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नागरिकता बिल विरोध- केवल असम ही क्यों हो पीड़ित हिंदुओं का आश्रयदाता
आशुचित्र- नागरिकता बिल पर असम के विरोध को कई प्रावधानों द्वारा सुलझाया जा सकता है।

नागरिकता बिल 2016 को विरुद्ध 46 संस्थाओं से समर्थन के साथ 23 अक्टूबर को 12 घंटों के असम बंद को कथित तौर पर विस्तृत समर्थन प्राप्त हुआ। तनाव की स्थिति में अपना मतलब निकालने वाली कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम प्रभुत्व वाली ए.यू.डी.एफ़. ने बंद का समर्थन किया। असम सरकार में भारतीय जनता पार्टी के साथी असम गण परिषद ने भी विरोध का समर्थन किया।

भाजपा सरकार 2019 के चुनावों के पहले नागरिकता बिल 2016 पारित करने की उम्मीद में है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अत्याचार पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करेगी। नागरिकता पाने वाले संभावित समुदाय हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध और ईसाई होंगे।

प्रत्यक्ष रूप से अपने पड़ोसी देशों के अत्याचार पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने में कुछ गलत नहीं है। धर्मनिरपेक्षवादी इस बिल का विरोध कर रहे हैं, इसलिए नहीं कि यह अत्याचार पीड़ितों को नागरिकता देता है बल्कि इसलिए क्योंकि समुदायों की सूची में मुस्लिम शामिल नहीं हैं। बिल अप्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट करता है कि अत्याचारी कौन है। यही वास्तविकता है- पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता आया है- यह नागरिकता अधिनियम 1955 के बिल के संशोधन का विरोध करने वालों को प्रभावित नहीं करता है।

हालाँकि इसका यह तात्पर्य यह नहीं है कि असम बंद जो कांग्रेस और ए.यू.डी.एफ़. के लिए भले ही एक मुद्दा हो, अपने सिद्धांत में गलत है।

दो बिंदू ध्यान देने योग्य हैं।

पहला, असमी- विशेषकर कि असमी हिंदू और बोडो जैसे छोटे समुदाय- जनसंख्या संबंधी परिवर्तनों से चिंतित हैं: एक बंगलादेश से बंगालियों का सैलाब और दूसरा मुस्लिमों का। दोनों वास्तविकता है।

दूसरा, एक प्रत्यक्ष डर है कि नागरिकता अधिनियम में पड़ोसी देशों के अत्याचार पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की नई कटऑफ़ तारीख दिसंबर 2014 कर दी गई है जिससे राष्ट्रीय नागरिक सूची का पूरा प्रयोजन ही भंग हो जाएगा जिसका प्रारूप लगभग तैयार हो चुका है और इसके अंतर्गत 1971 से अबतक 40 लाख अवैध प्रवासियों की पहचान की गई है। हालाँकि अंतिम रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के संरक्षण में तैयार की जाएगी जिसमें इस संख्या में कुछ कटौती होगी और कुछ योग्य प्रवासियों को रहने की अनुमति मिल जाएगी। बंद समर्थकों को चिंता है कि जो नागरिक नहीं हैं, वह भी संशोधित अधिनियम के अनुसार योग्यता सिद्ध करके निवासी बन जाएँगे। इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि न्यायालय का ही राष्ट्रीय नागरिक सूची और संशोधित नागरिकता अधिनियम विवाद पर अंतिम निर्णय होगा।

संशोधन के विरोध के दोनों कारण वैध हैं लेकिन बिल का मूल उद्देश्य सही है।

इन विरोधों का समाधान कुछ प्रावधानों को बिल में जोड़कर किया जा सकता है। अतिरिक्त प्रावधान निम्नलिखित हो सकते हैं-

  1. अत्याचार पीड़ित समुदायों का नाम अंकित करने की, जैसे हिंदू, जैन आदि, कोई आवश्यकता नहीं है। कानून इस आधार पर बनाया जा सकता है कि दिसंबर 2014 से पहले के जनसंहार या सामुदायिक सफाई जैसी परिस्थितियों को झेलकर भारत आए प्रवासियों को नागरिकता दी जाए। यह उसी प्राकर प्रभावी होगा जैसा समुदायों का नाम अंकित करने से था और सेक्युलरिस्टों का भी शांत कर सकेगा।
  2. असमियों का डर कि राष्ट्रीय नागरिक सूची अकर्मिक हो जाएगी पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जो राष्ट्रीय नागरिक सूची के अनुसार अपवर्जित हुए हैं मगर पीड़ित अल्पसंख्यक हैं, उनके लिए अलग प्रावधान होना चाहिए कि उन्हें असम के अलावा कहीं और रहने का अधिकार प्राप्त होगा। मतलब उनकी इच्छानुसार भारत के दूसरे प्रदेश। वे बाद में प्राकृतीकरण के बाद नागरिक बन सकते हैं।
  3. एक अलग कानून बनना चाहिए जिसके अनुसार भारतीय विश्वासों जैसे हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख धर्मों को मानने वालों को भारत आश्रय देगा, वैसे ही जैसे विश्व भर में कहीं के भी यहूदी इज़रायल में रह सकते हैं। वह समय आ गया है जब भारत इस मुद्दे पर अपनी तथाकथित निष्पक्षता छोड़ दे क्योंकि इन लोगों को जीवन और स्वतंत्रता देने के लिए अब भारत ही एक मात्र देश बचा है। ऐसे कई ईसाई और मुस्लिम देश हैं जो अपने पीड़ित सह-धर्मियों को आश्रय देते हैं परंतु ऐसा प्रावधान भारतीय विश्वासों को मानने वालों के लिए कहीं नहीं है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता विकृत है क्योंकि यह केवल बहुसंख्यक समुदायों के अधिकारों में राज्य का हस्तक्षेप होने देती है। इससे बुरा यह कि मुख्यधारा में सेक्युलरिस्टों द्वारा ऐसा कथात्मक बनाया गया है जिससे राज्य और व्यक्तिगत रूप से हिंदू पीड़ित हिंदुओं व अन्य भारतीय विश्वासों को मानने वालों का खुलकर समर्थन नहीं कर पाते। पाकिस्तान अपने हिंदू अल्पसंख्यकों का दमन करके भारत के मुसलमानों की तथाकथित समस्याओं पर भारत पर उंगली उठाता है लेकिन भारत कहीं हिंदुओं के नरसंहार और सामुदायिक सफाई पर भी चुप्पी साधे रखता है, यहाँ तक की कश्मीर पर भी।

आत्म-आरोपित अंकुश और छद्म धर्मनिरपेक्षता को अस्वीकार कर दरकिनार कर देना चाहिए।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। ट्वीटर- @TheJaggi