राजनीति
कन्याकुमारी चुनाव- प्रतिद्वंद्व भाजपा और कांग्रेस में लेकिन निर्णायक कोई और

आशुचित्र- कन्याकुमारी का रणक्षेत्र कांग्रेस और भाजपा के मध्य कड़ा मुकाबला देखेगा लेकिन परिणाम को अंतिम मोड़ देने का कार्य अममुक पर है।

भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित कन्याकुमारी लोकसभा संसदीय क्षेत्र तमिल नाडु की 39 सीटों में से एक है। 2008 में संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन के बाद तिरुचेंदुर से अलग होकर इसका गठन हुआ था। इससे पहले 10 वर्षों तक यहाँ द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) का शासन रहा था और पारंपरिक रूप से यह कांग्रेस का गढ़ माना जाता है।

2009 लोकसभा चुनावों में भी 41.81 प्रतिशत मतों से द्रमुक के जे पेलेन डेविडसन ही जीते थे लेकिन भाजपा के पोन राधाकृष्णन भी 33.24 प्रतिशत मतों से सम्मानीय स्थिति के साथ द्वितीय स्थान पर रहे थे। 2014 में मोदी लहर का लाभ उठाकर राधाकृष्णन ने अपनी स्थिति को सुधारा और 37.62 प्रतिशत मतों के साथ चुनाव जीता। साथ ही अन्नाद्रमुक और कांग्रेस के भी चुनाव में उतरने से द्रमुक चौथे स्थान पर फिसल गया था।

अब जानते हैं 2014 से 2019 तक यहाँ क्या-क्या बदला-

पोन राधाकृष्णन के विकास कार्य

सांसदों के स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैड्स) के तहत मिलने वाले 25 करोड़ रुपये का राधाकृष्णन ने पूर्ण उपयोग किया है। 2014 से 2019 तक उन्होंने सभागृहों और सामुदायिक भवनों के निर्माण में 6.6 करोड़ रुपये खर्च किए। इनमें से कई सभागृह मंदिरों के निकट बनाए गए हैं। सूत्रों के अनुसार उनके द्वारा शुरू की गई 558 योजनाओं में से 75 प्रतिशत पूरी की जा चुकी हैं और इसके लिए 1 करोड़ रुपये राज्य सभा सांसद के कोष से भी लिये गए। सड़कों, पीने के पानी और पुस्तकालयों के लिए भी काफी राशि लगाई गई है।

केंद्र सरकार ने रेल परियोजनाओं के माध्यम से भी इस क्षेत्र में निवेश किया है। मदुरै से चेन्नई के बीच तेजस एक्सप्रेस चलाई गई। रामेश्वरम व धनुषकोड़ी को जोड़ने के लिए रेल लाइन का शिलान्यास भी किया गया। रामेश्वरम को जोड़ने के लिए पांबन पुल का भी शिलान्यास किया गया जो तैयार हो जाने के बाद 104 साल पुराने पुल का स्थान ले लेगा। राधाकृष्णन के प्रयासों से पिछले माह ही तंबारम-नगरकोइल ट्रेन भी शुरू की गई। चेन्नई से कन्याकुमारी तक औद्योगिक गलियारा भी बनाया जाएगा।

पनागुड़ी से कन्याकुमारी को जोड़ने वाले एनएच 87 का चौड़ीकरण कर इसे 4 लेन का बनाया जा रहा है। कन्याकुमारी में सड़क सुरक्षा पार्क व परिवहन संग्रहालय का उद्घाटन भी किया गया। जिले में सड़क निर्माण के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 में 300 करोड़ रुपये आवंटित भी किए थे। 314 करोड़ रुपये के दो स्टील पुल निर्माण के बाद नगरकोइल में कन्याकुमारी का सबसे महंगा स्टील पुल 400 करोड़ रुपये की लागत से बनाया जाएगा।

चुनावी समीकरणों में अंतर

2014 में भाजपा, कांग्रेस, द्रमुक और अन्नाद्रमुक सभी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था लेकिन इस वर्ष राज्य में द्रमुक से कांग्रेस के गठबंधन और अन्नाद्रमुक से भाजपा के गठबंधन से कन्याकुमारी में कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी आमने-सामने हैं। भाजपा वर्तमान सांसद पोन राधाकृष्णन को मैदान में उतार रही है, वहीं कांग्रेस ने एच वसंतकुमार को चुनाव में खड़ा किया है।

2014 में भी यही दो उम्मीदवार आमने-सामने थे लेकिन उस समय अन्नाद्रमुक और द्रमुक भी चुनाव में उतरे थे। ऐसे में वसंतकुमार द्वितीय स्थान पर रहे थे। 2006 में और 2016 में वे इसी लोकसभा क्षेत्र में आने वाले नगुनेरी विधान सभा क्षेत्र से विधायक भी चुने गए थे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दोनों ही चुनावों में कांग्रेस और द्रमुक ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। हालाँकि 2011 में भी ऐसा ही था लेकिन वे जयललिता की लहर के सामने हार गए थे।

इसके अलावा 2016 के विधान सभा चुनावों को देखा जाए तो कन्याकुमारी में आने वाली सभी छह विधान सभा सीटों पर कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन ही जीता था जिसके कारण अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि कांग्रेस को इस क्षेत्र में लाभ मिलेगा।

लेकिन इस द्विपक्षीय मुकाबले में तीसरे पक्ष के रूप में उभरा है अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (अममुक)। अगस्त 2017 में अन्नाद्रमुक से निकाले गए शशिकला के भतीजे ने 15 मार्च 2018 को इस पार्टी का गठन किया था। जहाँ एक तरफ यह अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि अन्नाद्रमुक से अलग होते समय कुछ कार्यकर्ता अममुक में सम्मिलित हो गए थे जिसके कारण अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन के कुछ मत यहाँ हस्तांतरित होंगे, वहीं इसके कारण कांग्रेस के मतों में सेंध लगने की अधिक आशंका है क्योंकि कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन के कुछ अल्पसंख्यक मत अममुक की झोली में जाएँगे।

मोदी लहर की स्थिति

निस्संदेह ही 2014 की तुलना में मोदी लहर में कमी आई है लेकिन फिर भी लोग देश के लिए मोदी को बेहतर मानते हैं और स्थानीय मुद्दों से ऊपर राष्ट्रीय मुद्दों को रखने के लिए तैयार हैं, विशेषकर हिंदू। इसके अलावा तमिल नाडु में भले ही सवर्णों की संख्या कम हो लेकिन कन्याकुमारी में वेल्लारों और नायरों की संख्या अधिक है जो 10 प्रतिशत आर्थिक पिछड़ा वर्ग आरक्षण के मिलने से भाजपा के पक्ष में आ गए हैं।

इन परिवर्तनों के अलावा कुछ अन्य कारक हैं जो चुनावी परिणाम को प्रभावित करेंगे। जानते हैं इनके विषय में-

जनसांख्यिकी और ध्रुवीकरण

क्षेत्र में 1982 के दंगों के बाद से धार्मिक ध्रुवीकरण चुनावों को प्रभावित करते आए हैं। कन्याकुमारी संसदीय क्षेत्र व कन्याकुमारी जिले का क्षेत्र एक ही है और 2011 की जनगणना के अनुसार इस जिले का जनसांख्यिकी डाटा निम्नलिखित है-

धर्म हिंदू मुस्लिम ईसाई
जनसंख्या 9,09,872 78,590 8,76,99
प्रतिशत (%) 48.65% 4.20 46.85

इस वर्ष की शुरुआत में धर्मांतरण का विरोध कर रहे रामालिंगम की हत्या ने स्थानीय हिंदुओं को एक संदेश भेजा है जिसके कारण उनके मत भाजपा की ओर संगठित होने की संभावना है। इसके साथ ही इस क्षेत्र के हिंदुओं में हिंदू मुन्नानी, शिवसेना, हिंदू मक्कल काची और विश्व हिंदू परिषद के सक्रिय होने से हिंदुत्व की भावना व्याप्त है।

दूसरी ओर चर्च व जमात भाजपा के विरुद्ध मतों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। हालाँकि एक पादरी राधाकृष्णन के समर्थन में सामने आए हैं और कुछ ईसाई उनके विकास कार्य से परभावित भी हैं लेकिन इस ध्रुवीकरण के आगे भाजपा के समर्थकों की संख्या कम ही रहेगी।

जहाँ बात जातीय समीकरणों की आती है तो इसमें पोन राधाकृष्णन का वर्चस्व दिखता है क्योंकि वे एक नाडार हैं और कन्याकुमारी में हिंदू नाडारों, ईसाई नाडारों, पिल्लीमारों (वेल्लालार) और कृष्णावागों की संख्या अधिक है जो उन्हें बेहतर स्थिति में डालते हैं।

गठबंधन में मत हस्तांतरण

2016 के विधान सभा चुनावों में देखा गया कि कांग्रेस और द्रमुक के बीच मतों का हस्तांतरण सुचारु रूप से हुआ जिसकी संभावना इस चुनाव में भी है लेकिन अममुक इनमें से कुछ मतों को चुरा सकता है। वहीं दूसरी ओर अन्नाद्रमुक से भाजपा को मत हस्तांतरण में यह गठबंधन कुछ अल्पसंख्यक मतों को खो देगा क्योंकि अन्नाद्रमुक को ईसाई मत मिलते थे लेकिन उपरोक्त ध्रुवीकरण के कारण इन मतों का भाजपा की झोली में आना मुश्किल है।

मछुआरों का असंतोष

भाजपा सरकार द्वारा शुरू की गई सागरमाला योजना के अंतर्गत बंदरगाहों के निर्माण से मछुआरे नाराज़ हैं। उनका कहना है कि व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने से उनका कार्यक्षेत्र प्रभावित होगा व साथ ही इसके कारण समुद्री तूफानों में भी वृद्धि होगी। कन्याकुमारी जिले में लगभग 8 प्रतिशत मछुआरे हैं जिसमें से 5 प्रतिशत ईसाई व 3 प्रतिशत हिंदू मछुआरे होंगे। इस कारण भाजपा ये 3 प्रतिशत मत खो सकती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो कन्याकुमारी का यह रणक्षेत्र कांग्रेस और भाजपा के मध्य कड़ा मुकाबला देखेगा जहाँ भाजपा के पक्ष में हिंदू मत व विकास है, वहीं कांग्रेस के मत में गैर-हिंदू और मछुआरे मत हैं जो दोनों को लगभग समान स्थिति में लेकर आते हैं लेकिन परिणाम को अंतिम मोड़ देने का कार्य अममुक पर है।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।

तमिल नाडु के मूल निवासी साई गणेश व विक्रम को सहयोग हेतु आभार।