राजनीति
इंसेफ्लाइटिस के अभिशाप से योगी की नीति, नीयत व नियोजन से मुक्त हो रहा उत्तर प्रदेश

‘जापानी इंसेफ्लाइटिस’- यह शब्द सुनते ही आँखों के सामने अस्पतालों में दम तोड़ते मासूम, बदहवासी की हद तक रोते-बिलखते माता-पिता, सरकारों की संवेदनहीनता और अस्पतालों की दुर्व्यवस्था की तस्वीरें सहसा ही उभर आती हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वी अंचल के ऐसे ही हृदय विदारक दृश्यों से हर साल जुलाई-अगस्त में अखबार पटे पड़े रहते थे।

चमकी बुखार यानी जापानी इंसेफ्लाइटिस (जेई) उत्तर प्रदेश के गोरखपुर सहित करीब 38 जिलों के लिए किसी भयावह आपदा से कम नहीं था। सरकारें आती-जाती रहीं, बच्चे मरते रहे, नेताओं के दौरे भी खूब हुए, लेकिन न अस्पतालों की सूरत बदली, न इस जानलेवा बीमारी का दंश कम हुआ।

पर, यह दर्द अब मंद हो चला है, पीड़ा अब कम हो गई है। कभी ‘बच्चों की कब्रगाह’ की संज्ञा से प्रचारित गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के परिसर में अब अपने लाडले की लाश पर सिर पीटते अभिभावकों का करुण क्रंदन नहीं होता। अगर कहें कि उत्तर प्रदेश इंसेफ्लाइटिस के दंश से मुक्त हो गया है, तो कतई गलत न होगा।

ताजा रिकॉर्ड के मुताबिक वर्तमान वर्ष में केवल 19 मामले सामने आए हैं। यह कोई चमत्कार नहीं है न ही कोई दैवीय कृपा। संतोष और सुकून देने वाले इस बदलाव के पीछे योगी आदित्यनाथ का संघर्ष है, उनकी  साधना है। इस महामारी को खत्म करने की जिजीविषा ही वह कारक है, जिसने पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार की सहस्रों माँओं के चेहरे पर सुकून के भाव लाए हैं।

वर्ष 1997-98 के आस-पास योगी आदित्यनाथ ने इस जानलेवा बीमारी के समूल नाश का जो संकल्प लिया है, आज वह पूर्ण हो रहा है। सांसद रहते हुए योगी ने इंसेफ्लाइटिस के खात्मे के लिए सड़क से लेकर संसद तक जो संघर्ष किया है, वह किसी व्रत या साधना से कम नहीं। वर्ष 2017 में प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का दायित्य संभालने के बाद से योगी ने नीतिपरक विधि से इंसेफ्लाइटिस के नाश के लिए कार्य किया।

नतीजा यह है कि जिस बीमारी से 1977-78 से लेकर 2016 तक हर वर्ष महज तीन से चार महीने में से 500 से 1500 बच्चों की मौत होती थी, 2019 में 20 अगस्त तक 04 लोगों की मृत्यु हुई थी, जबकि वर्तमान वर्ष में इस अवधि तक केवल 02 लोगों की मृत्यु हुई है। साल 2005 में इस बीमारी का सबसे भयानक कहर पूर्वांचल ने झेला है। उस साल बीआरडी मेडिकल कॉलेज में साढ़े तीन हजार से ज्यादा मरीज भर्ती हुए इनमें 937 की मौत हो गई।

यह सब कुछ योगी आदित्यनाथ ने देखा है। शायद यही वजह रही कि सूबे की कमान संभालने के तत्काल बाद योगी ने इंसेफ्लाइटिस के खिलाफ एक तरह से जंग-सी छेड़ दी। 2017 में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन कांड के बाद से इंसेफ्लाइटिस के खिलाफ पूरे पूर्वांचल में निर्णायक लड़ाई लड़ी जा रही है, जो गाँव में सफाई, बीमारी के बारे में लक्षण पहचान की जागरूकता, स्वच्छ पीने के पानी से लेकर घर-घर शौचालय और मच्छरदानी के प्रयोग को लेकर है।

फरवरी 2018 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में फैले जापानी इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम और उपचार के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए ‘दस्तक’ अभियान की शुरूआत की। यह अभियान इसलिए चलाया गया, ताकि लोगों को किसी भी तरह से होने वाले बुखार व अन्य बीमारी में लापरवाही न कर सकें।

इस अभियान के अंतर्गत जिला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारियों को दो दिवसीय प्रशिक्षण के साथ ही प्रदेश के पाँच साल से कम उम्र के सभी बच्चों की खून की कमी की जाँच, छह माह से पाँच वर्ष तक के गंभीर कुपोषित बच्चों की पहचान और नौ माह से पाँच वर्ष तक के बच्चों को विटामिन ‘ए’ का घोल दिया गया।

अभियान के तहत बच्चों को दस्त रोग, निमोनिया, और जन्मजात बीमारियों से पीड़ित बच्चों की पहचान कर उन्हें निःशुल्क जाँच एवं उपचार तथा परिवहन सुविधाएँ प्रदान की गईं। स्वास्थ्य, ग्राम्य विकास व बेसिक शिक्षा एक साथ मिलकर  कार्य करते हुए उपचार और बचाव के गुर बताए। राज्य के 38 प्रभावित जिलों में रेडियो, टीवी एवं समाचार-पत्रों के माध्यम से जापानी इन्फेलाइटिस बिमारी के बारे में जागरूकता फैलाई गई।

पूर्वांचल में 40 लाख बच्चों का टीकाकरण हुआ। घर-घर जाकर दस्तक अभियान की शुरुआत हुई। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बेड की संख्या बढ़ी। इंसेफ्लाइटिस के इलाज के लिए पर्याप्त मात्रा में वॉर्मर उपलब्ध कराए गए। आज अगर मरीज कम हुए हैं इसकी सबसे बड़ी वजह जागरूकता है, पूरे पूर्वांचल में जापानी बुखार के खिलाफ लगभग 90 फीसदी टीकाकरण पूरा हो चुका है, साथ ही, लोगों को साफ सफाई की जानकारी भी है।

कभी बीआरडी मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में 15 जून तक मरीजों की भरमार हो जाती थी और बरसात की शुरुआत के साथ ही इन्सेफेलाइटिस या जापानी बुखार अपने चरम पर होता था, लेकिन आज सूरत बदल चुकी है। जिन परिवारों ने अपने बच्चों को इस बीमारी से खोया है वह भी मानते हैं कि हालात काफी सुधर चुके हैं।

पूर्वांचल में मासूमों को शिकार बनाने वाली जो इन्सेफेलाइटिस चार दशक से कहर बरपा रही थी, बीते दो साल में साफ-सफाई पर ज़ोर और उपचार के संसाधन बढ़ाकर बीमारी पर निर्णायक काबू पा लिया गया है। कभी बीआरडी मेडिकल कॉलेज में एक एक बेड पर कई-कई बच्चे जानलेवा इंसेफ्लाइटिस से जूझते दिखाई देते थे, पर अब हालात बदल चुके हैं। बीआरडी कॉलेज में सुविधाएँ इतनी बढ़ाई गई हैं कि अब कई बेड खाली है क्योंकि मरीजों से ज्यादा सुविधाएँ हैं।

आज अगर उत्तर प्रदेश इंसेफ्लाइटिस से मुक्ति पर हर्षित है, तो इसका श्रेय योगी आदित्यनाथ की साफ नीयत, दूरदर्शी नीति और सटीक नियोजन को दिया जाना चाहिए। कोरोना की विभीषिका के बीच भी योगी ने जुलाई की शुरुआत होते ही जेई/एईएस से बचाव की तैयारी शुरू कर दी थी।

योगी ने अपने अधिकारियों से साफ तौर पर कहा है कि इंसेफ्लाइटिस, एईएस तथा अन्य संचारी व विषाणुजनित रोगों के दृष्टिगत किसी भी प्रकार की लापरवाही या शिथिलता स्वीकार्य नहीं होगी। योगी की प्रतिबद्धता और सक्रियता से वह दिन दूर नहीं कि खुद को इंसेफ्लाइटिस से पूर्णतः मुक्त राज्य घोषित कर देगा।

महेंद्र कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं और वर्तमान में दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक आचार्य हैं। क्षितिज पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं।