राजनीति
समाजवाद की आत्मा ने जब कांग्रेस के शरीर में प्रवेश किया तो मिलीं काल्पनिक बसें

शरद जोशी का एक लेख है ‘समाजवाद- एक उपयोगी चिमटा’ इसमें जोशी लिखते हैं– “समाजवाद सबका सहारा है। यह उखड़ने वाले मुख्य्मंत्री का आखिरी सहारा है, यही उखाड़ने वाले का अंतिम शस्त्र है।”

समाजवाद के चीन के क्रांति के समय से ही गरीब और किसान के दो चक्के रहे हैं जिनपर समाजवादी साइकिल चलती है। भारतीय राजनीति भी प्रजा पार्टी जैसे संगठनों की समाप्ति के पश्चात पहले दबे छुपे और सत्तर के आपातकाल में संविधान में घुसेड़े जाने के बाद से समाजवाद के भरोसे ही चली है।

प्रशासन भले ही चीन तक में पूंजीवादी हो गया हो, राजनीति समाजवादी ही रही। शबाना आज़मी जैसे ठेठ समाजवादी बेगूसराय की गरीब गुरबा के साथ समाजवाद के नाम पर एप्पल के आई फ़ोन से सेल्फ़ी लेकर अमेरिका उड़ने से पहले समाजवाद का स्वप्न गरीबों के लिए छोड़ गए।

कांग्रेस की अलग समस्या रही। बेहिसाब भ्रष्टाचारों और धीरे-धीरे खुलता बहुसंख्यक विरोध की मार में सत्ता से हटाई गई कांग्रेस, विशेषकर कांग्रेस के प्रथम परिवार के लिए, सत्ता से दूर रहना कठिन हो गया। इस बदहवासी के दौर में जब बड़ी-बड़ी योजनाओं के धरातल पर उतरने की बातें खुलने लगी और उन्हीं योजनाओं को कार्यान्वित करके नरेंद्र मोदी सरकार को जन समर्थन जुटने लगा तो कांग्रेस अपने ही विरुद्ध खड़ी हो गई।

स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में नेहरू सरकार कम्युनिस्टों को थोक में जेलों में भर रही थी, चुनी हुई समाजवादी सरकारों को बर्ख़ास्त कर रही थी, तब समाजवादियों में एक विचार बना था कि कांग्रेस का विरोध करने के स्थान पर बेहतर है कि कांग्रेस में पीछे के रास्ते से घुसा जाए। हालाँकि सोनिया गांधी की एनएसी इस व्यवस्था का चरमोत्कर्ष था क्योंकि यहाँ समाजवादियों के पास निर्बाध सत्ता और शून्य जवाबदेही थी। सरकार जाने के बाद कांग्रेसी और वामपंथी, दोनों ही बुरी स्थिति में गए। 

यहाँ से इस कथा का तृतीय सर्ग प्रारंभ होता है। गांधी परिवार या हाई कमांड सत्ता से बाहर रहने के लिए अभ्यस्त ही नहीं है। सो उस कांग्रेस ने वामपंथियों के साथ मिलकरलोकतंत्र खतरे में हैका समूहगान प्रारंभ किया। जिस कांग्रेस सरकार के मस्तक पर एक दिन में सर्वाधिक लोगों पर राष्ट्रद्रोह का आरोप मुकुट है, जिस कांग्रेस ने सोशल मीडिया को 66 का उपहार दिया, प्रथम संशोधन में अभिव्यक्ति के अधिकार को रोका, लोगों को सालों जेल में डाला, वह लोकतंत्र की रक्षक के अवतार में वामपंथियों के साथ दिखी।

प्रियंका गांधी वाड्रा ने राजनीति में कदम रखा और उनके लिए बड़ी भूमिका की भूमिका बनाई जाने लगी। पाँच वर्ष तक सत्ता से दूरी ने ऐसा अफरातफरी का माहौल खींचा कि समाजवादी पार्टी से समीकरण बैठाया गया परंतु उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के मजबूती से सत्ता में आने के बाद, दादी की नाक से समानता भी राजनीतिक नवागंतुका प्रियंका गांधी वाड्रा की नाक बचाने के लिए नाकाफी हो गई।

इस बीच विश्व भर में मृत्यु का तांडव मचाती महामारी कोरोना का भारत में पदार्पण हुआ और सत्ता की शक्ति के आधार पर कम, परंतु स्नेह एवं विश्वास के आधार पर नरेंद्र मोदी सरकार को जनता का अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ। 

अब जब केंद्र अपनी गाँव में इंटरनेट, आधार पर आधारित सीधा लाभ हस्तांतरण, शहरों में प्रशासन एवं सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से भोजन की व्यवस्था आदि के माध्यम से महामारी में स्थिति नियंत्रण में लाने और बहुत हद तक मृत्यु का तांडव रोक सका ताकि स्वास्थ व्यवस्था ऐसी महामारी को संभालने के लिए तैयार हो जाए, तो विपक्ष को राजनीतिक चिंता होने लगी। 

देशवासियों को धैर्य देने के स्थान पर राहुल गांधी एक भयावह भविष्य की भूमिका बनाने में व्यस्त हो गए। प्रवासियों को बिना साधनों के महानगरों की सीमा पर छोड़ने की प्रक्रिया होने लगी। सफल लॉकडाउन विफल कराने के प्रयासों के बीच छोटे उद्योगों में काम कर रहे मज़दूरों और दिहाड़ी कमाने वाले प्रवासी भारतीयों के पलायन का रेला प्रारंभ हुआ।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद से ही समस्या रही छपास के रोग से दूर, योगी का सर नीचे करके काम करने का स्वभाव। यही स्वभाव योगी को गोरखपुर में एन्सेफ्लाइटिस में बच्चों की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के मिथ्यारोप से निकालकर यूनिसेफ की अनुशंसा तक ले गया।

इस व्यवहार के कारण विपक्ष और विपक्ष के कारण कांग्रेस का आधा हाई कमांड जो उत्तर प्रदेश का प्रभार रखता है, वह अप्रासंगिक हो गया। हाई कमांड का अप्रासंगिक हो जाना धीरे-धीरे उसके चाटुकारों के अप्रासंगिक हो जाना होता है। 

सो प्रियंका धीरे-धीरे छोटी बड़ी आपराधिक घटनाओं को लेकर योगी आदित्यनाथ की सरकार को घेरने का उपक्रम करती दिखीं। इस बीच आ जाती है वैश्विक महामारी कोरोना। अब कांग्रेस की बड़ी मालकिन की समस्या भी गंभीर होती जा रही है और वो है किसी के द्वारा गंभीरता से न लिया जाना।  

तभी उत्तर प्रदेश के नवनियुक्त अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू जो धरना कुमार के नाम से भी विख्यात हैं, यह काल्पनिक बस योजना लेकर आए। योगी सरकार ने इस राजनीतिक चाल को सच मानकर बसों की माँग प्रस्तुत कर दी। 

सोचने की बात यह है कि कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल है चाहे किसी अवस्था में हो, उसे उत्तर प्रदेश की ही चिंता क्यों है, राजस्थान की क्यों नहीं जहाँ से बस उधार ली गई हैं। ऐसी व्यवस्था महाराष्ट्र में क्यों नहीं की गई जहाँ अव्यवस्था के नए मानदंड प्रतिदिन बनाए जा रहे हैं और कांग्रेस सरकार है।

300 के करीब बसें उपयोग के योग्य नहीं हैं, सूची में कुछ 100  तो ऑटो और कार निकली हैं। ऐसी अफरातफरी कांग्रेस की आतंरिक कलह और गांभीर्यरहित राजनीतिक चुहल बताती है। एक बस में 20 लोग सोशल डिस्टन्सिंग के अंतर्गत जा सकते हैं, ऐसे में 600 बसें भी मान लें तो इस कवायद से लगभग 12,000 लोग यात्रा कर सकेंगे। 

प्रवासियों के लिए काम बहुत पहले से प्रारंभ हो गया था। रॉबर्ट वाड्रा के द्वारा पार्ले-जी के पैकेट बनाने और कांग्रेस के समाजवाद के झंडाबरदार बनकर मज़दूरों के प्रश्न उठाने से पहले भाई अकरम शाह जैसे लोग सूरत में, हुमानिटरियन इंटरनेशनल के सुधांशु सिंह दिल्ली में और संघ के किचन लोगों की सेवा में जुट चुके थे। 

प्रवासियों को वापस ले जाने में राज्य-केंद्र के प्रश्न पर रेलवे की व्यवस्था में शुरूआती कठिनाइयाँ रहीं, जिसके लिए केंद्र को उत्तरदायी होना होगा। परंतु इस के बाद भी, उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रवासियों को वापस लाने का कार्य बाकी राज्यों से पहले प्रारंभ कर दिया था। 

मार्च में ही प्रदेश के 10,000 बच्चों को कोटा से वापस लाने वाली उत्तर प्रदेश की पहली सरकार थी। जैसी यह महामारी है, व्यवस्थित रूप से प्रवासी वापस लाने में ही राज्य की सुरक्षा निहित है। 16 मई तक उत्तर प्रदेश की सरकार लगभग 5.65 लाख लोग उत्तर प्रदेश में लगभग 550 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से लाए जा चुके थे, बिज़नेस स्टैण्डर्ड  के अनुसार।

अब यदि प्रियंका जी के सलाहकारों का मानना है कि उनके डूबते राजनीतिक भविष्य का पुनरुद्धार इन 12,000 गरीब प्रवासियों में है, और लाये गए 6 लाख प्रवासियों की सेवा में नहीं है, तो यही कहा जा सकता है कि उनके सलाहकार राहुल गांधी के सलाहकारों से बेहतर नहीं हैं जो पिछले महीने तक प्रलय का माहौल बांध रहे थे, इस महीने पत्रकारों पर कांग्रेस के राज्यों में प्राथमिकी दर्ज करने में और इंटरव्यू करवा के राहुल गांधी को ही पत्रकार बनाने में व्यस्त हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रियंका सेना के छुटभैय्ये नेताओं पर फ्रॉड के नाम पर प्राथमिकी दर्ज कर दी है, जो अपने आप में शायद कुछ ख़ास अर्थ नहीं रखती हो परंतु संभवतः मानव इतिहास की सबसे बड़ी महामारी से जूझते देश के सबसे बड़े राज्य की ओर से स्पष्ट निर्देश है उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाशती प्रियंका गांधी को कि कृपया प्रशासनिक कार्य में दखल न दें।

चाटुकारों की समस्या यह है कि वे आज की तारीख में दो-दो हाई कमांड संभाल रहे हैं और दोनों सत्ता केंद्रों की कुल राजनीतिक समझ एक रिक्त अंधकार के अतिरिक्त कुछ नहीं है। समस्या राजनीतिक लफ़्फ़ाज़ी से बड़ी है। 

बड़े-बड़े राष्ट्र घुटनों पर बैठे हैं। वैश्विक महामारी के परिणामस्वरूप जन्मी आर्थिक महामारी के पॉंव मध्य वर्ग तक फैल रहे हैं। यह वर्ग समाजवादियों के लिए उतना रोमांटिक नहीं है जितना मज़दूर -किसान का युगल गीत परंतु समस्या यहाँ भी गहन हो रही है।

प्रत्येक समस्या एक अवसर भी है। सर नीचे करके काम करने वाले नेता भारत को आत्मनिर्भरता ही नहीं संभव है एक ऐसी धरातलीय स्वस्थ्य व्यवस्था दे दें जो अब तक संभव ही नहीं लगती थी। संभव है प्रशासन में वह विश्वास दे दें जो आम जनता को अब तक असंभव ही जान पड़ती थी।

यह हाथ से हाथ जोड़ने का समय है, उस रोटी के लिए बंदरबाँट करने का नहीं है जो कहीं है ही नहीं। समाजवाद तो आता ही रहेगा।  उसका सौंदर्य आते ही रहने में है। वह आ जाए तो अपना राजनीतिक अर्थ खो देगा।

समाजवाद के आने और गरीबी के जाने की प्रक्रिया में ही राजनीति पूर्ण होती है, इसे गंतव्य तक नहीं पहुँचना होता है। पहुँचा कि राजनीति समाप्त। तब तक तो खून पसीने वाला पूंजीवाद ही ग्रामीण रोज़गार लाएगा और भारत को एक सशक्त रूप में पुनः विश्व पटल पर प्रस्तुत करेगा। भीख और भ्रम से नहीं, स्वेद और श्रम से ही नव-भारत का निर्माण होगा।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।