नहीं कर पाया। अपने विजय संबोधन में मोदी ने साफ रूप से कहा था, भारत में सिर्फ दो ही जातियाँ हैं- एक वह जो गरीब हैं और दूसरे वे जो उन्हें गरीबी से उबारने के लिए कार्य कर रहे हैं।

चौथा, भारतीय चुनाव भविष्य में भी विशेष नाम पर लड़े जाएँगे। विपक्षी यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि बिना किसी का नाम लिए वे एक सत्ताधारी को हरा सकते हैं, सिर्फ यह कहकर कि उसमें कुछ कमियाँ हैं। चुनौती देने वाले को स्थिति बदलने के लिए वह करना चाहिए जिसका कोी प्रभाव पड़े।

इनमें से कुछ नया नहीं है। राजीव गांधी की मृत्यु तक और जब अटल-आडवाणी की जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा आई, विजय के लिए एक नेता की भूमिका स्पष्ट रही। कम से कम बड़े नाम लोगों को पता होते हैं।  केवल यूनािटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) के समय नेता की महत्ता नहीं रही। इसके बाद से मीडिया में दावा किया जाने लगा कि भारतीय राजनीति में नेता का उतना महत्व नहीं है। सत्य से इससे ज़्यादा दूर और कुछ नहीं हो सकता।

नेता मायने रखते हैं, व्यक्तिगत नाम मायने रखते हैं- अगर ऐसा नहीं होता तो सरकारें पूर्व-निर्धारित एक्सल शीट से काम करतीं जिन्हें कोई थिंक टैंक संचालित करते।

पाँचवाँ और सबसे महत्त्वपूर्ण, भारत ने किसी परिवार की ‘प्राइवेट लिमिटेड’ राजनीति को नकारा है। अमेठी से राजीव गांधी के बेटे, दोझपुर से अशोक गहलोत के बेटे, गुना से माधवराव सिंधिया के बेटे, नानदेड से शंकरराव चव्हाण के बेटे, मावल से अजीत पवार के बेटे, मुंबई दक्षिण से मुरली देवड़ा के बेटे और मांड्या से एचडी कुमारस्वामी के बेटे हारे।

कांग्रेस के नौ पूर्व मुख्यमंत्री भी हारे। नाबम तुकी (अरुणाचल प्रदेश), शीली दीक्षित (दिल्ली), भूपेंद्र सिंह हुड्डा (हरियाणा), वीरप्पा मोइली (कर्नाटक), दिग्विजय सिंह (मध्य प्रदेश), अशोक चव्हाण (महाराष्ट्र), सुशील कुमार शिंदे (महाराष्ट्र), मुकुल संगमा (मेघालय) और हरीश रावत (उत्तराखंड) सभी अपने मज़बूत क्षेत्रों से हारे। महाराष्ट्र में यूपीए ने जहाँ नेताओं के बेटे-बेटियाों को खड़ा किया था, वहाँ इसे 16 हारें मिलीं।

भारतीय लोगो उन्हें लोगों की वहीं बातें सुनकर प्रभावित नहीं होंगे। विपक्ष को नए नाम तलाशने की ज़रूरत है जो भरोसेमंद भी हों और अपने परिवारों की मशाल लेकर न चल रहे हों। यह विपक्ष के लिए बड़ा काम लगता है।

भारतीय राजनीति की भाषा बदली है

2019 लोकसभा चुनावों ने भारतीय राजनीति की भाषा बदल दी है। विकास और समझौता न करने वाले राष्ट्रवाद से आए इस परिणाम को दिल्ली में चर्चा का केंद्र बनना चाहिए। विपक्ष को पहले मोदी का विरोध करने के लिए अच्छे कारण ढूँढने होंगे, फिर यह या तो भाजपा को एजेंडा के नाम पर घेरे या अलग जन कथात्मक (नैरेटिव) पर।

अब यह खेल नया है। नियम बदले हैं लेकिन विपक्ष का दृष्टिकोण नहीं। नरेंद्र मोदी को कमतर सिद्ध करना एक ऊँची चढ़ाई होगी।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति व समसामायिक मुद्दों पर लिखते हैं। वे @c_aashish के माध्यम से ट्वीट करते हैं।