राजनीति
किन मुद्दों की वजह से बिहार में जदयू-भाजपा गठबंधन टूटने की कगार पर है?

‘अब की बार नीतीश कुमार’ से शुरू हुआ गठबंधन ‘फिर क्यों करे विचार, ठीक तो है नीतीश कुमार’ पर आकर टूटने को बेताब है। लगभग 13 सालों से अपने नए-नए जुमलों के सहारे बिहार की सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार एक बार फिर अपनी राजनीतिक मुश्किलों में घिर गए हैं। भाजपा के एक गुट ने नीतीश का विरोध करना शुरू कर दिया है।

बीते दिनों बिहार भाजपा के कद्दावर नेता संजय पासवान ने यह कहकर राज्य की राजधानी में सियासी तूफान खड़ा कर दिया कि अब नीतीश को मुख्यमंत्री का पद भाजपा को देना चाहिए। हालाँकि स्वराज्य  से पासवान ने इस विषय पर बात करने में सहमति नहीं जताई।

पासवान के इस बयान में कई मायने छुपे हैं। पासवान बयान देने के अगले दिन ही दिल्ली पहुँचे, जहाँ उन्होंने पार्टी नेता गिरिराज सिंह से मुलाकात की। बिहार में गठबंधन पर सवाल उठाने वाले भाजपा की ओर से गिरिराज ही सबसे पहले नेता थे।

इस मामले में विपक्षी पार्टी राजद भी चुटकी लेने में पीछे नहीं रही। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राजद नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर नीतीश कुमार से संजय पासवान के बयान पर प्रतिक्रिया मांगी।

जिस भाजपा के नेता लोकसभा चुनाव के दौरान ‘केंद्र में मोदी और बिहार में नीतीश’ का नारा लगा रहे थे, वही 100 दिन बाद ही गठबंधन पर सवाल क्यों उठाने लगे? आखिर क्या वजह है जिससे दोनों दलों के बीच दरार पड़ना शुरू हो गया है?

17वीं लोकसभा में भाजपा नीत एनडीए को जबरदस्त बहुमत मिली। बिहार में भी एनडीए ने 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी, जिसमें भाजपा ने अपने सहयोगी दलों को सांकेतिक भागीदारी के तौर पर एक-एक मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया। जदयू ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर अपने लिए अनुपातिक भागीदारी की मांग की, जिसे भाजपा ने ठुकरा दिया।

जदयू और भाजपा के बीच सबसे पहली दरार यहीं से पड़ना शुरू हुई। अनुच्छेद 370 पर जदयू के मत ने अमित शाह को असहज किया और दिल्ली से लेकर पटना तक भाजपा के राजनीति को करीब से देखने वाले बताते हैं कि इसके बाद नीतीश कुमार अमित शाह के चहेतों की सूची से बाहर हो गए।

इसके बाद भाजपा के संकटमोचक माने जाने वाले समावेशी नेता अरुण जेटली के निधन से भाजपा-जदयू गठबंधन के बीच तलवार लटक गई है। अरुण जेटली ही थे, जिन्होंने नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनाने को लेकर 2005 में पहली बार भाजपा के अंदर सहमति बनाई थी।

यही नहीं 2013 में नीतीश के एनडीए से अलग होने के बाद फिर से अरुण जेटली ही उन्हें वापस एनडीए में लाए। अरुण जेटली के निधन के बाद से जदयू खेमा को लगने लगा है कि भाजपा से गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी, उधर भाजपा के प्रदेश नेता भी आश्वस्त हैं कि पार्टी अकेले चुनाव लड़ सकती है।

अब इन अप्रत्यक्ष मंशाओं को प्रत्यक्ष प्रमाण बल दे रहे हैं। बिहार में अपराध एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा है। 2005 में नीतीश कुमार राजद सरकार के अपराध के खिलाफ ही चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने थे।

बाद के दिनों में बिहार में एक जुमला प्रसिद्ध हुआ कि नीतीश कुमार तीन सी (क्राइम, कम्यूनल और करप्शन) से कोई समझौता नहीं करते हैं। इसपर नीतीश भी कई बार बयान देते रहे हैं, लेकिन हालिया घटनाक्रम देखें तो बिहार के अपराध में बेतहाशा वृद्धि हुई है ‌।

बिहार पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, 2001 में बिहार में संज्ञेय अपराधों (कॉग्निजेबल क्राइम) की संख्या 95,942 थी, जो 2018 में बढ़कर 26,2,802 हो गई। 2001 में बलात्कार जैसे गंभीर अपराध के 746 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2018 में दुष्कर्म के 1,475 मामले हुए।

भाजपा के नेता और अमित शाह के करीबी माने जाने वाले रामेश्वर चौरसिया ने पिछले ही दिनों अपराध वृद्धि को लेकर नीतीश कुमार पर निशाना साधा था। चौरसिया ने बयान देते हुए कहा था कि नीतीश कुमार बिहार में अपराध रोकने में विफल रहे हैं।

वहीं, अनाम रहने के शर्त पर भाजपा के एक नेता ने स्वराज्य  को बताया, “देखिए शुरुआत से ही बिहार का गृह महकमा नीतीश कुमार संभाल रहे हैं।” उनका मानना है कि जब अपराध कम हुए तो उसका श्रेय नीतीश ने लिया लेकिन जब अब बढ़ रहे हैं तो उसकी जवाबदेही भी उन्हीं की होनी चाहिए।

दोनों दलों के बीच शुरू हुए इस विवाद का पटाक्षेप कहाँ होगा यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में दोनों साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेंगे‌।

भाजपा और जदयू ने अपने अपने स्तर से चुनाव की तैयारियाँ भी शुरू कर दी हैं। जहाँ भाजपा ने पश्चिमी चंपारण से आने वाले एक पिछड़े नेता को अध्यक्ष बनाकर राज्य की राजनीति में पिछड़े वोटों पर ध्यान केंद्रित किया है। वहीं, जदयू भी पंचायत स्तर तक अपने पार्टी को विस्तार देने में लगी है।