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सबरीमाला निर्णय से प्रेरित होकर दायर की गई याचिका- सभी धर्मों से हटाई जाएँ भेदभावपूर्ण परंपराएँ

सबरीमाला मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, जिससे सभी आयुवर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिल गई, के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है जो अन्य धर्मों की भेदभावपूर्ण परंपरा मिटाने का अनुरोध करती, बार एंड बेंच  ने रिपोर्ट किया।

न्यूमैक्स बेनेवॉलेंट फाउंडेशन नामक एन.जी.ओ. के निदेशक संजीव कुमार ने इस्लाम, ईसाई, पारसी, आदि धर्मों में महिलाओं के साथ असमान व्यवहार को खत्म करने के लिए याचिका दर्ज की है। निम्नलिखित परंपराओं को यह याचिका चुनौती देती है-

  • पारसियों के जोरास्ट्रियन फायर टेम्पल और टेम्पल ऑफ़ साइलेंस में महिलाओं का प्रवेश निषेध है।
  • मस्जिदों में पुरुषों के साथ महिलाएँ प्रार्थना नहीं कर सकती।
  • केवल स्त्रियों के लिए बनाए गए हिंदू मंदिर जहाँ पुरुषों का प्रवेश निषेध है जैसे अट्टुकल मंदिर, चक्कूलाथुकवु मंदिर, संतोषी माँ व्रत, ब्रह्मा मंदिर, भगवती माँ मंदिर, माता मंदिर और कामरूप कामख्या मंदिर।
  • पारसी और ईसाई धर्मों में महिला के पुजारी बनने पर बाध्यता।
  • हिंदू महिलाओं को पुजारी, पुरोहित और अखाड़ा मुखिया की उपाधि मिलने पर बाध्यता।
  • मुस्लिम महिलाओं का इममाम बनकर नमाज़ पढ़वाने पर बाध्यता।
  • मासिक धर्म के दौरान घर के सभी कक्ष व पूजा घर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध।

अपने केस को आगे रखते हुए याचिकाकर्ता ने वाक्पटुता से “असमानता विरोधी” सबरीमाला निर्णय को उल्लेखित किया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकन पर भी प्रकाश डाला जिसमें यह कहा गया था कि सभी धार्मिक परंपराएँ संविधान के अधीन हैं।