राजनीति
परिवर्तन की खातिर बदलाव- छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव परिणामों पर एक नज़र

प्रसंग
  • परिवर्तन के लिए परिवर्तन लोकतंत्र में एक वैध कारण है और छत्तीसगढ़ को बदलाव चाहिए था।

छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बर्बाद हो चुकी है। ज़मीन पर मनोभाव को समझने में सक्षम न होने के लिए सफाई देने का कोई तरीका तो नहीं ही है और कोई बहाना भी नहीं है। जबकि कई राजनीतिक टिप्पणीकारों तथा चुनाव विशेषज्ञों ने कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना के साथ काफी करीब की जंग होने की भविष्यवाणी की थी, वहीं बहुत ही कम लोगों ने भाजपा की पूरी तरह से हार की भविष्यवाणी की थी।

राज्य में अब तक के सबसे निर्णायक जनादेश में भाजपा 15 सीटों पर ही सिमट कर रह गई, इससे साफ है कि नाराज़गी और निकटवर्ती बदलाव की भावना को भुलाना बहुत ही कठिन होगा। लेकिन बहुत से लोगों को इस नतीजे से काफी बड़ा झटका लगा और यह मीडिया और सोशल मीडिया की प्रकृति पर भी सवाल उठाता है। लेकिन यह सब बाद के लिए है।

इस स्थिति में जो कुछ सबसे ज्यादा किया जा सकता है वह है हार पर चिंतन करना और दीर्घदर्श में इस बात का पता लगाना कि भाजपा के साथ क्या गलत हुआ और राज्य में किस चीज़ ने कांग्रेस के लिए काम किया।

सत्ताविरोधी लहर का दोहरा आघात

छत्तीसगढ़ में निर्णायक जनादेशों और चुनावी नतीजों की इतनी खराब हालत तो कभी भी नहीं देखी गई है और लगभग हमेशा ही नतीजे एक दूसरे के बहुत ही करीब रहे हैं। सन् 2013 में भाजपा तथा कांग्रेस के वोट शेयर में 1 प्रतिशत से भी कम का अंतर था और मतगणना वाले दिन केवल दोपहर बाद ही यह ज्ञात हो पाया था कि कौन जीतेगा। कुछ चुनावी नतीजे तो बहुत ही ज्यादा करीब थे और यहाँ तक कि वोट शेयर में बहुत ही मामूली अंतर के साथ भाजपा 90 में से 49 सीटें सुरक्षित रखने में कामयाब रही थी।

लेकिन इस बार 10 प्रतिशत का बड़ा अंतर है और पिछले चुनाव के विपरीत उम्मीदवारों ने काफी बड़े अंतर के साथ चुनाव जीता है। यह मध्यप्रदेश की तरह करीबी जंग नहीं है और न ही राजस्थान की तरह एक कड़ी जंग। यह एक स्पष्ट गिरावट है। और यह इंगित करता है कि सबसे प्रभावशाली भावना बदल चुकी है।

एकदम सटीक एकल कारणों का शायद यहाँ सीमित प्रभाव होगा क्योंकि भाजपा को राज्य में सभी जनसांख्यिकीय और भौगोलिक समूहों से भारी नुकसान उठाना पड़ा है और राज्य तथा केंद्र दोनों स्तरों पर दोहरे कार्यकाल का आघात अंततः रमन सिंह सरकार को सहन करना पड़ा है।

पहली या दूसरी बार मतदान करने वाली नई पीढ़ी के लिए भाजपा एकमात्र ऐसी चीज होगी जिसको वे याद रखेंगे और अपने फैसले को आधार देने के लिए उनके पास पहले अजीत जोगी सरकार या अविभाजित मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार का कोई संदर्भ बिंदु नहीं होगा। इस प्रकार, स्थानीय विधायकों का असंतोष और विकास की गति पर अधीरता ही एकमात्र महत्त्वपूर्ण कारक होगी।

अधीर मतदाता राजनीतिक दलों को लेकर चौकन्ने रहते हैं और अधीरता के लिए शायद 15 साल पर्याप्त लंबा समय था। ताजगी की माँग इतनी अधिक थी कि लोकप्रिय मुख्यमंत्री रमन सिंह अपेक्षाकृत बहुत ही कम अंतर से जीतने में सफल रहे और कांग्रेस का मुख्यमंत्री का चेहरा न दिखाने का जुँआ सफल रहा।

अनुसूचित और जनजातीय वोट

पूरे राज्य में ‘चावल वाले बाबा’ के नाम से विख्यात रमन सिंह की देश में सर्वश्रेष्ठ सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को संस्थागत बनाने के लिए जनजातीय घटकों के बीच एक सकारात्मक छवि थी। लेकिन सन् 2013 में कांग्रेस ने दक्षिणी छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिलों, विशेष रूप से कांकड़ और बस्तर में बेहतर प्रदर्शन किया था।

कांग्रेस ने 29 सीटों में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी जिसमें नक्सल प्रभावित बस्तर और दंतेवाड़ा की सीटें भी शामिल थीं। उत्तरी छत्तीसगढ़ में जनजातीय बहुलता वाले जशपुर में संपूर्ण सफाए के साथ भाजपा ने 11 जनजातीय सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन, इस बार भाजपा सन् 2013 में जीती हुई 11 सीटों में से केवल 1 सीट पर ही फिर से जीतने में सक्षम रही। यह बहुत ही कम अंतर के साथ दंतेवाड़ा सीट जीतने में कामयाब रही तथा रामपुर में जीत के साथ जनजातीय क्षेत्र में इसके पास सिर्फ तीन सीटें ही रहीं।

2019 को देखते हुए, यह एक महत्त्वपूर्ण निर्वात है क्योंकि कांकड़, जगदलपुर और जशपुर के जनजातीय क्षेत्रों में अब कांग्रेस की पकड़ काफी मजबूत है।

लेकिन भाजपा के लिए जनजातीय निर्वाचन क्षेत्रों का नुकसान उतना अहम नहीं है जितना कि अनुसूचित जाति के निर्वाचन क्षेत्रों का नुकसान। सन् 2013 में भाजपा ने अनुसूचित जाति की 10 सीटों में से 8 पर जीत दर्ज की थी। लेकिन अब यह केवल मस्तूरी तथा मुंगेली ही जीतने में सक्षम हो पाई है, बाकी सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हुआ है। लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में सीधे कांग्रेस को वोट स्थानांतरित होना ही यहाँ पर काफी अहम है।

अहिवारा, आरंग, डोंगरगढ़, नवगढ़, सरायपाली और सारंगढ़ सीटों पर भाजपा 25,000 से 52,000 के बीच के अंतर के साथ हार गई। इनमें से कुछ सीटों पर भाजपा ने सन् 2013 में इसी तरह का अंतर दर्ज किया था और इस बार पूरा मामला उल्टा प्रतीत होता है।

यह भी ध्यान रखना काफी महत्त्वपूर्ण है कि भाजपा ने इन विधानसभा सीटों में से कई सीटों पर अपने पुराने विधायकों को ही उतारा था, जिससे इस बात पर सवालिया निशान उठता है कि कहीं भाजपा स्थानीय असंतोष को खत्म करने में चूक तो नहीं गई।

2019 को देखते हुए, निश्चित रूप से ये अनुसूचित जाति वाले निर्वाचन क्षेत्र भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए ही महत्त्वपूर्ण होंगे। भाजपा को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करना होगा और कांग्रेस को आगे और समेकित होना होगा।

शहरी नाराज़गी

हालाँकि छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए पूरी तरह से मुश्किल रहा है, लेकिन शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में नाराज़गी एक बड़े कारक के रूप में दिखाई देती है। भाजपा के साथ मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ और यह पार्टी की पिछली छवि पर विचार करने के लिए महत्वपूर्ण है। जब कई टिप्पणीकार ग्रामीण संकट को प्रमुख कारक मानकर इस पर जोर देते हैं, तो ध्यान देने योग्य बात है कि भाजपा ने 13 शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में से 8 सीटें खो दी हैं जिन पर 2013 में इसने जीत हासिल की थी।

भाजपा केवल रायपुर में एक और दुर्ग के वैशाली नगर में एक निर्वाचन क्षेत्र जीतने और धमतरी पर जीत हासिल करने में कामयाब रही जिसे कांग्रेस ने 2013 में जीता था। इसे प्रमुख शहरी केंद्रों जैसे कि बिलासपुर, रायगढ़, भिलाई, जगदलपुर और रायपुर के अधिकांश क्षेत्रों से हार मिली है। यह हानि कोई छोटी हानि नहीं थी। कांग्रेस ने रायपुर में दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में 10,000 से अधिक मतों और जगदलपुर में 27,000 से अधिक मतों से जीत हासिल की।

इस बीच कांग्रेस अपनी पूर्व शहरी सीटों महासमुंद और अंबिकापुर पर बरकरार रही है।

भाजपा के साथ शहरी निराशा एक ऐसा पैटर्न है जिसे छोड़ा नहीं जा सकता और छत्तीसगढ़ की कहानी इस पैटर्न पर फिट बैठती है। नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने शहरी क्षेत्रों और प्राथमिक रूप से भाजपा के मूल मतदाताओं के बीच इसकी लोकप्रियता को हानि पहुँचाई।

जोगी फैक्टर और वोट शेयर

चुनाव में प्रमुख धारणा यह थी कि अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी)- या जिसे आमतौर पर जोगी कांग्रेस के नाम से जाना जाता है- के कारण विभाजन और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन के लिए कांग्रेस की अक्षमता कांग्रेस के वोट शेयर में कमी का कारण बन जाएगी।

ऐसा माना जाता था कि छत्तीसगढ़ की कांटे की टक्कर, जो कि हमेशा देखने को मिलती है, में जेसीसी-बसपा गठबंधन किंग मेकर साबित होगा। लेकिन अंतिम परिणाम वास्तव में निरुत्साहित करने वाले रहे हैं और अब ऐसा लगता है कि जेसीसी-बसपा की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था।

आइए देखते हैं कि जेएसएस-बसपा गठबंधन ने क्या प्रदर्शन किया।

जोगी कांग्रेस और बसपा गठबंधन 11.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ कुल सात सीटें जीतने में कामयाब रहा। जोगी द्वारा जीती सीटों में से एक पारंपरिक सीट मरवाही है, जिस पर उन्होंने 45,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल की। उनकी पार्टी द्वारा जीती गई दूसरी सीट कोटा थी जहाँ उनकी पत्नी डॉ रेणु जोगी ने 3,000 वोटों के अल्प अंतर के साथ जीत दर्ज की। जेसीसी ने पाँच सीटों पर जीत दर्ज की और लोरमी के अलावा अन्य चार सीटें कांग्रेस से छीन लीं। बलौदाबाजार को छोड़कर, सभी पाँच सीटों पर कांग्रेस पार्टी तीसरे स्थान पर थी।

भाजपा ने 33 प्रतिशत वोट शेयर दर्ज किया जबकि कांग्रेस ने 43 प्रतिशत। 2013 में, भाजपा के पास 41 प्रतिशत वोट शेयर था और कांग्रेस के पास 40.3 प्रतिशत। वोट शेयर में कांग्रेस का 3 फीसदी का मामूली लाभ रहा है लेकिन यह 29 अन्य सीटें पाने में कामयाब रही। हालाँकि भाजपा में 7 प्रतिशत की कमी आई थी जिसका संकेत उसकी हार से मिलता है।

लेकिन यह ऐसा नहीं लगता कि भाजपा का वोट शेयर जेसीसी-बसपा गठबंधन के पास चला गया हो। बल्कि पहले की चर्चा से स्पष्ट होता है कि ऐसा लगता है कि भाजपा का वोट शेयर सीधे-सीधे कांग्रेस के पास गया है जबकि जोगी ने कांग्रेस के वोट शेयर में सेंध मारी है। निश्चित रूप से भाजपा के वोट जोगी के पाले में गए हैं लेकिन ऐसा भी प्रतीत होता है कि इस प्रक्रिया में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा फायदा उठाया है।

छत्तीसगढ़ में किसानों का संकट भी इन कारणों में से एक रहा है जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा की नइया डुबोने में प्रमुख भूमिका निभाई है।

साथ ही मुख्यमंत्री रमन सिंह लोकप्रिय और प्रभावशाली थे, फिर भी मंत्रियों के खिलाफ एक अंतर्निहित असंतोष और कई विधायकों के खिलाफ स्थानीय क्रोध था। यह मुद्दा शायद नकार दिया गया अथवा पर्याप्त गंभीर नहीं माना गया और पार्टी को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। अंत में छत्तीसगढ़ परिणामों के विश्लेषण को ‘मतदाताओं की थकान’ कहा जा सकता है।

मतदाताओं में अंतर्निहित अधीरता के कई कारण हो सकते हैं और यह भविष्य में ध्यान देने योग्य विषय है। लेकिन परिवर्तन की खातिर परिवर्तन लोकतंत्र में एक वैध कारण है। और छत्तीसगढ़ बदलाव चाहता था।

प्रत्याशा रथ एक सलाहकार हैं जो सामाजिक विकास और राजनीतिक क्षेत्र में काम कर रही हैं।