भारती / राजनीति
मोदी ने अपने ही मंत्री परिषद् पर क्यों कर दी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने ही कैबिनेट पर की गई बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक के तीन अर्थ निकाले जा रहे हैं- पहला, कि मोदी अगले वर्ष उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों की तैयारी कर रहे हैं।

दूसरा, यह संदेश है मंत्रियों को कि उन्हें प्रदर्शन करना होगा अन्यथा उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। तीसरा, कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपना जाति आधार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जाति/जनजाति (एससी/एएसटी) पर केंद्रित कर रही है जिन्हें क्रमशः 27 और 20 पद मिले।

ये सभी निकाले गए अर्थ गलत नहीं हैं, विशेषकर ओबीसी/एससी/एएसटी से लदी कैबिनेट के लिए। 47 सीटों के साथ अब ये सामाजिक वर्ग मोदी के मंत्रालय का 60 प्रतिशत भाग बनाते हैं। निम्न वर्गों के लिए हिंदुत्व आ गया है और स्वयं मोदी इसकी मशाल हाथ में लिये हुए हैं।

हालाँकि, प्रथम दो अनुमान- मंत्री परिषद् में फेरबदल का संबंध उत्तर प्रदेश, गुजरात एवं उत्तराखंड के चुनावों से है और बात मंत्रियों के प्रदर्शन की है- आंशिक रूप से ही सही हैं।

12 मंत्रियों को निकाला गया जिनमें छह कैबिनेट मंत्री और छह राज्यमंत्री थे। हर्ष वर्धन, प्रकाश जावड़ेकर एवं रवि शंकर प्रसाद जैसे नेताओं को निकाला जाना आश्चर्यजनक था।

लेकिन इसका अर्थ प्रदर्शन न करने वाले मंत्रियों को संदेश के रूप में निकालना गलत होगा। कोविड के दौरान लगभग हर मंत्रालय ने कमतर काम किया और इसलिए यह कारण लागू नहीं होता।

यदि हर्ष वर्धन पर इस चीज़ का दोष मढ़ा गया है कि उन्होंने कोविड की दूसरी लहर में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो पहली लहर को संभालने के लिए उनकी सराहना भी की जानी चाहिए।

इसके अलावा, मोदी अपने निकटवर्तियों को दूर करने में विश्वास नहीं रखते हैं। यदि प्रदर्शन न करने वालों को ही बाहर का रास्ता दिखाया जाना था तो रेलवे से लेकर सांख्यिकी तक स्थानांतरित किए गए सदानंद गौड़ा काफी पहले निकाल दिए जाते लेकिन उन्हें अब जाकर निकाला गया है।

संभवतः, कर्नाटक के जातीय परिप्रेक्ष्य से अब उनकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि शोभा कारांदलाजे ने उनका स्थान राज्यमंत्री के स्तर पर ले लिया है जो कर्नाटक की गौड़ा जाति से ही आती हैं।

ऐसे में, हमें कुछ और अर्थ खोजने होंगे। यदि मंत्रियों के माध्यम से उत्तर प्रदेश को संदेश देना था तो इस राज्य से सात सदस्यों को जोड़ना कोई बड़ी बात नहीं है। लोक सभा सीटों में प्रदेश की 15 प्रतिशत और जनसंख्या में 17 प्रतिशित की भागीदारी है।

यदि अनुपात देखा जाए तो उत्तर प्रदेश को कम-से-कम 12 मंत्री मिलने चाहिए थे परंतु ऐसा नहीं हुआ और इसका कारण स्वयं प्रधानमंत्री हैं। वाराणसी से सांसद बने मोदी स्वयं ही उत्तर प्रदेश के लिए संदेश हैं और जातीय समीकरण ओबीसी के पक्ष में जाते हैं। यहाँ आँकड़ों की बात नहीं है।

मोदी मंत्रालय में इस बड़े परिवर्तन के कारण कुछ और हैं जिसके तहत 43 नए मुखड़ों को सम्मिलित किया गया है और नए मंत्रियों को जोड़ने तथा राज्यमंत्री पद से सात मंत्रियों की पदोन्नति करने के लिए 15 नए कैबिनेट पद बनाए गए हैं।

पहला, मोदी सिर्फ एक प्रदर्शन करने वाला मंत्री परिषद् नहीं बनाना चाहते हैं। वे वास्तव में अपनी पार्टी में प्रशासनिक अनुभव को भरना चाहते हैं। कांग्रेस पाँच दशकों से अधिक सत्ता में रही है और इसलिए कठिन मंत्रालय चलाने के लिए उसे सरलता से लोग मिल जाते हैं।

इसके विपरीत भाजपा जो प्राकृतिक रूप से अब और भविष्य में सरकार चलाने वाली पार्टी बन गई है, उसके पास ऐसा अनुभव नहीं है। इसलिए मोदी जितना संभव हो, उतने नए लोगों को जोड़ना चाह रहे हैं।

मोदी 2.0 के बचे हुए कार्यकाल में वे चाहते हैं कि कई सारे पार्टी कार्यकर्ता अनुभव प्राप्त कर लें। इसी कारण कई सारे कनिष्ठ मंत्रियों को साथ-साथ दो भिन्न मंत्रालयों से जोड़ा गया है। पिछले सात वर्षों में अनेक राज्यों के 100 से अधिक सांसद मोदी के मंत्रालयों का भाग रहे हैं।

दूसरा, मोदी जानते हैं कि एक मज़बूत क्षेत्रीय विपक्ष के सामने उन्हें 2024 के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और अपना दल जैसे सहयोगी दलों को भी कैबिनेट मंत्री का पद दिया है।

2024 के आते-आते हम अपेक्षा करते हैं कि कैबिनेट में एक और बार परिवर्तन होगा तथा उसमें एनडीए के और सहयोगी दलों को स्थान मिलेगा। महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में मोदी को सहयोगियों की आवश्यकता होगी।

तीसरा, वरिष्ठ मंत्रियों को निकाला जाना और उनके स्थान पर नए कैबिनेट सदस्यों को जोड़ना, पुरानी कांग्रेस पार्टी के 1960 के दशक की कामराज योजना जैसा लगता है। जब कांग्रेस का जनाधार घटने लगा था तो पार्टी ने वरिष्ठ मंत्रियों से त्याग-पत्र लेकर नए मुखड़ों को जोड़ा था।

भाजपा भी अब यही कर रही है। पश्चिम बंगाल में भाजपा का प्रदर्शन कुछ विशेष नहीं रहा और पिछले चुनावों में इसने राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, आदि राज्यों में अपना जनाधार खोया है। वरिष्ठ नेताओं से अब अपेक्षा की जाएगी कि वे इन राज्यों में पार्टी की स्थिति सुधारें।

चौथा, मोदी युवा मुखड़ों के साथ दल में अधिक ऊर्जा भरना चाहते हैं। इसी कारण मनसुख मांडविया को दवा उद्योग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रसायन एवं ऊर्वरक मंत्रालय के साथ-साथ स्वास्थ्य का भी दायित्व सौंपा गया है।

ऐसे ही अश्विनी वैष्णव को रेलवे, आईटी एवं संचार, अनुराग ठाकुर को सूचना एवं प्रसारण, सर्बानंद सोनोवाल को बंदरगाह, शिपिंग एवं जल संसाधन और किशन रेड्डी को संस्कृति एवं पर्यटन का दायित्व दिया गया है।

ये सभी युवा नेता हैं जिन्हें कैबिनेट मंत्री के रूप में बड़े दायित्व सौंपे गए हैं। हालाँकि सोनोवाल की पदोन्नति अपेक्षित थी क्योंकि उन्होंने असम का मुख्यमंत्री पद त्यागकर हिमंत बिस्वा सरमा को सौंप दिया है।

अपेक्षा है कि नए झाड़ू बेहतर सफाई करेंगे क्योंकि उनमें उत्साह होगा। राजीव चंद्रशेखर पूर्व में कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम कर चुके हैं और राज्यमंत्री रहते हुए कौशल विकास तथा आईटी से भी उनक सामना हो चुका है।

पाँचवा, प्रदर्शन करने वालों को अधिक दायित्व दिए गए हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय में अच्छा प्रदर्शन (उज्ज्वला जैसी योजना जिसने कई क्षेत्रों में भाजपा को जिताया) करने वाले धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा एवं कौशल विकास मिला है और शहरी मामलों के साथ हरदीप पुरी को पेट्रोलियम भी दे दिया गया है।

छठा, तुलनात्मक रूप से नए लेकिन अनुभव प्राप्त लोग जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया और नारायण राणे को क्रमशः नागरिक उड्डयन तथा लघु, छोटे एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) जैसा कठिन काम सौंपा गया है। संकट से गुज़र रहे इन क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करके वे स्वयं को सिद्ध कर सकते हैं।

सातवाँ, रेलवे एक ऐसा मंत्रालय है जिससे मोदी काफी निराश लग रहे हैं। यह देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का नियोक्ता है लेकिन इसने मोदी के लिए वह नहीं किया जो स्वर्णिम चतुर्भुज ने वाजपेयी के लिए किया था- वृद्धि का कारक बनना।

मोदी ने सदैव रेलवे से काफी आशाएँ रखी हैं लेकिन मंत्रालय उनपर खरा नहीं उतरा है। तीन मंत्रियों (सदानंद गौड़ा, सुरेश प्रभु और अब पीयूष गोयल) को बदला जा चुका है लेकिन मंत्रालय में कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिला है।

इसलिए अब परिवर्तन करके पूर्व नौकरशाह, कॉर्पोरेट कार्यकारी और वार्टन विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र वैष्णव को रेलवे का चालक बना दिया गया है। एक मंत्रालय के रूप में रेलवे का पद कम हुआ है क्योंकि पहले इसका अपना एक बजट हुआ करता था लेकिन अब यह सामान्य बजट का ही भाग है।

अब रेल को संचार से जुड़ने के लिए कहा जा रहा है। मोदी को आशा है कि इस बार कुछ परिवर्तन होगा।

यह मोदी का अंतिम कैबिनेट परिवर्तन नहीं है। 2022 में उत्तर प्रदेश के चुनावों के बाद थोड़े परिवर्तन और 2023 में कर्नाटक चुनावों के बाद बड़े परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं जो 2024 के लोक सभा चुनावों से पहले की तैयारी होंगे।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।