राजनीति
भारतीय राजनीति में चर्च का हस्तक्षेप अस्वीकार्य, रद्द हो वैटिकन की मान्यता

आशुचित्र-

  • यदि भारत सरकार का कोई आत्म-सम्मान है तो इसे ऐसे दूतावास, जो मात्र पोप का प्रतिनिधि बनकर इसकी गरिमा को क्षति पहुँचा रहा है, को वैटिकन वापस भेज देना चाहिए।
  • शंकराचार्य के ईसाई संस्करण को सम्मान देना ठीक है लेकिन किसी राज्य प्रमुख के सम्मान के कारण नहीं।

भारतीय राजनीति में चर्च के बढ़ते हस्तक्षेप को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और औपचारिक रूप से इस समस्या पर चर्चा होनी चाहिए। इसे या तो दिल्ली से वैटिकन के राजदूत को वापस भेज देना चाहिए या वैटिकन को एक राज्य के रूप में अमानित कर देना चाहिए। धर्मिनिरपेक्ष संसार में किसी भी धार्मिक संस्था को राज्य के रूप में पहचाना जाने के लिए बाधित नहीं किया जा सकता, वह भी एक संप्रभु राष्ट्र में तो बिल्कुल नहीं।

कई राज्य चुनावों में चर्च के पादरी नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के विरुद्ध मतदान के लिए लोगों को उकसा रहे हैं। इसका मतलब, वे विपक्ष समर्थक हो चुके हैं। यह दिसंबर 2018 में हुआ जब दक्षिण भारत के कई बिशॉप, पास्टर और पादरियों ने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम के एमके स्टैलिन को समर्थन जताया। ऐसी ही दृश्य अन्य बिशॉप और प्रमुखों द्वारा दूसरे राज्यों में देखा गया।

अपना राजनीतिक विचार निजी रूप से रखना एक बात है लेकिन अपने उपदेश-मंच का दुरुपयोग कर चुनावों को अनौपचारिक रूप से प्रभावित करना दूसरी। कोई वितर्क कर सकता है कि जब कई भारतीय गुरु, बाबा और शंकराचार्य कई बार राजनीतिज्ञों का प्रतिनिधित्व करते हैं तो सिर्फ चर्चों पर ही दोष क्यों मढ़ा जा रहा है?

उत्तर सीधा तथ्य है- वैटिकन एक राज्य है जिसका भारत में दूतावास भी है। और सभी प्रमुख व बिशॉप वैटिकन द्वारा ही नियुक्त किए जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ में बाहरियों द्वारा कई राजदूत नियुक्त किए जा रहे हैं और वे बारतीय राजनीति को वास्तविकता में प्रभावित कर रहे हैं। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में यह अस्वीकार्य है। यदि यूएस राजनीति में रूस का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है तो भारत में वैटिकन का हस्तक्षेप कम आपराधिक कैसे हुआ।

चीन इस बात को लेकर सख्त है कि बिना इसकी सहमति के वैटिकन किसी पुजारी को नियुक्त नहीं कर सकता और कोई भी नियुक्ति इसकी जानकारी के बिना होती है तो इस हस्तक्षेप माना जाता है। पिछले सितंबर वैटिकन और चीन के बीच एक संधि हुई जिसके अनुसार चीनी सरकार द्वारा नियुक्त बिशॉप वैध होंगे और भावी नियुक्तियाँ दोनों पार्टियों की सहमति से ही की जाएगी।

इसका अर्थ यह कि चीन ने वैटिकन को राज्य की तरह औपचारिक रूप से स्वीकार किया है और वैटिकन ने भी स्वीकार किया है कि यह चीन में जो भी करता है, उसके साथ चीनी राज्य का सहमत होना आवश्यक है। लघु में कहा जाए तो दो राज्यतंत्रों के बीच संधि।

प्रोटेस्टेन्ट चर्चों के मामले में कहा जा सकता है कि वे सीधे तौर पर विदेशी वरिष्ठों के आदेश का पालन नहीं करते हैं लेकिन यह भी तथ्य है कि क्वीन इंगलैंड के चर्च की आधिकारिक प्रमुख है और उत्तर एवं दक्षिण भारत के चर्च एंग्लीकन कम्युनियन के भाग है जहाँ यह आर्कबिशप ऑफ कैन्टरबरी समतुल्य है लेकिन इंग्लैंड के चर्च के बाहर इसका औपचारिक अधिकार नहीं है।

कई प्रोटेस्टेन्ट चर्च की सत्ता अंग्रेज़ों से अमेरिका के पास चली गई है जिसने यूएस राजनीति को बहुत प्रभावित किया। वे ऐसा कानून लाने में सक्षम हो गए जिसने यूएस को विश्व भर में धार्मिक स्वतंत्रता का निरीक्षक बना दिया, हालाँकि कोई देश सीमा से अधिक इसका प्रभुत्व स्वीकार नहीं करता है। अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता के लिए यूनाइटेड स्टेट्स आयोग (यूएस सीआईआरएफ) ऐसी ही एक संस्था है जो विश्व भर में धार्मिक स्वतंत्रता मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखती है। भारतीय चर्च यूएस सीआईआरएफ को रिपोर्ट करते हैं और वे सत्ताधारी पार्टी के विरुद्ध कार्य करने के लिए उकसाती है, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी जैसी हिंदू पार्टी इनका निशाना होती है।

यदि भारत सरकार स्वाभिमानी है तो पोप का प्रतिनिधि बनकर इसकी गरिमा को क्षति पहुँचाने वाले दूतावास को वैटिकन वापस भेज देना चाहिए। शंकराचार्य का ईसाई संस्करण सम्मान का पात्र है लेकिन किसी राज्य प्रमुख के सम्मान के कारण नहीं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।