राजनीति
संविधान निर्माता अंबेडकर को इस्लामी झंडे पर टाँगने का छलावा शाहीन बाग में खुल गया

अभी 26 जनवरी गुज़री है, भारत के संविधान के 70 वर्ष हो गए हैं। भारत के नागरिकता कानून का संशोधन संसद से पारित हुआ, और उसपर राष्ट्रपति का अनुमोदन प्राप्त हो गया है। महात्मा गांधी और स्वयं कांग्रेस की स्थापित नीतियों के अनुसार इसके अंतर्गत इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से 2014 से पहले आए प्रताड़ित विस्थापितों को भारतीय नागरिकता देने का कानून लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पारित हो गया। 

विपक्षी दलों ने महान उत्साह के साथ डॉ अंबेडकर के चित्र लगाकर संविधान की रक्षा के नाम पर संवैधानिक विधि से पारित विधेयक का विरोध आरंभ किया। विरोध के पीछे विपक्ष का मंतव्य आगामी दिल्ली चुनाव के परिपेक्ष्य में अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण था। 

इसमें कुछ नया नहीं था। भारतीय समाज का एक वर्ग स्वतंत्रता के बाद से रहा है जिसका वोट मूलभूत नागरिक सुविधाओं, विकास आदि के नाम पर नहीं, सिर्फ धर्म के नाम पर प्राप्त किया जाता रहा है। इस कवायद में धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांतसब धर्म से सामान निरपेक्षता अथवा दुराव को सब धर्मों से सामान सामीप्य से पलट कर रख दिया गया। 

कठिनाई इसमें यह रही कि सामान दूरी देखी, मापी और रखी जा सकती है परंतु सामीप्य का नापना कठिन है। इस कठिनाई से सांप्रदायिक राजनीति निकलती है जिस के गिर्द भारतीय सत्ता के समीकरण घुमते रहे हैं। इस बार भी कांग्रेसी नेताओं के नाम निकलकर आए, आम आदमी पार्टी (आप) के नेता जामिया और सीलमपुर में दिखे। 

शासन, जो लोकतंत्र में हाशिये पर खड़े व्यक्ति के विचारों और आशाओं का प्रतिनिधित्व करता है, उसे भीड़ के उन्मादी शोर से आतंकित करने का प्रयास किया गया। शुष्क राजनीतिक गणना यह थी कि अल्पसंख्यक कौम के नाम पर विपक्ष के साथ खड़ा हो जाएगा और बहुसंख्यक अपने बहुसंख्यक होम पर लज्जित, अलग-अलग मुद्दों पर वैसे ही शांत खड़ा रहेगा जैसे 70 वर्ष खड़ा रहा है।

एक जातिवर्ग में बँटे बहुसंख्यक समाज को विपक्षद्वारा पोषित अल्पसंख्यक जब धमकाएगा, तो उसके विरोध में एक आध स्वर उठेंगे तो संविधान, लोकतंत्र जैसे नैतिक शब्दों का प्रयोग करके उसे शर्मिंदा कर दिया जाएगा। एक बुद्धिजीवी वर्ग जो समाज के सत्य का प्रतिबिंब होने के स्थान पर स्वयं एक अर्धसत्य के निर्माण करने का प्रयास कर रहा है, इस दंगाई आंदोलन को नैतिकता के रंग रोगन से लीपने-पोतने में लगा रहा। 

इस बार समस्या यह खड़ी हो गई कि गणित पलट गए। मूक बहुसंख्यक बोल उठा, और तो और संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के महान विज्ञापनों के पीछे जिन सांप्रदायिक विचारों को छुपे रहना था, वे सामने आने को मचल गए। 

जामिया का दंगा बरखा दत्त ने पोछा ही था और दंगाइयों को बचाने के लिए पुलिस कार्रवाई के बीच आई महिलाओं को रण नायिका बनाने का प्रयास किया ही था कि उनके भारत में इस्लामिक राष्ट्र बनाने की महत्वाकांक्षा के फेसबुक पोस्ट सामने गए।

जामिया से भगाए हुए दंगाइयों ने आम आदमी विधायक अमानतुल्लाह खान के गढ़, शाहीन बाग़ में बुज़ुर्ग महिलाओं को आगे करके तहरीर स्क्वायर बनाने का प्रयास किया और महीने भर को सड़क बंद हो गई। बंगाल में रेल पर पथराव हुआ, कानपूर में, मेरठ में दंगा हुआ।

परंतु एक विचित्र चीज़ हुई जो पहले नहीं होती थी। विपरीत दिशा से सही मायने में अहिंसक प्रदर्शन नए कानून के समर्थन में हुए। हिंसा के प्रत्युत्तर में आम जनता ने शासन को विधिवत कार्यवाही के लिए प्रेरित किया, कोई जवाबी हिंसा नहीं हुई। हिंसक, सांप्रदायिक विरोध की स्थिति उस भेड़ की तरह हो गई जो दर्पण में अपनी ही छवि को सींग मारता है। 

भारत में अल्पसंख्यक समाज जिसमें वर्षों से शासन की मूक सहमति से एक उग्र सांप्रदायिकता भरी जा रही थी, जिसका सूचक वह शाहीन बाग है जहाँ सड़के खराब हैं, बिजली के तार फैले हुए हैं, गंदगी है, शिक्षा के साधन नहीं हैं परंतु मस्जिदें विशाल हैं।

प्रबुध्द वर्ग वहाँ धरने पर बैठी महिलाओं को साधुवाद कहता है परंतु 21वीं सदी की दिल्ली में अपने विधानसभा क्षेत्र को 18वीं सदी में रोककर खड़े विधायक से प्रश्न नहीं करता है। वे यह नहीं पूछते कि संशोधन को यदि भू अधिग्रहण विधेयक की भाँति भीड़ की धमकी से यदि आप वापस करवा भी दें तो शाहीन बाग की दादियों के पोतों को उन झुग्गियों से बाहर क्या वही विधायक निकालेगा जो चार वर्ष कुछ भला कर सका जब दिल्ली की बसें काम होती गईं, पानीहवा दूषित होती गई, और अंत में चुनाव के पहले धर्मोन्मादी भीड़ से दंगे करा पाया

ऐसा नहीं है कि पहले राज्यों में विपक्ष की सरकार ने केंद्र की सरकार का विरोध नहीं किया। परंतु राज्य सरकार केंद्र सरकार के साथ जुड़कर सत्ता का भाग रही, सरकार और पार्टी हमेशा अलग रहे हैं। नागरिकता कानून पर भी यदि कम्युनिस्ट पार्टी, तृणमूल या आम आदमी पार्टी अदालत जाए तो स्वीकार्य है परंतु शासन में बैठी सरकार स्वयं अराजकता के पक्ष में खड़ी हो जाए, यह सर्वथा अनुचित है।

राष्ट्र की नागरिकता केंद्र का विषय है, इसपर पार्टी अदालत में जा सकती है, राज्य सरकार नहीं। राज्य सरकार अपने राज्य के हर व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, चाहे वो संशोधन के पक्ष में हो या विपक्ष में। नागरिकता आंदोलन के संदर्भ में पार्टी और सरकार का भेद समाप्त होता जान पड़ता है। किसी भी राज्य की सरकार विधिवत पारित कानून के विरोध में खड़ी हो जाए इससे अधिक असंवैधानिक क्या होगा?

इस सारे प्रकरण में दो चीज़े हुईं

एक  तो प्रदर्शनकारियों का इस्लामिक एजेंडा खुलकर सामने गया, और बहुसंख्यक भी संभवतः पहली बार समझ पाया कि आज वह एक भारतीय संस्कृति और धर्म के रूप में उसी स्थान पर जहाँ तीसरी सदी में पहले ईसाई रोमन सम्राट कोंस्टनटिन के समय रोम की पुरातन धर्म संस्कृति थी। भारत का यह सौभाग्य है कि सत्ता पर इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण के समय कोई विरोधी शक्ति नहीं है।

दूसरी  बात यह हुई कि पहली बार वामपंथियों के हाथ से इस्लामीवाद ने आंदोलन को अपनी ओ खींचना प्रारंभ किया। यह वामपंथी आंदोलन का आतंरिक विद्रोह है। जो इस्लाम वामपंथ की खाली होती सेना के लिए पैदल सैनिकों की व्यवस्था करता रहा, अब धीरज खोता दिखा और ध्वजा छीन रहा है।  

एक वीभत्स उन्मादी विचारधारा को नैतिक आवरण ढाँपने के प्रयास को शाहीन बाग ने पूरी तरह से नकार दिया है और नारातक़बीर को थाम लिया है। माओ और मौलाना के इस आतंरिक युद्ध जहाँ मुसलमान मार्क्स को छोड़कर मस्जिद का राज मांग रहा है, बहुसंख्यक भी संभवतः पहली बार मुखर हो आया है। 

एक खोखले आदर्श की भाँति अंबेडकर को इस्लामी झंडे के ऊपर टाँगने का छलावा खुल गया है। 25 नवंबर 1949 को दिए अपने भाषण, अराजकता का व्याकरण में अंबेडकर कहते हैं कि समाजवादी अनिर्बाधित स्वतंत्रता इसलिए चाहते हैं ताकि यदि वे लोकतांत्रिक साधनों से सत्ता प्राप्त कर सकें तो इन प्रावधानों का दुरुपयोग करके सिर्फ शासन का विरोध कर सकें बल्कि बलपूर्वक सत्ता परिवर्तन कर सकें।

अंबेडकर की तस्वीर टाँगे घूमने वाले कामरेड को उनकी यह बात पसंद नहीं आएगी। उनका प्रयास हमेशा यह रहा कि अंबेडकर को नीली मूर्तियों से अधिक कोई जाने। कांग्रेस के अराजकता के मार्ग से सत्ता तक पहुँचने के कार्यक्रम का क्या होगा यदि लोग पढ़ लें कि उसी भाषण में बाबा साहेब ने आगे कहा था कि आप वयस्क मतदान में दो-तिहाई भाग पाकर संसद नहीं पहुँच सकते हैं तो उनके असंतोष को जनसाधारण का असंतोष मानने का कोई औचित्य ही नहीं है।

अच्छा है कि युवा वर्ग आज संविधान पढ़ रहा है, प्रस्तावना पढ़ रहा है। अच्छा यह भी होगा कि इसका विरोध करने के स्थान पर संविधान की यात्रा पर सत्ता पक्ष जनजागरण अभियान चलाए। जनता को ज्ञात होना चाहिए कि भारतीय संविधान में अब तक 104 संशोधन हुए हैं। पाँच संशोधन नरेंद्र मोदी सरकार ने किए हैं, 15 संशोधन वाजपेयी सरकार में हुए। नौ संशोधन अन्य विपक्षी दलों के कार्यकाल में हुए, शेष संशोधन कांग्रेस की सरकार में हुए।

मसलन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला संशोधन नेहरू लाए और उसका सबसे अधिक विरोध श्यामाप्रसाद मुख़र्जी ने किया। उसपर संसद में जो बहस हुई थी उसके विषय में अधिक जानने के लिए पढ़ें

मूलभूत संवैधानिक अधिकारों और उनके अनुल्लंघनीय होने पर भी बड़ी चर्चा है। संविधान के 24वें संशोधन में संसद को इंदिरा गांधी के शासन में यह अधिकार दिया गया था कि वह मूलभूत अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है। 

ऐसा ही सशोधन 39वाँ संशोधन था जिसमें प्रधानमंत्री को न्यायिक विवेचना से बहार रखने का प्रावधान था। इसे सर्वोच्च न्यायलय ने बाद में निरस्त किया। संविधान के 42वें संशोधन में इंदिरा गांधी पुनः संशोधन लेकर आईं जिसमे संसद को संविधान में परिवर्तन के निर्बाध अधिकार दिए गए। 1980 में मिनर्वा मिल मामले में यह फिर पलट दिया गया, और संविधान की मूल संरचना पर बात हुई।

एक अन्य महत्वपूर्ण संशोधन राजीव गांधी के समय में, 59वाँ संशोधन था जिसमें राष्ट्रपति शासन की अवधि पंजाब में एक से तीन वर्ष करने की अनुशंसा की गई। आज जब कश्मीर पर कांग्रेस के लोग प्रश्न उठाते हैं, पंजाब भूल जाते हैं। सत्य ही है कि राजनीति जनता की लघु स्मृति पर ही आधारित है। विडंबना ही है कि कांग्रेस नरेंद्र मोदी को संविधान की प्रति भेज रही है।

बहरहाल, नागरिकता संशोधन पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी विपक्षी पार्टियों की हिंसक और धर्मांध भीड़ के माध्यम से लोकतांत्रिक सत्ता को आतंकित करने के प्रयास, मूक बहुमत के सुसभ्य पलटवार के कारण उल्टा पड़ गया है। 

अब केजरीवाल जैसे नेता के लिए शाहीन बाग़ उस बाघ की भाँति हो गया है जिसकी सवारी करने अब कठिन हो चला है और जिससे उतरना असंभव। जो उप-मुख्यमंत्री भीड़ की हिंसा को उचित दिखने के लिए झूठे वीडियो प्रसारित कर रहे थे, और जो मंत्री इस्लाम खतरे में दिखा कर भीड़ को उत्तेजित कर रहे थे, उनके नेता केजरीवाल आज विपरीत ध्रुवीकरण से चिंतित होकर केंद्र से शाहीन बाग़ का धरना बंद करने को कह रहे हैं। 

12 प्रतिशत जनता को एक जुट होकर वोट करने को कहने वाले नेता, आज देश की राजधानी को बंधक देखकर दुखी हुई 88 प्रतिशत जनता के जवाब को लेकर आशंकित हो रहे हैं। परंतु क्या अब देर हो चुकी है? इस प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ में है।