राजनीति
विरोध की राजनीति तक सीमित हो रही कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा ‘विकल्प’ बनना

लोकतंत्र में विपक्ष हमेशा सत्तापक्ष का स्वाभाविक विकल्प माना जाता है। परंतु, राजनीति में किसी का विकल्प होने के लिए मात्र अलग अस्तित्व ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि एक वैकल्पिक विचार और विज़न गढ़ना होता है। केंद्र की राजनीति में भाजपा से मुकाबला कर रही कांग्रेस का यही संकट है। यह भारत की राजनीति के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश पर सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला दल आज 2019 के लोकसभा चुनाव की पूर्वसंध्या पर भी केवल विरोध की राजनीति करके अपना काम चलता हुआ प्रतीत हो रहा है।

2014 के चुनावों में अगर भाजपा निर्णायक बहुमत के साथ जीत हासिल कर सकी तो उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उसने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के माध्यम से शासन चलाने का एक ‘वैकल्पिक नज़रिया’ रखा था, जो तत्कालीन यूपीए सरकार की शैली को चुनौती देता था। हालाँकि उस समय तक आम लोग कांग्रेस नीत यूपीए में फैले भ्रष्टाचार और अनिर्णय से उकता चुके थे, और बेचैनी के साथ विकल्प तलाश रहे थे। लेकिन यदि भाजपा और वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी सशक्त तरीके से यह नहीं बता पाते कि वे कांग्रेस से अलग क्या करने का इरादा रखते हैं और उसे वह कैसे करेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें यह सफलता नहीं मिलती। मात्र सत्ता-विरोधी रुझानों के भरोसे बैठने और उन्हें हवा देते रहने से बहुमत तो दूर सबसे बड़ा दल बन पाना भी मुश्किल होता।

2014 के चुनावों के लिए नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2013 में शुरू किए गए अपने प्रचार अभियान में जब यह कहा, “मैं इसी संविधान के तहत इन्हीं कानूनों और व्यस्थाओं तथा इन्हीं अधिकारियों के साथ काम करते हुए रिजल्ट दूंगा” तब इसका लोगों पर असर हुआ। जिसका पूरा प्रतिबिंब चुनाव परिणामों में भी देखने को मिला था।

नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव अभियान में गुजरात में अपने द्वारा सफलतापूर्वक सरकार चलाने के अनुभवों का हवाला देते हुए न सिर्फ अपने आप को प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया था बल्कि ‘गुजरात मॉडल’ और कांग्रेस के मॉडल के बीच बार बार में तुलना करके एक बहस को जन्म दिया। गुजरात में कृषि के क्षेत्र में तकनीक के प्रयोग का प्रचार हो या विदेश नीति के क्षेत्र में पाकिस्तान को कैसे जवाब दिया जाना चाहिए- प्रत्येक छोटे, बड़े मुद्दे पर नरेंद्र मोदी ने पर्याप्त डिटेल्स के साथ अपनी बात को लोगों के सामने रखा। विकल्प पेश करने के प्रयासों में उन्होंने 15 अगस्त २०१३ को लाल किले पर होने वाले कार्यक्रम के समय पर ही एक सामानांतर कार्यक्रम भुज (गुजरात) के एक कॉलेज में आयोजित किया जहाँ उन्होंने बहुचर्चित भाषण भी दिया। उस वक़्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गुजरात के मुख्य मंत्री मोदी के भाषणों की तुलनात्मक समीक्षा ने भी बहस को जन्म दिया था।

आज 2019 में कांग्रेस एक मोदी विरोधी गिरोह के मंच की शक्ल लेते चली जा रही है। कांग्रेस में ‘रचनात्मक शून्यता’ का दौर चल रहा है।  मोदी सरकार के काम-काज की खोखली आलोचना कांग्रेस के लिए दीर्घ-कालीन राजनीति का ईंधन बिल्कुल नहीं हो सकती। मज़े की बात यह है कि कई बार आलोचना करने की झोंक में कांग्रेस ऐसे मुद्दे भी छेड़ दे रही है जिस पर खुद उसका रिकॉर्ड ज्यादा ख़राब रहा है। इतना ही नहीं, अधकचरी तैयारी के साथ किए गए हमलों में कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी का भी मज़ाक बन जा रहा है।

आलोचना करने के लिए जो अध्ययन चाहिए, वह अगर ना हो तो आलोचना कोरे आरोप का रूप ले लेती है।

राहुल गांधी द्वारा पहले लगाया गया ‘सूट-बूट’ की सरकार का आक्षेप, अब मर्यादाओं की लचीली सीमाओं के भी बाहर सीधे प्रधानमंत्री को ‘चोर’ करार देने के स्तर तक आ गया है। राफेल मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गलत साबित दिए जाने के बाद भी राहुल गांधी जिस तरह से अपनी बात पर अड़े हुए हैं, उससे कांग्रेस के समर्थकों में कोई इज़ाफा होता नहीं दिखता। उल्टे, इससे कांग्रेस के विरोधियों द्वारा कांग्रेस को कुतर्क करने वाली पार्टी बताने का अवसर मिल रहा है। यूपीए में शामिल एनसीपी प्रमुख शरद पवार, तथा मुलायम सिंह यादव जैसे दूसरे कई गैर-भाजपा नेताओं ने भी प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार करने के आरोपों को विश्वास के योग्य नहीं माना है। लेकिन, फ़िलहाल कांग्रेस की रणनीति नरेंद्र मोदी की छवि पर हमले तक ही सीमित नजर आ रही है।

जबकि नरेंद्र मोदी की रणनीति 2014 में भी सिर्फ कांग्रेस को कोसने तक सीमित नहीं थी। गुजरात के आर्थिक विकास को मोदी ने अपनी क्षमताओं के प्रमाण के रूप में सामने रखते हुए परिवर्तन के लिए वोट मांगा था । नरेंद्र मोदी के पक्ष में यह भी गया कि उस समय गुजरात के अलावा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा जैसे राज्यों में भी उनकी पार्टी की सरकारें सफल मानी जा रहीं थीं। भाजपा द्वारा ’60 साल’ के कांग्रेस शासन की असफलता को तराजू के एक पलड़े में रख कर दूसरी ओर गुजरात मॉडल और अपनी राज्य सरकारों की सफलताएँ रखने से कांग्रेस और भाजपा के बीच का अंतर रेखांकित हो गया था।

कांग्रेस की वंश परंपरा में सोनिया गांधी द्वारा राहुल गांधी को कमान दिए जाने के बाद भी विचारों के स्तर पर कांग्रेस में कुछ भी नया देखने को नहीं मिला है। कांग्रेस के द्वारा किसानों की कर्जमाफी को प्रमुख मुद्दा बनाया गया, और जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं वहां कर्जमाफी लागू करके उसका श्रेय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को दिया गया। राजनीति में कर्जमाफी को लोकप्रियता और वोट हासिल करने के हथियार के रूप में 1970 के दशक से इस्तेमाल किया जा रहा है तथा इसके पक्ष एवं विपक्ष में दिए जाने वाले तर्कों से सभी लोग परिचित हैं। क़र्ज़ माफ़ी 2019 के चुनावों कांग्रेस के पक्ष में कोई लहर पैदा करेगी इसके आसार दूर दूर तक नज़र नहीं आ रहे। दूसरी ओर, कर्जमाफी का राग अलापने से नाराज़ होने वाला कर देने वाला तबका कांग्रेस के खिलाफ भी जा सकता है।

2009 से 2014 तक चली यूपीए-2 से तुलना करें तो, पाँच साल चली एनडीए सरकार में भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला प्रकाश में नहीं आ पाया। राफेल मसले पर कांग्रेस अब इतना आगे आ चुकी है कि कुछ भी साबित न होने के बावजूद पीछे हट पाना मुश्किल होगा। सामाजिक-आर्थिक मोर्चे पर कांग्रेस एक वैकल्पिक नज़रिया प्रस्तुत करने के बजाय अन्य रास्तों से जन समर्थन जुटाने का प्रयास कर रही है। अब यह भी देखा जा रहा है कि कांग्रेस एकजुट हिन्दू वोट के भय से या उसे पाने की लालच में अपनी नेहरूवादी धर्म-निरपेक्षता से अलग व्यवहार कर रही है। गुजरात के विधानसभा चुनावों से शुरू हुआ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मंदिरों में जाने का सिलसिला समय के साथ और तेज़ ही हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष ने आगे बढ़ कर यह भी कह दिया कि ‘हिंदू’ का अर्थ नरेंद्र मोदी को उनसे समझना चाहिए।यहाँ भी नरेंद्र मोदी का नाम घसीट लाने के बयान से यह साफ़ होता है कि राहुल गांधी सिर्फ उनते ही हिंदू होना चाहते हैं जितना होने से उन्हें नरेंद्र मोदी से अधिक हिंदू माना जाए।

कुल मिलाकर, कांग्रेस की रणनीति में अभी तक व्यक्ति-विरोध, आलोचना और आरोपों के अलावा कुछ भी ठोस नहीं दिखाई दे रहा है। इन सब से ऊपर उठ कर कांग्रेस को एक अलग छवि गढ़ने की ज़रूरत है। ताज़े विचारों को पिरो कर बनाई गईं लोकहित की नीतियों की झलक जनता को दिखानी होगी।

यदि कांग्रेस समय रहते नए विचारों को अपनाने के लिए तैयार नहीं है और पुख्ता ‘वैकल्पिक नज़रिया या मॉडल’ नहीं रख पाती है तो उसे 2019 के चुनावों से कोई बहुत अधिक उम्मीद नहीं लगानी चाहिए।

उपरोक्त लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में  राजनीति शास्त्र के शोधार्थी हैं।