राजनीति
संगठनात्मक संरचना के साथ समीक्षा रिपोर्टों की उपेक्षा भी है कांग्रेस के पतन का कारण

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव का बिगुल कभी भी बज सकता है, लेकिन पार्टी में आंतरिक गुटबाजी चरम पर है। स्थिति यह है कि हर राज्य के छोटे से लेकर बड़े मसलों को सीधे अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर सुलझाया जा रहा है।

पार्टी के अंदर समस्या इतनी विकराल हो गई है कि एक प्रदेश का मसला सुलझता नहीं है कि दूसरे प्रदेश के नेता अपनी समस्या लेकर आ जाते हैं। मसलन, महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, मध्यप्रदेश और राजस्थान में गुटबाजी का समाधान पार्टी अभी तक नहीं निकाल पाई है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता पर काबिज है, जबकि हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में इस साल चुनाव होने हैं।

पार्टी में सारी लड़ाई आपसी वर्चस्व हासिल करने की है और जो नेता इस लड़ाई में पीछे छूट जाते हैं, वे बेधड़क पार्टी छोड़कर बाहर निकल जा रहे हैं। यानी कहा जाए कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद से ही पार्टी में भगदड़ जैसी स्थिति है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

राजनीति पर पकड़ रखने वाले पार्टी के अंदर मची इस घमासान को बुजुर्ग और युवाओं के बीच लड़ाई बता रहे हैं। जहाँ राजस्थान में अशोक गहलोत सचिन पायलट को किनारे करने में लगे हैं, वहीं दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की जोड़ी मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को अलग-थलग करने की जाल बिछा रहे हैं। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा गुट पिछले ही दिनों युवा अशोक तंवर को पार्टी के अध्यक्ष से बाहर का रास्ता दिखाने में कामयाब हो चुका है।

कुल मिलाकर कांग्रेस नेता एक दूसरे को किनारे करने में ही लगे हैं और परिणाम यह रहा कि लोकसभा चुनाव में पार्टी ही किनारे हो गई। लेकिन कांग्रेस में ऐसी स्थिति उत्पन्न होने का ज़िम्मेदार कौन है? कभी आज़ादी से पाँच दशक तक एकक्षत्र राज करने वाली कांग्रेस अब क्यों हाँफने लगी?

इस सवाल के जवाब टटोलने के लिए हमें 1990 के दौर में वापस जाना पड़ेगा, जब कांग्रेस के कद्दावर नेता उमाशंकर दीक्षित ने कांग्रेस संगठन पर अपनी रिपोर्ट बनाकर पार्टी को सौंपी। उस रिपोर्ट के बाद कांग्रेस में आंतरिक हलचल मच गई।

कांग्रेस पर दलालों का कब्ज़ा

1984 के लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत मिलने के दो साल बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को संगठन के प्रति संदेह होने लगा था। एक दिन वे कांग्रेस के दिग्गज नेता और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल की सेवा से निवृत्त होकर दिल्ली आए उमाशंकर दीक्षित से मिलने पहुँचे।

दीक्षित ने मुलाकात के दौरान राजीव गांधी से अपने लिए पार्टी में काम मांग लिया। राजीव ने उन्हें तुरंत पार्टी संगठन पर एक रिपोर्ट बनाने का जिम्मा सौंप दिया। उमाशंकर दीक्षित कमेटी में एक महत्त्वपूर्ण सदस्य और उस वक्त राजीव गांधी के सबसे करीबी मणिशंकर अय्यर भी थे।

दीक्षित ने 1987 में अपनी रिपोर्ट पार्टी को सौंप दिया। रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले खुलासे थे। यह बात अलग है कि पार्टी ने उस रिपोर्ट को न तो कभी सार्वजनिक किया न ही अपने कार्यकर्ताओं को देखने दिया, लेकिन रिपोर्ट में संगठन स्तर पर 42 कमियाँ बताई गई थीं।

उमाशंकर दीक्षित अपनी रिपोर्ट में पार्टी पर दलालों और पूंजिपतियों का कब्जा बताया। कैसे दलाल और पूँजिपति अपने काम चलाने के लिए कांग्रेस के संगठन का दुरुपयोग कर रहे हैं? इसका जिक्र भी रिपोर्ट में किया गया था। राजीव गांधी ने इस रिपोर्ट को लागू करने की बात कही थी, लेकिन रिपोर्ट को कुछ ही सालों में पार्टी दफ्तर 24 अकबर रोड के किसी कोने में दफना दिया गया।

एंटनी कमेटी की पहली रिपोर्ट

1999 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई। एंटनी कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट पार्टी को सौंपी, लेकिन इस बार भी यह रिपोर्ट न तो सार्वजनिक की गई और न ही कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को बताया गया।

एंटनी कमेटी ने पार्टी में आमूलचूल परिवर्तन की बात कहते हुए समान विचारधारा वाले दलों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन की बात कही। पार्टी ने 2003 के पंचमढ़ी के अधिवेशन में चुनाव पूर्व गठबंधन की बात पर मोहर लगा दिया, बाकी की सभी सिफारिशे जस के तस रह गईं।

2013 में हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी के हार के बाद पार्टी नेता मणिशंकर अय्यर ने फिर से दीक्षित-एंटोन कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की बात उठा दी, लेकिन कांग्रेस के किसी नेता ने उनकी बातों को तवज्जो नहीं दिया।

2014 पार्टी की शर्मनाक हार हुई और मोदी लहर में पार्टी 50 का आँकड़ा भी पार नहीं कर पाई। पार्टी में फिर से आत्म-मंथन का बिगुल बजा और पार्टी की सबसे बड़ी इकाई कांग्रेस कार्यसमिति ने फिर से एके एंटनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी।

राहुल को क्लीनचिट

हार के कारण ढूँढने के लिए बनी एंटनी कमेटी ने अपना पूरा ध्यान पार्टी के युवराज राहुल गांधी को क्लीनचिट देने पर लगाया। कमेटी ने हार का ठीकरा मनमोहन सरकार पर फोड़ दिया। रिपोर्ट में कहा गया कि मनमोहन सरकार अपनी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने में असफल रही, जिसके कारण पार्टी को हार का मुँह देखना पड़ा।

कांग्रेस में न दीक्षित कमेटी की रिपोर्ट से कुछ बदला और न ही एंटनी कमेटी की दोनों रिपोर्ट से। इसके पीछे अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वह कांग्रेस की सबसे बड़ी इकाई कांग्रेस कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी। कांग्रेस कार्यसमिति कांग्रेस नीतिगत के सभी बड़े फैसले लेती है, इसमें 25 सदस्य होते हैं।

वर्तमान में कांग्रेस कार्यसमिति में 23 स्थायी सदस्य हैं, जिनमें से 13 सदस्य 75 पार उम्र के हैं। सत्ताधारी दल भाजपा में जहाँ 75 पार के नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में बैठा दिया जाता है, वहीं कांग्रेस मेंं इस उम्र के नेता पार्टी की सर्वोच्च इकाई में बैठकर नीति तय करते हैं।

राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के पीछे भी यही कारण बताया जा रहा था। राहुल चाहते थे कि सभी बड़े नेता पार्टी के पद से इस्तीफा दें लेकिन राहुल के इस्तीफे के बाद भी किसी ने इस्तीफा नहीं दिया।

कांग्रेस को चाहिए कि वह अपनी सर्वोच्च इकाई में बड़ा फेरबदल करे। देश में युवाओं की संख्या 40 प्रतिशत से ऊपर है। युवा ही देश की राजनीति का भविष्य है। पार्टी के अंदर बुजुर्ग और युवाओं के बीच चल रहे द्वंद में बुजुर्ग नेताओं से पार्टी के लिए त्याग करने के लिए कहना चाहिए, वरना एक वक्त ऐसा आएगा कि पार्टी को ढूँढने से भी उसको निष्ठावान कार्यकर्ता नहीं मिलेंगे।

अविनीश मिश्रा स्वराज्य में समाचार सहयोगी हैं। वे @HelloAvinish द्वारा ट्वीट करते हैं।