राजनीति
चोर मचाए शोर? राफेल पर राहुल गांधी की धमकियों को समझें गोएबेल्स तकनीक से

आशुचित्र- राहुल गांधी की राफेल सौदे पर लगातार बातों का कारण आसानी से समझा जा सकता है। गोएबेल्स तकनीक के प्रयोग से स्पष्ट होता है कि इसके पीछे कोई सबूत और कोई सच्चाई नहीं है।

संसद में राफेल सौदे पर हुई वार्ता में एक चीज़ स्पष्ट हो गई कि भले ही सबूतों का अभाव हो या सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, राहुल गांधी इस मामले को छोड़ेंगे नहीं।

वे एक सरल और समय द्वारा परीक्षित वाक्य का अनुसरण कर रहे हैं जो नाज़ी मान्यता के प्रचार-प्रसार प्रमुख जोसेफ गोएबेल्स के समय से प्रचलित है। एक झूठ को सौ बार बोलो और लोग उसे सच मान लेंगे। आपको केवल नए सबूत का दावा करना है। कल (2 जनवरी) को गोवा मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की एक टेप रिकॉर्डिंग थी, कल कुछ और होगा तथा गांधी परिवार ने संकेत दिए हैं कि कई और टेप हो सकती हैं। अत: सही सिद्ध होने की उम्मीद में ये आरोप लगते जाएँगे।

सबूत नहीं होने का सबूत है कि गोएबल्स की राह पर चलते राहुल गांधी के पास प्रत्येक बहस में, प्रेस वार्ता में तीन बिंदु होंगे- चौकीदार चोर है, नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी। अपनी बातों में मसाला डालने के लिए वे प्रधानमंत्री को बहस की चुनौती देंगे, उन्हें डरपोक करार देंगे, प्रेस वार्ता न करने पर ताने देंगे (भले ही राहुल गांधी की प्रेस वार्ता से आज तक एक भी सार्थक बात सामने न आई हो) और नरेंद्र मोदी को अन्य तरीकों से बदनाम करने के प्रयास करेंगे।

राहुल के संदर्भ में दो बातें याद रखनी होंगी- चोर मचाए शोर, चोर ही चोर-चोर चिल्लाकर अपनी ओर से ध्यान भटकाने का प्रयास करता है। यदि राहुल कहते हैं कि चौकीदार चोर है तो कोई अव्यवसायी मनोवैज्ञानिक भी यह समझ जाएगा कि राहुल अपनी ओर से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। तो प्रमुख प्रश्न है कि राहुल किस बात से ध्यान हटाने का प्रयास कर रहे हैं?

इसके दो कारण हो सकते हैं, पहला तो नेशनल हेराल्ड घोटाला जहाँ वे और उनकी माँ ने दो अन्य कांग्रेसी नेताओं के साथ मिलकर हज़ारों करोड़ की संपत्ति एसोसिएटेड जर्नल्स से उनके द्वारा संचालित निजी ट्रस्ट को बिना किसी निवेश के दिलवाई थी। यह एक बदनीयत युक्त मामले के खुलने और बंद होने का मुद्दा है। यह भी है कि कभी भी एक ईमानदार न्यायधीश सच ही कहेगा। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय समेत अन्य अदालतों ने भी गांधी परिवार के प्रयासों के विपरीत जिस साल हेराल्ड सौदा हुआ था उस वर्ष के इनकम टैक्स के अभिलेख का पुन: आकलन करने के आदेश दिए। ये दोनों माँ-बेटे जमानत पर बाहर हैं और निचली अदालत में इस मुद्दे पर कानूनी कार्यवाही झेलेंगे।

अन्य कारण यूएई से क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण का है। कांग्रेस से जुड़े वकील मिशेल को कानूनी सहायता दिलाना चाह रहे हैं वहीं केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की गई जाँच में मिशेल द्वारा किसी भी प्रकार के खुलासे होने की आशंका ने माँ-बेटे की चिंता बढ़ा दी है। बाहर आई कुछ खबरों से पता चलता है कि कुछ नुकसान हो चुका है।

वहीं जब बात राफेल की आती है तो सरकार से सरकार के सौदे के बीच कोई भी आशंका नहीं दिखती, यहाँ कोई भी बिचौलिए की बात नहीं है जैसा कि बोफोर्स अथवा अगस्ता घोटाले में है जो सोनिया गांधी से जुड़े होने के संकेत देते हैं। मोदी सरकार के मामले में केवल एक ही कमज़ोर कड़ी है और वह है राफेल सौदे में अनिल अंबानी का ऑफसेट सहयोगी होना। लेकिन यहाँ भी अदालत द्वारा सरकार के खिलाफ कोई सबूत नहीं पाया गया।

वहीं बोफोर्स मामले में गांधी परिवार से जुड़े किसी भी बिचौलिए को जेल नहीं हुई तथा नेशनल हेराल्ड भी अदालतों द्वारा लंबे समय से चलाया जा रहा है। अगुस्टा वेस्टलैंड सौदे में हेलीकॉप्टर का कॉन्ट्रेक्ट दिलाने में गांधी परिवार की भूमिका की ओर इशारा करते कुछ बिंदु, बिचौलिए को मिली राशि पर शक और मिशेल के प्रत्यर्पण के बाद भी कोई सबूत हासिल नहीं हुआ। इसका अर्थ यह है कि राफेल मुद्दा भी कहीं नहीं जाएगा क्योंकि यहाँ भी बोफोर्स, अगस्ता और नेशनल हेराल्ड की तरह सबूत नहीं है।

राफेल मुद्दे पर केवल एक सबूत हमें मिलता है जो फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का कुछ समय पहले आया हुआ बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि अनिल अंबानी का चयन भारत सरकार के कहने पर किया गया था हालाँकि डसॉल्ट सीईओ और फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति ने इस बात को नकारा है। वहीं यदि आप ओलांद का बयान भी पढ़ेंगे तो उसमें उन्होंने केवल यह कहा है कि अंबानी के चयन में फ्रांस सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं था तथा चयन करने में भारत सरकार और डसॉल्ट की भूमिका थी। इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत सरकार ने डसॉल्ट को अंबानी का चयन करने का सुझाव दिया।

यह संभव है कि अनिल अंबानी के प्रवेश का कोई अन्य कारण हो। कुछ वर्षों पहले अनिल और उनके बड़े भाई मुकेश ने एक दूसरे के खिलाफ गैर प्रतिस्पर्धा धारा का उल्लंघन किया था। जिससे मुकेश पुन: टेलीकॉम के व्यवसाय में प्रवेश कर सके। क्या उन्होंने रक्षा क्षेत्र अपने छोटे भाई को मुआवजे के तौर पर दी है?

राफेल-अंबानी सौदे की पृष्ठभूमि यह है- टाटा ने लॉकहीड मार्टिन के साथ रक्षा क्षेत्र में साझेदारी के लिए अनुबंध किया। डसॉल्ट ने मुकेश अंबानी के साथ वार्ता आरंभ की लेकिन एक वक़्त पर मुकेश दौड़ से बाहर हो गए और अनिल अंबानी ने इसमें प्रवेश किया। कोई भी यह सोच सकता है कि एक भाई का दौड़ से बाहर होते ही दूसरे का प्रवेश करना केवल संयोग नहीं हो सकता। संभव है कि मुकेश ने टेलीकॉम में प्रवेश करने हेतु अपने भाई को यह लाभ दिलवाया लेकिन हम दोनों ही भाइयों से इसकी कोई पुष्टि नहीं पाएँगे।

राफेल सौदे पर एक अलग नज़रिया जो राहुल की गोएबल्स जैसी बातें स्पष्ट करता है वह एक ऐसी संस्था का मुद्दा है जो इस दौड़ में शामिल थी और वह रॉबर्ट वाड्रा से जुड़ी हुई थी।

इसी कारण द इकोनॉमिक टाइम्स  को लिखना पड़ा था, “एक समय पर दागी संस्था ऑफसेट इंडिया सॉल्युशन (ओआईएस) भी इस दौड़ में शामिल हुई थी और प्रमुख वार्ताकारों के अनुसार इसने राफेल के कार्य लेने के लिए दबाव भी बनाए थे। इस कंपनी के प्रचारक के कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा से संबंध हैं। उसके प्रचारक संजय भंडारी के फ़रवरी 2017 में लंदन चले जाने के बाद भारत में व्यापार में दिक्कतें आने के कारण से ओआईएस बंद हो गई।”

यदि ये सभी बातें ध्यान में रखी जाएँ तो राहुल गांधी की राफेल सौदे पर लगातार बातों के कारण को आसानी से समझा जा सकता है। गोएबेल्स के तरीके के प्रयोग से स्पष्ट होता है कि इसके पीछे कोई सबूत और कोई सच्चाई नहीं है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।