राजनीति
भाजपा की हार- सरकार प्रदर्शन और चुनाव परिणाम के मध्य कमज़ोर होते संबंध

आशुचित्र-

  • शासन समर्थक मत, जिसने इन मुख्यमंत्रियों को इतने लंबे समय तक सिंहासन पर बैठाए रखा का अस्त हो गया।
  • तीन हिंदीभाषी राज्यों में भाजपा की हार इस बात की सूचक है।

जब राजनीतिक पंडित भारतीय जनता पार्टी के हिंदी गढ़ में तीन राज्य हारने की समीक्षा कर रहे हैं, अनुमान लगाया जा सकता है कि परंपरागत कारण संतोषजनक नहीं होंगे। हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि राजस्थान हमेशा भाजपा-कांग्रेस के मध्य बदलता रहता है, इसलिए वसुंधरा राजे का सत्ता से बाहर होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हम यह भी सारांश निकाल सकते हैं कि शिवराज सिंह चौहान और रमण सिंह दोनों लगभग 15 वर्षों से सत्ता में थे इसलिए मतदाता इस बार नए चेहरों को सत्ता में देखना चाहते थे।

फिर बात की जा सकती है “ग्रामीण संकट” की जो कि अलोकप्रिय छवि से काफी दूर रहे राज्य के नेताओं को अस्वीकार करने वाला एक सनकी फैसला ही लगता है। पर जब आप हाल ही के मध्य प्रदेश चुनाव नतीजों को देखेंगे, तो कांग्रेस ने 53 प्रतिशत ग्रामीण सीटें जीती हैं, जबकि दोनों पार्टियों ने शहरों में समान सम्मान साझा किया है।
यहाँ इस बात के स्पष्टीकरण की ज़रूरत है कि ग्रामीण आय वृद्धि को छोड़कर अधिकांश मोर्चों पर अपेक्षाकृत ठोस आर्थिक प्रदर्शन के होते हुए भी तीनों राज्यों ने परिवर्तन के लिए मतदान क्यों किया।
हरीश दामोदरन द इंडियन एक्सप्रेस  में लिखते हैं कि 2015-16 से निर्मित संपत्ति के मामले में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान- तीनों ही राज्यों का प्रदर्शन बेहतर रहा। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत निर्मित ग्रामीण आवासों में ही इन तीन राज्यों का हिस्सा पूरे देश का 27 प्रतिशत लेखाबद्ध किया गया। इन तीन राज्यों के कम से कम 250 की जनसंख्या वाले गाँवों की बिना पक्की सड़क वाली ग्रामीण बस्तियों की संख्या नरेंद्र मोदी के आगमन से पूर्व संपूर्ण की 50-60 प्रतिशत से घटकर 4-11 प्रतिशत जा पहुँची है। उज्ज्वला योजना सम्मिलित एलपीजी प्रवेश राजस्थान में 94 प्रतिशत एवं तीनों राज्यों में 70 प्रतिशत से ऊपर है। बिजली के अभाव वाले घरों की संख्या अब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगभग शून्य है तथा राजस्थान में 5 प्रतिशत से भी कम है। घरेलू शौचालयों की उपलब्धता तीनों राज्यों में 100 प्रतिशत है।
अन्य उपलब्धियों को मिलाकर एक ठोस आर्थिक प्रदर्शन देखने को मिलता है परंतु ऐसा लगता नहीं है कि ग्रामीण मतदाताओं पर इसका अधिक प्रभाव पड़ा हो। द राइज़ एंड फॉल ऑफ नेशन्स  के लेखक रुचिर शर्मा ने द टाइम्स ऑफ इंडिया  में पिछले वर्ष लिखा था कि भारत में “राजनीति और अर्थशास्त्र में कोई संबंध नहीं है” और “इस दशक में… मतदाता आर्थिक प्रदर्शन की चिंता किए बिना सत्ताधारियों को सत्ता से बेदखल करने के अपने स्वभाव की ओर लौट रहे हैं।”
दामोदरन संकेत करते हैं कि यदि मतदाता ग्रामीण संपत्ति के संदर्भ में मोदी सरकार के अच्छे प्रदर्शन के होते हुए भी सत्ताधारियों को सत्ता से बाहर करते हैं, तो इसका स्पष्टीकरण पिछली यूपीए सरकार के 5 वर्षों की तुलना में, 2014-15 से स्थिर रही ग्रामीण आय में खोजना चाहिए। यह स्थिरता एनडीए सरकार में खाद्य एवं अखाद्य थोक मूल्यों की धीमी वृद्धि (एनडीए सरकार में क्रमशः 2.75 प्रतिशत एवं 0.76 प्रतिशत जो कि यूपीए सरकार में मुद्रास्फीति के लिए समायोजन से पूर्व 12.26 एवं 11 प्रतिशत थी), और 5.2 प्रतिशत की सीधी ग्रामीण वेतन वृद्धि, जो कि 4.9 प्रतिशत की महंगाई दर से थोड़ी ही ऊपर है, में दिखाई देती है।
मान सकते हैं कि यह मोदी सरकार के पहले दो वर्षों में असामान्य मानसून तथा उसके बाद 2016-17 के अच्छे कृषि वर्ष, जो कि वर्ष के अंत में नोटबंदी के विघटन के कारण बेअसर हो गया था, का नतीजा था। इसने ग्रामीण तंगी को उस समय बिगाड़ दिया जब वह सुधार पर थी क्योंकि वर्ष 2017 में नकद की कमी हो गई थी। नोटबंदी को छोड़कर एनडीए का ग्रामीण रिकॉर्ड कहीं से भी राज्य के कार्य या उसकी निष्क्रियता का परिणाम नहीं था। अन्यथा ग्रामीण जनता तो प्राकृतिक व्यवधानों की आदी है।
दूसरी ओर विगत चार वर्षों में भाजपा और गैर-भाजपा सरकारों द्वारा कृषि क्षेत्र में 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक की कर्ज़माफी की गई, इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्यों में काफी वृद्धि हुई, और फसल बीमा योजना इससे बेहतर कभी नहीं रही। यह सब उन लाभों की तरह गिने जाने चाहिए जिन्होंने कम से कम आंशिक रूप से ही सही मगर ग्रामीण आय स्थिरता को पूरा किया।
आखिर फिर बदल क्या गया है? शायद इस खेल में एक और अतिरिक्त कारक है- बढ़ती आशाएँ। आज ग्रामीण आशाएँ शायद शहरों से कम नहीं हैं। वर्ल्ड बैंक का एक अध्ययन बताता है कि भारत की लगभग 55 प्रतिशत जनसंख्या की ज़रूरतें शहरों की तरह हैं। मूल रूप से जिसका अर्थ हुआ कि निवास क्षेत्र के 31 प्रतिशत से परे, जो कि औपचारिक रूप से शहरी नामित हैं, अतिरिक्त 24-25 प्रतिशत जनसंख्या अब शहरी क्षेत्रों की तरह रहती है। शहरी और ग्रामीण आशाओं में अंतर कम हो रहा है और 49 रुपए के मासिक डाटा प्लान के युग में, जो कि मनरेगा के दैनिक वेतन से भी कम है, मोबाइल इंटरनेट तक बढ़ती पहुँच शीघ्र ही ग्रामीण और शहरी आशाओं के इस नाम मात्र के अंतर को भी खत्म कर देगी।
राजनीति के लिए इसका अर्थ यह हुआ कि बेहतर प्रदर्शन होते हुए भी राजनेताओं के लिए मतदाताओं की निष्ठा बनाए रखना कठिन होगा। यह राहुल गांधी के लिए अच्छी खबर हो सकती है क्योंकि कोई फर्क नहीं पड़ता कि मोदी कैसा प्रदर्शन करें, मतदाताओं के बड़े खेमे में असंतोष की संभावना हमेशा रहेगी। सत्ता समर्थित वोट का युग, जिसने कई प्रदर्शन करने वाले मुख्यमंत्रियों को इतने समय तक सत्ता में बनाए रखा, खत्म हो सकता है। हिंदी गढ़ के तीन राज्यों में भाजपा की हार इस वास्तविकता की तरफ एक संकेत है।
जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।