भारती / राजनीति
विमर्श के नाम पर निहित स्वार्थसिद्धि के लिए तथाकथित उदारवादी निषेधाधिकार चाहते हैं

लूट्यन्स दिल्ली में सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना से असहमत होने वाले लोगों के पास असहमति का सबसे बड़ा कारण है कि इस विषय पर जनता से पर्याप्त विमर्श नहीं किया गया। नए संसद भवन समेत अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए प्रस्तावित इस परियोजना को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। वहाँ भी याचिकाकर्ताओं ने इसी बिंदु को उठया, हालाँकि 2-1 के निर्णय से इस परियोजना को हरी झंडी मिल गई।

संजय खन्ना, परियोजना के विपक्ष में मत करने वाले न्यायाधीश, के पास भी न्यायाधीश एएम खानविलकर और दिनेश माहेश्वरी के निर्णय से असहमत होने का सबसे बड़ा यही कारण था। खन्ना को परियोजना के बिड नोटिस या कन्सल्टेन्सी अनुबंध या दिल्ली शहरी कला आयोग की इस परियोजना को हामी से असहमति नहीं थी, उन्हें चिंता थी सार्वजनिक चर्चा की कमी की जो “लोकतंत्र के गढ़ों को आम लोगों से जोड़ती और उन्हें प्रेरित करती है।”

न्यायाधीश खन्ना चाहते थे कि परियोजना के लिए किया गया भूमि उपयोग में परिवर्तन वापस लिया जाए और मामला पुनः विरासत संरक्षण समिति के पास चला जाए लेकिन उनका मुख्य बिंदु था कि “जनता को न सिर्फ प्रस्तावित योजना की जानकारी दी जानी चाहिए, बल्कि वास्तविक विकल्पों की एक रूपरेखा और इस योजना को प्रधाकारियों द्वारा चुने जाने के मुख्य कारण भी बताए जाने चाहिए।”

आदर्श रूप से लोकतंत्र के लिए अधिक विचार-विमर्श और अधिक सार्वजनिक चर्चाएँ अच्छी हैं लेकिन वास्तविकता में विमर्श तब ही लाभकारी होता है जब जिन लोगों से विमर्श किया जा रहा है, वे वास्तविक मुद्दों को समझने में सक्षम हों। 20,000 करोड़ रुपये की सेंट्रल विस्टा परियोजना, जिसमें नया सचिवालय भी सम्मिलित है, को लोकप्रिय सहमति के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता।

यह वैसा ही होगा जैसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) माँग करे कि किसी कंपनी के आईपीओ (शुरुआती पब्लिक ऑफरिंग) जारी होने से पहले सभी संभावित निवेशक अपने विचार रखें। अवश्य ही कई सौ पेज के प्रॉस्पेक्टस जारी होते हैं लेकिन व्यापार बैंकिंग समुदाय या म्युचुअल फंड्स से बाहर के लोग इसे समझ नहीं सकते।

संक्षिप्त में कहें तो सार्थक विमर्श के लिए ज्ञानी संभ्रात वर्ग से चर्चा आवश्यक है। लेकिन यहाँ भी एक समस्या है। भारत में अत्यधिक विविधता के कारण यह नहीं कहा जा सकता कि विशेषज्ञ संभ्रात वर्ग जनहित में काम करेगा। वे किसी एजेंसी से प्रभावित हो सकते हैं जहाँ उनके निजी स्वार्थ उससे अलग हो सकते हैं जिसका वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

कई बार हो सकता है कि उनके निहित निजी स्वार्थ किसी नीति या योजना के आर्थिक पहलू में भी हों। उदाहरण स्वरूप, पर्यावरण कल्याण की बात करने वाले भूमि के अभाव से ग्रसित मुंबई में अधिक फ्लोर स्पेस सूचकांक (जिसके कारण अधिक ऊँची इमारतें बन सकती हैं) का विरोध करते हैं। इस कारण से उन बिल्डरों को फायदा होता है जिनके पास बिन बिके फ्लैट हैं। ऐसे में यह चिंता उपयुक्त है कि पर्यावरण चिंता के नाम पर रियल्टी क्षेत्र का लाभ करवाया जा रहा है।

भारत की अत्यधिक विविधता से यह समस्या भी है कि कोई भी कानून- भले ही उसका लाभ कितने ही लोगों को क्यों ने मिलने वाला हो- उसमें किसी न किसी का निहित स्वार्थ आड़े आ ही जाता है। जैसे कृषि कानूनों का विरोध पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सक्षम किसान कर रहे हैं। ऐसे में सबसे विचार-विमर्श का अर्थ होता कि ये कानून आ ही नहीं पाते। एक वर्ग ऐसे कानून को नकारने का सामर्थ्य रखता है जो अधिकतर किसानों को लाभ पहुँचाएँगे।

पिछले कई निर्णयों में सभी राजनीतिक और आर्थिक हितधारकों से विचार-विमर्श के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया बुरी ही हुई है। उदाहरण स्वरूप, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)। तमिलनाडु को छोड़कर सभी राज्यों का विश्वास जीता गया और राज्यों को जोड़ने के कारण उच्च मुआवज़ा लागत और बुरी कर संरचना को बोझ उठाना पड़ रहा है। आज भी हमारे पास एक आदर्श जीएसटी संरचना नहीं है जिसका कारण अधिक विचार-विमर्श रहा।

ऐसे ही हमारे पास बुरा भूमि अधिग्रहण कानून, बुरा खाद्य सुरक्षा कानून और घटिया शिक्षा का अधिकार अधिनियम है। सिर्फ बुरे कानूनों पर ही सहमति बन पाती है और इसमें हितधारकों से विचार-विमर्श की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। यदि आज सरकार कह दे कि प्रति व्यक्ति को 5,000 रुपये प्रति माह दिए जाएँगे तो कोई इसके आर्थिक प्रभाव पर विचार की माँग नहीं करेगा। बल्कि आलोचक कहेंगे कि 5,000 की राशि कम है और अधिक मूर्खता करनी चाहिए।

अनुच्छेद 370 के उन्मूलन और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे कानूनों की सोचें। क्या इन कानूनों पर सहमति लाना संभव था? कांग्रेस भी मानती है कि ये कानून आ सकते हैं लेकिन विरोध इसपर है कि किसी “प्रक्रिया” से वे आए हैं। या पश्चिम बंगाल और असम सीएए के प्रारूप पर सहमत हो जाते? क्या भविष्य में आने वाला राष्ट्रीय नगरिक रजिस्टर जो अब आता हुआ नहीं दिखता, सहमति से हो सकता था?

कुल मिलाकर बात यह है कि कुशल होने के लिए विमर्श का विस्तृत होना आवश्यक नहीं है। लोकतांत्रिक विमर्श को तार्किक छोर तक ले जाने से बात अटक जाती है और आगे नहीं बढ़ा पाती। या इससे भी बुरा वह एक बुरे समझौते का रूप ले लेती है। जब तथाकथित “उदारवादी” विमर्श की कमी की शिकायत करते है तो वास्तव में वे कहना चाहते हैं कि वे निषेधाधिकार चाहते हैं और यदि सहमति तो एक मूल्य पर जो उनके द्वारा निर्धारित हो।

यदि सेंट्रल विस्टा पर विमर्श होता तो यह किसी संसद के कार्यकाल में नहीं हो पाता। प्रायः लोकतंत्र इच्छुक लोगों के गठबंधन के आधार पर काम करता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।