राजनीति
दलाईलामा का बेतुका दावा: जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाकर टाला जा सकता था विभाजन

प्रसंग
  • गुलाबी रंग के चश्मे से देखने पर संयुक्त भारत का दृश्य आदर्श प्रतीत हो सकता है लेकिन वास्तव में इसकी सच्चाई कुछ और है।
  • जिन्ना के नेतृत्व वाली एक सरकार और एक अन्तर्निहित मुस्लिम वीटो के साथ एक संयुक्त भारत का उद्भव संभव नहीं होता।

दलाई लामा आमतौर पर संतुलित और समझदारी भरी बातें करते हैं। लेकिन हाल ही में भारत के विभाजन के बारे में बात करते समय उन्होंने कुछ टिप्पणियां कीं जो बेतुकी थीं।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट में उनके कथन का उद्धरण था कि जवाहरलाल नेहरू का “आत्म केंद्रित” दृष्टिकोण विभाजन के लिए एक सहायक कारक हो सकता है। दलाई लामा के अनुसार नेहरु प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक थे इसीलिए उन्होंने महात्मा गाँधी का यह सुझाव स्वीकार नहीं किया था कि भारत को एकजुट रखने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाया जाए।

उन्होंने कहा, “भारत के इतिहास में झांकिए, मुझे लगता है कि गाँधी की तीव्र इच्छा थी कि जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाया जाए लेकिन पंडित नेहरु ने इंकार कर दिया था। मुझे लगता है कि पंडित नेहरु का दृष्टिकोण थोड़ा-बहुत आत्मकेंद्रित था कि ‘प्रधानमंत्री मुझे बनना चाहिए’। यदि महात्मा गाँधी की सोच को अमल में लाया जाता तो भारत और पाकिस्तान अलग नहीं हुए होते।”

दलाई लामा जैसे राजमर्मज्ञ व्यक्ति द्वारा यह बयान डरावना है।

पहला, उन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री पद का अधिकार देना गाँधी के हाथ में था, जिसे भी वह पसंद करते, जिसमें जिन्ना (जिन्हें गाँधी विशेष रूप से पसंद नहीं करते थे) शामिल थे। जबकि नेहरू को आत्म केन्द्रित कहा भी जा सकता है या नहीं भी कहा जा सकता है, लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री पद पर जिन्ना, जो 1947 के लिए सांप्रदायिकता की आग फैलाने में व्यस्त थे, से ज्यादा अधिकार नेहरू का था। एक ऐसे व्यक्ति के हाँथों में सत्ता सौंपने की गाँधी की इच्छा जिस पर आबादी के एक बड़े हिस्से द्वारा विश्वास नहीं किया जाता था, न केवल निरंकुश थी बल्कि यह एक पक्षपात भी था। इस तरह का रवैया सुधीन्द्र कुलकर्णी जैसे शांतिप्रिय लोगों को लगातार अपनी ओर आकर्षित करना जारी रखता है, जिन्होंने हाल ही में लिखा था कि पाकिस्तान वित्तीय संकट से जूझ रहा है और भारत को इसकी सहायता करनी चाहिए, जबकि हम बखूबी जानते हैं कि इसके संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा सेना को जाता है जिसका एक ही इरादा है भारत को बर्बाद करना। संक्षेप में, भारत के लिए यह अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही विनाश को वित्त पोषित करना होगा।

दूसरा, 1940 में प्रस्तावित किये गए सभी समाधानों का उद्देश्य मुस्लिम लीग को भारतीय शासन में एक बड़ा वीटो देना था। नेहरू की अध्यक्षता वाली अंतरिम सरकार में यह काफी हद तक साबित हो गया था| नेहरू और पटेल को यह भरोसा दिलाते हुए कि किसी भी बहुमत निर्णय पर एक मुस्लिम वीटो पर आधारित एक संयुक्त अस्तित्व अप्रभावी था, वित्त मंत्री लियाकत अली ने गृह मंत्री सरदार पटेल के सभी प्रस्तावों को ख़ारिज किया था। जबकि एक एकीकृत देश के लिए कड़ी मेहनत की कोशिश न करने के लिए कोई उन्हें दोषी ठहरा सकता है, लेकिन वास्तविकता तो यह थी किः केवल विभाजन की वजह से ही भारत भली प्रकार नियंत्रित रहा और एक लोकतंत्र बना रहा। कोई भी यह कल्पना कर सकता है कि एक मुस्लिम वीटो के भारतीय संविधान का हिस्सा बनने के बाद क्या हो सकता था। हमारे पास एक धर्मनिरपेक्ष संविधान कभी नहीं होता और इसमें शरिया कानून शामिल कर दिया गया होता कम से कम उतना तो जरूर जितना मुस्लिमों पर लागू होता है।

गुलाबी रंग के चश्मे से देखने पर संयुक्त भारत का दृश्य आदर्श प्रतीत हो सकता है लेकिन वास्तव में इसकी सच्चाई कुछ और है। जिन्ना के नेतृत्व वाली एक सरकार और एक अन्तर्निहित मुस्लिम वीटो के साथ एक संयुक्त भारत का उद्भव संभव न होता। इसलिए, दलाई लामा पूरी तरह से गलत हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।