राजनीति
पश्चिम बंगाल- ममता के मैदान में कांग्रेस के लिए राजनीतिक जगह नहीं

आशुचित्र- बंगाल में ममता की तृणमूल की वजह से कांग्रेस अपने अस्तित्व को खोते हुए नज़र आ रही है। और अब बनर्जी ने यह स्पष्ट कर दिया गया है कि राज्य में कांग्रेस जैसी भव्य और पुरानी पार्टी को कोई स्थान नहीं मिलेगा और एक सार्थक गठबंधन विलुप्त होने की कगार पर खड़ा है।

खरगोश के साथ दौड़ना और शिकारी कुत्ते का शिकार करने वाला रवैया अब नहीं चलेगा और कांग्रेस बंगाल में अपनी खोई हुई ज़मीन को तलाशने में संघर्ष करती नज़र आ रही है। बंगाल में कांग्रेस की मौजूदा दुविधा बुधवार (13 फरवरी) को एक बार फिर सामने आई जब तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस बंगाल में कोई स्थान नहीं मिलेगा ।

बनर्जी की बातों पर कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने तृणमूल कांग्रेस पर तुरंत ही तीखा हमला किया और उन्होंने ममता पर बंगाल के चिट फंड घोटाले से लाभान्वित होने का आरोप लगाया। इसके तुरंत बाद ही वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने अनियमित जमा योजना विधेयक, 2018 को पेश किया जिसमें ऐसे घोटालों को शामिल करने का प्रयास किया गया है। चौधरी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया।

तृणमूल सांसद उस समय सदन में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। जब चौधरी ने घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया तृणमूल सांसद और अधिक उत्तेजित हो गए। तृणमूल सांसदों को चौधरी की ‘चोर मचाए शोर’ वाली बात रास नहीं आई और वे गुस्से में चिल्लाने लगे। और यह तथ्य कि कांग्रेस सांसद जो ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के एक तीखे आलोचक हैं और अपना हमला जारी रखा। वहीं सोनिया गांधी और कांग्रेस के कुछ अन्य सांसद टेबल पर हाथ थपथपा कर अपना समर्थन दिखाते रहे।

वैसे तो ममता बैनर्जी काफी गुस्से में थी लेकिन जब वे सोनिया गांधी से दिन में संसद की लॉबी में उनसे मिलीं तो बंगाल की मुख्यमंत्री ने उनकी पार्टी पर हमले से नाराजगी के बारे में कोई बात नहीं की। ममता बनर्जी की परेशानी साफ दिखाई दे रही थी और उन्होंने सोनिया गांधी से कहा कि वह अपनी पार्टी पर कांग्रेस के हमले को याद रखेंगी। बाद में शाम को बनर्जी ने कांग्रेस को स्पष्ट कर दिया कि वे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक साथ लड़ेंगे लेकिन बंगाल में दोनों दल प्रतिद्वंद्वी बने रहेंगे।

यह बनर्जी की कांग्रेस को सलाह थी कि वह उन राज्यों में ही उम्मीदवार खड़ा करे जहाँ वह मज़बूत है और बंगाल में तृणमूल के वोट काटने से बचें और इस बात ने कांग्रेस को और हिला दिया है। बनर्जी चाहती हैं कि कांग्रेस या तो बंगाल में बहुमत वाली सीटों पर उम्मीदवारों को मैदान में उतारे या बहुत कमज़ोर उम्मीदवारों को मैदान में उतारे जो राज्य में भाजपा विरोधी मतों का विभाजन नहीं करेंगे। कांग्रेस की बंगाल इकाई को यह अस्वीकार्य लग रहा है।

जबसे बनर्जी ने 2011 में बंगाल में सत्ता हासिल की है तब से वे कांग्रेस पर शिकंजा कस रहीं हैं और राज्य में कांग्रेस के गढ़ में भी उनके कैडर कांग्रेस पर हमले करते रहे हैं। हमले अक्सर शातिर रहे हैं और हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं को कथित रूप से तृणमूल में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया है। राज्य में 2016 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 44 सीटें जीती थीं। लेकिन कांग्रेस के अधिकांश विधायक तब से तृणमूल में शामिल हो गए हैं जिसने कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को बंगाल में जो वो पहले कभी हुआ करती थी उस पर काले बादल छा चुके हैं।

बंगाल में कांग्रेस की राज्य इकाई के लिए तृणमूल ने एक गंभीर अस्तित्व के खतरे में डाल दिया है। “तृणमूल पूरी तरह से एक अलोकतांत्रिक पार्टी है जिसकी अध्यक्षता एक सत्तावादी व्यक्ति कर रहा है। पिछले आठ वर्षों में हमारे कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर कई हमले किए गए, उनके घरों से निकाल दिया गया या तो उन्हें मार दिया गया है और यहाँ तक कि हमारे पार्टी कार्यालयों में तोड़-फोड़ की गई है और हमारे कई विधायकों को तृणमूल में शामिल होने के लिए उन्हें धमकी मिल रही है, उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा या तो उन्हें लालच दिया जा रहा है। चौधरी ने कहा कि तृणमूल भाजपा के खिलाफ कितना भी चिल्लाए लेकिन यह तथ्य बरकरार है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल में कोई लोकतंत्र नहीं है।

ममता बनर्जी चाहती थीं कि कांग्रेस ‘हाईकमान’ (पढ़ें- सोनिया गांधी) राष्ट्रीय पार्टी की राज्य इकाई को तृणमूल पर हमला करने से रोकने का आदेश दे। लेकिन कांग्रेस की बंगाल इकाई ऐसा करने के मूड में नहीं है। राज्य कांग्रेस प्रमुख सौमेन मित्रा ने कहा, “हम बंगाल में तृणमूल के खिलाफ उतने ही जोरदार तरीके से लड़ेंगे जितना कि हम भाजपा से लड़ेंगे। तृणमूल एक फासीवादी और भ्रष्ट पार्टी है और बंगाल को इसके कुशासन से मुक्त करना बहुत जरूरी है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 34 वर्षों तक बंगाल को बर्बाद करके रखा दिया था और पिछले आठ वर्षों में तृणमूल उससे भी दो कदम आगे निकल गई है। बंगाल के लोग तृणमूल से तंग आ चुके हैं”।

तृणमूल विशेष रूप चिट फंड घोटाले को लेकर किसी भी हमले को लेकर काफी संवेदनशील हो जाती है। स्वाभाविक रूप से  इसलिए क्योंकि इसके कई नेता (सांसद सहित) जेल जा चुके हैं और घोटाले में उनकी कथित रूप से शामिल होने को लेकर जाँच का सामना कर रहे हैं। भाजपा के अलावा कांग्रेस भी इस घोटाले को तृणमूल पर हमला करने का एक बढ़िया हथियार मानती है। चौधरी और कांग्रेस में कई नेता इस घोटाले पर तृणमूल के कट्टर आलोचक रहे हैं और यहाँ तक ​​कि बंगाल में उनके द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाने की भी मांग की उठाई जा रही है। लेकिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अपनी राज्य इकाई द्वारा तृणमूल की ऐसी आलोचना से दूर रहना पसंद कर रहा है।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और कोलकाता पुलिस के बीच हालिया प्रकरण के कारण बनर्जी ने धरना दिया और कांग्रेस की गहरी दुविधा को भी उजागर किया। जहाँ राहुल गांधी ने बनर्जी को समर्थन देने की पेशकश की और “एनडीए सरकार द्वारा सीबीआई के दुरुपयोग” और “प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लोकतंत्र को रौंदनें” जैसे मुद्दों पर साथ देने का भरोसा दिया वहीं राज्य के कांग्रेस नेता तृणमूल पर लगातार हमले करते रहे। यहाँ तक ​​कि जब बनर्जी अपना धरना दे रही थीं तब भी चौधरी यही कह रहे थे कि बंगाल में लोकतंत्र नहीं है।

तथ्य यह है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अपने राज्य के नेताओं पर पाबंदी लगाने को तैयार नहीं है और इसी बात ने ममता बनर्जी को नाराज़ कर दिया है। “वे सोनिया गांधी सहित कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की विफलता से बहुत परेशान हैं। उन्होंने बंगाल में कांग्रेस को लाइन में लगने और तृणमूल की आलोचना करने से रोकने के लिए बार-बार अनुरोध किया। ममता को यह लगता है कि बंगाल उनका घरेलू मैदान है और भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए ‘महागठबंधन’ (विपक्षी गठबंधन) के सहयोगियों को एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने से बचना चाहिए और अपने स्वयं के गढ़ों तक सीमित करना चाहिए। कांग्रेस बंगाल में अब काफी कमज़ोर पड़ चुकी है और इसलिए कांग्रेस को बंगाल में तृणमूल के खिलाफ खुद को खड़ा करने से बचना चाहिए। ममता यह महसूस करती हैं कि जिस तरह तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ किसी अन्य राज्य में नहीं लड़ रही है उसी तरह कांग्रेस को भी बंगाल में हमारी पार्टी के खिलाफ नहीं लड़ना चाहिए।“, तृणमूल राज्यसभा सांसद का कहना था जो बनर्जी के करीबी सहयोगी हैं।

लेकिन बंगाल में कांग्रेस को यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव में जहाँ हर सीट की गिनती होनी है वहाँ कांग्रेस बंगाल में 42 लोकसभा सीटों पर अपनी बढ़त बनाने की तैयारी में है। चौधरी ने कहा, “हमारे पास कई सीटों पर जीत का उचित मौका है। तो हमें इन सीटों को तृणमूल को क्यों सौंपना चाहिए? “महागठबंधन” की ‘भावना’ का अर्थ यह नहीं है कि हम राजनीतिक रूप से तृणमूल के सामने आत्मसमर्पण कर दें।”

वह तृणमूल के खिलाफ एक सख्त कदम अपनाने और उस पार्टी के खिलाफ आर पार का अभियान को चलाने के लिए एक मजबूत और मुखर आवाज़ रहे हैं। चुनाव के बाद के परिदृश्य और संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए उनकी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बनर्जी को बहुत अधिक नाराज नहीं करना चाहता है और न ही कांग्रेस बंगाल में अपनी संभावनाओं को कम करना चाहता है। और यही वह संतुलित कार्य है जिसे करने के लिए कांग्रेस बहुत मेहनत करनी पड़ रही है।