राजनीति
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावः स्थानीय स्थितियों पर निर्भर होंगे नतीजे
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावः स्थानीय स्थितियों पर निर्भर नतीजे

प्रसंग
  • सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस राज्य में चुनाव के लिए तैयार हैं, लेकिन कुछ ऐसी अहम बातें हैं जो चुनाव के नतीजों को प्रभावित करेंगी

छत्तीसगढ़ चुनाव की सरगर्मियाँ तेज हो गई हैं। डॉ. रमन सिंह की 55 निर्वाचन क्षेत्रों को कवर करने वाली विकास यात्रा का पहला चरण खत्म हो चुका है और नामांकन करवाने के बाद अटल विकास यात्रा के नाम से यात्रा का दूसरा चरण किसी भी समय शुरू हो सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस महीने की शुरूआत में नए कार्यालय का उद्घाटन करते हुए पहले ही चुनावी बिगुल बजा चुके हैं। इस मौके पर राहुल ने राज्य की जनता से कहा था कि उन्होंने भाजपा सरकार को सत्ता से बेदखल करने का मन बन लिया है। इसी समय अजीत जोगी के लिए दरवाजा खुला रखते हुए मायावती कांग्रेस के साथ गठबंधन के विकल्पों की तलाश कर रही हैं।

नतीजों में निरंतरता

राज्य की स्थापना के बाद पिछले तीन चुनावों के नतीजों में निरंतरता देखने को मिली है। यहाँ भाजपा 49-50 और कांग्रेस 37-39 सीटों पर जमी हुई है। सन् 2003 में दोनों पार्टियों के बीच वोट शेयर का अंतर 2.6 प्रतिशत था जो 2013 में घटकर 0.7 प्रतिशत ही रह गया था, सीटों की संख्या नतीजों में एक स्थिरता को इंगित करती हैं।

वोट शेयर
पार्टी 2003 (प्रतिशत) 2008 (प्रतिशत) 2013 (प्रतिशत)
भाजपा 39.3 40.3 42.30
कांग्रेस 36.7 38.6 41.60
अंतर 2.6 1.7 0.7
बसपा 4.4 6.1 4.4
सीटों की संख्या
भाजपा 50 50 49
कांग्रेस 37 38 39
अंतर 13 12 10

 

सार्थक मंथन संघटित होना

हालांकि, पिछले तीन चुनावों में समग्र परिणाम व्यापक रूप से समान हैं, लेकिन कई सीटें एक से दूसरे के हाथ में चली गईं हैं।

2008 बनाम 2003

2008 में, परिसीमन अभ्यास के बाद 66 सीटें यथावत रहीं, जबकि 24 नई सीटों का सृजन हुआ। भाजपा ने 2003 में इन 66 सीटों में से 35 सीटें जीती थीं लेकिन 2008 में इनमें से केवल 19 यानी कि (54 प्रतिशत) सीटें ही सुरक्षित रख पाने में कामयाब रह सकी। कांग्रेस ने इन 66 सीटों में से 29 सीटें जीती थीं लेकिन केवल 12 सीटें (41 फीसदी) ही बचा पाने में कामयाब रह पाई थी। कुल मिलाकर 53 प्रतिशत सीटें एक से दूसरे के हाथ में चली गईं, जहां लोगों ने एक अन्य पार्टी के उम्मीदवार को चुनने के लिए निर्वाचित सदस्य को वोट किया।

पार्टी प्राप्त सीटें प्रतिधारण अनुपात सीटों की अदला-बदली लाभ / हानि अनुपात

(प्रतिशत)

भाजपा 24 48.0 26 52.0
कांग्रेस 12 31.6 26 68.4
कुल 36 40.9 52 59.1

 

2013 बनाम 2008

2013 में, भाजपा 2008 में जीती 50 सीटों (48 प्रतिशत) में से केवल 24 सीटें बचा पाने में कामयाब रह पाई थी, जबकि 2008 में कांग्रेस द्वारा जीतीं गईं 38 सीटों (32 प्रतिशत) में से केवल 12 सीटें ही सुरक्षित रह पाईं थीं। कुल मिलाकर लगभग 60 प्रतिशत सीटें एक से दूसरे के हाथ में चलीं गईं। जो एक बड़ी संख्या है।

पार्टी प्राप्त सीटें प्रतिधारण अनुपात सीटों की अदला-बदली लाभ / हानि अनुपात

(प्रतिशत)

भाजपा 24 48.0 26 52.0
कांग्रेस 12 31.6 26 68.4
कुल 36 40.9 52 59.1

 

स्थानीय सत्ता विरोधी लहर का है खेल

यह प्रत्येक चुनाव में विधान सभा सदस्यों (विधायकों) के खिलाफ महत्वपूर्ण स्थानीय सत्ता-विरोध का प्रदर्शन करता है। सामान्यतः सीट स्तर का सत्ता विरोध सत्तारूढ़ पार्टी को नुकसान पहुंचाता है क्योंकि  इसमें अधिक विधायक होते हैं।

हालांकि, कांग्रेस भाजपा सरकार को उखाड़ फेंकने में नाकामयाब रही है क्योंकि इसका प्रतिधारण अनुपात कांग्रेस से कम है, जो 2008 में 41 प्रतिशत बनाम 54 प्रतिशत और 2013 में 32 प्रतिशत बनाम 48 प्रतिशत रहा। यह भाजपा के विधायकों की अपेक्षा कांग्रेस के विधायकों  पर लोगों की नाराजगी को दर्शाता है। यह एक आईबीसी सर्वेक्षण से भी संबंधित है, जिसके अनुसार राज्य में 56 प्रतिशत लोग अपने विधायकों से संतुष्ट नहीं हैं।

विधायक के साथ संतुष्टि आईबीसी24
  अप्रैल (प्रतिशत)
हाँ 38
नहीं 56
कह नहीं सकते 6

 

कामयाब हुई रमन सिंह की रणनीति

2013 के चुनावों से पहले, रमन सिंह अच्छी तरह से जानते थे कि स्थानीय सत्ता विरोध 2003 से प्रत्येक चुनाव में भूमिका निभा चुका है। उन्हें जानकारी थी कि लोग उनके कुछ विधायकों से नाखुश हैं और इसीलिए उन्होंने जनता से कहा कि लोग उन्हें वोट दें, उम्मीदवार को नहीं। यह रणनीति काम कर गई और कई उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहे, जबकि उनकी जीत के बारे में संदेह थे। रमन सिंह द्वारा अपनाई गई अध्यक्षीय चुनाव शैली ने भाजपा को काफी हद तक सफलता दिलाई।

 

शहरी / अर्ध शहरी / औद्योगिक केन्द्रों का मौजूदा विधायकों को वोट देने की तरफ झुकाव

2013 में सत्ता परिवर्तन होने वाली 52 सीटों में से 38 सीटें बिलासपुर, दुर्ग और रायपुर क्षेत्रों की थीं और 14 सीटें बस्तर और अंबिकापुर के जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित थीं। बस्तर और अंबिकापुर राज्य के मुख्य आदिवासी क्षेत्र हैं और इन क्षेत्रों में 26 सीटें हैं। शेष बची हुई 64 सीटें बिलासपुर, दुर्ग और रायपुर क्षेत्रों से संबंधित हैं। इसका मतलब यह है कि मौजूदा विधायक (60 प्रतिशत सीटें पार्टी परिवर्तन किए जाने की गवाह है) को वोट देने की जनजातीय क्षेत्रों (53 प्रतिशत) की तुलना में गैर-जनजातीय क्षेत्रों में अधिक संभावना है।

कांग्रेस को स्थानीय प्रचार पर ध्यान देने की जरूरत है

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अगर कांग्रेस को यह चुनाव जीतना है तो कांग्रेस को स्थानीय प्रचार पर ध्यान देना चाहिए, राज्य की सभी 90 सीटों के लिए एक घोषणापत्र तैयार करना चाहिए, भाजपा के सभी मौजूदा विधायकों के खिलाफ ‘आरोप पत्र’ तैयार करना चाहिए। अगर कांग्रेस किसी एक चेहरे को अगुआकार बनाकर चुनाव लड़ने का प्रयास करती है, तो वह हार जाएगी, क्योंकि राज्य में रमन सिंह की प्रतिभा के सामने टिकने वाला कोई नेता नहीं है। यहां तक कि रमन सिंह बनाम राहुल गांधी का भी चुनाव हो तो भी कांग्रेस के जीतने की उम्मीद नहीं है। कांग्रेस को बस सत्ता विरोधी हवा का फायदा उठाना चाहिए।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर है जो राजनीति और चुनावों में रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।