राजनीति
भाजपा को पूर्वोत्तर राज्यों के चुनावों में भारी पड़ सकता है नागरिकता अधिनियम
पहली बार पूरा पूर्वोत्तर भारत मंगलवार (8 जनवरी) को केंद्र सरकार के विरोध में बंद रहा। नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन (सात राज्यों के प्रभावशाली छात्र समूहों का एक केंद्रीय निकाय) द्वारा मंगलवार को किया बंद का आह्वान किया गया जिसे बहुत अच्छी और सहज प्रतिक्रिया मिली और भारत बंद पूरी तरह सफल रहा।
हालाँकि असम और त्रिपुरा के विभिन्न हिस्सों से हिंसा के मामले दर्ज किए गए। नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 (जो मंगलवार को लोकसभा में पारित हुआ) के विरोध में बुलाए गए भारत बंद से सहज, व्यापक और प्रचंड प्रतिक्रिया मिली जिससे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को चिंतित होना चाहिए।
एनडीए सरकार द्वारा इस बिल पर ज़ोर देने और क्षेत्र के लोगों खासकर असम के लोगों की भावनाओं की अनदेखी करने पर पूरे क्षेत्र में भाजपा के ऊपर व्यापक गुस्सा और निराशा है। भाजपा ने असम में 2016 के विधानसभा चुनावों में 126 में से 60 सीटें जीती थीं और असोम गणा परिषद (एजीपी) ने 14 सीटें जीती थीं और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) जिसने 12 सीटें जीती थीं, ने साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई थी।
हाई-वोल्टेज चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने असम में रह रहे बांग्लादेश के सभी अवैध प्रवासियों का पता लगाने और उन्हें वापस भेजने का वादा किया था। क्षेत्र में नागरिकता विधेयक को उस वादे की उपेक्षा और भाजपा द्वारा अपना रुख़ पलटने के रूप में देखा जा रहा है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि बिल (जो राज्यसभा की बाधा पार करते ही एक अधिनियम बन जाएगा) एक अनुमानित 9 लाख बंगाली हिंदुओं की उपस्थिति को वैध कर देगा जिन्होंने 1971 से 2013 के बीच बांग्लादेश से अवैध रूप से असम में प्रवेश किया था।
असम समझौते के तहत 24 मार्च 1971 के बाद राज्य में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को विदेशी माना जाएगा। लेकिन नागरिकता (संशोधन) विधेयक कहता है कि वे सभी (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी) जिन्होंने छह साल पहले तक भारत (बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से) में प्रवेश किया था वे सभी भारत के नागरिक बन जाएँगे।
असम ने 1947 से बांग्लादेश (और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) के लाखों प्रवासियों का भार वहन किया है। इससे पहले भी असम में पूर्वी बंगाल से मुस्लिम किसानों को बसाने की ब्रिटिश नीति के कारण राज्य की जनसांख्यिकी बदल गई थी। ब्रिटिश दिनों के दौरान असम के कुछ मुस्लिम शासकों जैसे कि मुहम्मद सादुल्लाह ने राज्य में मुस्लिम आबादी बढ़ाने के लिए असम में लाखों मुस्लिमों को पूर्वी बंगाल से पलायन करने और बसने के लिए प्रोत्साहित किया था।
आज़ादी के बाद के कांग्रेस के शासनकाल ने पूर्वी पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश के मुस्लिमों के इस अवैध आव्रजन को प्रोत्साहित किया और अल्पसंख्यक वोट बैंक बनाया जिसने असम में पार्टी को सत्ता में लाने में मदद की। इनमें से कई अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी (आईबीआई) असम से दूसरे क्षेत्र में घुसपैठ कर चुके हैं जिनकी जनसांख्यिकी अपरिवर्तनीय रूप से बदल दी गई है।
असम में लाखों आईबीआई की उपस्थिति राज्य के स्वदेशी लोगों के लिए एक अत्यधिक भावनात्मक मुद्दा है। एक अनुमान अनुसार मुस्लिम अब असम की जनसंख्या का 35 प्रतिशत हिस्सा बन चुके हैं जो 1951 में 24.3 प्रतिशत से ऊपर है। असम के 33 जिलों में से ग्यारह मुस्लिम बहुल जिले हैं और राज्य के 126 विधानसभा क्षेत्रों में से 30 मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्र हैं।
1951 में असम के सिर्फ चार जिले और 1972 की मतदाता सूची के अनुसार सिर्फ 15 (126 में से) विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र मुस्लिम-बहुल थे जबकि पाँच अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 40 प्रतिशत से अधिक थी। इसी समय राज्य की स्वदेशी आबादी का प्रतिशत लगातार नीचे चला गया है और अब लगभग 45 प्रतिशत होने का अनुमान है।
यह असम में एक निराशाजनक अल्पसंख्यक बनने का डर है जिसने छह साल लंबे विदेशियों के खिलाफ असम आंदोलन (इसे पढ़ें) को बढ़ावा दिया और जिसने राज्य से विदेशियों (आईबीआई) का पता लगाने और निर्वासन की मांग की। आंदोलन की उत्पत्ति मंगलदोई लोकसभा सीट की मतदाता सूची के संशोधन से हुई जो 1978 में उसके मौजूदा सांसद हीरालाल पटवारी (जनता पार्टी से) की मृत्यु के बाद खाली हुई थी।
उत्परिवर्तित मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि देखी गई जिनमें से अधिकांश संदिग्ध बांग्लादेशी मूल के मुसलमान थे। इसने असम आंदोलन को गति प्रदान की जिसने राज्य को छह लंबे वर्षों तक हिला कर रखा। आंदोलन का समापन असम समझौते के साथ हुआ जिसने राज्य में विदेशियों का पता लगाने के लिए कट-ऑफ तारीख 24 मार्च 1971 रखी गई थी।
अब जब नागरिकता विधेयक बंगाली हिंदुओं के लिए एक नई कट ऑफ डेट (जो की जनवरी 2013 होगी अगर इस महीने अधिनियमित किया गया है) स्थापित करना चाहते हैं तो इसके विरोध में असमिया सड़क पर उतर आए हैं। अनुमानित 9 लाख बंगाली हिंदू जो 1971 और 2013 के बीच असम में प्रवेश कर चुके हैं वे सभी भारतीय नागरिक बन जाएँगे। मिजोरम में भी लगभग 10,000 चकमा (बौद्ध) जो बांग्लादेश में उत्पीड़न से भाग कर आए थे वे सभी भी भारतीय नागरिक बन जाएँगे।
अन्य राज्य जैसे की नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय उन बंगाली हिंदुओं की संख्या से प्रभावित नहीं होंगे जो बांग्लादेश से भाग कर आए थे और 1951 के बाद इन राज्यों में बस गए थे (नागरिकता अधिनियम के अनुसार कट-ऑफ ईयर) 1955) जो की ना के बराबर हैं और यहां तक ​​कि इन राज्यों में रहने वाले बंगाली हिंदू भी संख्या में इतने कम हैं कि वे वहाँ की स्वदेशी आबादी के लिए कोई खतरा पैदा नहीं कर सकते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में बांग्लादेशियों की मौजूदगी से ऐसा भय पैदा हुआ है कि पूरे पूर्वोत्तर ने मंगलवार को इस मुद्दे पर एकजुट हो कर बंद का पालन किया।
मंगलवार के बंद की सफलता साफ दर्शाती है कि अन्य राज्यों के लोगों (असम को छोड़कर) को भाजपा यह समझाने में विफल रही कि विधेयक उन राज्यों के स्वदेशी लोगों के लिए कोई खतरा नहीं है। भाजपा को इस बिल का विरोध करना चाहिए था क्योंकि यह बिल तब से चल रहा था जब इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा गया था।
जेपीसी ने इस क्षेत्र का दौरा किया और सभी पूर्वोत्तर राज्यों से प्रतिनिधित्व प्राप्त किया। मिजोरम और मेघालय विधानसभाओं ने भी विधेयक का विरोध करते हुए प्रस्ताव पारित किए। भाजपा का चुप रहना और इस क्षेत्र के आदिवासियों से बातचीत न करना और उन्हें ना बताना कि बिल उनके लिए कोई खतरा नहीं है यह भाजपा की ओर से एक अक्षम्य विफलता रही है।
एनडीए सरकार द्वारा असम समझौते के अनुच्छेद 6 (जो वादा करता है कि “असमी सांस्कृति, समाज, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षण और इसे बढ़ावा देने के लिए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएँगे”) को लागू करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति के गठन की घोषणा अंतिम मिनट में करना असम के लोगों को उत्तेजित कर रहा है और एनडीए सरकार को एक अवसरवादी दल के रूप में देखा जा रहा है। यह बहुत पहले आ सकता था और तथ्य यह है कि इसका फ़ैसला आखिरी घंटे में किया गया था (निर्णय 2 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में एक कैबिनेट बैठक में लिया गया) जिससे सरकार का अवसरवादी होने की बू आ रही है।
गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को घोषणा किया कि असम के छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने वाला विधेयक जल्द ही पेश किया जाएगा जो सरकार की गंभीरता और उसके अवसरवादी होने पर संदेह खड़ा करता है।
अहोम, मटका, मोरान, चुटिया, कोच-राजबोंगिस और चाय जनजाति (आदिवासी) को एसटी का दर्जा देने की मांग लंबे समय से चली आ रही है और इस मांग की जांच के लिए कई समितियों का गठन किया गया था। यह घोषणा कम से कम एक महीने पहले की जा सकती थी और यहाँ भी आखिरी घंटे में कदम उठाना इसे अत्यधिक संदिग्ध बनाता है।
राजनाथ सिंह ने मंगलवार को लोकसभा के फर्श से असम के लोगों को आश्वस्त किया कि असम को बंगाली हिंदुओं की मेजबानी का भार नहीं उठाना पड़ेगा जिन्हें नागरिकता विधेयक लागू होने के बाद भारतीय नागरिकता प्रदान की जाएगी। लेकिन इस मौखिक आश्वासन का कोई मानने वाला नहीं है।
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (ए ए एस यू) ने आश्वासन को “उपहास” और “बचकाना” करार दिया है। सोमवार को भाजपा से नाता तोड़ने वाली असोम गण परिषद (एजीपी) ने यह कहते हुए आश्चर्य जताया कि इस बिल में एक भी ऐसा अनुच्छेद नहीं जोड़ा जिसमें जो भी भारतीय नागरिक (बिल के अधिनियमन होने के बाद) के रूप में सम्मिलित होगा वो सभी देश के अन्य हिस्सों में फिर से मिल सकते हैं।
विधेयक में राज्य और क्षेत्र के असमिया और स्वदेशी लोगों के हितों की रक्षा के लिए इस तरह का अनुच्छेद नहीं जोड़ने पर अड़े रहने के कारण भाजपा ने उत्तर पूर्व में काफी राजनीतिक जमीन खो दी है। असम में सत्तारूढ़ गठबंधन से एजीपी का बाहर निकलना हालांकि यह सरकार को नीचे नहीं गिराएगी लेकिन यह भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक और नैतिक झटका है। महत्त्वपूर्ण लोकसभा चुनावों के आने के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने क्षेत्र से 21 सीटें जीतने का जो लक्ष्य बनाया था अब जोखिम में नज़र आ रहा है।
राजनाथ सिंह ने मंगलवार को लोकसभा में असम के लोगों को आश्वासन दिया कि उनके हितों की रक्षा की जाएगी और केंद्र सरकार असम के लोगों से बात करेगी और उनकी शिकायतों को सुनेगी और हल करेगी।
एजीपी के एक प्रवक्ता ने कहा कि “असम के लोगों से बात करने और हमारी शिकायतों को सुनने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है। हम सभी ने जेपीसी का प्रतिनिधित्व किया लेकिन जेपीसी द्वारा उन पर कोई विचार नहीं किया गया। भाजपा असम और उत्तर पूर्व के लोगों और संगठनों द्वारा किए गए प्रतिनिधित्व से भी अवगत थी। राज्य के लोगों की चिंताओं और शिकायतों को दूर करने के लिए बिल को उपयुक्त रूप से संशोधित क्यों नहीं किया गया। राजनाथ सिंह ने जो आश्वासन दिया है वह खोखला है और विश्वसनीयता में कमी है।
“इन सभी दशकों में कांग्रेस द्वारा धोखा दिए जाने के बाद हमने सोचा था कि भाजपा हमारे सामने आने वाले जनसांख्यिकीय आक्रमण से हमारी रक्षा करने में गंभीर होगी। लेकिन भाजपा ने भी हमें धोखा दिया है। हम बेहद निराश हैं और हमने भाजपा पर जो विश्वास किया था और उस विश्वास का विश्वासघात किया है वह हमें दुखी और क्रोधित कर रहा है। यह भाजपा को महंगा पड़ने वाला है, ”गुवाहाटी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और जाने-माने अकादमिक ध्रुभज्योति डेका ने कहा। उन्होंने असम में आज व्यापक रूप से फैली भावना को व्यक्त किया।
भाजपा ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक के माध्यम से कुछ गंभीर त्रुटियाँ कीं। इसने या तो पूरे उत्तर पूर्व को बिल के दायरे से बाहर रखा होता या एक ऐसा अनुच्छेद सम्मिलित किया होता कि इस क्षेत्र में निवास करने वाले सभी अवैध अप्रवासी जो विधेयक के लागू होने के बाद भारतीय नागरिक बन जाएँगे उन्हें अन्य राज्यों में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। और असम समझौते के अनुच्छेद 6 के कार्यान्वयन और असम में छह समुदायों को एसटी का दर्जा देने के बारे में घोषणाएँ बहुत पहले कर देनी चाहिए थीं।