भारती / राजनीति
स्टेन स्वामी की मौत पर रोने वाले झूठे हैं, इन 10 तथ्यों से स्पष्ट हो जाएगा कि सत्य क्या है

कोविड-19 संक्रमण के पश्चात स्वास्थ्य समस्याओं के कारण 84 वर्षीय कैथोलिक पादरी की मृत्यु पर उनके निकटवर्ती लोगों के अलावा न किसी का ध्यान जाता, न किसी को शोक होता लेकिन स्टेनिस्लॉस लॉर्डुस्वामी जिन्हें स्टेन स्वामी के नाम से जाना जाता है, उनके साथ ऐसा नहीं हुआ।

सोमवार (5 जुलाई) को उनकी मौत तकनीकी रूप से न्यायिक हिरासत में हुई जिसके बाद चिंता, टिप्पणियों और आलोचनाओं की बाढ़-सी आ गई जिसमें मानवाधिकार के लिए ईयू के विशेष प्रतिनिधि और मानवाधिकार रक्षकों पर यूएन के विशेष दूत भी सम्मिलित हैं।

भारत के राजनीतिक विपक्ष ने उनकी मृत्यु को केंद्र सरकार को फटकार लगाने के एक अवसर के रूप में देखा और शासन पर दोष मढ़ दिया। सामान्य रूप से तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ आई हैं- पहली, स्टेन स्वामी की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि बीमार होने के बावजूद उन्हें जमानत नहीं दी गई।

दूसरी, उन्हें चिकित्सा सुविधाएँ नहीं मिली और तीसरी, उनपर ‘आतंकवाद’ के झूठे आरोप लगाए गए थे। इनमें से हर प्रतिक्रिया गलत और भ्रामक है। इनमें से कोई भी तथ्यों पर आधारित नहीं है।

ये सभी बातें सत्य को विकृत करके प्रस्तुत की गई हैं जो दर्शाता है कि भारत सरकार, राज्य और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) पर इन हमलों का उद्देश्य क्या है- वे उन ‘एक्टिविस्टों’ पर लगे आरोपों को झूठा बताना चाहते हैं जिनमें से एक स्टेन स्वामी थे।

इन्हें प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से संबंध रखने और राज्य के विरुद्ध हिंसा भड़काने का षड्यंत्र रचने के लिए गिरफ्तार किया गया था। ये ‘एक्टिविस्ट’ किसी एक समुदाय से नहीं हैं, और न ही किसी एक मत को मानते हैं।

इसलिए जो कहा जा रहा है कि कैथोलिक पादरी होने के लिए स्टेन स्वामी को निशाना बनाया गया, वह आधारहीन है। तो इस मामले के तथ्य क्या हैं? आरोपों, न्यायिक कार्यवाहियों और गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपियों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए क्या किया गया, की निम्नलिखित सूची देखें-

  1. 8 जनवरी 2018 को पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन पर कबीर कला मंच के ‘एक्टिविस्टों’ द्वारा ‘एल्गार परिषद’ में 31 दिसंबर 2017 को दिए गए भड़काऊ भाषणों के लिए मामला (एफआईआर क्रमांक 04/2018) दर्ज किया गया। इन भाषणों में स्पष्ट रूप से जाति समूहों के बीच शत्रुता फैलाने का प्रयास था और इससे हिंसा भड़की भी थी जिससे जान-माल की क्षति हुई।
  2. जाँच में पता चला कि सीपीआई (माओवादी) के शीर्ष नेता ‘एल्गार परिषद’ के आयोजकों के संपर्क में थे और अवैधानिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए माओवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे।

‘एल्गार परिषद’ के दौरान क्या-क्या हुआ, इसकी जाँच होने पर परेशान करने वाले तथ्य सामने आने लगे जिसके कारण केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जाँच एनआईए को सौंप दी। इसके बाद एनआईए ने मामला संभाला और 24 जनवरी 2020 को मामला (RC-01/2020/NIA/MUM) दर्ज  किया जिसे ‘भीमा कोरेगाँव’ मामले के नाम से जाना जाता है।

3. इस जाँच के दौरान ही एनआईए को भीमा कोरेगाँव मामले में स्टेन स्वामी की भूमिका का पता चला जो सीपीआई (माओवादी) का सदस्य था और अवैधानिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में सक्रियता से लिप्त था।

एनआईए को पता चला कि वह सीपीआई (माओवादी) के नेताओं और कैडर से संवाद करता था। वह एक माओवादी संगठन ‘पर्सिक्यूटेड प्रिज़नर्स सोलिडरिटी कमिटी’ का संयोजक भी था।

4. जब साक्ष्यों के आधार पर एनआईए ने मामले में उसकी भूमिका की पुष्टि कर ली तो 8 अक्टूबर 2020 को स्टेन स्वामी को झारखंड के रांची से गिरफ्तार किया गया। जब उसकी गिरफ्तारी हुई तो उसका अधिवक्ता पीटर मार्जिन भी उपस्थित था और कानून की सभी संबंधित धाराओं की जानकारी देने के बाद ही गिरफ्तारी हुई।

एनआईए ने गिरफ्तारी के बाद सुनिश्चित किया कि विशेष न्यायालय के समक्ष ले जाने से पहले उसकी आवश्यक चिकित्सीय जाँच हो। एक आरोपी को जो अधिकार मिलते हैं, वह उसे दिए गए और रांची से मुंबई ले जाए जाने के दौरान उसकी उपयुक्त देखभाल की गई।

उसकी आयु का ध्यान रखते हुए एनआईए ने पूछताछ के लिए स्टेन स्वामी की पुलिस हिरासत की माँग नहीं की जबकि तथ्य यह है कि उसके आरोपों के पर्याप्त साक्ष्य दर्ज किए जा चुके थे।

5. भारतीय अपराधी प्रक्रिया संहिता के खंड 54 के अनुसार स्टेन स्वामी की जाँच एक चिकित्सक ने की और न्यायालय में ले जाने से पहले उसका स्वास्थ्य स्थिर प्रमाणित किया गया था। न्यायिक हिरासत में लेने से पहले भी उसकी एक चिकित्सीय जाँच हुई थी।

6. 9 अक्टूबर 2020 को स्टेन स्वामी को मुंबई में एनआईए के विशेष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया। उसने जाँचकर्ताओं द्वारा दुर्व्यवहार की कोई शिकायत नहीं की। उसके और भीमा कोरेगाँव मामले के अन्य आरोपियों के विरुद्ध एक पूरक आरोप-पत्र दायर किया गया।

इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 120 (ब), 121, 121 (अ), 124 (अ) और 34 तथा अवैधानिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 13, 16, 18, 20, 38 और 39 का उल्लेख था। आरोप-पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद न्यायालय ने उसकी न्यायिक हिरासत का आदेश दिया जिसमें उसे मुंबई में तलोजा स्थित केंद्रीय कारावास में रखा जाना था।

7. आयु और गिरफ्तारी पूर्व स्वास्थ्य समस्याओं के कारण स्टेन स्वामी को कारावास अस्पताल में एक पृथक कोठरी आवंटित की गई। चिकित्सा अधिकारी की सलाह पर उसे दो परिचारक भी दिए गए थे।

इस कोठरी में सभी आवश्यक सुविधाएँ थीं और स्टेन स्वामी को व्हीलचेयर, वॉकर, चलने के लिए छड़ी, स्ट्रॉ, सिपर, मग, कमोड कुर्सी, कान की मशीन के लिए बैटरी, दंत चिकित्सा दी गई। मनोचिकित्सक और दूरभाष पर चिकित्सा सलाह भी उसकी पहुँच में थे।

8. स्टेन स्वामी ने बॉम्बे उच्च न्यायालय से जमानत की माँग की लेकिन उसकी याचिका खारिज हो गई। 23 मार्च 2021 को एनआईए के विशेष न्यायालय ने उसकी जमानत याचिका खारिज की। न्यायाधीश का कहना था-

यदि याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोपों को सही दृष्टिकोण में देखा जाए तो यह निष्कर्ष निकालने में कोई संकोच नहीं होगा कि याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अधिक मायने रखता है समुदाय का सामूहिक हित। उसकी आयु और कथित रोग याचिकाकर्ता के पक्ष में नहीं जाएँगे…

9. 21 मई 2021 को स्टेन स्वामी ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष एक आपराधिक अपील दायर की। इसकी प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र शासन ने जेजे हॉस्पिटल के चिकित्सक मंडल की एक रिपोर्ट दायर की। न्यायालय ने सुझाव दिया कि वह जेजे हॉस्पिटल में चिकित्सा लाभ उठाए।

उसने प्रस्ताव नकार दिया। उसके बाद 28 मई 2021 को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने बांद्रा स्थित होली फैमिली हॉस्पिटल में उपचार कराने की स्टेन स्वामी की याचिका को स्वीकृति दे दी और नियमानुसार उसे एक परिचारक दिया गया।

होली फैमिली हॉस्पिटल एक बहु-विशेषज्ञता अस्पताल है जिसे कैथोलिक उर्सुलिन सिस्टर्स चलाती हैं। महाराष्ट्र शासन को उपचार के दौरान सुरक्षा देने का निर्देश दिया गया। होली फैमिली हॉस्पिटल में रहने की उसकी अवधि बढ़ाकर 6 जुलाई 2021 कर दी गई थी।

10. 3 जुलाई को होली फैमिली हॉस्पिटल की देखरेख में स्टेन स्वामी को हृदयाघात हुआ। होली फैमिली हॉस्पिटल के डॉ ईएन डीसूज़ा ने 5 जुलाई को घोषणा की कि उपचार के दौरान स्टेन स्वामी की मृत्यु हो गई।

ये ऐसे तथ्य है जिन्हें नकारा नहीं जा सकता और ये हमारा परिचय उस दृष्टिकोण से कराते हैं जिसे स्टेन स्वामी की मृत्यु पर हो रही आलोचक टिप्पणियों और निंदाओं से दूर रखा गया है। इन तथ्यों के आधार पर कुछ टिप्पणियाँ निम्नलिखित हैं-

पहली, कोई भी व्यक्ति जो यह बोलता है कि स्टेन स्वामी की मृत्यु राज्य की हिरासत में चिकित्सा सुविधा के अभाव में हुई, वह मात्र लांछन लगाने वाला व्यक्ति है। स्टेन स्वामी होली फैमिली हॉस्पिटल के चिकित्सकों की देखरेख में 28 मई से था। उसने जेजे हॉस्पिटल के स्थान पर स्वयं इस अस्पताल को चुना था। उसे सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य सुविधा विशेषज्ञों के माध्यम से मिल रही थी। उसकी मृत्यु हृदयाघात से हुई जो इस आयुवर्ग के लोगों में आश्चर्यजनक नहीं है।

दूसरी, न्यायालय ने प्रथम दृष्टि में माना कि स्टेन स्वामी के विरुद्ध जो साक्ष्य हैं उन्हें झूठा या गलत नहीं कहा जा सकता है। भारतीय विधानों के अधीन उसपर विशिष्ट आपराधिक आरोपों के लिए कार्रवाई चल रही थी।

वह जमानत का अधिकारी था या नहीं, इसका निर्णय न्यायपालिका के हाथ में है, न कि किसी व्यक्ति की राय से होगा। दर्ज किए गए आरोपों और साक्ष्यों को ध्यानपूर्वक देखने के बाद न्यायालय ने उसे जमानत न देने के पक्ष में निर्णय सुनाया। भारत (या किसी भी देश) के विधान आयु, लिंग, जाति, संप्रदाय या मत के आधार पर भेद नहीं करते हैं।

तीसरी, अपनी विचारधारा के हिंसक परिणाम का उत्तरदायी वह विचारक ही होता है। यह कहना पाखंड होगा कि माओवादी विचारधारा को मानने वाला या माओवादी विचारक या माओवादी विचारों से सहमत होने वाले व्यक्ति को दंड नहीं दिया जा सकता, वह भी तब जब उसके विचारों के कारण हिंसा फैले।

स्टेन स्वामी सिर्फ माओवादी विचारधारा को मानता ही नहीं था, बल्कि वह उन माओवादियों के संपर्क में भी था जो इस विचारधारा के आधार पर शासन के विरुद्ध शस्त्र उठाते हैं। झारखंड में पाथलगढ़ी आंदोलन के नाम पर संविधान के विरुद्ध लोगों को भड़काने का आरोप उसपर लग चुका है।

चौथी, भीमा कोरेगाँव मामला एक जटिल मुद्दा है जिसमें कपटी एक्टिविज़्म का उद्देश्य सामाजिक संघर्ष, सामुदायिक घृणा और विवाद खड़ा करना था जो संवैधानिक कानून को न सिर्फ चुनौती देता है, बल्कि उसके लिए खतरा भी है।

‘एल्गार परिषद’ एक प्रयोगशाला था यह देखने के लिए कि अन्य साधनों से शासन के विरुद्ध युद्ध कैसे छेड़ा जाए। शहरी माओवाद का विस्तार करके जान-माल को हानि पहुँचाना भी इसका लक्ष्य था। एनआईए जाँच ने ‘बौद्धिक’ एक्टिविज़्म के छल पर से पर्दा उठा दिया है। इस मामले में हमें न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। तब तक निर्दोष होने का दावा खोखला रहेगा।

पाँचवी, जनजातीय समुदायों में काम करने वाले और उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाले स्टेन स्वामी को कैथोलिक पादरी होने के लिए निशाना बनाया गया, यह एक विरूपित कहानी है क्योंकि उसके संबंधों और गतिविधियों के तथ्य सामने हैं।

ये सब एक रात की बात नहीं है, ये सब काफी लंबे समय से था और स्टेन स्वामी हमेशा से 84 वर्ष का ही नहीं था। भारत का विपक्ष याद करे कि कब वास्तव में ईसाई मिशनरियों को उनकी गतिविधियों के लिए निशाना बनाया गया था- जब राजीव गांधी सत्ता में थे तो एक वृद्ध पादरी को भारत से निष्कासित कर दिया गया था, जब इंदिरा गांधी सत्ता में थी तो कलकत्ता की बस्ती में निर्धनों और भूखों को खाना खिलाने वाले ब्रिटिश पादरी को वापस भेज दिया गया था।

कुछ अन्य उदाहरण भी हैं। वहीं, दूसरी ओर सात दशकों से भारत में काम करने वाले स्पेन के कैथोलिक पादरी को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नागरिकता दी गई। पहले उनकी नागरिकता याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था जब कांग्रेस सत्ता में थी, आखिरी ऐसी घटना 2012 में हुई थी।

छठी, ध्यान रखें कि माओवादी और उनके ‘बौद्धिक’ सहयोगी लोकतंत्र की नींव को हिलाने वाली हिंसा को भड़काने के दोषी हैं, ये एक गणतंत्र के हर सिद्धांत के विरोधी होते हैं जो उन्हें संविधान और उसके प्रावधानों का भी विरोधी बना देता है।

पिछले दो दशकों में माओवादियों ने 3,600 नागरिकों और 2,616 सुरक्षा बलों के कर्मियों की हत्या की है। नरसंहारों की संख्या अगणित है। वाहनों को फूँका गया, गश्ती दलों पर घात लगाकर हमला किया गया, ट्रेनों की पटरियाँ उखाड़ी गईं। माओवादी विचारधारा न मानने वाले ग्रामीणों को मारा गया।

विद्यालयों का विध्वंस किया गया, महत्त्वपूर्ण संचार नेटवर्कों को उड़ाया गया, माओवाद को सफल करने के लिए निर्धनता और गरीबी को थोपा गया। यदि हम माओवादी विचारधारा के पक्षधरों को दोषमुक्त कर दें और माओवादी आतंकवाद का सारा दोष माओवादी कैडर पर मढ़ दें तो यह विचारक को विशेषाधिकार देने जैसा हो जाएगा।

हर मृत्यु पर शोक करना चाहिए। दुखद यह है कि कुछ मौतों पर शोक मनाया जाता है, वहीं इस हिंसक विचारधारा का शिकार हुए पीड़ितों के शोक को ढक दिया जाता है। मानवाधिकार सिर्फ कुछ लोगों का अधिकार नहीं है। वास्तव में जिन्हें मारा गया, उनके मानवाधिकार का हनन हुआ है और अभी भी माओवादियों के हाथों निर्मम हत्याएँ जारी हैं।

कंचन गुप्ता भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार हैं।