राजनीति
चुनाव 2019 – चुनाव का समय निकट आते ही नज़र आने लगे हैं फर्जी खबरों के सौदागर

प्रसंग
  • शायद, एक नीची जाति के चाय बेचने वाले, जो शून्य से शिखर तक पहुँचे हैं, की जमीन से जुड़ी कहानी को नीचा दिखाने के बजाय अनुचरों के लिए यह बेहतर होता यदि उन्होंने अपने प्रिय राजवंश की अत्यधिक संदिग्ध वंशावली का आत्म-निरीक्षण किया होता।

अब चूँकि 2019 का चुनाव बिलकुल हमारे सर पर आ गया है, अनियमित समीक्षकों के लिए काफी मनोरंजन उपलब्ध है। इनका एक उदहारण हैं, सिलिकन वैली से आये जैक डॉर्सी, जिन्होंने ट्विटर की स्थापना की थी। डॉर्सी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के साथ एक सौहार्दपूर्ण मूड में देखा गया था, लेकिन जब उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ औपचारिक मुलाकात की तो उनकी बॉडी लैंग्वेज बता रही थी कि वह अहंकार और घृणा से भरे हुए थे, वह कुर्सी पर पीछे की तरफ बढ़कर बैठे थे और उनका बायां पैर मुड़ा हुआ उनके दाएं पैर के घुटने पर था।

फिर डॉर्सी को महिलाओं के एक समूह के साथ पाया गया, उनमें से कुछ को एक विद्रोही एजेंडे और विदेशी सहानुभूति तथा वित्त पोषण स्रोतों के साथ भीड़ को भड़काने वालों के रूप में जाना जाता है। उनमें भारत को तोड़ने का सपना रखने वाले कुछ नए वामपंथी चेहरे भी शामिल थे। वह (डॉर्सी) एक पोस्टर दिखा रहे थे जिसपर यह भड़काऊ नारा लिखा था – “Smash Brahminical Patriarchy!” जिसका मतलब है ब्राह्मणों का दबदबा ख़त्म करो। यह “संवैधानिक नैतिकता” जैसा एक और नवशब्द होना चाहिए जो कि “हिंदुत्व को खत्म करने” के लिए “धर्मनिरपेक्षता” और अन्य व्यंजनाओं में शामिल होने के लिए तैयार है।

यह डॉर्सी के लिए एक गंभीर गलती थी – और इससे खुद उनके ट्विटर प्लेटफॉर्म पर हंगामा खड़ा हो गया। इसने उनको लोगों के समूह की भावनाओं को चोट पहुँचाने और सांप्रदायिक सद्भावना को आघात पहुँचाने के लिए भारतीय दंड संहिता की कठोर धाराओं 295ए और 153ए के तहत परीक्षण के लिए खड़े होने के लिए भारत आने को मजबूर कर दिया। ये बड़े आरोप हैं और अनभिज्ञ लोगों को खुद को ऐसी परिस्थितियों से बचाकर रखना चाहिए नहीं तो उन्हें अपना काफी लंबा समय भारत की जेलों में बिताना पड़ सकता है।

लेकिन साथ ही इसके और भयावह प्रभाव भी हैं। हम सभी इसके बारे में तो जानते ही हैं कि फेसबुक और कैम्ब्रिज एनालिटिका ने अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने के इरादे से किस तरह से अवैध रूप से निजी डेटा का अधिग्रहण और कुशलतापूर्वक उसका उपयोग किया था। क्या अब हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि कांग्रेस और वामपंथी प्रकार के गठबंधन ने 2019 के भारतीय चुनावों में ऐसा ही करने के लिए डॉर्सी और ट्विटर को काम पर रखा है? भारत में ट्विटर के कार्यों पर बहुत ही बारीकी से नजर रखी जानी चाहिए।

ट्विटर इंडिया के खिलाफ पक्षपात और भेदभाव के पहले से ही कई आरोप हैं। एक बात साफ है कि इसने वामपंथियों को लगातार नियोजित किया है और साथ ही कम से कम एक अलगाववादी को। इसने गैर-वामपंथी ट्विटर यूज़र्स को ब्लॉक करने की आदत बना ली है क्योंकि एकसमान अपराधों के लिए यह वामपंथियों के बजाय गैर-वामपंथियों के साथ ज्यादा कठोर तरीके से पेश आता है। उनका पक्षपात तो साफ तौर पर जाहिर है, इसलिए यह संभावना है कि वे मोदी के खिलाफ छलपूर्ण विपक्षी मोर्चे में भागीदार बनेंगे।

ट्विटर द्वारा किए जाने वाले अपराधों की खबर होते हुए भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नरमी ने उनको प्रोत्साहित किया है। साहस की कमी के अलावा मुझे कोई और ऐसी वजह तो नहीं दिखाई देती है जिसकी वजह से भारत में ट्विटर का लाइसेंस अस्थाई रूप से रद्द न किया जाए, जब तक कि यह मृदु न हो जाए और अपना काम जिम्मेदारी से न करने लगे। दूसरी ओर, फायरवॉल का उपयोग करना और सभी नेटवर्क सेवा प्रदाताओं को ट्विटर का ट्रैफिक छोड़ने के लिए निर्देशित करने में कठिनाई नहीं होगी। दूसरी ओर, मुझे यकीन है कि ट्विटर ने भारत में सोशल मीडिया साइट की हैसियत से लाइसेंस हासिल किया था, लेकिन अब वे एक न्यूज़ साइट के रूप में कार्य कर रहे हैं, जो बिना किसी सूचना के अपना उद्देश्य बदलने के कारण उन पर शिकंजा कसने की पर्याप्त वजह है। इन दोनों कामों से कुचेष्टा करने वाली अन्य इकाइयों को भी सबक मिलेगा। सबसे बड़े अपराधियों पर आपराधिक मामले चलाना भी बहुत मददगार होगा।

वैसे, मुझे पूरा यकीन है कि वे बड़े खुन्नस रखने वाले लोग हैं और यह सीधा साधा सच बोलने के लिए वे मेरा ट्विटर अकाउंट निलंबित कर देगें। इसलिए पहले से ही होशियार होकर मैंने अपने ट्विटर अकाउंट को ससपेंडेड एनीमेशन में डाल दिया है।

अगला, एक स्टार्टअप की उल्लेखनीय कहानी है जिसे आपने कभी नहीं सुना होगा- वह है बाइटडेंस, दुनिया में सबसे मूल्यवान यूनिकॉर्न (1 बिलियन डॉलर से अधिक निजी स्वामित्व वाली फर्म)। टेक्नोड में “बाइटडेंस ऐड्स फ्यूल टू इंडियाज रिलीजियस एंड एथनिक फायर्स” (हिंदी अनुवाद- बाइटडेंस ने भारत की धार्मिक और संजातीय आग में डाला घी) नामक शीर्षक वाले लेख से यह पता चलता है कि हिंदुस्तान टाइम्स की एक हालिया जाँच बताती है कि हेलो, साथ ही ज़ियामी समर्थित भारत स्थित इसकी प्रतियोगी शेयरचैट, “गलत सूचनाओं और राजनीतिक प्रोपगंडा का प्रसार” कर रहे हैं।

इसके अलावा, यह आरोप लगाया गया है कि इन एप्स का उद्देश्य है झूठी खबरें बनाना। ……….”यह उन हेडलाइनों को पहचानती है जिन पर सबसे ज्यादा क्लिक किया जाता है और यह उन्हें अपने यहाँ प्रकाशित होने वाली ख़बरों में इस्तेमाल करती है। इससे अक्सर ऐसा होता है कि लेख की वास्तविक सामग्री की तुलना में इसका शीर्षक अधिक उत्तेजक या विभाजक हो जाता है। इन शीर्षकों के कारण उपयोगकर्ता गलत जानकारी के शिकार हो सकते हैं।”

इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि यदि यह भारत के चुनावों में चीनी-वित्त पोषित हस्तक्षेप का हिस्सा हो। यह बात प्रकाश में आई है कि सभी देशों – विशेष रूप से कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया दिमाग में आते हैं – में चीन के अनुकूल कार्य करने के लिए अकादमिक, पत्रकारों और साथ-साथ राजनेताओं के वित्त पोषण के माध्यम से भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने में चीनी भागीदारी एक महामारी की तरह है। इस प्रकार हेलो चीन के अनुकूल कांग्रेस को सत्ता में लौटने में मदद करने का प्रयास हो सकता है।

आखिरकार, कांग्रेस में कुछ नेहरू वंश के अनुगामी आए, जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की वंशावली के लिए छलपूर्ण और व्यंग्यमिश्रित सन्दर्भ दिए जिनका मतलब है कि वह एक सामान्य परिवार से हैं, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष के पीछे प्रभावशाली नेहरू राजवंश है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि अति-ईर्ष्यालु अनुगामियों को जरा सा भी अंदाजा नहीं है कि यह उनके मालिकों के लिए कितना हानिकारक है। कोई तर्क दे सकता है कि यह ठीक है क्योंकि हम जानते हैं कि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा नेहरू और राजीव नेहरू ने क्या किया है कि हम नहीं चाहते कि उनके वंशज कहीं भी सत्ता में रहें (खैर, अगर किन्हीं राजवंशों को याद किया जाए तो गुप्त और मौर्य राजवंशों को याद किया जाए न कि गाँधी जैसे राजवंशों को, जो कि गैन्धी से नाम बदलकर गाँधी हुए थे)।

जवाहर लाल, इंदिरा और राजीव और फिर उनकी पत्नी ने भारत को बर्बाद किया। इसका एक सरल लेकिन गंभीर तथ्य यह है कि वर्ष 1947 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की कीमत 4 रुपए थी लेकिन 2014 में डॉलर 62 रूपए के बराबर हो गया। दूसरे शब्दों में, इस अवधि में रुपए ने अपनी 93.5 प्रतिशत क्रय शक्ति खोई है। यह आपराधिक कुप्रबंधन है। भारत, जो 1960 और 1970 के दशक में दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में से एक था, उस सूची से बाहर हो गया, और अब वापस अपने स्थान पर आ रहा है। जी हाँ, यह राजवंश की प्रतिष्ठा है। जब हमारे पास ऐसे दोस्त हों तो दुश्मनों की आवश्यकता किसे है?

इसके अलावा, हम और भी आगे जा सकते हैं। नेहरू परिवार का इतिहास क्या है? कहानी लेखक ओ. पी. विजयन के अनुसार, और मुझे विश्वास है कि उन्होंने पर्याप्त खोजबीन के बाद स्पष्ट किया होगा कि, नेहर नदी के किनारे व्यापार (यात्री ढोने का काम) करने वाले मल्लाहों को नेहरू नाम मिला था। कोई नहीं जानता था कि वे कहाँ से आए थे।

इसके बाद, एक गंगाधर नामक पूर्वज थे, जो दिल्ली में कोतवाल (एक मामूली पुलिस अधिकारी) थे। यहाँ एक चौंकाने वाली कहानी है। मुझे बताया गया है कि गंगाधर की सिर्फ एक ज्ञात, और बहुत ही रोचक, तस्वीर है। वह एक पठानी पोशाक पहने हुए हैं। 1850 के दशक में एक तस्वीर खिंचवाना काफी महंगा होगा। इसका कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं है कि एक कश्मीरी पंडित पुलिस अधिकारी पठान की वेशभूषा में स्वयं की तस्वीर खिंचवाने में इतनी बड़ी रकम क्यों खर्च करेगा?

स्वर्गीय ए. घोष के पास एक दिलचस्प स्पष्टीकरण था – कि ‘गंगाधर’ वास्तव में एक पठान थे, जो 1857 के बाद दिल्ली में ब्रिटिश अत्याचारों से बचने के लिए भाग गये थे और अपना नाम ‘गंगाधर’ रख लिया था। ए. घोष ने पठान को गयासुद्दीन गाजी का नाम दिया। मुझे नहीं पता कि यह सब सच है या नहीं, लेकिन क्या हम इसकी तह तक जाएंगे और इसके बारे में पता लगाएंगे कि वास्तव में नेहरू वंश के पूर्वज कौन थे?

चाहे जैसी भी स्थिति हो, उनके परिवार की तकदीर मोतीलाल (हालांकि वह एक सफल वकील थे) द्वारा नहीं बल्कि उनके भाई द्वारा लिखी गई थी जो राजस्थान में एक रियासत में मंत्री के रूप में पद ग्रहण करने में कामयाब रहे। उस समय मोतीलाल ने एक समृद्ध मुस्लिम मकान मालिक से प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में एक हवेली खरीदी, जिनके परिवार के साथ उनके संबंध बहुत दोस्ताना थे, जो समाज में खुसफुसाहट का विषय था।

तो इनकी पिछली वंशावली पूरी तरह से पाक-साफ तो नहीं है। इसके अलावा, जवाहर लाल के व्यभिचार के बारे में बहुत सारे किस्से हैं, विशेष रूप से खूबसूरत युवा योगिनी की रोचक कहानी के बारे में, जो गुप्तरूप से बैंगलोर चली गयी थीं और एक बच्चे को जन्म दिया था और उस बच्चे को एक ईसाई अनाथालय के सुपुर्द कर दिया गया था। और एम. ओ. मथाई की आत्मकथा को कौन भूल सकता है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि इंदिरा के साथ उनका लंबे समय तक सम्बन्ध रहा था?

इसके अलावा, परिवार का दूसरा पक्ष, जेवियर मोरो की प्रतिबंधित पुस्तक द रेड साड़ी (इसके कुछ भाग इंटरनेट पर उपलब्ध हैं) के अनुसार, यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि कांग्रेस अध्यक्ष के दादा स्टीफेनो मेनो एक राजगीर थे। इसके अलावा, दिसंबर 2015 में कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र ‘कांग्रेस दर्शन’ के अनुसार, “स्टेफेनो मेनो एक पूर्व फासीवादी सैनिक थे।” यदि कांग्रेस स्वयं ऐसा कहती है, तो यह सच होना चाहिए। इस प्रकार इनकी पिछली कहानी आकर्षक है। वास्तव में यह बहुत अच्छी वंशावली है।

शायद, एक नीची जाति के चाय बेचने वाले, जो शून्य से शिखर तक पहुँचे हैं, की जमीन से जुड़ी कहानी को नीचा दिखाने के बजाय अनुचरों के लिए यह बेहतर होता यदि उन्होंने अपने प्रिय राजवंश की अत्यधिक संदिग्ध वंशावली का आत्म-निरीक्षण किया होता।

बेशक, यह सब 2019 के उस अंतिम लक्ष्य की खोज में है, जहाँ पर ये मोदी को दूसरे कार्यकाल में आने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं। यदि कांग्रेस सत्ता में वापस आती है, तो वे निम्नलिखित एजेंडों के साथ आगे बढ़ेंगे– (1) अपने 100 लक्षित खलनायकों को सूली पर चढ़ाना, (2) सभी पाठ्यपुस्तकों को विषाक्त बनाना, (3) परिभाषा के अनुसार सभी हिंदुओं को अपराधी बनाने के लिए सांप्रदायिक हिंसा विधेयक को हटाना, (4) प्रत्येक आर्थिक कदम को आगे से पीछे की ओर ले जाना, जिससे शायद सहचर पूँजीवाद को बढ़ावा मिल सके। हाँ, कुछ लोगों के लिए यह बहुत ही फायदेमंद है।

राजीव श्रीनिवासन रणनीति और नवोन्मेष पर लिखते हैं, इस पर वह बेल लैब्स और सिलिकॉन वैली में काम कर चुके हैं। इन्होंने कई भारतीय प्रबंधन संस्थानों में नवोन्मेष की शिक्षा प्रदान की है। आईआईटी मद्रास और स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ बिजनेस में वह 20 वर्षों तक एक पारंपरिक समीक्षक रह चुके हैं।