राजनीति
नागरिकता के नाम पर मचा शोर मुस्लिम केंद्रित सेक्युलरिज्म के पराजय की खीज है

नागरिकता के सवाल पर मचे उत्पात से उपजी हर घटना 70 साल से ओढ़े हुए नकली सेक्युलरिज्म की पोल खोल रही है। हिंसा की हर सुर्खी इस बात का पर्दाफाश कर रही है कि किस तरह इस देश में मुस्लिम तुष्टिकरण को ही सेक्युलरिज्म का घातक पर्याय मान लिया गया। मजहब की बुनियाद पर देश के टुकड़े-टुकड़े करने के बावजूद बचे-खुचे भारत में भारत को ही दोयम दरजे पर डालकर रखा गया।

देश उस दमाघोंटू धर्मनिरपेक्षता के खोल से बाहर निकल रहा है, जहाँ हर फैसला एकपक्षीय था और भारत को भारत की निर्दोष नज़र से नहीं बल्कि मुस्लिम वोट की खातिर स्वार्थ की नज़र से देश को देखने की एकतरफा आदत डाली गई थी। इस नकली सेक्युलरिज्म की कलई कब की खुल चुकी है।

खुद को सेक्युलर कहने वाली पार्टियाँ अपनी खोई ज़मीन से हर दिन और नीचे खिसक रही हैं। उनका हर कदम उनके लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। वे वैचारिक रूप से दिवालिया हो चुकी हैं। उनके पास अब कोई मुद्दा नहीं बचा है। अब वे सत्ता से बेदखली की खीज देश की कीमत पर चुकाने पर आमादा हैं।

कुछ खानदानी पार्टियों के लिए सत्ता जैसे उनका जन्मसिद्ध एकाधिकार थी, जिसमें कुछ ऐसे बाहरी तत्व आ टिके हैं, जो लुटियंस के इलाके में रहने की औकात नहीं रखते थे। अब उन्हें सबक सिखाना ज़रूरी है इसलिए सरकार में रहते वे जो भी फैसला लें, उसमें टांग अड़ाओ। हो-हल्ला मचाओ। दुष्प्रचार करो। लोगों को भड़काओ। बदनाम करो। देश को आग के हवाले कर दो मगर इनको सत्ता से हर हाल में हटाओ।

अगर वे अर्थव्यवस्था या विदेश नीति या बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर ऐसा करते तो सड़कों पर चार लोग नहीं मिलते। ले-देकर मुस्लिमपरस्ती का ही कार्ड है, जिस पर सारे तथाकथित सेक्युलर ठेकेदार मदारी और जमूरों की तरह खेल रहे हैं। सब कुछ बहुत सुनियोजित ढंग से हो रहा है।

कट्‌टरपंथी मुस्लिमों के लिए बैठे-ठाले शोर मचाने का मौका मिल गया है। यह इस देश की ऐसी जमात है, जिसे कभी भारत से कोई लेना-देना नहीं था। थाली में छेद करने वाले भाड़े के ऐसे मौकापरस्त जो बटवारे की असलियत या तो जानते नहीं है, या जानबूझकर अनजान हैं।

सत्ता में अब तक काबिज रहीं सेक्युलर पार्टियों की दुकानें इन्हीं की दम पर चलती रहीं। अब 2014 के बाद से सेक्युलरों का यह सपोर्ट सिस्टम भी बेरोजगार है। नागरिकता संशोधन बिल ने इन्हें भी काम से लगा दिया है। और काम क्या है? आग और शोलों की ज़हरीली सियासत।

जो वीडियो वायरल हुए हैं, वे इस उत्पात में शामिल हिंसक झुंडों की असलियत खुद उजागर कर रहे हैं। मुस्लिम युवाओं की एक भीड़ में करीब 35 साल उम्र का एक नौजवान बता रहा है कि हम अधिकतर शहरों में हैं और हर शहर का कारोबार ठप करने का माद्दा हममें होना चाहिए। हम जहाँ भी हैं वहाँ नाक में दम कर दें। सड़कों पर जाम करें। जीना हराम कर दें। वह खुलेआम अपने आसपास खड़े अपने ही जैसे नौजवानों में यह तकरीर झाड़ रहा है।

एक दूसरे वीडियो में करीब 30 साल उम्र का नौजवान इस बात पर भड़क रहा है कि यह मुसलमानों के खिलाफ लिया गया फैसला है। यह देश सबका है। सबको यहाँ आने और रहने की इजाज़त है। केरल मूल की जामिया की एक लड़की पुलिस से सीधी भिड़ रही है और देश के सेक्युलर सेटप को लेकर फिक्रमंद है। वह एक साथ तीन स्थानों पर उत्पाती अंदाज़ में देखी गई है।

ये खतरनाक युवा पता नहीं किस दुनिया में जी रहे हैं? ये कितना भारत को समझते हैं? क्या वे भारत को एक ऐसी धर्मशाला समझते हैं, जहाँ कोई भी आकर कब्ज़े जमा सकता है?

क्या उन्हें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में नर्क जैसा जीवन जी रहे लगातार घटते हिंदू, बौद्ध, सिख, पारसी और अपनी करतूतों की वजह से म्यांमार से भागने पर मजबूर हुए रोहिंग्या मुसलमानों में कोई फर्क नज़र नहीं आता?

यही पागल आवाज़ें तब किस रोज़े में खामोश थीं, जब कश्मीर घाटी से रातों-रात लाखों पंडितों काे बाहर निकाल दिया गया था? और इन सिरफिरे अपराधियों के सिर पर जिन राजनीतिक आकाओं का हाथ है, वे तब कहाँ थे?

ज़ाहिर है इन सवालों के कोई जवाब किसी के पास नहीं हैं। जनता ने जिन्हें 60 साल तक भोगा और असलियत उजागर होते ही एक झटके में बाहर कर दिया, ऐसे खानदानी दलों को अपना वजूद बचाए रखना मुश्किल हो रहा है। पूरा परिवार सरकार के खिलाफ गला फाड़ रहा है। मगर वे आग से खेल रहे हैं।

देश का बेपढ़ा-लिखा आम आदमी भी नागरिकता के सवाल पर बटा हुआ नहीं है। मंदिर को लेकर भी जो थोड़े-बहुत अति उदार हिंदू सोचते थे कि क्या फर्क पड़ता है कि मंदिर हो या मस्जिद हो या कोई अस्पताल बना दिया जाए, वे भी नागरिकता के सवाल पर स्पष्ट मत रखते हैं कि यह देश कोई खुली सैरगाह नहीं होना चाहिए।

सेक्युलर सरकारों ने बांग्लादेशी घुसपैठ पर आँखें बंद करके रखीं और हमने तीन-चार दशक में असम की जनसांख्यिकी को गड़बड़ाते हुए अपनी आँखों से देख लिया है। सरहद के कई जिलों में घुसपैठियों ने मूल निवासियों को अल्पसंख्यक बना दिया है।

सेक्युलर ताकतों ने सिर्फ घुसपैठ को होने ही नहीं दिया, बल्कि घुसपैठियों को सारी सरकारी सुविधाएँ मुहैया कराने में आगे रहे। उनके वोटर और राशन कार्ड बने। उन्हें रहने के लिए घर दिए गए। यह वोटों के बदले किया गया एक ऐसा घातक और घृणित सौदा था, जिसने काँटों की फसल बोई।

अब उस खरपतवार को फैलने से रोकने के लिए अगर कोई कानून बन रहा है तो वे सब सौदेबाज बौखलाए हुए हैं, क्योंकि वे असम से लेकर दिल्ली तक सत्ता से खदेड़े जा चुके हैं और निकट भविष्य में उनकी वापसी की कोई संभावना नहीं है। कश्मीर में भी उनकी किस्मत उलट चुकी है।

सच बात तो यह है कि इस देश ने कई सालों से साहसिक फैसले लेने वाली सरकारों को देखा ही नहीं है। गठबंधन कहे जाने वाले सत्तालोलुप झुंडों को ही सरकारों के नाम पर भोगा है। एक पूरी पीढ़ी इन सौदेबाजों को सत्ता में देखते हुए ही बड़ी हो गई। गुनगुने पानी में बने रहने की आदी, जहाँ सबके लिए सबकुछ आरामदेह है। कोई ऐसा फैसला करने की ज़रूरत नहीं थी, जो देश को किसी बड़े बुनियादी बदलाव की तरफ ले जाता।

मुस्लिमपरस्ती की घिसीपिटी आदत ने सेक्युलरों में भी ऐसे फैसले लेने की सोच ही पैदा नहीं होने दी। रोज़ा-इफ्तार पार्टियों में जालीदार टाेपियाँ लगाकर सामने आना ज्यादा आसान और आरामदेह था बनिस्बत इसके कि 370 के औचित्य पर बात की जाए या घुसपैठ को रोकने के लिए कोई बात की जाए। ऐसा करते हुए उन्हें जातियों में बटे हिंदुओं से कभी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि एक दिन वे उनकी कुर्सी उलट देंगे। हिंदुओं की यह एकजुटता सेक्युलरों की आँख में सबसे ज्यादा खटकी है।

नागरिकता के सवाल पर वे एक बार फिर अपने एकमात्र परंपरागत तारणहार मुस्लिम वोटों की तरफ झुके हैं। उन्हें भड़का रहे हैं। उनकी यह कायराना कोशिश उनके डूबते जहाज को और रसातल में ले जाएगी। अल्पसंख्यक का पर्याय मान लिए गए मुस्लिमों का रत्ती भर भला अब इनसे होने वाला नहीं है। इसलिए मुस्लिमों को भी इनसे जितना संभव हो पल्ला झाड़ना ज़रूरी है।

सरकार सख्ती से इस ताज़ा उत्पात से निपटे इससे पहले सेक्युलर नेताओं की अक्ल जागना ज़रूरी है कि वे ही इस उत्पात को आग और हवा देने की बजाए खुद आगे आकर रोकें। कश्मीर में 370 और अयोध्या में मंदिर के मसले पर मुँह की खाने के बाद उनके लिए एक सुनहरा मौका है कि नागरिकता के सवाल पर देश की नब्ज़ को समझने की कोशिश करें और भारत को भारत की दृष्टि से देखने की आदत डालें।

यह आदत आज़ादी के बाद से ही छूटी हुई है। 60 साल में बिल्कुल ही भूली हुई है। भारत अब सोया हुआ नहीं है। भारतीय आज़ादी के बाद पहली बार कुछ जागे हुए हैं। भारत को भारत की दृष्टि से देख रहे हैं और यह भी देख रहे हैं कि हमने 1947 में क्या खो दिया और उसके बाद क्या-क्या खोया? मुस्लिम केंद्रित सेक्युलरिज्म भारत में अपनी जमीन खो चुका है। नागरिकता के नाम पर मचा शोर उसी पराजय की खीज है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com