राजनीति
भारतीय राजनीति में ‘नेहरूवादी सेक्युलरवाद’ का पराभव

हालिया कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति की मूलभूत मान्यताओं में कुछ बड़े परिवर्तन आए हैं। अनेक पुरानी मान्यताएँ ध्वस्त हुई हैं और उन मान्यताओं के पराभव के कारण नवीन समीकरण बने हैं। राजनीति के पुराने खिलाड़ियों को जनता की नब्ज़ पकड़ने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इन नई परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा पाने में असफल सिद्ध हो रहे कुछ पुराने नेता बड़ी तेज़ी से हाशिये पर जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेक्युलरवाद के साथ समाजवाद और सामाजिक न्याय के आधार पर राजनीतिक पूंजी कमाने वाले नेता और दल अपने प्रभाव क्षेत्र में काफी सिमट गए हैं। कम से कम उत्तर भारत में नई उभरती परिस्थितियों के असर को साफ़ महसूस किया जा सकता है। मुलायम सिंह यादव, ओम प्रकाश चौटाला, अजीत सिंह और कुछ हद तक मायावती भी सेक्युलरवाद और समाजवाद के आधार पर अपनी राजनीति चलाते रहे, लेकिन अब तीव्र ढलान की और चले गए हैं। कांग्रेस का पतन राजनीतिक मान्यताओं के परिवर्तन की ही देन है और कांग्रेस पार्टी अभी भी इन परिवर्तनों से सामंजस्य बना पाती नज़र नहीं आ रही है।

सेक्युलरवाद लंबे समय तक भारतीय राजनीति में एक अनिवार्य शर्त के रूप में मौजूद रहा है। सेक्युलरवाद ‘नेहरूवियन कंसेन्सस’ (नेहरूवाद सहमत) का केंद्रीय हिस्सा था। 1990 के दशक में उभरी सामाजिक न्याय की राजनीति में भी सेक्युलरवाद को विशेष जगह मिली। सामाजिक न्याय की राजनीति का चेहरा बन कर उभरे लालू यादव और मुलायम सिंह यादव ने क्रमशः लाल कृष्ण अडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार करवा कर और अयोध्या में करसेवकों पर गोली चलवा कर अपने सेक्युलर होने के पुख्ता ‘सबूत’ दे दिए थे। सेक्युलर होना या न होना, वोट माँगने से लेकर गठबंधन करने के योग्य होने की कसौटी के रूप में माना गया। राजनीति ऐसे उदाहरणों से पटी हुई है जिसमें सेक्युलरवाद के बहाने से गठबंधन तोड़े गए हैं और बनाए गए हैं। 1980 में जनता पार्टी की टूट से लेकर अब तक अनेक बार सेक्युलरवाद की दुहाई देकर समर्थन देने और वापस लेने का खेल चला है। हम ऐसा नहीं कह सकते कि सेक्युलरवाद हमेशा एक बहाना ही रहा है, लेकिन कुछ मौकों को छोड़ दें तो सेक्युलरवाद को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का ही एक दूसरा नाम समझा जाता रहा है। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण भारतीय राजनीति में एक वास्तविकता के रूप में हमेशा से विद्यमान रहा है। लेकिन भारत के ‘नागरिक समाज’ ने राजनीति में इस तत्व की उपस्थिति को स्वीकार करने में खासी हिचकिचाहट दिखाई है। ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ (राजनीतिक शुद्धता) होने की मजबूरी के चलते सेक्युलरवाद के अंदर दोहरे मापदंडों को मज़बूत होने दिया गया।

सेक्युलरवाद के दोहरे मापदंडों से परेशान होकर जनमानस में इसके विरुद्ध एक प्रतिरोधी ग्रंथि विकसित हुई, जिसका नतीजा यह हुआ की सेक्युलरवाद का अर्थ नकारात्मक रूप से लिया जाने लगा। जो राजनीतिक दल सेक्युलरवाद की कसमें खाते नहीं थकते थे और इसे अपनी राजनीति का मुख्य आधार मानते थे, वे भी अब यदा-कदा ही इसका नाम लेते हैं। सेक्युलरवाद को लेकर सामाजिक सोच में जो परिवर्तन हुए हैं, उसको समझने के लिए हम बिहार की राजनीति से उदहारण ले सकते हैं। जून 2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपनी लोकसभा चुनावों की केंद्रीय प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया और इस बात के स्पष्ट संकेत दिए कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। गुजरात दंगों को लेकर लगे आरोपों के चलते मोदी को सेक्युलरवाद की कसौटी पर खरा नहीं माना जाता था। जनता दल (यू) के नीतीश कुमार सेक्युलरवाद के अनुयायियों में गिने जाते थे, अतः उन्होंने मोदी को अपना नेता मान कर सेक्युलरवाद की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कर चुकी भाजपा से गठबंधन तोड़ कर किनारा कर लिया। लेकिन आज की तारीख में ‘सेक्युलर’ शब्द के मायने बदल चुके हैं। आज नीतीश कुमार को भाजपा से गठबंधन करने के लिए सेक्युलर होने या न होने का प्रश्न बाधा नहीं है। 2017 में मोदी और उनसे भी अधिक कट्टर माने जाने वाले अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा से नीतीश कुमार ने तत्परता से गठबंधन कर लिया। इसके लिए उन्होंने न सिर्फ लालू यादव के साथ किए गए चुनाव-पूर्व गठबंधन को तोड़ा बल्कि अपनी पार्टी के वरिष्ठतम नेता शरद यादव को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया।

‘सेक्युलरवाद’ के अर्थ को गहरा आघात तब भी लगा था जब राजनीतिक वर्णक्रम के विपरीत छोरों पर स्थित मानी जाने वाली, ‘राष्ट्रवादी’ भाजपा का अलगाववादियों के साथ हमदर्दी दिखाने वाली पीडीपी के साथ जम्मू-कश्मीर में गठबंधन हो गया था। सेक्युलरवाद की वह दीवार जो राजनीति में तीव्र विभाजन करती थी, वह दीवार इस गठबंधन से ध्वस्त हो गई। सबसे अधिक लाभ भाजपा को हुआ क्योंकि वह अब राजनीतिक ‘अछूत’ न होकर हमेशा के लिए बराबर की खिलाड़ी बन गई। सेक्युलरवाद का पटाक्षेप गुजरात चुनाव 2017 में देखने के लिए मिला। 2002 के गुजरात दंगे भाजपा के खिलाफ कांग्रेस का सबसे बड़ा मुद्दा थे। 2002 के बाद हुए हर चुनाव में कांग्रेस ने गुजरात दंगों में भाजपा के नेताओं की कथित संलिप्तता को मुद्दा बनाया है। लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि पिछले  गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने दंगों को मुद्दा बनाने से परहेज किया था। कांग्रेस की रणनीति में उसका परंपरागत अस्त्र यानि कि गुजरात दंगो के जिक्र का शुमार न होना यह बताता है कि कांग्रेस अब अपनी छवि पर बोझ बन चुके सेक्युलरवाद को ढोकर अपनी साख पर बट्टा नहीं लगाना चाहती।

पिछले साल की तरह इस साल हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सांप्रदायिकता और सेक्युलरवाद का मुद्दा नहीं छेड़ा। उल्टा कांग्रेस के अध्यक्ष अलग-अलग मंदिरों में दर्शन करते हुए देखे गए। पिछले वर्ष जब राहुल गांधी की सोमनाथ मंदिर की यात्रा से उनके मज़हब को लेकर उठे विवाद के बाद कांग्रेस ने राहुल गांधी को जनेऊधारी हिंदू बताया था, तब विश्लेषकों ने कांग्रेस के इस कदम को दो नज़रियों से पढ़ा। कुछ विश्लेषकों के अनुसार गुजरात चुनावों में कांग्रेस मुस्लिम मतों के अपने पक्ष में आने को लेकर आश्वस्त होने के कारण, कांग्रेस इस बहाने से अपनी हिंदू -विरोधी छवि को मिटाना चाहती थी। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस की आतंरिक रिपोर्ट (एके एंटनी रिपोर्ट) में यह बताया गया था कि पार्टी की मुस्लिम-परस्त व हिंदू -विरोधी छवि के कारण ही उसकी हार हुई। कुछ अन्य विश्लेषकों का यह मानना था कि सेक्युलरवाद की आड़ में हुई मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के प्रतिक्रिया स्वरुप हिंदू मतों का ध्रुवीकरण हुआ है। यानि की ‘मुस्लिम वोट-बैंक’ की तर्ज़ पर एक सामानांतर हिंदू वोट-बैंक भी अस्तित्व में आने लगा है। ऐसे में कांग्रेस नहीं चाहेगी कि इस वोट-बैंक में उसका हिस्सा न हो, अतः उसके लिए ‘सॉफ्ट हिंदू कार्ड’ है। राहुल गांधी का मंदिरों में जाने का दौर पहले से तेज़ होता जा रहा है। हाल ही हुए पाँच राज्यों के चुनाव में राहुल गांधी मध्य प्रदेश और राजस्थान में मंदिरों की यात्रा करते हुए देखे गए। कांग्रेस अध्यक्ष का ऐसा करना एक प्रकार से भाजपा की वैचारिक जीत है। साथ ही यह चेतावनी भी कि कांग्रेस अब भाजपा को उसके वैचारिक धरातल पर चुनौती देना चाहती है।

इस बार राजस्थान में चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने एक जगह स्वयं को दत्तात्रेय गोत्र का ब्राह्मण बताया तथा प्रधानमंत्री मोदी को हिंदू का अर्थ सिखाने का इच्छा प्रकट की। कांग्रेस को अब यह बिल्कुल ठीक से समझ में आ गया है कि सेक्युलरवाद एक राजनीतिक मुद्रा के रूप में प्रचलन से बाहर जा चुका है।

बहरहाल, कांग्रेस की रणनीति का लक्ष्य चाहे कुछ भी हो लेकिन इतना तो तय है कि राष्ट्रीय राजनीति में तुष्टिकरण को पुनः स्थापित कर पाना संभव नहीं होगा। ऐसा करने का प्रयास करने वाले दल को साख और वोट दोनों से हाथ धोना पड़ सकता है। हालाँकि, कुछ राज्यों में तुष्टिकरण की राजनीति अभी भी चल रही है। बंगाल, तेलंगाना और कर्नाटक आदि राज्यों की सरकारों पर मज़हबी भेदभाव और मुस्लिम-परस्त राजनीति करने का आरोप लग रहा है। खासकर बंगाल जो कि आक्रामक नेत्री ममता बनर्जी के दल द्वारा शासित है, अपने तेज़ी से बदलते जन्सांख्यिकी चरित्र के कारण संवेदनशील राज्य बनता जा रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश जैसा राज्य भी है जहाँ के मुख्यमंत्री के अनुसार सेक्युलरवाद एक मिथ्य-अवधारणा है और आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा झूठ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सेक्युलरवाद के विरुद्ध खुल कर बोलते हैं और इसे पक्षपाती बताते हैं। अगर देखा जाए तो एक भगवाधारी योगी का मुख्यामंत्री बनना अपने आप में सेक्युलरवाद की नेहरूवादी अवधारणा पर एक और चोट है।

1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के दौर में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों और विचारकों ने नेहरूवादी सेक्युलरवाद को राजनितिक और वैचारिक तौर पर चुनौती दी थी। अकादमिक जगत में भी आशीष नंदी और टी.एन.मदान जैसे विद्वानों ने नेहरूवादी सेक्युलरवाद की आलोचना की थी। सेक्युलरवाद पर उस दौर में जो बहस छिड़ी थी उसका एक निर्णायक समापन 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणामों से हुआ। भारतीय राजनीति में ‘सेक्युलरवाद’ ने जिस गति से सामाजिक वैधता खोई है, यह राजनीति में परिवर्तनों की तीव्रता का सूचक है। परिवर्तन के इस संक्रमण काल में आशाएँ भी बंध रही है और चिंता की लकीरें भी खिंच रही हैं। ‘सेक्युलरवाद ’ का जो स्वरुप जवाहरलाल नेहरू के समय से लेकर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के समय तक थोड़े बहुत अंतर के साथ मुख्यधारा में बना रहा, वह आज सिमट क़र कुछ राज्यों में अपने अत्यधिक विकृत रूप में प्रयोग हो रहा है। इस बात की कोई संभावना नहीं दिखती कि वह पुनः मुख्यधारा में स्थापित हो सके।

यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है।