राजनीति
आँकड़ों से जानें कैसे एससी-एसटी संशोधन ने चुनावों में भाजपा को पहुँचाई हानि

आशुचित्र- एससी-एसटी अधिनियम में संशोधन दलित समुदाय के समर्थन की गारंटी नहीं देता है लेकिन सामान्य वर्ग तथा ओबीसी द्वारा समर्थन कम होने का एक कारण अवश्य है।

मार्च 2018 में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम में सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी से प्रारंभिक पूछताछ तथा अग्रिम जमानत के प्रावधान शामिल किए थे। इस पर दलित समुदाय ने रोष जताया था और कहा कि इससे अधिनियम की सख्ती कम हो जाएगी।

देश भर में विरोध तथा भारत बंद के दौरान सात लोगों की जानें भी गईं। लगभग 17 राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तथा सरकार से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त करने की विनती की। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी इस विषय पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था। सरकार पर भारतीय जनता पार्टी के कानून निर्माताओं तथा समाज की ओर से दबाव बढ़ गया था।

एससी-एसटी समुदाय की देश की जनसंख्या में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इस समुदाय के मतदाताओं ने बहुजन समाज पार्टी तथा कांग्रेस से हटकर भाजपा को बड़ा समर्थन दिया था। कई दशकों से बहुजनों ने कांग्रेस तथा बसपा का समर्थन किया था, वहीं आदिवासी समुदाय ने कांग्रेस का।

  • भाजपा को मिला एससी समुदाय का समर्थन 2014 के चुनाव में 24 प्रतिशत था जो कि 2009 में मिले 12 प्रतिशत से दोगुना था।
  • कांग्रेस तथा बसपा को क्रमश: 8 प्रतिशत तथा 6 प्रतिशत का घाटा हुआ था।
  • एसटी समुदाय का समर्थन भी आधे से ज्यादा बढ़कर 2014 के चुनाव में 38 प्रतिशत हो गया था।
  • वहीं कांग्रेस को इसमें 10 प्रतिशत का घाटा हुआ था।

एससी मत रुझान

एसटी मत रुझान

कई दलों के दबाव के बाद तथा एससी-एसटी समर्थन बरकरार रखने के लिए भाजपा एससी-एसटी अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव लेकर आई जिससे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को अमान्य कर दलितों को यह विश्वास दिलाया जा सके कि 2014 में भाजपा को वोट करना उनकी गलती नहीं थी।

आदिवासी समुदाय की अधिक संख्या वाले उत्तर-पूर्व में भाजपा की जीत से नरेंद्र मोदी सरकार पर तुरंत कदम उठाने के लिए दबाव था। वहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में इन समुदायों की 30 प्रतिशत जनसंख्या होना भी इस निर्णय का प्रमुख कारण रहा। पार्टी को उम्मीद थी कि इससे होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी को काफी बढ़त मिल जाएगी, जिन्हें 2019 लोकसभा चुनाव का सेमी-फाइनल भी कहा जा रहा था।

परिणाम विपरीत रहे-
भाजपा को एससी-एसटी आरक्षित सीटों पर बड़ी हार मिली। तीनों राज्यों की कुल सीटें मिलाकर भाजपा को 50 प्रतिशत का नुकसान हुआ है जैसा कि नीचे दर्शाया गया है। एससी आरक्षित सीटों पर भाजपा 2013 में 71 सीटें जीती थी वहीं 2018 में 31 पर आ गई। एसटी आरक्षित सीटों पर भाजपा 57 से 28 के आँकड़े पर आ गई। पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन मध्य प्रदेश में रहा जहाँ शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता तथा उनके द्वारा दलित आदिवासियों के लिए चलाई गई योजनाओं ने भाजपा को यहाँ छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान जितनी बुरी हार से बचा लिया। वहीं सबसे खराब प्रदर्शन छत्तीसगढ़ में रहा जहाँ एससी-एसटी समुदाय कांग्रेस तथा अजीत जोगी के पक्ष में हो गया। जोगी ने आदिवासियों को जमीन के अधिकार देने की बात कही थी।

एससी-एसटी आरक्षित सीटों पर भाजपा का आँकड़ा

मध्य प्रदेश में चुनाव के बाद किए गए सीएसडीएस के सर्वेक्षण से पता चलता है कि 40 प्रतिशत एससी तथा 47 प्रतिशत एसटी समुदाय के लिए अधिनियम का मुद्दा वोट देने के पहले एक प्रमुख वैचारिक बिंदु रहा। वहीं इन समुदायों को भाजपा द्वारा संशोधन में देरी करने से काफी निराशा हुई। परिणाम स्वरूप 49 प्रतिशत एससी तथा 39 प्रतिशत एसटी समुदाय ने कांग्रेस के पक्ष में मत दिया। इस संशोधन ने भाजपा के लिए नई मुश्किल पैदा कर दी। मध्य प्रदेश में सवर्ण आंदोलन ने जोर पकड़ा वहीं राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में भी अन्य जातियों के लोगों में नाराज़गी बढ़ी।

मध्य प्रदेश में 42 प्रतिशत सामान्य वर्ग तथा 38 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अधिनियम वोट देने के पहले एक प्रमुख वैचारिक बिंदु रहा। इसमें से 30 प्रतिशत सामान्य वर्ग तथा 41 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग ने कांग्रेस के पक्ष में मत दिया जिससे भाजपा के वोट बैंक का समीकरण बिगड़ा। सवर्ण आंदोलन से जन्मी सपाक्स पार्टी को ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की दो सीटों पर हार के अंतर से ज्यादा मत मिले जो कि भाजपा प्रत्याशियों की 1,000 मतों के अंतर से भी कम में हुई हार का कारण रहा।

एक सीट करेरा पर इसे 5 प्रतिशत वोट मिले जिससे भाजपा के अवसर कम हुए। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी तथा मायावती के गठबंधन ने भाजपा के दलित और सतनामी वोट बैंक में सेंध लगाई जिससे एससी आरक्षित सीटों पर 2003 से लेकर अभी तक की सबसे बड़ी हार भाजपा को झेलनी पड़ी। राजस्थान में किरोड़ी लाल मीणा का आना भी भाजपा को सहयोग न कर सका। एसटी आरक्षित सीटों पर भाजपा 18 की संख्या से आधी होकर 9 पर पहुँच गई।

मध्य प्रदेश में क्षेत्रीय वितरण दिखाता है कि केवल एससी-एसटी ही नहीं अपितु कई जगह सामान्य वर्ग तथा ओबीसी समुदाय भी भाजपा से किनारा कर गया।

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 38 प्रतिशत एससी-एसटी आबादी वाले मालवा क्षेत्र में भाजपा 2013 में 55 सीटों से 2018 में 28 सीटों पर आ गई। महाकौशल क्षेत्र जहाँ पर 31 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय की है, यहाँ भाजपा 18 सीटों से 9 सीटों पर आ गई। सामान्य वर्ग की सबसे ज्यादा आबादी (28 प्रतिशत) वाले ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा को बुरी हार झेलनी पड़ी है।

दलितों के रोष के बाद एंटी-दलित हिंसा ने संभवत: दलितों को भाजपा के विरुद्ध मत देने के लिए प्रेरित किया होगा। दलित कार्यकर्ताओं के अनुसार भारत बंद के दौरान उनके खिलाफ सैकड़ों एफआईआर दर्ज हुई जो कभी वापस नहीं ली गई।

कांग्रेस ने सफलतापूर्वक लोगों की यह मानसिकता बनाई कि भाजपा दलित विरोधी पार्टी है। अब यह भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। 2014 की जीत पुन: अर्जित करने के लिए भाजपा को आवश्यक है कि दलित वर्ग तथा सामान्य वर्ग को एक साथ लेकर चले।

स्पष्ट है कि एससी-एसटी अधिनियम में संशोधन दलित समुदाय के समर्थन की गारंटी नहीं देता है लेकिन सामान्य वर्ग तथा ओबीसी द्वारा समर्थन कम होने का एक कारण अवश्य है।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार इनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।