राजनीति
क्या मध्य प्रदेश में भाजपा पर लगाम लगाकर ‘हाथी’ को आगे बढ़ा सकती है कांग्रेस?
कांग्रेस बसपा गठबंधन

प्रसंग
  • दलित वोट काफी मायने रखता है, लेकिन यह तो मध्य प्रदेश चुनाव से ही पता चलेगा कि भाजपा और बसपा इस समुदाय को खुश करके किस हद तक मैदान मार पाएंगे

मध्य प्रदेश में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के इरादे से कांग्रेस मायावती की अगुवाई वाली बहुजन समाज पार्टी के साथ बातचीत कर रही है। उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले दलितों के बीच बसपा की काफी अच्छी पहुँच है, यहाँ पर इसकी हर सीट पर औसतन 10,000 वोट हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2013 में यह औसत 17,000 हो गया था। कांग्रेस को उम्मीद है कि उनके पक्ष में 1.5 से 2 प्रतिशत तक वोटों का ईजाफ़ा होगा, साथ ही बसपा से मिलने वाले वोटों से राज्य में पार्टी का ‘वनवास’ भी समाप्त हो जाएगा।

बसपा ने छोटी-मोटी सफलताओं के साथ कांग्रेस और भाजपा के क्षेत्र में दखल देने का प्रयास किया है

बसपा ने अविभाजित मध्य प्रदेश के लिए 1993 में हुए चुनावों में 11 सीटें जीतकर 7 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था। इसने राज्य में पिछले पाँच चुनावों में 7 प्रतिशत की औसत वोट साझेदारी भी दर्ज की है। पार्टी को राज्य के दलित समुदाय का 15 प्रतिशत समर्थन हासिल है, जो राज्य की कुल आबादी का 16 प्रतिशत है। यहाँ पर 35 सीटें दलितों की लिए आरक्षित हैं। राज्य के अनुसूचित जाति वाले क्षेत्र, उज्जैन, सीहोर, छत्रपुर, दतिया, टीकमगढ़, भिंड, सागर और देवास में इनकी संख्या 25 प्रतिशत से अधिक है। चमार और बहलि, दलितों की दो प्रमुख उपजातियाँ हैं जो अनुसूचित जाति का 60 प्रतिशत हिस्सा साझा करती है।

बसपा का वोट शेयर अभी भी 7 फीसदी तक है, लेकिन इसकी सीट का आँकड़ा– इस समय मध्य प्रदेश में 4 और छत्तीसगढ़ में 1 सीट के साथ – काफी हद तक आधा रह गया है। यह राज्य में बीजेपी-कांग्रेस के प्रभुत्व को चुनौती देने में सक्षम नहीं है। उच्च राज्य स्तर के नेताओं की कमी और पार्टी के अगुआकारों (मायावती और कांशीराम, दोनों) द्वारा उत्तर प्रदेश पर ध्यान केंद्रित करने की वजह से राज्य में उनकी संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। बसपा के कई नेता पार्टी छोड़कर कांग्रेस या बीजेपी में शामिल हो गए हैं।

उत्तर प्रदेश के सीमवर्ती क्षेत्रों और राज्य में दलितों के बीच बसपा की अच्छी पकड़ है

उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र विंध्य और चंबल में बसपा की पकड़ काफी मजबूत है। इन क्षेत्रों में 90 सीटें हैं।गठबंधन का आधार यह है कि बसपा को भाजपा के विरुद्ध जो भी वोट मिलते हैं, अगर कांग्रेस और बसपा हाथ मिलाते हैं, को मूल रूप से स्थानांतरित किया जा सकता है। पार्टी 13 सीटों पर अनोखी जीत दर्ज करने के साथ दूसरे स्थान पर रही जिसमें इसे 34 सीटें प्राप्त हुईं । पिछले तीन चुनावों में ये 69 सीटों में 10 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर रही। बसपा के आधे वोट तो पार्टी के नाम से और आधे वोट उम्मीदवार के प्रभाव के कारण आते हैं।

भाजपा ने 2013 के चुनाव में चंबल और विंध्य क्षेत्रों में 90 सीटों में से 61 सीटें जीती थीं। अगर गठबंधन सफल रहा था तो फिर इन क्षेत्रों में इनकी संख्या घटकर 29 (-32) क्यों हो गई। यहां पर दलित आबादी का छठा हिस्सा हैं और कांग्रेस का लक्ष्य इस वोट बैंक के लिए बीएसपी के साथ गठबंधन करके अपनी स्थिति को मजबूत करना था। विंध्य और चंबल क्षेत्रों में वोट शेयर के मामले में 2013 के चुनावों में गठबंधन भाजपा से काफी आगे था।

कांग्रेस और बीएसपी 2008 में जीती थी और 2013 में भाजपा के पसीने छूटा दिये थे

अगर कांग्रेस और बीएसपी ने 2008 में एक साथ चुनाव लड़ा होता, तो दोनों पार्टियों के वोटों के आदान-प्रदान से गठबंधन चुनाव जीत जाता। तथ्य यह है कि उमा भारती अलग से चुनाव लड़ रही थीं, उन्होंने गठबंधन की मदद की होगी। 2013 में, महागठबंधन के गठजोड़ से प्रात 102 (+40) सीटें और भाजपा 124 सीटें (-41) से मुकाबला समाप्त हुआ था। वे भाजपा का दो तिहाई से ज्यादा वोट उड़ा ले जाने में सफल रहे होंगे।

बसपा ने वोटों को अपनी तरफ घूमकर क्षमता साबित कर दी, लेकिन मुद्दा यह है कि वह फिर से हाथ से फिसल न जाएं

पहले अतीत में, बसपा ने अपने गठबंधन सहयोगियों के सामने वोटों के आदान प्रदान करने की अपनी क्षमता साबित कर दी है। हालांकि, चुनौती यह है कि क्या कांग्रेस के मतदाता मायावती को आवंटित सीटों पर बीएसपी उम्मीदवार के लिए वोट देंगे। 1996 में, जब पार्टी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से गंठबंधन किया था, तब इसकी सीटें समान रहीं, वहीं कांग्रेस को पांच सीटों का फायदा हुआ था। हाल ही में उत्तर प्रदेश के कैराना, फूलपुर और गोरखपुर में हुए उप-चुनावों में बसपा कैडर और उनके समर्थकों ने एक आवाज पर सपा और राष्ट्रीय लोक दल के उम्मीदवारों को वोट दिया, जबकि यह एकऔपचारिक गठबंधन नहीं था।

 

विपक्ष के बीजेपी को दलित विरोधी के रूप में प्रचारित करने के बावजूद 2013 मध्य प्रदेश चुनाव के बाद बसपा राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर पड़ गयी

हालांकि पार्टी पिछड़े वर्गों से पूर्ण समर्थन प्राप्त करने में सफल रही है, लेकिन साथ ही यह अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के बीच समर्थन हासिल करने में असफल भी रही है, जो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। यहां तक कि 2013 के चुनावों में, अनुसूचित जनजाति की सीटों पर इसका वोट शेयर घटकर लगभग आधा रह गया था।

2013 के बाद, दलितों के बीच इसके समर्थन में पहले से अधिक गिरावट देखने को मिली। जिसके परिणामस्वरुप बीएसपी 2014 के लोकसभा चुनावों में अपना खाता तक खोलने में नाकाम रही। पार्टी के लिए अखिल भारतीय दलित समर्थन जहां 2009 में 20 प्रतिशत था वहीं 2014 में यह घटकर 14 प्रतिशत रह गया। वहीं, बीजेपी विशेष रूप से युवाओं और गैर जाटव उप जातियों के बीच अनुसूचित जातियों के बीच प्रवेश करने में सक्षम रही है। बीजेपी ने मुद्दा उठाया कि जाटव (मायावती उप जाति) को आरक्षण के सबसे अधिक लाभ प्राप्त हुए हैं । बीजेपी की 2014 की जीत के बाद, विपक्ष इस प्रचार को फैलाने की कोशिश कर रहा है कि बीजेपी गाय से संबन्धित घटनाओं और एससी-एसटी अधिनियम के प्रावधानों को कम करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आधारित एक दलित विरोधी पार्टी है।

दोनों पक्षों के विरोधाभासी कथनों ने बढ़ाई उलझन

रिपोर्ट के अनुसार, बसपा सभी तीन राज्यों में गठबंधन की माँग कर रही है, जिसका चुनाव नवंबर में होना है और यह 2019 के लिए एक राष्ट्रीय गठबंधन होगा। यह गठबंधन जरूर ही भाजपा के लिए परेशानी खड़ा करेगा, भाजपा ने प्रभावशाली बसपा नेताओं को लुभाने और उनको अपनी पार्टी में शामिल करने की रणनीति तैयार कर ली है। हालांकि, आज तक गठबंधन को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं। सीटें तो कई हैं लेकिन मेरी राय में अगर बसपा 30 सीटें ही जीत ले तो दोनों पार्टियों की जीत निश्चित हो सकती है।

गठबंधन नाकामयाब होने पर बीजेपी को लाभ मिलेगा

भाजपा को उम्मीद है कि गठबंधन वार्ताएं असफल हो जाएंगी, बसपा अलग संघर्ष करेगी और अपने ऐतिहासिक प्रदर्शन को बरकरार रखेगी। बसपा को वोट देने वाले निश्चित रूप से भाजपा विरोधी है। अगर बसपा कमजोर पड़ी तो ये वोट कांग्रेस को मिल सकते हैं और भाजपा की संभावनाओं को हानी पहुंचा सकते हैं।

संक्षेप में कहें तो, मध्य प्रदेश में कांग्रेस-बसपा गठबंधन चुनाव को दिलचस्प बना देगा। रहस्योद्घाटन के बिना लगातार विनिमय की गुणवत्ता ही इस गठबंधन की सफलता की कुंजी है। दलितों को पहले बसपा का कितना समर्थन मिला है और एससी-एसटी संशोधन अधिनियम के माध्यम से भाजपा जनता को कितना संतुष्ट कर पाई है, ये दोनों मुद्दे चुनाव की कार्यप्रणाली का निर्णय करेंगे। देखते रहिए आगे क्या होता है।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर है जो राजनीति और चुनावों में रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।