राजनीति
कांग्रेस की सत्ता के संरक्षक और समर्थन तंत्र
अजय चंदेल - 24th December 2018
कई बार मीडिया मे प्रचारित वीडियो देखकर सोचना पड़ता है कि क्या राहुल गांधी अचानक परिपक्व हो गए? हो सकता है हाँ, हो सकता है नहीं। 24 घंटे राजनीति के बीच रहते हुए कोई भी हो, थोड़ा बहुत तो सीखेगा ही। राहुल गांधी वास्तव में बहुत रगड़े गए हैं, ऊपर से घाघ नेताओं से घिरे रहते हैं। अहमद पटेल, गुलाम नबी आज़ाद जैसे नेता उनको क्या पट्टी पढ़ाते होंगे और उनके दिमाग में क्या भरते होंगे यह कोई बहुत गुप्त बात नहीं है। भले ही राहुल की निर्णय लेने की क्षमता पर लोगों को शंका हो, लेकिन उनके चार मुहरदार और सलाहकार उन्हें 24 घंटे एक एक बात सिखाने-बुलवाने के लिए खड़े रहते हैं। राहुल ने कम से कम सलाहकारों की बात मान लेना सीख लिया है। हाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले का वीडियो इसका प्रमाण है।
भले ही भाजपा और उनके समर्थक मज़ाक में उड़ा दें लेकिन उनके लिए बात गंभीर है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ सत्ता के संरक्षकों ने ही शासन चलाया है। मुग़ल सल्तनत को बैरम ख़ान ने कैसे अकबर के होश संभालने तक चलाया यह सबसे प्रचलित उदाहरण है। राहुल गांधी शासन चलाने में शायद ही रुचि रखते हों लेकिन उनके परिवार द्वारा पोषित तंत्र को शासन में वापस आने की अहमियत अच्छे से पता है, और राहुल उन सबका संयुक्त चेहरा हैं। राहुल गांधी की हर बात को हल्के में लेना एक मोह है, जिससे भाजपा के बड़े से बड़े नेता भी नहीं बच पाते। ज़ुबान किसकी नहीं फिसलती, मोदी जी की भी फिसलती है और अमित शाह की भी, जो राहुल गांधी की फिसलती ज़ुबान को लेकर उनका मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें कम से कम अब सोचना होगा कि वैसे ही वीडियो कांग्रेस के मीडिया सर्कल में भी चल रहे होते हैं। उनका समर्थन करने के लिए सोशल मीडिया और मुख्य धारा की मीडिया भी है। लेकिन भाजपा अपने ही दायरे में कैद है। राहुल गांधी ने यह जिस दिन यह मान लिया था कि उन्हें सब कुछ नहीं आता और उनकी ज़ुबान फिसलती है, वह एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। संसद में यह कह देना कि आप मज़ाक में ले लीजिए या फिर सोचिए कि यह किसी पर्सनालिटी डवलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा ही था जिसमें सबसे पहले किसी मंच पर लोगों के बीच में खुलकर अपनी कमज़ोरी को स्वीकार करना होता है और उससे मानसिक शक्ति विकसित होती है। वे अभी सीखने के क्रम में हैं, कितना सीखते हैं, कितना कर पाते हैं, वह अलग बात है लेकिन उनका समर्थन पूरा तंत्र करता है ।
कांग्रेस के पास उन लोगों की एक बड़ी फौज है जो खुलकर समर्थन करते हैं और ज़मीन पर प्रभाव डालते हैं क्योंकि वे जानते हैं उनके लिए पूरी पार्टी खड़ी हो जाएगी और भाजपा के समर्थक किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। कुछ ऐसी घटनाएँ घटी जिसमे भाजपा अपने कुछ कट्टर समर्थकों के समर्थन में ही खुल कर नहीं बोली जिसके कारण पार्टी को आलोचना का शिकार होना पड़ा। पार्टी उन्हें भरोसा नहीं दिला पाई कि पार्टी का सहयोग उन लोगों के साथ है जो पार्टी के पक्ष में बोलते हैं। इसलिए बहुत से रचनात्मक समर्थक हैं वे सीधे-सीधे समर्थक न दिखने में ही भलाई समझते हैं। इसका प्रभाव राजस्थान में देखने को मिला, राजस्थान में भाजपा के विरोध और कांग्रेस के समर्थन में संपत सरल, इमरान प्रतापगढ़ी जैसे कवियों ने खुलकर प्रचार किया, लोगों से मिलकर प्रचार किया लोगों के घर जाकर प्रचार किया। भावनाओं की चाशनी में  घोलकर सरकार के खिलाफ काँटों के बीज अपनी शायरी में कैसे बोए जाते हैं, यह देखना चाहिए और समझना भी चाहिए। अनेक प्रकार के एकता मुशायरे के नाम पर वोटों का खुलकर ध्रुवीकरण किया जाता है। कांग्रेस के समर्थक कवि और शायर भाजपा के आयोजित कार्यक्रम में ही आकर उनकी ही सरकार को कोस कर सुनने वालों के मन में कुंठा का बीज बो जाते हैं ।
भाजपा के समर्थक मंच से राहुल की फिसलती ज़बान, पाकिस्तान, छप्पन इंच के सीने से आगे नहीं सोच पाए, कभी शोले तो कभी अंगारे लिखते रहे और इधर शायर तरन्नुम में एक ग़ज़ल गाते हुए माँ के आँचल से लोगों को बांधकर, कौम के फ़र्ज़ और फिर “भजपा एक मर्ज़” तक का सफ़र करा देते हैं। जीत के बाद निकले एक जुलूस में विजयी प्रत्याशी से अधिक उनके प्रचार में उतरे इमरान प्रतापगढ़ी को महत्त्व दिया जाना इसका प्रमाण है, जहाँ वे तरन्नुम में गा रहे हैं –
राजस्थान से , छत्तीसगढ़ से एमपी से
भाजपा को तीन तलाक मुबारक हो।
रचनात्मक समर्थकों की कमी नहीं है और कांग्रेस भी उनको खूब भुना रही है। वैसे ही जैसे कुमार विश्वास को सत्ता पाने तक अरविंद केजरीवाल ने भुनाया था।

दूसरी ओर भाजपा के कुछ आलोचक और समर्थक जिन्होंने सरकार के जनता के बीच पनप रहे असंतोष को भाँप लिया था, चेतावनी देते रहे लेकिन नज़रअंदाज़ कर दिए गए, कुछ तो कट्टर समर्थकों द्वारा लताड़े भी गए। कुछ समर्थक आपस में ही भिड़ गए। मंतव्य किसी का गलत नहीं था, किंतु एक ही बात अलग-अलग तरीके से कहने के कारण ही आपसी द्वन्द में एक दूसरे से कट गए। इसका कारण था कि ऊर्जा को दिशा नहीं मिली। 2014 में जो सोशल मीडिया बहुत व्यवस्थित होकर ट्विटर, वॉट्सैप, फ़ेसबुक पर प्रचार करता था, वह बंटा हुआ दिखता है। हो सकता है यह भी एक छलावा हो, लेकिन दिखता तो है ही। इसमें सोशल मीडिया पर प्रभावशाली और जाने-माने लोगों का मोहभंग की स्थिति में आ जाना है  ।

इसे भाजपा नहीं नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों के मन में लगाव कहिए कि वे खुलकर भाजपा को अपनी सेवाएँ निःशुल्क देना चाह रहे हैं, लेकिन भाजपा की ओर से उन्हें प्रतिक्रिया नहीं दी जा रही। चुनाव की रणनीति और प्रचार पार्टियों का अपना मामला है, उसमें बोला जाए तो भी क्या। भाजपा के पास कांग्रेस के विरुद्ध नेगेटिव प्रचार की गुंजाईश अब नहीं बची है। दो-तीन महीने मुश्किल से बचे हैं, और इनमें देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का तंत्र अब किस मुद्दे को लेकर आगे बढ़ता है, भाजपा के पास सकारात्मक प्रचार के आलावा कोई और विकल्प नहीं दिखता। कुछ को छोड़ दें तो भाजपा के सारे नेता अभी मोदी जी के भरोसे ही बैठे हुए दिखते हैं ।