राजनीति
ये आठ विषय 2019 चुनावों को प्रभावित करेंगे और ये छः नहीं

आशुचित्र- ये आठ मुद्दे हैं जो 2019 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं को प्रभावित करेंगे और छः मुद्दे ऐसे जो मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाएँगे।

जहाँ सरकार और विपक्ष अगले आम चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं, ऐसे में यह पता लगाना आवश्यक है कि कौनसे मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित करते हैं और कौनसे मुद्दे ऐसा करने में अक्षम हैं। नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के लिए समस्या यह है कि इसकी बड़ी उपलब्धियों के बाद भी यह कोई खेल बदलने वाला प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पा रही है। बड़ा प्रभाव उत्पन्न करने वाले बदलाव अभी भी अपने पूर्ण स्वरूप में नहीं आए हैं और इसकी कथित विफलताएँ (नौकरी, कृषि आय) चुनाव अभियान को प्रभावित करती नज़र आ रही हैं।

इन चीज़ों को देखते हुए, यह पता लगाना संभव है कि कौनसे मुद्दे मायने रखेंगे और कौनसे नहीं।

वर्तमान में इन छः मुद्दों पर चर्चा की जा रही है जो जनता को प्रभावित नहीं करेंगे

  1. भ्रष्टाचार- 2014 में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) के बड़े भ्रष्टाचार घोटालों ने उनकी हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई; लेकिन इससे भी अधिक प्रभाव 2011-12 से शुरू हुई आर्थिक मंदी का था जो किसानों और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए अधिक मायने रखता थी। 2019 में मतदाता नौकरियों और आय के बारे में सबसे अधिक चिंतित हैं, और इसका मतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जो काले-धन पर हमले किए और कर-अनुपालन में सुधार किए, इससे उन्हें मतदाताओं का सहयोग नहीं मिलेगा। जब आजीविका दाँव पर है तो मतदाता को भ्रष्टाचार की चिंता नहीं है। इसलिए सोनिया-राहुल-वाड्रा घोटाले जनता के लिए ज़्यादा मायने नहीं रखते, और न ही राफेल पर चिल्लम-चिल्ली जनता के लिए मायने रखती है। 2019 के लिए भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं होगा।
  2. वंशवाद– भारतीय मतदाता भाई-भतीजावाद और वंशवादी राजनीति से असहज नहीं हैं क्योंकि हमारी जाति-आधारित नैतिकता इस आधार पर बनी है। इसी कारणवश कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश (पूर्व) का प्रभार देते हुए औपचारिक रूप से प्रियंका गांधी को राजनीति में शामिल किया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) वंशवाद के खिलाफ़ भले ही रहे मगर इसका कोई भी प्रभाव जनता पर नहीं पड़ेगा।
  3. कम मुद्रास्फीति, राजकोषीय स्थिरता– सबसे अच्छे समय में भी मतदाता राजकोषीय स्थिरता का अर्थ नहीं समझता है। मुद्रास्फीति एनडीए-2 की सबसे बड़ी सफलता की कहानियों में से एक रहा है, जो मतदाता हल्के में ले रहा है। महंगाई तभी मायने रखती है, जब यह बढ़ रही हो, न कि जब यह सौम्य हो। टीवी चैनल वाले चिल्लाते रहते हैं जब पेट्रोल की कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन विपरीत होने पर बड़े पैमाने पर चुप रहते हैं। कम मुद्रास्फीति इस प्रकार मज़बूत अंतर्निहित व्यापक आर्थिक प्रदर्शन के बावजूद कुछ चुनावी लाभांश देती है।
  4. सुधार, जीएसटी, आईबीसी– यदि कोई अर्थ-संबंधी प्रेस संस्थाओं को देखता है, तो मांग हमेशा बड़े आर्थिक सुधारों की होती है। लेकिन मोदी सरकार के बड़े टिकट सुधार जैसे, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), दिवालियापन संहिता और आधार के उपयोग के माध्यम से सब्सिडी सुधारों को औसत मतदाता द्वारा बड़े रूप में नहीं देखा जाता है। उनके काम अभी भी प्रगति की ओर अग्रसर हैं और इनके वास्तविक लाभ 2019 के बाद ही प्रवाहित होंगे, जब सबसे मुश्किसल ऋण मुद्दे हल हो जाएँगे और जीएसटी को सरल बना दिया जाएगा। इस बीच इन योजनाओं के कारण हो रही असुविधाओं को सामने रखा जाएगा ताकि भाजपा को चुनावी मैदान से खदेड़ा जा सके।
  5. तीन तलाक़- एक बैठक में तीन तलाक़ के मुद्दे को समाप्त करने के लिए मोदी सरकार की लड़ाई में मुस्लिम महिलाओं का एक छोटा समूह चुपचाप समझौते में सिर हिला रहा है। लेकिन जब समुदाय की समग्र भावना सरकार के खिलाफ है तो मुस्लिम महिला की मनोदशा में होने वाला यह अयोग्य, अंतर्निहित बदलाव डूब जाएगा। इस प्रकार यहाँ कोई चुनावी लाभ नहीं है।
  6. काले धन के खिलाफ लड़ाई- जहाँ अधिकांश मतदाता नरेंद्र मोदी को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं जिनके पास चौकीदार के रूप में एक साफ रिकॉर्ड है लेकिन वास्तविकता में भाजपा और मोदी की स्वच्छ छवि चुनाव जीतने के लिए काफी नहीं है क्योंकि मतदाताओं का ध्यान आजीविका और आय पर है। दूसरी ओर मोदी द्वारा गरीबों को बदमाशों से बरामद काले धन से 15 लाख रुपये देने के कथित वादे को मतदाता बहुत अधिक महत्त्व नहीं देंगे। औसत मतदाताओं को पता है कि यह कर पाना आसान नहीं होगा।

आठ मुद्दे जो मतदाताओं को प्रभावित करेंगे

  1. मोदी बनाम खिचड़ी- हर मतदाता जानता है कि विपक्षी गठबंधन केवल वोटों की गिनती तक मौजूद है। उसके बाद अंतहीन तकरार होगी। इससे नरेंद्र मोदी और उनकी स्थिरता भाजपा के लिए एक महत्त्वपूर्ण सकारात्मक कारक प्रदान करता है, लेकिन एक चेतावनी के साथ- मतदाता को अतिरिक्त रूप से यह भी महसूस करना होगा कि मोदी की नाव को ठुकराना उनके भविष्य के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा। इसका मतलब यह है कि मोदी को यह स्पष्ट करना होगा कि यह स्थिरता 2019 के बाद बेहतर परिणाम क्यों देगी। यदि मोदी और उनकी अभियान टीम 2019 के बाद प्रगति और स्थिरता का मिलाप कर सकती है तभी स्थिरता काम करेगी। अन्यथा, मतदाता विकल्प के साथ जोखिम लेने के लिए तैयार हो सकता है।
  2. बहुसंख्यक/अल्पसंख्यक पत्ता- विपक्ष को यकीन है कि अल्पसंख्यक वोट भाजपा के खिलाफ हिंदी राज्यों और अन्य जगहों पर जाएँगे। भाजपा ने हिंदू वोट को संग्रहित करने हेतु कोई कदम नहीं उठाए हैं। सबरीमाला मामले पर भी भाजपा का बाद में अपनाया गया रुख केरल में इससे अधिक यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) को लाभ पहुँचाएगा। हिंदू वोट वर्तमान में बड़े पैमाने पर वामपंथियों के पास जाता है और भाजपा के पक्ष में यहाँ कोई भी क्षरण यूडीएफ को लाभ देता है क्योंकि अल्पसंख्यक इसके पीछे समेकित होते हैं और हिंदू वोट विभाजित होता है। असम में नागरिकता संशोधन विधेयक ने असमिया और आदिवासी समूहों के बीच नाराज़गी पैदा कर दी है, जबकि राज्य में बंगाली हिंदू भाजपा को नई दृष्टि से देख सकते हैं। पश्चिम बंगाल में हालाँकि, नागरिकता विधेयक को पार्टी के लिए सकारात्मक रूप में देखा जाएगा। इस प्रकार धर्म का मुद्दा विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रभाव डालेगा। इन बातों का प्रभाव अब तक अनिश्चित है।
  3. राम मंदिर व अन्य मुद्दे- हिंदू मतों को आकर्षित करने का एक मात्र रास्ता है कि भाजपा आधिकारिक रूप से एक हिंदू एजेंडे की घोषणा करे जैसा कि इसने अभी तक राम मंदिर निर्माण के लिए नहीं किया है। लेकिन चुनावों के पहले इसका फल देखने को नहीं मिलेगा। सर्वोच्च न्यायालय ऐसा कोई निर्णय नहीं सुनाएगा जो चुनावों को सीधे प्रभावित करेगा और भाजपा हिंदुओं को ज़मीन सौंपने के लिए अध्यादेश जारी करके अपने पक्ष में अंतिम फैसला प्राप्त करने की संभावनाओं को बर्बाद नहीं करेगी। वैसे भी अध्यादेश पर न्यायालय द्वारा रोक लगाया जाना निश्चित है।
  4. गौ रक्षा- हिंदी भाषी राज्यों में गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने का भावनात्मक मुद्दा अप्रिय हो रहा है। लोग अब अपनी पालन क्षमता से अधिक गायों को खुला छोड़ दे रहे हैं क्योंकि अब तस्करों को छुपकर गाय बेचना आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में खुले छोड़े हुए मवेशियों के झुंड फसलों को प्रभावित कर रहे हैं जिससे किसानों में भारी आक्रोश है। अगर उप्र सरकार ने आवारा पशुओं के मुद्दे को एक और महीने में सुलझाया नहीं, तो यह हिंदू वोटों को भाजपा से दूर कर देगा। एक आम हिंदू गौरक्षा की चिंता करता है परंतु तब नहीं जब गाय उसकी फसल बर्बाद कर रही हों।
  5. सामाजिक क्षेत्र की योजनाएँ- गरीबों के लिए भाजपा द्वारा आरंभ की गई उज्जवला योजना, पाँच लाख रुपये की सुरक्षा देने वाली आयुष्मान भारत चिकित्सा बीमा, ग्रामीण गृह ऋण ब्याज दर में कमी, स्वच्छ भारत के लिए शौचालय निर्माण की होड़ और अंतिम गाँव तक बिजली विस्तार कुछ राज्यों के क्षेत्रों पर भाजपा के लिए सकारात्मक प्रभाव डालेगा। लेकिन यह समग्र मतदाता मूड को महत्त्पूर्ण रूप से प्रभावित नहीं कर सकता है। फिर भी, हर मत मायने रखता है, और भाजपा मोटे तौर पर यहाँ लाभ उठाने वाली है।
  6. कृषि आय- कई राज्य-स्तरीय ऋण छूट और उच्च न्यूनतम समर्थन मूल्य के बावजूद कृषि-उपज की कीमतें कमजोर रही हैं और किसानों को अभी तक अपनी आय में सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। इस संदर्भ में केंद्रीय संसाधनों का उपयोग करने वाले छोटे और सीमांत किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान करने की कोई भी योजना भाजपा को लाभान्वित करेगी लेकिन मामूली रूप से। इससे पूरी तरह से लाभान्वित होने के लिए भाजपा को इसे पिछले साल करना चाहिए था, ताकि लाभ इस वर्ष दिखाई दे।
  7. आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए कोटा- आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण, जो इस महीने की शुरुआत में संसद से पहले भाजपा द्वारा जल्दबाजी में विधायी किया गया था, उच्च जातियों में गरीबों के वोट भाजपा के लिए एक मामूली सकारात्मक बात है। लेकिन चूँकि ज्यादातर मामलों में चुनावों से पहले कोटा जारी नहीं किया गया है इसलिए मतदाताओं के इरादों पर इसका असर पड़ेगा। सुर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाया गया कोई भी रोक पार्टी के लिए मुसीबत बनेगा। अगर यह पिछले साल किया गया होता तो यह काम करता। यूपीए ने अपने अंतिम वर्ष में आंध्र प्रदेश को द्विभाजित करने की बात नहीं करते हुए खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण कानून लागू किया। लेकिन वह हार गई। इन फैसलों के कारण वह नहीं हारी, बल्कि इसलिए हारी क्योंकि दूसरे दौर के रिकॉर्ड में अन्य नकारात्मकताओं को पछाड़ने में उन्हें बहुत देर हो गई।
  8. नौकरी और वेतन- लगभग सभी इस बात से सहमत हैं कि इस चुनाव में नौकरी ही प्रमुख मुद्दा है। लेकिन असली मुद्दा नौकरियों की व्यापक उपलब्धता नहीं है बल्कि बेहतर नौकरी और अच्छा वेतन मुद्दे की जड़ हैं। मतदाता किसी ऐसे व्यक्ति को वापस वोट नहीं करेगा जो अधिक नौकरियों का वादा करता है, बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति को वोट करेगा जो बेहतर नौकरियों और उच्चतर वेतन का वादा करता है। एनडीए दावा कर सकती है कि औपचारिक नौकरियों की गुणवत्ता में सुधार की प्रक्रिया शुरू हो गई है और यह अपने अगले कार्यकाल में पूरी होगी, लेकिन यहाँ इसके तर्कों को विश्वसनीय और आश्वस्त करने की आवश्यकता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।