राजनीति
रोजगार के वादे को उत्तर प्रदेश में कैसे पूरा कर रही है योगी सरकार, आँकड़ों से समझें

रोजगार और सेवायोजन, कमोबेश, स्वातंत्रयोत्तर भारत के हर कालखंड में एक अहम मुद्दा रहा है। पर अफसोस, इस बात का है कि कभी भी किसी राजनीतिक दल ने इस संबंध में युवाओं का दर्द नहीं समझा। पुराने इतिहास की कड़वी यादों को छोड़ दें तो नई सदी में भी यह कभी सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रहा।

उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में बात करें हर चुनाव में रोजगार एक अहम मुद्दा हुआ करता है। वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव भी इससे अछूता नहीं था। लेकिन उत्तर प्रदेश के युवाओं के रोजगार के सपने धरातल पर उतरते प्रतीत हो रहे हैं। अगर आधिकारिक आँकड़ों पर ध्यान दें तो पता चलता है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उत्तर प्रदेश में जितनी नौकरियाँ दी है, वह पिछली सपा-बसपा सरकारों की तुलना में बहुत अधिक हैं।

साल 2012 से 2017 के बीच अपने पाँच साल के कार्यकाल में समाजवादी पार्टी ने कुल 2.05 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दे सकी थी, तो बहुजन समाज पार्टी ने 2007 से 2012 के बीच मात्र 91,000 पदों पर नियुक्तियाँ की थीं। इसके सापेक्ष योगी सरकार ने सिर्फ साढ़े तीन साल में ही 3.6 लाख युवाओं के सरकारी नौकरी के सपने को पूरा कर दिया है।

योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालते ही अपनी प्रमुख प्राथमिकता प्रदेश में कानून व्यवस्था को वापस पटरी पर लाने की घोषणा की थी। संभवतः इसी प्रतिबद्धता का परिणाम है कि इन 3.6 लाख नौकरियों में से सबसे ज्यादा नियुक्तियाँ पुलिस विभाग में हुई हैं। सरकारी आँकड़ों के हवाले से कहें तो मार्च 2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की कमान संभाली, तब से अब तक अकेले पुलिस विभाग में 1,37,253 युवाओं को स्थाई नौकरी मिली।

इसके अलावा, बेसिक शिक्षा विभाग में 69,000 पदों पर, पुलिस विभाग में 16,629 पदों और ऊर्जा विभाग में 853 पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी है। इस प्रकार अभी कुल 86,482 पदों की चयन प्रक्रियाओं से जुड़े अभ्यर्थियों की आस भी शीघ्र पूरी हो जाएगी। योगी सरकार ने प्रदेश के सभी विभागों में वर्षों से खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी की है।

नव-नियुक्त शिक्षकों को संबोधित करते योगी

यूपी सरकार में 3 लाख से अधिक पदों पर हुई इन नियुक्तियों की सबसे बड़ी विशेषता रही, इनकी शुचितापूर्ण पारदर्शी प्रक्रिया। उत्तर प्रदेश में नौकरियों के लिए विज्ञापन जारी होने की सुगबुगाहट के साथ ही ‘जुगाड़ और रेट’ तय हो जाने की कहानियाँ आम हुआ करती थीं, लेकिन बीते साढ़े तीन साल में किसी भी भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और परंपरागत ‘जुगाड़ तंत्र’ की शिकायतें नहीं आईं। इक्का-दुक्का अवसरों पर अगर नौकरी दिलाने के नाम पर भ्रष्ट आचरण की बात सामने आई तो उस पर सरकार की त्वरित और सख्त कार्रवाई भी सुनिश्चित हुई है।

हाल ही में, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए सभी विभागों में अद्यतन खाली पदों का विवरण तलब कर लिया। यही नहीं, प्रदेश के सभी भर्ती आयोगों के प्रमुखों की विशेष बैठक कर साफ आदेश दिया कि इन पदों पर चयन की प्रक्रिया तीन माह में शुरू कर दिया जाए।

योगी आदित्यनाथ ने कहा, “चयन प्रक्रिया में शुचिता और पारदर्शिता हमारी नीति है और इसे प्रत्येक दशा में सुनिश्चित किया जाएगा। हमारे युवा साथियों में प्रतिभा है, क्षमता है, मेधा है। वर्तमान प्रदेश सरकार सभी को बिना भेदभाव के समान अवसर उपलब्ध करा रही है। सभी विभागों में रिक्त पदों पर चयन की प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ होंगी। हमारा प्रयास है कि आगामी छह माह में सभी विभागों में चयन प्रक्रिया को संपन्न करा लिया जाए।”

ऐसे मुश्किल दौर में, जबकि कोविड-19 महामारी के कारण, दुनिया की अर्थव्यवस्था भारी मंदी से गुजर रही हो, निजी क्षेत्र की तमाम बड़ी-बड़ी कम्पनियों, संस्थाओं में ‘कॉस्ट कटिंग’ का अभियान चल रहा हो, दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे ‘संपन्न’ राज्यों में डॉक्टरों तक को वेतन देने के लाले पड़े हों, खुद उत्तर प्रदेश के राजस्व संग्रह में कमी आई हो, सरकारी नौकरियों की घोषणा करना, बड़े साहस और हौसले का ही प्रमाण है।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि, सरकारी नौकरियों की घोषणा करना जितना सहज है, चयन प्रक्रिया को पूरा कर लेना, उतना ही दुष्कर। यह चुनौती उत्तर प्रदेश सरकार के सामने भी है। लेकिन जिस तरह तमाम अड़चनों के बावजूद योगी सरकार के साढ़े तीन साल में 3 लाख से ज्यादा भर्तियाँ पूरी हुई है यह युवाओं में विश्वास पैदा करती हैं। नैतिक पटल पर पहले से ही दम तोड़ चुके सपा और बसपा जैसे दलों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं है। हालाँकि मुद्दाविहीन विपक्ष के कुछ नेतागण आये दिन छिटपुट टिप्पणियाँ करते रहते हैं।

देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में संसाधनों के अकाल के बीच कोरोना कालखंड में योगी ने पीड़ित मानवता की जिस तरह सेवा की है, उसने पूरे देश को चकित किया है और उन्हें खूब सराहा भी गया। योगी सरकार ने कोविड-19 के दौरान, लोगों को निजी क्षेत्र में रोजगार पैदा करने की कोशिश की है।

कोविड से लड़ने के लिए ऑक्सीजन संयंत्र का उद्घाटन करते मुख्यमंत्री

सिर्फ शिक्षित और कुशल युवाओं को ही नहीं बल्कि अशिक्षित, अकुशल मजदूरों कामगारों को भी इस मुश्किल घड़ी में रोजगार के अवसर देने का प्रयास कर रही है। और इसमें अहम भूमिका निभाने वाली छोटे और मझोले उपक्रमों को हर संभव मदद कर रही है चाहे वो आसान शर्तो पर ऋण की व्यवस्था हो या फिर व्यापार करने की सुलभता।

प्रदेश में केवल एमएसएमई के तहत 8,18,114 इकाइयों में 51.78 लाख श्रमिक कार्यरत हैं। ‘आत्मनिर्भर पैकेज’ के तहत 4.32 लाख इकाइयों को 10,437 करोड़ रुपए का ऋण स्वीकृत कर वितरण किया गया। आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश रोजगार/स्वरोजगार सृजन अभियान के तहत 3.72 लाख नई एमएसएमई इकाइयों को 13,383 करोड़ रुपए का ऋण स्वीकृत किया गया।

मनरेगा के तहत अब तक 95.87 लाख व्यक्तियों को रोजगार देते हुए 23.75 करोड़ मानव दिवस का सृजन करते हुए 4,874.67 करोड़ रुपए के मानदेय का भुगतान किया गया, जो देश में सर्वाधिक है। यही नहीं, गरीब कल्याण रोजगार अभियान के तहत 22 सितम्बर तक 6.45 करोड़ मानव दिवस भी सृजित किए गए हैं।

भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद की प्राथमिकताओं में उलझे उत्तर प्रदेश में इतना सब कुछ हो पाना कल्पनातीत था। लेकिन अब यह वास्तविकता है। पुनः सरकारी नौकरियों में भर्ती की घोषणा कर योगी सरकार ने युवाओं को एक उम्मीद दी है। इस बात की उम्मीद न करने का फिलहाल कोई कारण नहीं दिखता।

महेंद्र कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं और वर्तमान में दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक आचार्य हैं। क्षितिज पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं।