राजनीति
मीडिया की दिल्ली चुनाव में रही भूमिका; नतीजे अप्रत्याशित या पूर्वनिर्धारित?

प्रसंग- दिल्ली चुनाव में मीडिया की भी रही भूमिका।

सामरिक इतिहासकारों का कौतूहल ऐसे युद्धों की ओर बना रहता है जिनमें पराजित सेना विजयी सेना से सामान्य पैमानों पर अधिक शक्तिशाली रही हो। इस संदर्भ में सिकंदर की पोरस या पर्वतेश्वर पर विजय एक विवेचना का विषय रहा है। संभवत: विदेशी आक्रांताओं की छोटी-सी सेना के अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली भारतीय सेना की पराजय का यह पहला अवसर रहा।

सिकंदर की विजय के प्रमुख कारणों में पोरस का सिकंदर की अश्व सेना के समक्ष हाथियों का उपयोग है। दिल्ली चुनावों में अरविंद केजरीवाल ने मीडिया की अश्व सेना के समक्ष राजनैतिक गज-दल को उतारा। अश्व एक दिशा में देखता है और दिशा चपलता से बदल सकता है। उसे अपनी पूर्व परिस्थिति से विरोधाभास से अंतर नहीं पड़ता क्योंकि उसके आँखों पर पट्टी होती है। एक राजनेता धीमे चलता है और अपनी तमाम सामर्थ्य के बावजूद अपने गिर्द के वातावरण से बहुत प्रभावित होता है।

लोकतंत्र में सत्ता और शासित के मध्य वार्ता का बहुत महत्व होता है। मीडिया इसी वार्ता का साधन है। भाजपा के क्षेत्रीय नेतृत्व के लिए इस वार्ता को पुनर्स्थापित करना आवश्यक है।

जब मीडिया ने आम आदमीं पार्टी का निर्माण किया, और पहली बार संजय हस्तिनापुर की सत्ता का अंग बना, चाहे कॉलेजों के बोर्ड हों या दिल्ली डायलॉग जैसी संस्था बनाई गई संस्था का माध्यम हो। शासन और राजनीति के संदेशवाहकों को आम आदमी पार्टी ने वह स्थान दिया जहाँ वे ख़बरें जनता तक पहुँचाने के स्थान पर खबरें बनाने लगे। एक झूठ पकड़े जाने पर वे चपल चतुरता के साथ दूसरे असत्य पर छलांग मार देते थे।

इस चुनाव में मीडिया के इस खेल की बड़ी भूमिका रही। स्थानीय भाजपा नेताओं की जनता के साथ संवाद के प्रति उदासीनता का राजनैतिक मीडिया ने खूब लाभ उठाया। नागरिकता संशोधन बिल बड़ा मुद्दा रहा परंतु कितने दिल्ली भाजपा के नेताओं को हमने अख़बार और डिजिटल मीडिया पर उसके विषय में लिखते देखा? बहुत हुआ तो वे मोदी और अमित शाह के भाषणों को आधे मन से आगे प्रसारित करते रहे। कपिल मिश्रा और ताजिंदर बग्गा मैदान में उतरे पर बाक़ी भाजपा इस सबसे अलग ही रही।

अनजान स्वर जो न भाजपा के सदस्य रहे, न ही चुनाव का अंग रहे, इन विषयों पर लिखते रहे पर दिल्ली भाजपा के नेताओं ने इन विषयों पर कोई संवाद स्थापित करने का सफल या असफल प्रयास नहीं किया। यही कठिनाई अर्थव्यवस्था के प्रश्न पर भी रही। मीडिया ने ब्रिटैनिया के घाटे की कथा बनाई और अगले क्वार्टर उसी कंपनी ने बेहतरीन नतीजे दिए (24 प्रतिशत शुद्ध लाभ)।

यही स्थिति अंत:वस्त्रों की रही जिसमें द प्रिंट  ने एक दुखद चित्र प्रस्तुत किया। इस पर बहुत चर्चा हुई। बात बाद में खुली कि फरवरी में उसी उद्योग खंड की सबसे बड़ी कंपनी पेज इंडस्ट्रीज़ ने पिछले वर्ष के समक्ष 24 प्रतिशत की लाभ में वृद्धि अंकित की। परंतु इन आँकड़ों पर कोई संवाद नहीं हुआ। दो मिनिट की टीवी बाईट की आयु भी दो मिनट होती है। डिजिटल मीडिया पर लिखे लेख सदा के लिए गूगल में रहते हैं और अख़बार वर्ष दर वर्ष इतिहास का भाग हो जाते हैं।

धार्मिक और वैचारिक मुद्दों पर भी स्थानीय इकाई ने जनता को प्रचार के अंतिम चरण तक निराश ही किया। दिवाली पर आतिशबाजी बंद करने का मूर्खतापूर्ण मुद्दा हो, हौज़ क़ाज़ी या शाहीनबाग- भाजपा के स्थानीय नेता रूक रूक के ही चले। यदि उनकी आशा थी कि हिंदू भी जामिया गिरोह की भाँति सड़कों पर आतंक फैलाता तो यह आशा ही ग़लत थी।

हिंदू विचार अपनी रक्षा के लिए व्यवस्था पर निर्भर करता है, अराजकता पर नहीं। जब हौज़ क़ाज़ी में मूर्ति भंजन के विषय पर हिंदुओं को ही गिरफ़्तार किया गया और स्थानीय सांसद मूक रहे तो बाद के दौर में जनसाधारण को उग्र कर के कुछ हासिल होने से रहा था।

इस संदर्भ में अन्य क्षेत्रों के नेताओं को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीखना होगा। हिंदुत्व कभी सैनिक धर्म नहीं रहा और रामायण युग से विश्वामित्र स्वयं सक्षम होने के बाद भी शासन में स्थापित दशरथ का ही हस्तक्षेप अन्याय की स्थिति में माँगते रहे हैं। यदि दशरथ धर्मनिरपेक्ष दिखने की आस में विश्वामित्र को ख़ाली हाथ लौटा दे, और राजा चुनाव में चुना जाता हो तो जनता के निर्णय पर जनता से नहीं, नेताओं से प्रश्न पूछना चाहिए।

सत्य है कि एक पोज़ीशन लेने पर मीडिया उनकी जान के पीछे पड़ जाता क्योंकि भाजपा से मीडिया निराश है, और आप में उसका अपना वैचारिक निवेश है। यही कारण है कि मीडिया पूरी तरह इसको दबाता रहा कि नागरिकता क़ानून पर फैले दंगों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आप पार्टी का हाथ रहा है।

चाहे मनीष सिसोदिया के फेक वीडियो हों, अमानतुल्लाह खान का दंगाइयों के साथ वीडियो हो,केजरीवाल सरकार द्वारा दंगाइयों की ज़मानत की व्यवस्था हो या बच्चों के गले में बंधे आम आदमी पार्टी के मफ़लर हों- इस सबको दरकिनार कर के मीडिया आज कांग्रेस और भाजपा को ध्रुवीकरण का अभियुक्त बना रहा है। परंतु राजनीति सरल मार्ग पकड़ने का नाम नहीं है। राजनीति वैचारिक साहस का खेल है। अन्यथा नरेंद्र मोदी को 370 और नागरिकता संशोधन के झंझट में पड़ने की क्या आवश्यकता थी।

वैचारिक शुद्धता, नीतिगत कटिबद्धता और संवाद का साहस भाजपा के लिए आवश्यक है। जहाँ मोदी प्रत्याशी होते हैं, वे एक विकलांग संवाद को अपनी दम पर पंख दे लेते हैं। बाक़ी नेताओं के लिए यह सदैव संभव नहीं होता है। उन्हें एक निरंतर संवाद, नीतिगत स्थिरता के साथ बनाइए रखना होगा। इसके लिए उन्हें अपनी मतदाता को समझना होगा।

20 दिन में वह तालिबानी नहीं होगा। आपको उसका युद्ध लड़ना होगा। आपका मतदाता आपका विश्वामित्र है। वह शस्त्र देगा पर युद्ध उसके पक्ष में आपको लड़ना होगा, क़ानूनी साधनों से। वह आपको सिर्फ़ अधिकृत करेगा, आपका लठैत नहीं बनेगा। आपका मतदाता अमानतुल्लाह के मतादाता से भिन्न है। वह सोचता है। और यह नया युद्ध हाथियों को कीचड़ में धकेलने से नहीं जीता जाएगा, आपको घोड़े उतारने होंगे। आपके पास भी माध्यम है, जिनको जीवन्त और शक्तिशाली आपका संवाद बनाएगा।